नई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने फरवरी 2026 के चुनावों से अवामी लीग को बाहर किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई है. उन्होंने इसे “संक्रमण के नाम पर किया गया तानाशाही कदम” बताया है.
दिप्रिंट को दिए एक खास इंटरव्यू में शेख हसीना ने 2024 के छात्र आंदोलनों को याद करते हुए कहा कि उन्हें हर एक जान के नुकसान का “अफसोस” है. लेकिन उन्होंने हिंसा की न्यायिक जांच को सीमित करने के लिए बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस को जिम्मेदार ठहराया.
छात्रों का यह आंदोलन पहले आरक्षण विरोधी था, लेकिन बाद में यह हसीना सरकार के खिलाफ प्रदर्शन में बदल गया. अंतरिम सरकार के अनुसार, इस हिंसा में लगभग 1,400 लोगों की मौत हुई.
हसीना ने यूनुस प्रशासन पर उनकी पार्टी की गतिविधियां निलंबित करने का भी आरोप लगाया. अवामी लीग 2009 से 2024 तक सत्ता में रही और शेख हसीना इसके नेतृत्व में थीं. उन्होंने कहा कि पार्टी पर प्रतिबंध लगाने से “करोड़ों बांग्लादेशी मताधिकार से वंचित हो जाएंगे, जो चुनाव में वोट ही नहीं डालेंगे”.
उन्होंने कहा कि अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाने से करोड़ों बांग्लादेशी चुनाव में भाग नहीं ले पाएंगे.
12 फरवरी को होने वाले चुनावों पर टिप्पणी करते हुए हसीना ने कहा, “ऐसी परिस्थितियों में कराए गए चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष या वैध नहीं कहे जा सकते. मतदाताओं को अपनी पसंद की पार्टी को चुनने की आजादी होनी चाहिए और उन्हें चुनाव से बाहर नहीं किया जाना चाहिए या घर-घर जाकर बीएनपी या जमात के पक्ष में वोट देने के लिए हिंसा या नुकसान की धमकी देकर मजबूर नहीं किया जाना चाहिए”.
उन्होंने कहा, “अंतरिम सरकार जानती है कि अगर हमें चुनाव लड़ने दिया गया, तो हमें भारी समर्थन मिलेगा. इसी वजह से हमें प्रतिबंधित किया गया है. यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यूनुस को खुद बांग्लादेश की जनता से एक भी वोट नहीं मिला है, फिर भी उन्होंने अपने गैरकानूनी कदमों को वैध ठहराने के लिए देश के कानूनी ढांचे को फिर से लिखा है”.
हसीना ने कहा कि यूनुस को कभी भी बांग्लादेश की जनता से एक भी वोट नहीं मिला, फिर भी उन्होंने अपने गैरकानूनी कदमों को वैध बनाने के लिए कानूनी व्यवस्था बदल दी.
एक लिखित इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “आप देश की सबसे पुरानी और सबसे लोकप्रिय राजनीतिक पार्टी पर प्रतिबंध लगाकर लोकतांत्रिक वैधता का दावा नहीं कर सकते. यह सुधार नहीं है, बल्कि संक्रमण के नाम पर तानाशाही है”.
मोहम्मद यूनुस का कहना है कि अवामी लीग पर प्रतिबंध नहीं है, बल्कि उसे “राजनीतिक गतिविधियों से निलंबित” किया गया है. इस पर हसीना ने कहा कि यह “बिना मतलब का अंतर” है. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी “व्यवहारिक रूप से प्रतिबंधित” है, क्योंकि वह न तो प्रचार कर सकती है, न संगठन बना सकती है और न ही चुनाव लड़ सकती है.
अब बांग्लादेश एक ऐसे भविष्य से जूझ रहा है, जिसमें न शेख हसीना हैं और न ही अवामी लीग, जो 1971 में पाकिस्तान से मुक्ति के संघर्ष का नेतृत्व करने वाली मुख्य राजनीतिक ताकत रही है.
5 अगस्त 2024 की हिंसा के दौरान शेख हसीना, जिनके पिता शेख मुजीबुर रहमान को लंबे समय से ‘राष्ट्रपिता’ माना जाता है, ढाका छोड़कर दिल्ली चली गई थीं. वह तब से भारत में हैं, जो अब भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक बड़ा विवाद का मुद्दा बन गया है.
सत्ता से हटाए जाने के बाद इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल-बांग्लादेश ने हसीना को मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए मौत की सजा सुनाई है. ट्रिब्यूनल ने जून से अगस्त 2024 के बीच छात्र आंदोलनों को दबाने को अपने फैसले का आधार बताया है.
यूनुस प्रशासन के तहत अवामी लीग की गतिविधियां काफी हद तक सीमित कर दी गई हैं. इसके छात्र संगठन बांग्लादेश छात्र लीग पर पिछले साल आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंध लगाया गया. यह कानून 2009 में अवामी लीग सरकार के समय बनाया गया था, लेकिन 2025 में मौजूदा सरकार ने इसमें संशोधन कर अवामी लीग के सदस्यों पर आरोप लगाए.
निष्पक्ष जांच की मांग
2024 की हिंसा पर बात करते हुए हसीना ने अपनी सरकार के कदमों का बचाव किया. उन्होंने कहा कि ये कदम बांग्लादेश की संस्थाओं की रक्षा और जान-माल के नुकसान को रोकने की भावना से उठाए गए थे. हालांकि, 5 अगस्त से पहले के दिनों में हिंसा बढ़ती गई, जिसके बाद हसीना को अपने 15 साल के शासन का अंत करते हुए प्रधानमंत्री आवास गणभवन छोड़ना पड़ा.
उन्होंने कहा, “हमने छात्रों द्वारा किए गए वैध प्रदर्शनों का स्वागत किया और उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ने दिया. हमने उनकी मांगें सुनीं और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में आरक्षण को खत्म किया, जो उनकी नाराजगी की वजह था”.
हसीना ने कहा, “हम यह नहीं देख पाए कि कब चरमपंथी तत्वों ने इस आंदोलन को अपने हाथ में ले लिया. यह अब कोई शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन नहीं था, बल्कि यूनुस द्वारा संगठित और निर्देशित एक हिंसक भीड़ बन गया था, जिसने हिंसा की, पुलिस थानों पर हमला किया और सरकारी ढांचे को नुकसान पहुंचाया. किसी भी वैध सरकार की तरह, हमारे कदम देश की संस्थाओं की रक्षा और जान बचाने के उद्देश्य से उठाए गए”.
यूनुस प्रशासन को लेकर हसीना की “सबसे बड़ी निराशा” यह है कि सत्ता संभालते ही उन्होंने उस न्यायिक जांच को भंग कर दिया, जिसे उन्होंने प्रदर्शनकारियों की मौत की जांच के लिए बनाया था.
उन्होंने लिखा, “मेरी सबसे बड़ी निराशा यह है कि यूनुस ने सत्ता में आते ही उस जांच को खत्म कर दिया, क्योंकि उन्हें पता था कि इससे उनके द्वारा बनाई गई पूरी योजना उजागर हो जाएगी. यह फैसला अपने आप में विरोध प्रदर्शनों और सत्ता हथियाने के पीछे की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है, जिसमें विदेशी हस्तक्षेप का मामला भी शामिल है. इन सवालों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए”.
कानून और व्यवस्था अब
अपने देश के संदर्भ में शेख हसीना ने “संवैधानिक शासन” में जल्दी वापसी की मांग की है. उन्होंने कहा कि कानून और व्यवस्था को और बिगड़ने से रोकने के लिए “सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी के साथ स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव” कराए जाने चाहिए.
उन्होंने लिखा, “कानून और व्यवस्था डर या चुनिंदा कार्रवाई के जरिए कायम नहीं की जा सकती”.
पूर्व नेता की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब महज एक महीने पहले देश ने दो दिनों की हिंसा देखी थी. यह हिंसा ढाका में हमलावरों द्वारा गोली मारे गए राजनीतिक आकांक्षी शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद हुई थी.
18 दिसंबर को हादी की मौत के बाद पूरे बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जो बाद में हिंसा में बदल गए. इस हिंसा में बांग्लादेश के मशहूर मीडिया संस्थानों प्रथोम आलो और द डेली स्टार के दफ्तरों को जलाया जाना भी शामिल था.
हसीना ने लिखा, “जो हिंसा हम आज देख रहे हैं, वह एक ऐसी निर्वाचित न होने वाली सरकार का सीधा नतीजा है, जिसके पास जनता का कोई जनादेश नहीं है और जिसने हमारी राजनीति को चरमपंथी गुटों के हाथों में जाने दिया है. ‘सुधार’ देने के बजाय अंतरिम सरकार ने कट्टरपंथी समूहों को सत्ता के पदों पर बैठा दिया है, भीड़ के न्याय का शासन कायम किया है और वैध राजनीतिक आवाजों को दबाया है”.
उन्होंने आगे कहा, “आज बांग्लादेश में कानून और व्यवस्था का कोई नामोनिशान नहीं है. यूनुस सरकार लगातार हिंसा के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई करने में विफल रही है. बल्कि इसने ऐसे चरमपंथियों को बढ़ावा दिया है, जो रोजाना की क्रूरता के जरिए अपनी कठोर विचारधारा फैलाना चाहते हैं, समाज में बहुलता के हर निशान को दबा रहे हैं और किसी भी असहमति को राजनीतिक दुश्मन बताकर खारिज कर रहे हैं”.
दिसंबर की हिंसा में मयमनसिंह शहर में एक हिंदू व्यक्ति दीपु चंद्र दास की सार्वजनिक रूप से पीट-पीटकर हत्या भी हुई, जिसके बाद भारत में विरोध प्रदर्शन हुए.
हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा को लेकर नई दिल्ली सतर्क रही है. भारत ने बार-बार ढाका से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए और कदम उठाने को कहा है.
हिंदू देश की कुल आबादी का लगभग आठ प्रतिशत हैं.
इस मुद्दे पर यूनुस ने बार-बार अंतरिम सरकार के रिकॉर्ड का बचाव किया है. उन्होंने कहा है कि यह हिंसा “सांप्रदायिक” नहीं बल्कि “राजनीतिक” है या “आपराधिक गतिविधियों” से जुड़ी है.
उन्होंने सोमवार को एक कदम और आगे बढ़ते हुए कहा कि 2025 में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की 645 घटनाओं में से 71 में “सांप्रदायिक तत्व” थे, जबकि बाकी को “गैर-सांप्रदायिक” माना गया.
कट्टरता की बढ़ती धारणा
भारत द्वारा 2025 के दौरान अपने बयानों में बार-बार सांप्रदायिक घटनाओं का मुद्दा उठाए जाने के बावजूद, यह व्यापक धारणा बन गई है कि बांग्लादेश 1971 के संविधान में दर्ज धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से दूर चला गया है.
हसीना ने लिखा, “बांग्लादेश की स्थापना धर्मनिरपेक्षता, बहुलता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर हुई थी. जमात-ए-इस्लामी और अन्य चरमपंथी गुटों का पुनर्वास हमारे देश की बुनियाद के लिए खतरा है. जब कट्टरपंथी समूहों को मुख्यधारा की राजनीति में वापस आने दिया जाता है, तो वे राज्य को उदार नहीं बनाते. वे उसे अपनी छवि में ढालना चाहते हैं और बहुलता के हर निशान को मिटाना चाहते हैं”.
अवामी लीग नेता ने बांग्लादेश के लिए “बेहद चिंताजनक दिशा” की ओर इशारा किया. उन्होंने कहा कि यह रास्ता समाज को तोड़ने और देश को उन अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों से अलग करने का जोखिम पैदा करता है, जो अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न और भीड़ की हिंसा को बर्दाश्त नहीं करेंगे.
उन्होंने कहा, “यह कोई सैद्धांतिक चिंता नहीं है. यह पहले से ही हमारी सड़कों पर दिखाई दे रहा है”.
उन्होंने आगे कहा कि जमात के उभार के साथ “इतिहास की सच्चाई को जानबूझकर कमजोर किया गया है”, यानी इतिहास को बदला जा रहा है. धनमंडी 32 में शेख मुजीबुर रहमान के पुराने घर को बार-बार तोड़ा-फोड़ा गया और फिर गिरा दिया गया, क्योंकि लोग अवामी लीग से छुटकारा पाना चाहते थे.
हसीना के अनुसार, “आज जो हम देख रहे हैं, वह इतिहास की सच्चाई को जानबूझकर मिटाने की कोशिश है. चरमपंथी और संशोधनवादी ताकतों ने 1971 में पाकिस्तान से मिली हमारी कठिन आजादी की सच्चाई को कमजोर करने की पूरी कोशिश की है और पीड़ित व आक्रामक के बीच के फर्क को धुंधला किया है. यह सच्चाई अंतरिम सरकार के लिए असहज हो सकती है, जो अवामी लीग को देश का दुश्मन दिखाना चाहती है, लेकिन यह फिर भी सच्चाई है”.
उन्होंने जोड़ा, “जो देश अपनी आजादी की कीमत भूल जाता है, वह उन लोगों के लिए कमजोर हो जाता है, जिन्होंने कभी उसे नकारा था. हमारे मुक्ति संग्राम की सच्चाई को बचाना राजनीति नहीं है. यह हमारी पहचान और संप्रभुता की रक्षा का सवाल है”.
यूनुस द्वारा जमात की गतिविधियों पर से प्रतिबंध हटाए जाने के बाद जमात ने बांग्लादेश की मुख्यधारा की राजनीति में वापसी की है. इसके छात्र संगठन बांग्लादेश इस्लामी छात्र शिबिर ने पिछले कुछ महीनों में कई विश्वविद्यालय परिसरों में हुए छात्र संघ चुनावों में जीत हासिल की है.
फरवरी आने वाले समय की दिशा तय करने में बेहद अहम होगा.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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