नई दिल्ली: सोमवार को दिप्रिंट को दिए बयान में ईरान ने कहा कि एक “सभ्यतागत देश” होने के नाते वह पश्चिमी दबाव के आगे नहीं झुकेगा और अगर खाड़ी देशों की ज़मीन का इस्तेमाल अमेरिका ईरान पर हमला करने के लिए करता है, तो उसे सैन्य रूप से जवाब देने का “वैध” अधिकार है.
भारतीय स्थित ईरानी दूतावास ने बयान में कहा, “ईरान सिर्फ आज की राजनीति का खिलाड़ी नहीं है, बल्कि हज़ारों साल पुरानी सभ्यता है, जिसका क्षेत्र और दुनिया के इतिहास में खास स्थान है. यह देश सदियों की परीक्षाओं, हमलों, प्रतिबंधों और दबावों से निकलकर अपनी पहचान, आज़ादी और सम्मान को बनाए रखे हुए है.”
यह बयान इज़रायल के भारत में राजदूत रूवेन अज़ार की टिप्पणी के जवाब में आया है.
बयान में आगे कहा गया, “ईरान हज़ारों साल पुरानी सभ्यता है, जिसने साम्राज्यों के उतार-चढ़ाव, प्रतिबंधों, हमलों और दबावों को झेला है, फिर भी कायम है. इस संदर्भ में इस्लामिक रिपब्लिक उस राष्ट्र की इच्छा का विस्तार है, जिसने स्वतंत्रता को कभी समझौता न करने वाला सिद्धांत माना है. इसी ऐतिहासिक जड़ के कारण बाहरी विश्लेषक अक्सर ईरान को समझने में गलती कर जाते हैं.”
दूतावास ने साफ कहा कि तेहरान “वैध आत्मरक्षा के अधिकार” पर कायम है, जिसके तहत कोई भी संप्रभु देश “हमले के स्रोत को अनुपातिक जवाब” दे सकता है.
बयान में कहा गया, “हमारे शहीद नेता आयतुल्ला अली खामेनेई ने पहले ही साफ कहा था कि अगर अमेरिका अरब देशों में अपने ठिकानों का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ करता है, तो इस्लामिक रिपब्लिक सीधे उन स्रोतों पर हमला करेगा, जिससे संघर्ष क्षेत्रीय स्तर तक फैल सकता है.”
पिछले हफ्ते रूवेन अज़ार ने दिप्रिंट से बातचीत में कहा था कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ईरान में फैसले ले रहा है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ का बंद होना उल्टा ईरान पर भारी पड़ा है, क्योंकि अब अमेरिका ने नौसैनिक नाकाबंदी कर दी है.
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ रहा है. यूएई ने सोमवार को बताया कि उसने ईरान द्वारा दागे गए 19 मिसाइल और ड्रोन को रोका. यूएई के फुजैरा में पेट्रोलियम कॉम्प्लेक्स पर हुए हमले में तीन भारतीय घायल हुए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को इस हमले की निंदा की और देशों से नागरिक ढांचे पर हमले रोकने की अपील की.
ईरान की जवाबी कार्रवाई का सबसे ज्यादा असर यूएई पर पड़ा है. 40 दिन के युद्ध के दौरान ईरान से 2,500 से ज्यादा मिसाइल और ड्रोन यूएई पर दागे गए, जिनमें सोमवार के हमले भी शामिल हैं.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल मच गई है. अमेरिका ने ‘Project Freedom’ शुरू किया, जिसमें गाइडेड मिसाइल डेस्ट्रॉयर जहाजों की मदद से व्यापारिक जहाजों को इस रास्ते से निकालने में मदद दी जा रही है. ईरान के विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अरागची ने सोमवार को कहा कि यह “राजनीतिक संकट” है और इसका कोई “सैन्य समाधान” नहीं है.
8 अप्रैल से अमेरिका और ईरान के बीच एक कमजोर युद्धविराम लागू है. 11 अप्रैल को इस्लामाबाद में हुई सीधी बातचीत का पहला दौर भी किसी शांति समझौते पर खत्म नहीं हुआ. यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था, जब संयुक्त अमेरिका-ईरान हवाई हमलों में आयतुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी.
दूतावास ने कहा, “ईरानी जनता ने दबाव के सामने कभी चुप्पी नहीं साधी. जब खतरे और हमले बढ़े, तो लोग पीछे नहीं हटे, बल्कि सड़कों पर उतर आए, जिससे उनकी एकता दिखी और यह साबित हुआ कि राष्ट्रीय सुरक्षा उनके लिए सिर्फ एक विचार नहीं है.”
बयान में आगे कहा गया, “ईरानियों का देश छोड़कर भागने के बजाय वापस लौटना और लोगों की लगातार सार्वजनिक उपस्थिति यह दिखाती है कि ईरान की असली ताकत सिर्फ सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि लोगों, उनकी जमीन और उनकी राष्ट्रीय पहचान के बीच गहरा रिश्ता है.”
दूतावास ने यह भी कहा कि ईरान को “सिर्फ सुरक्षा या प्रचार के नजरिए से नहीं समझा जा सकता” और इज़रायल पर 1948 से 1978 तक लगातार युद्ध और सैन्य कार्रवाइयों में शामिल होने का आरोप लगाया.
बयान में कहा गया कि कई दशकों के प्रतिबंध और आर्थिक दबाव के बावजूद ईरान ने इन्हें अपनी रणनीति में बदल दिया और उन्नत तकनीक, रक्षा उद्योग और वैज्ञानिक शोध जैसे क्षेत्रों में अपनी क्षमता बढ़ाई.
“इस नजरिए से ईरान पर हमला सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि उन सभी स्वतंत्र और सभ्यतागत मॉडलों के खिलाफ एक व्यापक विरोध है, जो शक्तिशाली देशों के दबाव में आने से इनकार करते हैं.”
अरागची ने एक्स पर कहा, अमेरिका और इज़रायल के लिए सबसे बड़ी सुरक्षा चिंता ईरान की संभावित परमाणु हथियार क्षमता है. पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है और तेहरान ने शांति वार्ता को लेकर अपनी स्थिति इस्लामाबाद को बताई है.
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