लंदन, 11 जनवरी (भाषा) ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक और उनकी पत्नी अक्षता मूर्ति द्वारा स्थापित एक शिक्षा चैरिटी के नए शोध में पता चला है कि माताएं गणित को लेकर अपनी चिंता अपनी बेटियों पर डाल देती हैं, जिससे समय के साथ इस विषय को लेकर आत्मविश्वास के मामले में लैंगिक अंतर पैदा होता है।
‘द संडे टाइम्स’ ने ‘रिचमंड प्रोजेक्ट’ के सर्वेक्षण के परिणाम इसके आधिकारिक प्रकाशन से पहले जारी किए हैं, जो बताते हैं कि लड़कियां आठ साल की उम्र से ही गणित में कम आत्मविश्वास रखती हैं और इसलिए अपेक्षाकृत कम सक्षम हो जाती हैं।
इसमें पाया गया कि चार से आठ साल के 51 प्रतिशत लड़कों को लगता था कि गणित ‘आसान’ है, जबकि लड़कियों में यह आंकड़ा 41 प्रतिशत था। यह अंतर समय के साथ और बढ़ गया तथा नौ से 18 साल के 86 प्रतिशत लड़कों ने कहा कि उन्हें इस विषय में आत्मविश्वास है, जबकि लड़कियों में यह आंकड़ा 63 प्रतिशत था।
अक्षता मूर्ति ने अखबार को बताया, ‘‘हमारा सर्वे दिखाता है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में बच्चों को उनके गणित के गृहकार्य में मदद करने में ज़्यादा संघर्ष करती हैं। और यह सिलसिला चलता रहता है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘यह चिंता महिलाओं को पुरुषों की तुलना में ज़्यादा महसूस होती है। मैं यह नहीं कह रही कि पुरुषों को यह बिल्कुल महसूस नहीं होती, लेकिन महिलाओं को यह ज़्यादा महसूस होती है और यह पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती है।’’
अक्षता ने कहा, ‘‘अगर कोई छोटी बच्ची अपनी मां को चिंतित देखती है, तो वह अनजाने में उस चिंता को अपना लेती है। इसलिए मुझे लगता है कि यह चक्र इसी तरह चलता रहता है।’’
इंफोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति और सुधा मूर्ति की बेटी मूर्ति ने कम उम्र से ही ‘स्टेम’– विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित में अपने आदर्शों का उल्लेख किया।
उन्होंने ‘रिचमंड प्रोजेक्ट’ के संदर्भ में कहा, ‘‘हमारा पूरा मिशन यह है कि हम संख्या कौशल का इस्तेमाल करके लोगों की ज़िंदगी कैसे बदलें।’’
इस परियोजना का नाम सुनक के नॉर्थ यॉर्कशायर निर्वाचन क्षेत्र के नाम पर रखा गया है।
उन्होंने अखबार से कहा कि गणित को किसी ‘अमूर्त’ अवधारणा से निकालकर कुछ ऐसा बनाने की ज़रूरत है जिसे ‘बहुत ही व्यावहारिक तरीकों से’ इस्तेमाल किया जा सके। उन्होंने कहा कि वह सुनिश्चित करती हैं कि उनकी किशोर वय बेटियां, कृष्णा और अनुष्का, इसके साथ बड़ी हों।
अक्षता ने कहा, ‘‘गणित समस्या का समाधान करता है। हमें एक परिवार के तौर पर पहेलियां पसंद हैं। जब वे छोटी थीं, तो हमें जिगसॉ पहेलियां पसंद थीं। अब जब वे बड़ी हो गई हैं, तो हम वर्डले से लेकर क्रॉसवर्ड पहेलियों तक सब कुछ करते हैं।’’
भाषा वैभव रंजन
रंजन
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.
