त्रिशूली: घर तक पहुंचने का सफर, जिसमें पहले विष्णु गुरंग को 20 मिनट लगते थे, अब करीब 2 दिन का हो गया है. अपने बैग पकड़े गुरंग और उनकी पत्नी, 100 और लोगों के साथ, नुवाकोट में त्रिशूली नदी के किनारे लाइन में खड़े हैं. वे नदी के दूसरे किनारे जाने के लिए एक अजीब तरह के साधन का इंतिजार कर रहे हैं. यह एक जिपलाइन है.
26 अगस्त की बाढ़ ने उत्तरी नेपाल के रसुवा और नुवाकोट जिलों में भारी तबाही मचाई. इसने पूरी-पूरी बस्तियां, बाजार और सबसे जरूरी, त्रिशूली नदी पर बने करीब 20 पुल बहा दिए. ये पुल पहाड़ी इलाके में अलग-अलग जगहों पर बने हुए थे.
गुरंग नुवाकोट में नदी के पूर्वी किनारे, ऊपर की तरफ बनी त्रिशूली कॉलोनी में रहते थे. इसलिए उनका घर और परिवार इस तबाही से सुरक्षित रहे. लेकिन वह और कई दूसरे लोग नदी के दूसरी तरफ मौजूद त्रिशूली बाजार तक पहुंचने का रास्ता पूरी तरह खो बैठे. वहां से आगे सबसे नजदीकी शहर बिदुर और यहां तक कि काठमांडू जाने का रास्ता भी बंद हो गया.
पिछले तीन दिनों से नेपाल सशस्त्र पुलिस के अधिकारियों ने यहां एक अस्थायी जिपलाइन लगा रखी थी और अब गुरंग नदी के दूसरे किनारे पहुंच चुके थे. वह घर जाने का इंतजार कर रहे थे.
“हम सुबह 5 बजे से यहां हैं और जिपलाइन से घर वापस जाने के लिए अपनी बारी का इंतिजार कर रहे हैं. अब दोपहर के 12 बज गए हैं. शायद अगले दो घंटे में हमारी बारी आ जाए,” 60 साल के रिटायर्ड सेना अधिकारी गुरंग ने कहा.

दो दिन की परेशानी
गुरंग और उनकी पत्नी शनिवार सुबह जल्दी उठे और अपने घर से नदी के किनारे तक पैदल चले, ताकि जिपलाइन से त्रिशूली बाजार और फिर बिदुर जा सकें. आम तौर पर वह अपने घर से 1 किलोमीटर से भी कम दूरी पर बने बेली ब्रिज से बाइक चलाकर जाते और 20 मिनट में बिदुर पहुंच जाते. अब उन्हें एक सूची में अपना नाम लिखवाना था और अपनी बारी आने से पहले दो घंटे इंतजार करना पड़ा.
गुरंग ने बताया, “मेरी बेटी बिदुर के एक राहत कैंप में नर्स के तौर पर है … वह पहले दिन से ही बाढ़ पीड़ितों की देखभाल कर रही है.” उन्होंने कहा, “मुझे उसके लिए कुछ साफ कपड़े लेकर आने थे. वह इतनी व्यस्त है कि यहां नहीं आ सकती थी और उसके आने में भी बहुत ज्यादा समय लगता.”
दूसरे किनारे पहुंचने के बाद गुरंग और उनकी पत्नी ने बिदुर जाने वाली बस का इंतजार किया, क्योंकि जिस सड़क से पहले आसानी से जाया जा सकता था, वह अब बाढ़ की मिट्टी और गाद से पूरी तरह भर गई थी. जब वे अपनी नर्सिंग की पढ़ाई कर रही बेटी से मिले, तब शाम हो चुकी थी. उन्होंने बिदुर में रात बिताने और अगली सुबह जिपलाइन से वापस जाने का फैसला किया.
गुरंग त्रिशूली नदी के दोनों किनारों और ऊपर की तरफ मौजूद किमटांग जैसे दूसरे गांवों के उन कई लोगों में से एक हैं, जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी बाढ़ ने कई तरह से बदल दी है. मोबाइल टावर, पुल और जरूरी संपर्क वाली सड़कों के नष्ट होने से रसुवा और नुवाकोट में बहुत से लोगों की जिंदगी प्रभावित हुई है, चाहे उनके घर सीधे बाढ़ से प्रभावित हुए हों या नहीं.
नई स्थिति की आदत डालना
55 साल के किमटांग गांव के रहने वाले धनबहाद तमांग लगातार हो रहे पेट के संक्रमण की जांच कराने के लिए 20 अगस्त को काठमांडू गए थे. वहां अस्पताल में कई दिन भर्ती रहने और अपने दूर के रिश्तेदार से इलाज में मदद मिलने के बाद, वह आखिरकार 5 सितंबर को घर लौटने के लिए स्वस्थ महसूस करने लगे.
लेकिन जिस सड़क से वह गए थे, वह अब मौजूद ही नहीं थी. उन्होंने बाढ़ के बारे में सुना था, लेकिन नुकसान कितना हुआ है, इसका उन्हें अंदाजा नहीं था. काठमांडू से बस से त्रिशूली बाजार पहुंचने के बाद उन्हें पता चला कि उनके गांव जाने वाला पुल बाढ़ में बह गया है.
तमांग ने कहा, “मैंने आसपास के लोगों से पूछा कि किमटांग कैसे पहुंचूं. मैंने सोचा कि देविघाट की तरफ चला जाऊं, लेकिन पता चला कि वहां का पुल भी बह गया है.” बैकपैक लिए और अपने सूटकेस पर बैठे तमांग ने कहा, “आखिर में मुझे बताया गया कि मैं यहां जिपलाइन से जा सकता हूं.”

जिपलाइन 2 सितंबर को लगाई गई थी. बाढ़ से प्रभावित पूरे इलाके में, बेत्रावती और देविघाट में भी इसी तरह की जिपलाइन लगाई गई हैं. इनका इस्तेमाल लोगों, राहत सामग्री और राहत कर्मचारियों को नदी के दोनों किनारों तक पहुंचाने के लिए किया जा रहा है, जब तक सरकार कोई स्थायी समाधान नहीं निकालती.
त्रिशूली जिपलाइन पर सशस्त्र पुलिस के अधिकारियों की मदद नेपाल रेड क्रॉस के वालंटियर्स कर रहे हैं. वे इस पथरीली जिपलाइन को संभालने में मदद करते हैं, जिससे एक बार में दो लोग खतरनाक नदी को पार कर सकते हैं. भीड़ में छात्र, खरीदारी करने आए लोग और नदी के दूसरे किनारे अपने रिश्तेदारों से मिलकर लौट रहे लोग भी शामिल हैं.
आखिरकार पुलिसकर्मियों ने गुरंग का नाम पुकारा. वह और उनकी पत्नी जल्दी से आगे बढ़े, लोहे की सीढ़ी पर चढ़े और ऑपरेटर द्वारा दिए गए लाइफ जैकेट पहन लिए.
गुरंग ने कहा, “हमें शायद कल बट्टार में अपने अंकल से मिलने आना पड़े. लगता है कि अब हमें जिपलाइन की आदत डाल लेनी चाहिए.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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