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Wednesday, 26 November, 2025
होमविदेश‘डिजिटल उपनिवेशवाद’: कैसे एआई कंपनियां साम्राज्यवाद की राह पर चल रही हैं

‘डिजिटल उपनिवेशवाद’: कैसे एआई कंपनियां साम्राज्यवाद की राह पर चल रही हैं

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(जेसिका रस-स्मिथ, ऑस्ट्रेलियाई कैथोलिक विश्वविद्यालय और मिशेल लाजारस, मोनाश विश्वविद्यालय)

मेलबर्न, 26 नवंबर (द कन्वरसेशन) ओपनएआई जैसी बड़ी एआई कंपनियों की नजर में, इंटरनेट पर मौजूद डेटा का भंडार बेहद कीमती है। वे चैटजीपीटी जैसे अपने उत्पादों को प्रशिक्षित करने के लिए फोटो, वीडियो, किताबें, ब्लॉग पोस्ट, एल्बम, पेंटिंग, तस्वीरें और बहुत कुछ इकट्ठा करते हैं और वे आमतौर पर बिना किसी पारिश्रमिक या रचनाकारों की सहमति के ऐसा करते हैं।

दरअसल, ओपनएआई और गूगल का तर्क है कि अमेरिकी कॉपीराइट कानून का एक हिस्सा, जिसे ’उचित उपयोग सिद्धांत’ कहा जाता है, इस ‘‘डेटा चोरी’’ को वैध ठहराता है। विडंबना यह है कि ओपनएआई ने अन्य एआई दिग्गजों पर भी ‘‘अपनी बौद्धिक संपदा’’ का डेटा चुराने का आरोप लगाया है।

दुनिया भर में कई देशों के मूल निवासी (फर्स्ट नेशंस) लोग इन दृश्यों को परिचित अनुभव व समझ के साथ देख रहे हैं। एआई के आगमन से बहुत पहले, लोगों, जमीन और उनके ज्ञान के साथ इसी तरह का व्यवहार किया जाता था – औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा अपने फायदे के लिए उनका शोषण किया जाता था।

एआई के मामले में जो हो रहा है वह एक तरह का ‘डिजिटल उपनिवेशवाद’ है, जिसमें शक्तिशाली (ज्यादातर पश्चिमी) तकनीकी दिग्गज दूसरों पर अपनी शक्ति का इस्तेमाल करने और बिना सहमति के डेटा लेने के लिए एल्गोरिदम और डिजिटल प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

टेरा नुलियस की कल्पना : टेरा नुलियस एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ ‘किसी की जमीन नहीं’ से होता है। उपनिवेशवादियों द्वारा इसका इस्तेमाल ‘‘कानूनी तौर पर’’ जमीन पर दावा करने के लिए किया जाता था।

ऑस्ट्रेलिया में टेरा नुलियस की कानूनी कल्पना को 1992 के ऐतिहासिक माबो मामले में पलट दिया गया था। इस मामले में मरे द्वीप समूह के मूल निवासी मेरियाम लोगों के भूमि अधिकारों को मान्यता दी गई। ऐसा करने से, इसने कानूनी दृष्टि से टेरा नुलियस को पलट दिया, जिसके परिणामस्वरूप मूल स्वामित्व अधिनियम 1993 अस्तित्व में आया।

हालांकि, जिस तरह से एआई कंपनियां इंटरनेट से अरबों लोगों का डेटा निकाल रही हैं, उसमें हम टेरा नुलियस के विचार के निशान देख सकते हैं। ऐसा लगता है मानो वे मानते हैं कि डेटा किसी का नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे ब्रिटिश मानते थे कि ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप किसी का नहीं है।

सहमति के रूप में डिजिटल उपनिवेशवाद : डेटा हमारी जानकारी के बिना ही चुरा लिया जाता है, लेकिन डिजिटल उपनिवेशवाद का एक और भी कपटपूर्ण तरीका है, सामूहिक सहमति के जरिए हमारे डेटा को जबरदस्ती पा लेना।

क्या आपको किसी जरूरी फोन अपडेट के बाद या अपने बैंक खाते तक पहुंचने के लिए ‘‘एक्सेप्ट ऑल’’ पर क्लिक करना पड़ा है? बधाई हो! आपने एक अलग ही विकल्प चुना है, जिसके तहत असल में, ‘‘सहमत’’ होना ही एकमात्र विकल्प है।

अगर आपने ‘हां’ के विकल्प को नहीं चुना, यानी इस सामूहिक सहमति को अस्वीकार कर दिया, तो क्या होगा? हो सकता है कि आप बैंकिंग या अपने फोन का इस्तेमाल न कर पाएं।

डिजिटल टेरा नुलियस का विरोध : क्या किसी जीच को हर हाल में स्वीकार कर लेना ही हमारा एकमात्र विकल्प है? नहीं। दरअसल, प्रतिरोध करने वाली पीढ़ियां हमें टेरा नुलियस से लड़ने और अपना अस्तित्व बरकरार रखने के कई तरीके सिखाती हैं।

समाज के सभी स्तरों पर प्रतिरोध की आवश्यकता है – व्यक्ति से लेकर स्थानीय और वैश्विक समुदायों तक। माबो मामले से मिली राह का अनुसरण करके बौद्धिक संपदा को भी कानूनी संरक्षण दिया जा सकता है।

विरोध शुरू हो रहा है, और एआई डेटा चोरी मामलों में बौद्धिक संपदा कानूनों का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हुए मुकदमों की बाढ़ आ गई है। उदाहरण के लिए, अक्टूबर में, ऑनलाइन मंच ‘रेडिट’ ने एआई स्टार्टअप ‘पेरप्लेक्सिटी’ पर अपने मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए कॉपीराइट सामग्री का उल्लंघन करने का मुकदमा दायर किया।

इससे पहले, सितंबर में एआई कंपनी ‘एंथ्रोपिक’ ने भी लेखकों द्वारा दायर एक सामूहिक मुकदमे का निपटारा किया, जिसमें तर्क दिया गया था कि कंपनी ने अपने चैटबॉट को प्रशिक्षित करने के लिए किताबों की पायरेटेड प्रतियां उपयोग कीं।

एआई कंपनियां सर्वशक्तिमान लग सकती हैं, जैसे कभी कई औपनिवेशिक साम्राज्य हुआ करते थे। लेकिन, पूर्व की पीढ़ियों ने दिखाया है कि प्रतिरोध के कई तरीके हैं।

(द कन्वरसेशन) शफीक पवनेश

पवनेश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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