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Monday, 25 May, 2026
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धर्मशाला में निर्वासित तिब्बती नेता के शपथ ग्रहण से पहले चीन ने भारत को एक संदेश भेजा

पेनपा त्सेरिंग को तिब्बत के राजनीतिक नेता के तौर पर पांच साल के नए कार्यकाल के लिए फिर से चुन लिया गया है. वह 27 मई को धर्मशाला में आयोजित एक कार्यक्रम में शपथ लेंगे.

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नई दिल्ली: 27 मई को सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन के नए ‘राजनीतिक नेता’ के शपथ ग्रहण से पहले, चीन ने भारत से आग्रह किया है कि वह “तिब्बती स्वतंत्रता” का समर्थन करने वाली गतिविधियों को कोई मंच देने से बचे, और कहा कि तिब्बत का मुद्दा “पूरी तरह से चीन का आंतरिक मामला” है.

वर्तमान सिक्योंग (अध्यक्ष/राजनीतिक नेता) पेनपा त्सेरिंग, जिन्हें फिर से चुना गया है, बुधवार को धर्मशाला में एक कार्यक्रम से अपना दूसरा पांच साल का कार्यकाल आधिकारिक रूप से शुरू करेंगे, जहां 14वें दलाई लामा के भी उपस्थित रहने की संभावना है, ऐसा भारत में निर्वासित तिब्बती सरकार (जिसे सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन कहा जाता है) के बयान में कहा गया है.

सिक्योंग काशाग का राजनीतिक नेता होता है, जो CTA की कार्यकारी शाखा का हिस्सा है. सिक्योंग CTA का राष्ट्रपति होता है. पेनपा त्सेरिंग भारत में सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन के दूसरे लोकतांत्रिक रूप से चुने गए सिक्योंग हैं.

भारत में चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने रविवार को निर्वासित तिब्बती प्रशासन की वैधता को खारिज करते हुए कहा कि इसे “किसी भी संप्रभु देश द्वारा मान्यता नहीं मिली है” और यह तिब्बती लोगों का प्रतिनिधित्व करने या दलाई लामा के पुनर्जन्म की प्रक्रिया को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं रखता.

“दलाई लामा का पुनर्जन्म का मुद्दा पूरी तरह से चीन का आंतरिक मामला है और इसमें बाहरी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. तथाकथित ‘सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन’ को किसी भी संप्रभु देश द्वारा मान्यता नहीं मिली है, और इसके नेतृत्व को न तो तिब्बती लोगों का प्रतिनिधित्व करने की वैधता है और न ही पुनर्जन्म प्रक्रिया पर दावा करने का अधिकार,” उन्होंने X पर लिखा.

उन्होंने आगे कहा कि दलाई लामा का पुनर्जन्म लंबे समय से चले आ रहे धार्मिक अनुष्ठानों और ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार होता है, जिसमें सदियों से चीन की केंद्रीय सरकार की मंजूरी जरूरी रही है. “यह ध्यान देने योग्य है कि 14वें दलाई लामा को भी इसी स्थापित प्रक्रिया के तहत मान्यता दी गई थी.”

उन्होंने कहा कि तिब्बत से जुड़े मुद्दों पर भारत ने पहले से प्रतिबद्धताएं की हैं. “सच्चे मन से उम्मीद है कि भारत इन प्रतिबद्धताओं का पालन जारी रखेगा, ‘तिब्बती स्वतंत्रता’ का समर्थन करने वाली गतिविधियों को कोई मंच नहीं देगा, और दलाई लामा के पुनर्जन्म में हस्तक्षेप नहीं करेगा. ऐसा करने से हमारे द्विपक्षीय संबंधों की स्थिरता और सकारात्मक विकास में योगदान मिलेगा,” उन्होंने कहा.

‘दलाई लामा का पुनर्जन्म’

ये बयान तब आया जब तिब्बत पर अंतरराष्ट्रीय ध्यान फिर से बढ़ा, क्योंकि पेनपा त्सेरिंग को अमेरिका ने नई दिल्ली में एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था, जो अमेरिकी स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में था.

2024 में, अमेरिकी सांसदों के एक द्विदलीय प्रतिनिधिमंडल ने भारत में दलाई लामा से मुलाकात की थी और तिब्बती धार्मिक स्वतंत्रता के समर्थन का वादा किया था, और कहा था कि चीन को तिब्बती बौद्ध धर्म की आध्यात्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.

12 जून 2024 को, अमेरिकी कांग्रेस ने रेजॉल्व तिब्बत एक्ट पारित किया, जो तिब्बत के बारे में चीनी दुष्प्रचार का मुकाबला करता है और दलाई लामा तथा तिब्बती नेताओं के साथ सीधे संवाद की अपील करता है ताकि विवाद का शांतिपूर्ण समाधान हो सके. इसमें तिब्बतियों के आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार किया गया और उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान को मान्यता दी गई.

बीजिंग ने रेजॉल्व तिब्बत एक्ट को खारिज कर दिया और दोहराया कि तिब्बत चीन का अभिन्न हिस्सा है, तथा किसी भी बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ चेतावनी दी.

पिछले साल, अपने 90वें जन्मदिन पर दलाई लामा ने घोषणा की थी कि उनके बाद भी दलाई लामा की संस्था जारी रहेगी और कहा कि उनके उत्तराधिकारी को चुनने में चीनी अधिकारियों की कोई भूमिका नहीं होगी. उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया पर अधिकार केवल उनके कार्यालय के साथ गादेन फोडरंग ट्रस्ट के पास होगा.

“इस मामले में किसी और को हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है,” उनके कार्यालय ने उस समय कहा था.

उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं के अनुसार, वरिष्ठ तिब्बती बौद्ध नेताओं और आध्यात्मिक रक्षकों से सलाह लेकर की जाएगी, जिससे चीन के उस दावे को चुनौती मिलती है कि लामा का पुनर्जन्म, खासकर दलाई लामा का, राज्य नीति का मामला है.

हालांकि, चीनी विदेश मंत्रालय ने तब कहा था कि भविष्य के पुनर्जन्म को चीनी सरकार की मंजूरी जरूरी है, और उत्तराधिकार को चीनी कानूनों और नियमों के साथ-साथ “धार्मिक अनुष्ठानों और ऐतिहासिक परंपराओं” के अनुसार होना चाहिए.

उत्तराधिकार के मामले में चीन जिस परंपरा का दावा करता है, वह 1793 के किंग राजवंश के समय की बताई जाती है, जब उच्च स्तर के लामाओं के चयन के लिए गोल्डन अर्न (स्वर्ण कलश) प्रणाली शुरू की गई थी. दलाई लामा ने इन दावों का विरोध किया और अपनी दशकों पुरानी स्थिति को दोहराया.

1969 में उन्होंने कहा था कि उनकी संस्था का भविष्य तिब्बती लोगों पर छोड़ दिया जाना चाहिए. 2011 में, तिब्बती निर्वासित सरकार में अपने राजनीतिक पद से हटने के बाद उन्होंने इसे औपचारिक रूप दिया और कहा कि उनके उत्तराधिकारी को पहचानने की जिम्मेदारी पूरी तरह तिब्बती समुदाय के धार्मिक नेतृत्व के पास होगी.

दलाई लामा के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा कि भारत सरकार आस्था और धर्म से जुड़े मामलों पर कोई रुख नहीं लेती.

MEA प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने कहा कि सरकार हमेशा भारत में सभी के लिए धार्मिक स्वतंत्रता का समर्थन करती है और आगे भी करती रहेगी.

“भारत सरकार आस्था और धर्म से जुड़े विश्वासों और प्रथाओं के मामलों पर कोई रुख नहीं लेती और न ही टिप्पणी करती है,” जयसवाल ने कहा था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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