नई दिल्ली: उत्तर कोरिया के पुंग्ये-री परमाणु परीक्षण स्थल पर माउंट मंताप के नीचे किए गए परमाणु परीक्षणों ने जमीन के अंदर मौजूद निष्क्रिय फॉल्ट लाइनों को फिर से सक्रिय कर दिया. इनकी वजह से परीक्षण खत्म होने के कई साल बाद भी भूकंप आते रहे. Science में प्रकाशित एक नई स्टडी के मुताबिक, पुसान नेशनल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पाया कि 2006 से 2017 के बीच किए गए छह भूमिगत परमाणु परीक्षणों के बाद 2008 से 2025 के बीच स्थानीय स्तर पर 1,399 भूकंप आए.
स्टडी में कहा गया कि माउंट मंताप पर देखी गई यह घटना अमेरिका के नेवादा और कजाकिस्तान के सेमिपालाटिंस्क जैसे ऐतिहासिक परमाणु परीक्षण स्थलों से अलग थी.
रिपोर्ट में कहा गया, “भूमिगत परमाणु विस्फोट आमतौर पर थोड़े समय के लिए भूकंपीय गतिविधियां पैदा करते हैं, जो परीक्षण बंद होने के बाद तेजी से कम हो जाती हैं. (उत्तर कोरिया के परीक्षण) इस सामान्य धारणा को चुनौती देते हैं. इससे पता चलता है कि कुछ खास भूगर्भीय परिस्थितियों में भूमिगत परमाणु परीक्षण कई सालों तक फॉल्ट को फिर से सक्रिय कर सकते हैं.”
ज्यादातर भूमिगत परमाणु परीक्षण शाफ्ट या सुरंगों में किए जाते हैं. परीक्षण के दौरान होने वाले विस्फोट भूकंपीय तरंगें पैदा कर सकते हैं. स्टडी के मुताबिक, 3 सितंबर 2017 को किया गया आखिरी परीक्षण उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा परमाणु परीक्षण था. इसकी विस्फोटक क्षमता करीब 160 किलोटन आंकी गई थी.
इससे 6.3 तीव्रता का भूकंप आया था. इस भूकंप की वजह से पहाड़ की चोटी 3.5 मीटर ऊपर उठ गई थी और सुरंगों के अंदर एक हिस्सा ढह भी गया था.
स्टडी में चीन और दक्षिण कोरिया के क्षेत्रीय स्टेशनों से मिले भूकंपीय तरंगों के डेटा का अध्ययन किया गया. ये स्टेशन परीक्षण स्थल से करीब 80 से 200 किलोमीटर दूर हैं. वैज्ञानिकों ने 17 साल के डेटा का अध्ययन कर यह समझने की कोशिश की कि इन विस्फोटों और धमाकों का लंबे समय तक कोई असर हुआ या नहीं.
वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि 1904 से 2017 के बीच माउंट मंताप के पास मौजूद इस महाद्वीपीय क्रस्ट में लगभग कोई गतिविधि नहीं थी. परीक्षण शुरू होने से पहले 100 साल से ज्यादा समय तक इस जगह के 50 किलोमीटर के दायरे में किसी क्रस्टल भूकंप का रिकॉर्ड नहीं था. लेकिन परीक्षणों के बाद 2017 से 2025 के बीच लगातार टेक्टोनिक फॉल्ट मूवमेंट देखा गया और यह धीरे-धीरे बढ़ता गया.
हालांकि, पुसान के वैज्ञानिकों ने इस लंबे समय तक चलने वाली टेक्टोनिक गतिविधि की वजह भी बताई. इसके पीछे परीक्षण स्थल की खास भौगोलिक स्थिति, पहले से मौजूद फॉल्ट लाइनों के पास इसका होना, पहाड़ की बहुत खड़ी ढलान और लगातार किए गए विस्फोटों से बना दबाव शामिल है.
1,399 भूकंपों में से सिर्फ 955 के एपिसेंटर की जानकारी मिल सकी. इससे पता चला कि भूकंप क्रस्ट में मौजूद दो साफ तौर पर पहचानी गई फॉल्ट लाइनों के आसपास हो रहे थे. प्लेट टेक्टोनिक्स की सीमाओं के उलट, फॉल्ट लाइनें धरती की सतह के नीचे मौजूद ऐसी दरारें हैं जो बहुत पुराने टेक्टोनिक मूवमेंट की वजह से बनी हैं. ये अक्सर भूकंपीय गतिविधि को प्रभावित करती हैं.
स्टडी में कहा गया, “हमारे अवलोकन बताते हैं कि बार-बार किए गए भूमिगत विस्फोटों ने स्थानीय तनाव की स्थिति को बदल दिया और ऊपरी क्रस्ट को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाया.”
दुनिया के दूसरे भूमिगत परमाणु परीक्षण स्थलों पर भी बड़े पैमाने पर विस्फोट हुए हैं. लेकिन वहां भूकंपीय गतिविधि सिर्फ कुछ दिनों तक ही चली. माउंट मंताप पर इसका असर इतने लंबे समय तक रहने की एक वजह यह है कि वहां पहाड़ की ढलान बहुत खड़ी और असमान है. इससे धरती की क्रस्ट पर अतिरिक्त दबाव पड़ा.
स्टडी में उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षणों के बाद हुई असामान्य भूकंपीय गतिविधि को समझाने के लिए ये वजहें बताई गई हैं. साथ ही, स्टडी ने कहा कि यह घटना Comprehensive Nuclear Test Ban Treaty (1996) के तहत परमाणु गतिविधियों की बेहतर निगरानी की जरूरत को दिखाती है.
स्टडी में कहा गया, “विस्फोट के कई साल बाद होने वाली भूकंपीय गतिविधि से यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि कोई घटना विस्फोट से जुड़ी है या टेक्टोनिक गतिविधि से. इसलिए लगातार निगरानी और भौतिक कारणों को ध्यान में रखकर की जाने वाली जांच जरूरी है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: BAPS एफिल टावर विवाद हिंदू vs बाकी लोगों का मुद्दा नहीं, मैं इसे गुजराती समस्या के तौर पर देखता हूं