नई दिल्ली: टीचर बनने के तीन एस्पिरेंट्स ने हरियाणा में संस्कृत के प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक के तौर पर सरकारी नौकरी पाने के लिए आठ साल तक कोशिश की. जब हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग ने आखिरकार उनकी लिखित परीक्षा पास कर दी, तो उन्हें लगा कि अब उनका इंतज़ार खत्म हो गया है.
इसके बजाय, उन्हें बताया गया कि उनकी उम्र ज्यादा हो गई है.
लेकिन पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुताबिक, मामला यहां उल्टा था. आयोग के अपने नियमों में उन्हें इसी उम्र संबंधी अयोग्यता से छूट दी गई थी, लेकिन यह बात इसलिए सामने नहीं आ सकी क्योंकि उम्मीदवारों ने 150 रुपये की फीस, महिलाओं के लिए 75 रुपये, भर दी थी, जबकि उन्हें यह फीस देनी ही नहीं थी.
जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने निर्मला देवी, सोमवती और शमशेर सिंह की ओर से दायर तीन जुड़ी हुई याचिकाओं का निपटारा किया. इन पर 12 अगस्त को एक साझा आदेश सुनाया गया और 1 सितंबर को HC की वेबसाइट पर अपलोड किया गया. कोर्ट ने कहा कि इन तीनों उम्मीदवारों को भर्ती प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जाना चाहिए था.
हाई कोर्ट ने 27 जुलाई 2024 के परिणाम और शुद्धिपत्र को उस हिस्से तक रद्द कर दिया, जिसमें इन तीन याचिकाकर्ताओं को बाहर किया गया था. कोर्ट ने आयोग को निर्देश दिया कि वह सभी दूसरी शर्तें पूरी करने के आधार पर योग्यता क्रम में इनकी उम्मीदवारी पर नए सिरे से विचार करे.
संबंधित सक्षम अधिकारी को आदेश मिलने के दो महीने के भीतर इस पर कार्रवाई करनी होगी.
याचिकाकर्ताओं को उनके साथ भर्ती हुए उम्मीदवारों की जॉइनिंग की तारीख से जुड़े लाभ और कागज़ी तौर पर मिलने वाले लाभ दिए जाएंगे. हालांकि, उन्हें वास्तविक वेतन उसी तारीख से मिलेगा, जिस दिन वे खुद नौकरी जॉइन करेंगे.
नौकरी जो बार-बार हाथ से निकलती रही
यह मामला 2016 का है, जब आयोग ने पहली बार TGT (संस्कृत) पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था. बाद में वह भर्ती प्रक्रिया वापस ले ली गई. आयोग ने 2019 में फिर कोशिश की, लेकिन 31 मई 2019 को वह भर्ती भी रद्द कर दी गई. याचिकाकर्ताओं ने दोनों बार आवेदन किया था.
जब आयोग ने 2023 में तीसरी बार इन पदों के लिए विज्ञापन जारी किया, तो उसने उन उम्मीदवारों के लिए एक सुरक्षा व्यवस्था रखी, जिन्हें पहले दो बार निराश होना पड़ा था.
नए विज्ञापन के Clause 11 में कहा गया था कि ऐसे उम्मीदवारों को उम्र में छूट, हरियाणा शिक्षण पात्रता परीक्षा की अनिवार्यता से छूट और आवेदन फीस में छूट मिलेगी. इसके लिए उन्हें दोबारा आवेदन करना होगा और पहले भरी गई फीस का सबूत लगाना होगा.
आयोग ने इन उम्मीदवारों को ‘Unique IDs’ भी जारी की थीं, जिससे यह पता चलता था कि वे रद्द किए गए पुराने विज्ञापनों वाले उम्मीदवार हैं.
कहां हुई चूक
हालांकि, ऑनलाइन पोर्टल में फीस से छूट लेने के लिए कोई बॉक्स नहीं था, जिसे उम्मीदवार टिक कर सकें. उम्मीदवारों को यह समझ नहीं आ रहा था कि खाली जगह को सिस्टम कैसे पढ़ेगा. इसलिए उन्होंने वही किया जो नौकरी की चिंता में कोई भी उम्मीदवार कर सकता है: उन्होंने सुरक्षित रहने के लिए फीस भर दी.
उनके आवेदन स्वीकार कर लिए गए. उन्होंने 30 अप्रैल 2023 को परीक्षा दी. वे परीक्षा में पास हो गए और उनके अंक उनकी श्रेणियों में आखिरी बार चुने गए उम्मीदवारों से भी ज्यादा थे.
फिर 28 जुलाई 2024 को एक नोटिस आया. अंतिम परिणाम में उनके नाम नहीं थे. वजह बताई गई कि वे “overage” हैं. इस पद के लिए अधिकतम उम्र 42 साल थी और कट-ऑफ तारीख तक तीनों उम्मीदवार यह उम्र पार कर चुके थे.
जब वे आयोग के पास दोबारा गए, तो उन्हें इससे भी अजीब जवाब मिला. आयोग ने कहा कि क्योंकि उन्होंने फीस में छूट लेने के बजाय फीस भर दी थी, इसलिए सिस्टम ने उन्हें पुराने उम्मीदवारों के बजाय नए आवेदक मान लिया, जिन्हें उम्र में छूट का फायदा नहीं मिलना था.
अपना आवेदन किसी तकनीकी गड़बड़ी से बचाने के लिए फीस भरने का वही कदम उनकी योग्यता खत्म होने की वजह बन गया.
‘मेहनत का अयोग्यता में बदल जाना’
आयोग के वकील ने कोर्ट को बताया कि पोर्टल को इस तरह नहीं बनाया गया था कि किसी उम्मीदवार की फीस जमा करने को उसकी उम्र में छूट के दावे से जोड़ा जा सके. दोनों चीजों पर अलग-अलग कार्रवाई हुई और फीस भरते ही सिस्टम ने अपने आप उम्मीदवार को “fresh application” यानी नया आवेदन करने वाला मान लिया.
आयोग ने अपने हलफनामे में इससे भी आगे की बात कही. उसने बताया कि Unique IDs सिर्फ उन्हीं उम्मीदवारों को दी गई थीं, जिन्हें आयोग ने उनके पहले के असफल आवेदनों के आधार पर पहले ही योग्य माना था.
जस्टिस बराड़ ने इस नतीजे को “एक अजीब नया नियम” बताया. उन्होंने कहा कि जिस फीस से छूट दी गई हो, वही फीस अगर उम्मीदवार अपनी तरफ से भर दे, तो उसके लिए अयोग्यता की वजह कैसे बन सकती है.
जज ने इस नतीजे को “एक बहुत ही क्रूर विडंबना, जिसे यह कोर्ट नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता” बताया. उन्होंने कहा कि उम्मीदवारों की सावधानी ही उनकी अयोग्यता का कारण बन गई.
‘Red Keep के गलियारों में नहीं’
कोर्ट ने कहा कि आयोग ने याचिकाकर्ताओं को उनकी पिछली कोशिशों को स्वीकार करते हुए Unique IDs दी थीं, ऐसे आवेदन स्वीकार किए जो सामान्य तौर पर उम्र की शर्त पूरी नहीं करते, छूट होने के बावजूद उनसे फीस ली और फिर अपने ही खराब सिस्टम का सहारा लेकर उन्हें बाहर कर दिया.
Game of Thrones का ज़िक्र करते हुए जज ने लिखा कि ये “Red Keep के गलियारे” नहीं हैं, जहां कोई “power is power” कहकर अपनी “मनमर्जी और इच्छाओं” के आधार पर काम कर सकता है.
कोर्ट ने कहा कि सरकारी भर्ती व्यक्तिगत पसंद के आधार पर नहीं चलती, बल्कि कानून के मुताबिक चलती है. किसी “सिर्फ तकनीकी चूक” की वजह से योग्य उम्मीदवारों को उनके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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