नई दिल्ली: 1 मार्च 2026 को एक्स पर एक वीडियो फैलना शुरू हुआ, जिसमें एक युद्धपोत आग की लपटों में घिरा हुआ दिख रहा था और उससे काला धुआं उठ रहा था. अरबी भाषा के कई अकाउंट्स ने इसे इस दावे के साथ शेयर किया कि यह एक अमेरिकी डेस्ट्रॉयर है, जो ईरानी हमलों के बाद नुकसान झेलकर साइप्रस की ओर लौट रहा है. वीडियो असली था. लेकिन उसके साथ जो दावा किया गया, वह पूरी तरह झूठा था. यह तस्वीरें यूएसएस फॉरेस्टल में लगी आग की थीं, जो 1967 में शांति काल के दौरान हुई एक दुर्घटना थी, यानी मौजूदा संघर्ष से लगभग 60 साल पहले की घटना.
यही उस सूचना युद्ध की तस्वीर है, जो सैन्य युद्ध के साथ-साथ चल रहा है. 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर हमले के बाद से सोशल मीडिया पर मिसाइल हमलों, तबाही, लड़ाई और मौत से जुड़े वीडियो और तस्वीरों की बाढ़ आ गई है. इनमें से बहुत सा कंटेंट न तो असली घटनाएं दिखाता है और न ही मौजूदा समय का है. इसमें अक्सर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बनाए गए वीडियो या पुराने फुटेज को नया बताकर पेश किया गया है.
कोविड, ऑपरेशन सिंदूर और अब इस संघर्ष के दौरान गलत जानकारी पर नजर रखने वाली बूम लाइव की डिप्टी एडिटर (न्यूज़) स्वास्ति चटर्जी कहती हैं कि सबसे बड़ा बदलाव यही है. उन्होंने कहा, “एआई से बने विजुअल्स ने लगभग हमें घेर लिया है. जब तक हम फैक्ट-चेक करते हैं, तब तक कहानी लोगों के दिमाग में बन चुकी होती है.”
इस संघर्ष की परिस्थितियां ऐसी हैं कि गलत जानकारी फैलना लगभग तय था. मिशिगन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इन्फॉर्मेशन में प्रोफेसर जयोजीत पाल इसके पीछे तीन कारण बताते हैं.
उन्होंने कहा, “गलत जानकारी फैलने के आम तौर पर तीन कारण होते हैं: पहला, जब लोगों को पता नहीं होता कि क्या हो रहा है. दूसरा, जब लोग अपने अस्तित्व को लेकर डरते हैं. तीसरा, जब एक समूह के मन में दूसरे समूह को लेकर पहले से नकारात्मक सोच होती है. युद्ध की स्थिति, जहां इंटरनेट बंद हो जाता है, वहां ये तीनों कारण एक साथ मौजूद होते हैं. ऐसी स्थिति में गलत जानकारी बहुत तेजी से फैलती है.”
फर्जी कंटेंट का पैमाना
संघर्ष के सिर्फ पहले दो हफ्तों में अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर सामने आए उदाहरण अपने फैलाव और विविधता में बहुत बड़े हैं. समस्या को और बढ़ाने वाली बात यह रही कि इनमें से कई फर्जी पोस्ट सोशल मीडिया पर जाने-माने पत्रकारों ने भी शेयर किए.
एक वीडियो एक्स पर बहुत शेयर हुआ, जिसमें दावा किया गया कि ईरानी मिसाइलें तेल अवीव के बीचों-बीच गिर रही हैं. इसे 40 लाख से ज्यादा बार देखा गया. लेकिन यह तेल अवीव का वीडियो नहीं था. यह अल्जीरिया का फुटेज था, जिसमें फुटबॉल फैंस एक स्थानीय क्लब की जीत का जश्न मना रहे थे. पहले भी कई बार इस वीडियो का गलत इस्तेमाल किया जा चुका है. एक और वीडियो, जिसे 50 लाख से ज्यादा बार देखा गया, इस दावे के साथ शेयर किया गया कि अमेरिकी लड़ाकू विमान “आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा हवाई हमला” कर रहे हैं. बाद में पता चला कि यह आर्मा 3 नाम के एक सैन्य वीडियो गेम का सिमुलेशन था, जिसकी ग्राफिक्स बहुत असली जैसी दिखती हैं.
दूसरे फर्जी वीडियो में तेल अवीव पर मिसाइलों की बारिश, एयरपोर्ट पर कथित हमले से घबराकर भागते लोग, बंदूक की नोक पर पकड़े गए अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज, और ईरान की जमीन पर अमेरिकी सैनिकों का काफिला दिखाया गया. इनमें से कुछ भी असल में नहीं हुआ था. एक वीडियो, जिसमें कथित तौर पर इज़राइली लोग शांति की मांग करते हुए प्रदर्शन कर रहे थे और पोस्टरों पर हिब्रू जैसी दिखने वाली बेकार लिखावट थी, पूरी तरह एआई से बनाया गया था. इसी तरह का एक और वीडियो था, जिसमें ईरानी लोग “वी लव इज़राइल!” कहते दिखाए गए. वह भी उतना ही फर्जी था. इससे साफ है कि इस संघर्ष में किसी एक पक्ष के पास ही झूठी तस्वीरें बनाने का अधिकार नहीं है.
मौजूदा दौर को इस क्षेत्र के पहले के सभी संघर्षों से अलग बनाता है सिर्फ गलत जानकारी की मात्रा नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता और उसे बनाने की रफ्तार है. शोधकर्ता इसे पहली सचमुच एआई-आधारित जंग कह रहे हैं.
भारत-पाकिस्तान संघर्ष का भी अध्ययन कर चुके जयोजीत पाल बताते हैं कि यह युद्ध फर्जी कंटेंट के लिए इतना उपजाऊ माहौल क्यों बना. उन्होंने कहा, “दोनों पक्ष पत्रकारों की पहुंच पर भारी रोक लगा रहे हैं, और दोनों ने ऐसे ठिकानों को निशाना बनाया है जिन पर दुनिया का ध्यान तुरंत जाता है, जैसे होटल, वाणिज्य दूतावास और ऊर्जा प्रतिष्ठान. ऐसे हमलों में फर्जी फुटेज ज्यादा फैलती है, क्योंकि ये घटनाएं बहुत नाटकीय होती हैं और साथ ही खबरों पर रोक भी होती है.”
इसके साथ दो लंबे समय से चल रही वजहें भी जुड़ी हैं. पहली, गाज़ा बमबारी के दौरान बढ़ी ध्रुवीकरण की स्थिति, जिसने कुछ लोगों को ऐसा कंटेंट जल्दी मानने के लिए तैयार किया जो उनकी पहले से बनी नफरत से मेल खाता हो. दूसरी, अमेरिकी टैरिफ और दबाव की राजनीति को लेकर दुनिया के कई हिस्सों में पहले से मौजूद गुस्सा. पाल ने कहा, “इससे ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है जो यह देखना चाहते हैं कि अमेरिका युद्ध में कमजोर पड़ रहा है, और इसलिए वे ऐसा कंटेंट ज्यादा शेयर करते हैं.”
ईरान की सरकारी व्यवस्था इस मामले में खास तौर पर बहुत सक्रिय रही है. 28 फरवरी के बाद ईरान से जुड़े युद्ध संबंधी 18 दावे झूठे पाए गए, जबकि उससे पहले के दो हफ्तों में ऐसे सिर्फ पांच दावे थे. यह जानकारी न्यूज़ रेटिंग संस्था न्यूज़गार्ड ने दी. न्यूज़गार्ड ने यह भी पाया कि ईरानी मीडिया अब तेजी से एआई से बदली गई तस्वीरों का इस्तेमाल कर रहा है, जिनमें से कई ईरान के बाहर तैयार की गई थीं.
संघर्ष के जून 2025 वाले पहले चरण में ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी फार्स न्यूज़ ने ‘तेल अवीव बिफोर एंड आफ्टर द वॉर विद ईरान’ नाम से एक वीडियो जारी किया था, जिसमें लगभग पूरा फुटेज एआई से बना था. दूसरी ओर, इज़राइल समर्थक नेटवर्क्स ने तेहरान में इज़राइल समर्थक प्रदर्शनों के सिंथेटिक वीडियो फैलाए और दावा किया कि ईरानी सरकार के खिलाफ जनता का विरोध बढ़ रहा है.
यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो का रिसर्च समूह सिटिजन लैब, जो नागरिक समाज के खिलाफ डिजिटल खतरों का अध्ययन करता है, उसने इज़राइल समर्थित ‘प्रिजनब्रेक’ नेटवर्क का दस्तावेजीकरण किया. इस नेटवर्क ने एआई से बनी तस्वीरें और डीपफेक उसी समय फैलाए जब इज़राइल सैन्य हमले कर रहा था. भारत में भी गाज़ा युद्ध के दौरान दिखी इज़राइल समर्थक झुकाव फिर सामने आया है. बड़ी फॉलोइंग वाले कई भारतीय अकाउंट्स ने इज़राइली दावों के समर्थन में फर्जी कंटेंट शेयर किया.
वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर राकिब नाइक कहते हैं कि गलत जानकारी अब आधुनिक युद्ध का हिस्सा बन चुकी है. उन्होंने कहा, “डिजिटल या साइबर युद्ध अब पूरे युद्ध का एक अहम हिस्सा है. देश डिजिटल दुनिया में नैरेटिव की लड़ाई जीतना चाहते हैं. वे अपने देश के भीतर उम्मीद और जीत की भावना बनाए रखना चाहते हैं, और साथ ही दुनिया भर के लोगों की सोच को भी प्रभावित करना चाहते हैं.”
उन्होंने आगे कहा कि अब तरीके पूरी तरह बदल चुके हैं. “राज्य, गैर-राज्य समूह और आम लोग अब बहुत कम संसाधनों और कम तकनीकी कौशल के साथ औद्योगिक स्तर पर कंटेंट बना और बदल सकते हैं, ताकि गलत जानकारी बड़े पैमाने पर फैलाई जा सके.”
भारत: निशाना, बढ़ाने वाला और एक युद्धक्षेत्र
इस संघर्ष के गलत सूचना तंत्र को भारतीय पाठकों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण बनाने वाली बात यह है कि भारत सिर्फ दूर से देखने वाला देश नहीं है. भारत खुद एक सक्रिय निशाना भी है और अनजाने में इस गलत जानकारी को आगे बढ़ाने वाला माध्यम भी. इसके दांव केवल सैद्धांतिक नहीं हैं.
ईरान, इज़राइल और खाड़ी देशों के साथ भारत के द्विपक्षीय संबंधों में ऊर्जा आयात, व्यापार गलियारे, रक्षा साझेदारी और खाड़ी क्षेत्र में रहने और काम करने वाले लगभग 90 लाख भारतीयों का हित शामिल है. अगर ऐसा फर्जी कंटेंट फैलता है जो इस संघर्ष में भारत की स्थिति को गलत तरीके से पेश करे या खाड़ी देशों के लोगों के बीच भारत की छवि खराब करे, तो इससे वास्तविक कूटनीतिक और आर्थिक नुकसान हो सकता है.
बहरीन, भारत और इज़राइल के झंडों वाली एक पोस्ट में दावा किया गया कि बहरीन की खुफिया एजेंसी ने “नितिन मोहन” नाम के एक भारतीय टेलीकॉम इंजीनियर को गिरफ्तार किया है, क्योंकि उसने संवेदनशील भौगोलिक जानकारी इज़राइल की मोसाद एजेंसी को दी थी. स्वतंत्र फैक्ट-चेक करने वालों ने पाया कि यह पाकिस्तानी प्रचार अकाउंट्स द्वारा बनाया गया एआई आधारित फर्जी कंटेंट था. बहरीन के मंत्रालय के असली बयान में सिर्फ इतना कहा गया था कि छह लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जो एशियाई मूल के थे. उसमें न नाम थे, न राष्ट्रीयता बताई गई थी, और न किसी खुफिया एजेंसी से जुड़ाव का जिक्र था.
अलग से, अरबी भाषा के अकाउंट्स ने यह दावा फैलाया कि भारत और इज़राइल ने मिलकर पाकिस्तान के खिलाफ साजिश रची है. इसमें भारत को “हिंदू-जायोनिस्ट गठबंधन” का हिस्सा बताया गया. इस तरह का कंटेंट खास तौर पर भारत की छवि को उन मुस्लिम बहुल खाड़ी देशों में नुकसान पहुंचाने के लिए बनाया गया, जिन पर भारत तेल, विदेशी कमाई और व्यापार के लिए निर्भर है.
अब तक सामने आई सबसे संगठित कार्रवाइयों में से एक और भी जटिल थी. भारतीय जैसे नाम वाले कई अकाउंट्स, हिंदी भाषा का इस्तेमाल, और हिंदू सांस्कृतिक पहचान जैसे गायत्री मंत्र वाले बैनर और राष्ट्रवादी परिचय के साथ, एक ही समय पर लगभग एक जैसी पोस्ट डाल रहे थे जिनमें ईरान की युद्धक्षेत्र में जीत का दावा किया जा रहा था. ध्यान से देखने पर लगा कि यह एक समन्वित अभियान है, जिसमें भारतीय पहचान का रूप देकर ईरान समर्थक और अमेरिका विरोधी संदेश हिंदी बोलने वाले लोगों तक पहुंचाया जा रहा था.
ऑनलाइन सूचना के फैलाव का अध्ययन करने वाले रटगर्स यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर किरण गरिमेला भारत की इस संवेदनशील स्थिति को बड़े ढांचे में समझाते हैं. 7 अक्टूबर 2023 के बाद, जब हमास और इज़राइल के संघर्ष से गाज़ा युद्ध शुरू हुआ, तब संघर्ष से जुड़ी सामग्री को बढ़ाने में भारतीय अकाउंट्स की हिस्सेदारी बहुत ज्यादा थी. उन्होंने कहा, “कुछ लोग कह रहे थे कि इज़राइल यह काम भारत से करवाता है. बहुत बड़ी संख्या में सक्रियता है. लाखों अकाउंट्स ऐसे हैं जो राजनीतिक दलों से जुड़े हैं और जिनके राजनीतिक लक्ष्य एक-दूसरे से मेल खाते हैं.”
जयोजीत पाल इसमें मनोवैज्ञानिक पहलू जोड़ते हैं. उन्होंने कहा, “सूचना युद्ध के समय लोग वही चीजें ज्यादा मानते हैं जिन पर वे पहले से विश्वास करना चाहते हैं, न कि जो सच होती हैं. लोग ध्यान देकर सोचने से ज्यादा जल्दी नजर पकड़ने वाली चीजें देखते हैं. जो चीजें तुरंत ध्यान खींचती हैं, उनके वायरल होने की संभावना किसी लिखित खंडन से कहीं ज्यादा होती है.”
राकिब नाइक कहते हैं कि इसका बड़ा कारण कमाई का मॉडल है. उन्होंने कहा, “युद्ध के समय गलत जानकारी फैलाने का सबसे बड़ा माध्यम अभी एक्स है, क्योंकि वहां पहुंच को पैसे से जोड़ा गया है. गलत मंशा वाले डिजिटल कंटेंट बनाने वाले लोग ट्रेंडिंग विषयों को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं. वे ऐसा कंटेंट डालते हैं जो ध्यान खींचे या भावनाएं भड़काए. कंटेंट जितना ज्यादा उग्र होगा, उसकी पहुंच उतनी ज्यादा होगी.”
यूएई ने इस संघर्ष से जुड़े भ्रामक और एआई से बनाए गए वीडियो प्रकाशित करने के आरोप में 35 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें 19 भारतीय नागरिक थे. ऐसे मामलों में कम से कम एक साल की जेल और कम से कम 1 लाख दिरहम जुर्माने की सजा हो सकती है.
फैक्ट-चेक करने वालों के सामने चुनौती
जांच करने वाली संस्थाओं के लिए अब चुनौती सिर्फ असली और नकली में फर्क करना नहीं रह गई है. असली चुनौती यह है कि क्या इस फर्क को लगातार साबित करते रहना संभव भी है.
स्वास्ति चटर्जी ने कहा कि उनकी टीम अब काफी हद तक पुराने तरीकों पर लौट आई है. “हम सिर्फ डिटेक्शन टूल्स पर निर्भर नहीं रहते. हम फैक्ट-चेकिंग की पुरानी और भरोसेमंद प्रक्रिया अपनाते हैं.” एक फैक्ट-चेक में 24 से 72 घंटे लग सकते हैं. उन्होंने कहा, “हम जितना कर सकते हैं, उसकी भी एक सीमा है.”
कोविड के दौरान सबसे ज्यादा छेड़छाड़ लिखित सामग्री में बदलाव के रूप में होती थी. ऑपरेशन सिंदूर तक आते-आते यह बदलकर पुराने वीडियो दोबारा इस्तेमाल करने और मंत्रियों के नाम से फर्जी पत्र फैलाने तक पहुंच गई. चटर्जी ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर के मुकाबले अब जितना एआई से बना कंटेंट दिख रहा है, उतना तब नहीं था. सिंदूर के बाद डीपफेक फैलाने वाले वही अकाउंट्स फिर सक्रिय हो गए हैं. इस बार उनका निशाना भारतीय न्यूज़ एंकर भी हैं और राजनीतिक नेता भी.”
राकिब नाइक इस समस्या को भरोसेमंद स्रोतों पर जानबूझकर किए जा रहे हमलों से जोड़ते हैं. उन्होंने कहा, “विश्वसनीय स्रोतों पर हमला हो रहा है. मुख्यधारा के समाचार संस्थानों पर, जिनकी अपनी संपादकीय प्रक्रिया है. ट्रंप उन्हें फेक न्यूज़ कहते हैं. मस्क ने वर्षों तक मुख्यधारा मीडिया की विश्वसनीयता कम करने की कोशिश की और एक्स को उसका विकल्प बताकर पेश किया.” इसका नतीजा यह है कि जनता के पास भरोसे के स्पष्ट आधार कम होते जा रहे हैं और इसलिए वह ज्यादा आसानी से प्रभावित हो रही है.
पत्रकारों की मदद के लिए बने उपकरण भी पूरी तरह भरोसेमंद नहीं रहे. गरिमेला ने अमेरिका के एक प्रसिद्ध तकनीकी पत्रकार का उदाहरण दिया, जिन्होंने हूती विद्रोहियों से जुड़ा फर्जी वीडियो शेयर कर दिया था. उन्होंने कहा, “अगर तकनीक को अच्छी तरह समझने वाले और सम्मानित पत्रकार भी ऐसा कर रहे हैं, तो आम लोगों को दोष नहीं दिया जा सकता.”
प्लेटफॉर्म: समस्या सिर्फ कामकाज में नहीं, ढांचे में भी
ओवरसाइट बोर्ड के एक फैसले के अनुसार, जून 2025 के 12 दिन वाले युद्ध के दौरान मेटा ने फेसबुक पर एक एआई से बने वीडियो को बिना जांचे चलने दिया. यह वीडियो फिलीपींस के एक यूज़र ने समाचार स्रोत बनकर पोस्ट किया था, जिसमें हैफा की इमारतों को भारी नुकसान दिखाया गया था. छह लोगों ने इसकी शिकायत की थी. इससे मिलता-जुलता वीडियो पहले टिकटॉक पर फर्जी साबित हो चुका था. फिर भी मेटा ने कोई कार्रवाई नहीं की. मेटा ने पिछले साल अपना थर्ड-पार्टी फैक्ट-चेकिंग प्रोग्राम बंद कर दिया था. नाइक के मुताबिक इससे प्लेटफॉर्म ढांचे के स्तर पर कमजोर हो गया. उन्होंने कहा, “जो सुरक्षा पहले मौजूद थी, अब वह नहीं है.”
एक्स की स्थिति भी बेहतर नहीं रही. अटलांटिक काउंसिल की डिजिटल फॉरेंसिक रिसर्च लैब के शोधकर्ताओं ने एक बमबारी वाले एयरपोर्ट के फर्जी वीडियो पर ग्रोक, यानी एक्स के एआई असिस्टेंट, के 300 से ज्यादा जवाब दर्ज किए. उसके जवाब एक-दूसरे से मेल नहीं खाते थे, कभी-कभी मिनट भर में बदल जाते थे. नाइक ने कहा, “लोग मानते हैं कि ग्रोक फैक्ट-चेकिंग टूल है, जबकि ऐसा नहीं है. इसे इंटरनेट पर मौजूद डेटा से ट्रेन किया गया है. इसे फैक्ट-चेकिंग के लिए इस्तेमाल करना गलती है.”
पाल के मुताबिक एक्स में एक ढांचागत समस्या है. उन्होंने कहा, “एक्स पर गलत जानकारी इसलिए ज्यादा फैलती है क्योंकि वहां वायरल होने की संरचना ऐसे वेरिफाइड यूज़र्स पर टिकी है जो इसलिए वेरिफाइड नहीं हैं कि वे भरोसेमंद सूचना देने वाले हैं, बल्कि इसलिए कि उन्होंने ब्लू टिक के लिए पैसे दिए हैं और वायरल होकर कमाई कर सकते हैं. कम्युनिटी नोट्स होने के बाद भी कंटेंट और उसके दोबारा शेयर किए गए संस्करण वायरल होते रहते हैं.”
भारत की नियामकीय प्रतिक्रिया
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत में सरकारी प्रतिक्रिया काफी तेज हुई है. यह समझना जरूरी है कि यह व्यवस्था काम कैसे करती है. सूचना और प्रसारण मंत्रालय खुद कंटेंट हटाता नहीं है. वह सिर्फ पहचान कर उसे आगे भेजता है. मंत्रालय के वरिष्ठ सलाहकार कंचन गुप्ता ने कहा, “सूचना और प्रसारण मंत्रालय अपने स्तर पर कोई कंटेंट नहीं हटाता और न उस पर कार्रवाई करता है. असली कार्रवाई इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में होती है.”
आईटी कानून के तहत कंटेंट हटाने का मुख्य अधिकार इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के पास है, जिसकी मदद उसकी आपात प्रतिक्रिया टीम करती है. गृह मंत्रालय और इंटेलिजेंस ब्यूरो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों को देखते हैं. जहां लाइसेंसशुदा कंटेंट का गलत इस्तेमाल हो रहा हो, जैसे ओटीटी का फुटेज गलत सूचना में इस्तेमाल हो, वहां सूचना और प्रसारण मंत्रालय सीधे कार्रवाई कर सकता है. गुप्ता ने कहा, “हाल ही में हमने टेलीग्राम के बड़ी संख्या में ऐसे चैनल हटवाए जो ओटीटी प्लेटफॉर्म का लाइसेंसशुदा कंटेंट इस्तेमाल कर रहे थे.”
ऑपरेशन सिंदूर के बाद पिछले महीने लागू आईटी संशोधनों के जरिए सरकार ने अनुपालन की समय सीमा काफी कम कर दी है. अब प्लेटफॉर्म को सरकारी निर्देश मिलने के तीन घंटे के भीतर कार्रवाई करनी होगी.
गुप्ता ने कहा, “अगर तीन घंटे के भीतर पालन नहीं हुआ तो इसे सुरक्षित कानूनी संरक्षण के नियमों का उल्लंघन माना जाएगा. पालन अनिवार्य है. अगर तीन घंटे और एक मिनट भी हो जाए तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा.” एक्स, फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर निगरानी के लिए 24 घंटे चलने वाला मॉनिटरिंग डेस्क बनाया गया है, जो ऐसे कंटेंट पर नजर रखता है जो भारत के द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित कर सकता है. गुप्ता ने कहा, “सिंदूर की तरह यह हमारा युद्ध नहीं है. लेकिन हमारे हित जुड़े हैं. ऊर्जा हित हैं, द्विपक्षीय हित हैं. पीआईबी फैक्ट-चेक यूनिट और दूसरे तंत्र बनाए गए हैं ताकि ऐसे कंटेंट की पहचान, निगरानी, स्रोत पता करना और हटाने की प्रक्रिया की जा सके, जो इन देशों के साथ भारत के संबंधों को प्रभावित करे.”
सरकार अब इससे आगे जाने पर भी विचार कर रही है. एक प्रस्ताव पर चर्चा चल रही है कि इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अलावा रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय जैसे दूसरे मंत्रालयों को भी सीधे कंटेंट हटाने का अधिकार दिया जाए, ताकि संघर्ष की स्थिति में हर अनुरोध एक ही मंत्रालय से होकर न गुजरे.
गुप्ता ने साफ कहा कि किसी भी व्यवस्था की सीमाएं होती हैं. “यह एक ऐसा तंत्र है जो बहुत तेजी से खुद को दोहराता है. कई बार यह व्हाट्सऐप और टेलीग्राम में चला जाता है, फिर पकड़ में नहीं आता.” गरिमेला कहते हैं कि एक्स पर जो दिखता है, वह सिर्फ ऊपर का छोटा हिस्सा है. “जो आप एक्स पर देखते हैं, वह बहुत छोटा हिस्सा है. उसके नीचे व्हाट्सऐप और फेसबुक का बहुत बड़ा पहाड़ है, जो दिखता ही नहीं.”
सबसे गहरी चोट: जब असली वीडियो को भी फर्जी मान लिया जाता है
इसका एक और असर है, जिस पर अक्सर कम ध्यान दिया जाता है. असली कंटेंट पर भरोसा टूटने लगता है. तेहरान की एक व्यस्त सड़क पर रॉकेट गिरने का असली वीडियो भी सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर एआई से बना प्रोपेगेंडा कहकर खारिज कर दिया गया. जब सूचना का माहौल फर्जी चीजों से भर जाता है, तो लोग सिर्फ झूठ पर विश्वास नहीं करते, बल्कि धीरे-धीरे किसी भी चीज पर विश्वास करना बंद कर देते हैं.
नेतन्याहू का मामला इस स्थिति का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है. गलत जानकारी फैलाने का अभियान मार्च के शुरुआती दिनों में शुरू हुआ, जब नेतन्याहू की खून से सनी और मलबे में पड़ी एआई से बनी तस्वीरें तेजी से एक्स, इंस्टाग्राम और टेलीग्राम पर फैलने लगीं. इनका स्रोत ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स से जुड़े अकाउंट्स थे, जिनमें 62 फर्जी प्रोफाइल शामिल थीं जो खुद को स्कॉटलैंड की आजादी के समर्थक और आयरिश राष्ट्रवादी बताकर चल रही थीं.
इज़राइल ने तुरंत इसका जवाब देने की कोशिश की. नेतन्याहू ने यरुशलम के एक कैफे में कॉफी पीते हुए अपना वीडियो पोस्ट किया और लिखा, “वे कह रहे हैं कि मैं क्या हूं?” यह सीधे तौर पर ईरानी सरकारी मीडिया के उस दावे का मजाक था जिसमें कहा गया था कि मिसाइल हमले में उनकी मौत हो गई है. लेकिन इसका उल्टा असर हुआ. लोगों ने वीडियो को फ्रेम दर फ्रेम देखकर जांचना शुरू कर दिया. जब उन्होंने नीचे देखा तो उनका चेहरा गोल से अंडाकार होता दिखा, उनकी शादी की अंगूठी कभी दिखती थी और कभी गायब लगती थी, और एक पुराने क्लिप में लोगों ने दावा किया कि उनके हाथ में छह उंगलियां दिख रही हैं, जिसे एआई से बने वीडियो की आम पहचान माना जाता है.
ईरान समर्थक एक अकाउंट ने एआई डिटेक्शन टूल हाइव का स्क्रीनशॉट पोस्ट किया, जिसमें वीडियो को “96.9 प्रतिशत एआई से बना” बताया गया था. इस पोस्ट को एक ही दिन में 12 लाख बार देखा गया. इसके बाद ग्रोक ने कहा कि वह “100 प्रतिशत निश्चित” है कि कैफे वाला वीडियो एक उन्नत डीपफेक है. उसने इसके लिए “कॉफी के स्तर का स्थिर रहना” और होंठों की अस्वाभाविक चाल जैसे कारण बताए. यह दावा किसी भी फैक्ट-चेक से ज्यादा तेजी से फैल गया.
नेतन्याहू के दफ्तर ने फिर दूसरा वीडियो जारी किया, फिर तीसरा. हर बार जगह और कैमरे का तरीका बदला गया ताकि शक दूर किया जा सके. किसी मौजूदा प्रधानमंत्री को सिर्फ यह साबित करने के लिए कि वह जिंदा हैं, इस तरह डिजिटल जवाबी अभियान चलाना अभूतपूर्व था. लेकिन इससे भी कुछ नहीं बदला. हर नया वीडियो आते ही उस पर नई जांच शुरू हो जाती, नई छेड़छाड़ के दावे किए जाते, और लोग फिर से परछाइयों और उंगलियों को ज़ूम करके देखने लगते.
स्वास्ति चटर्जी कहती हैं कि इनमें से कोई भी जांच असली ओएसआईएनटी के स्तर तक नहीं पहुंची, जिसमें वीडियो को सैटेलाइट तस्वीरों और मेटाडेटा से मिलाकर परखा जाता है. उन्होंने कहा, “ये बहुत ही कमजोर तरह की जांचें हैं. ये ओएसआईएनटी भी नहीं हैं.”
सुरक्षा कारणों से इज़राइल लाइव प्रसारण नहीं कर सकता, क्योंकि जैसे ही किसी नेता की लोकेशन सामने आती है, वह निशाना बन सकती है. लेकिन अब जो भी पहले से रिकॉर्ड किया गया वीडियो जारी किया जाता है, उस पर अपने आप शक किया जाता है. चटर्जी ने कहा, “इज़राइल की टीम बहुत कोशिश कर रही है यह साबित करने की कि वह जिंदा हैं. और हम फैक्ट-चेकर क्या खंडन करें? जैसे ही हम किसी दावे को गलत साबित करते हैं, ट्रोल आर्मी अपने नए अजीब तर्क लेकर हम पर आ जाती है. हमारे पास इतना समय और क्षमता नहीं है.”
राकिब नाइक मानते हैं कि सूचना पर रोक इस समस्या को और बढ़ाती है. उन्होंने कहा, “जब सरकारें कंटेंट पर रोक लगाती हैं, तो लोगों में उसे देखने की भूख और बढ़ जाती है, और वहीं गलत इरादे वाले लोग इस भूख का इस्तेमाल करते हैं. लोगों में जानने की चाह होती है कि क्या हो रहा है, और यही ऑनलाइन अकाउंट्स भ्रामक कंटेंट को तेजी से आगे बढ़ाते हैं.”
किरण गरिमेला सबसे डरावने निष्कर्षों से सहमत नहीं हैं, लेकिन उन्हें स्थिति की दिशा चिंता में डालती है. उन्होंने कहा, “जिस रफ्तार से यह तकनीक आगे बढ़ रही है, उससे लगता है कि जल्द ही ऐसे खुले और आसानी से उपलब्ध मॉडल होंगे जिन्हें नियंत्रित करना मुश्किल होगा. हमें इसके लिए तैयार रहना पड़ सकता है.”
जयोजीत पाल का कहना है कि समाधान शायद खंडन में नहीं, बल्कि स्रोत की विश्वसनीयता साबित करने में है. उन्होंने कहा, “अब तक ऐसा कोई तरीका नहीं मिला जो बड़े पैमाने पर खंडन के जरिए बहुत सफल रहा हो. शायद हमें ऐसे भविष्य के लिए तैयार होना होगा जहां हर जानकारी के साथ उसका स्रोत भी साबित करना जरूरी होगा.”
स्वास्ति चटर्जी, जो इस पूरे माहौल के बीच काम कर रही हैं, इस पर कम सैद्धांतिक और ज्यादा सीधी बात कहती हैं. उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता कि हम यहां से आगे कहां जा रहे हैं.”
संघर्ष जारी है. इसके साथ ऐसे वीडियो और दावे भी लगातार बन रहे हैं जो इस युद्ध को समझाने का दावा करते हैं. ईरान-अमेरिका-इज़राइल युद्ध दो मोर्चों पर लड़ा जा रहा है. एक मोर्चे पर मिसाइलें, ड्रोन और विमान हैं. दूसरे मोर्चे पर पिक्सेल, प्रॉम्प्ट और बनाई गई निश्चितताएं हैं. दूसरे मोर्चे पर असली और गढ़ी गई चीजों के बीच की रेखा हमेशा साफ दिखाई नहीं देती, और जिन संस्थाओं का काम इस फर्क को समझना है, उनके पास समय तेजी से कम पड़ रहा है.
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