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Friday, 24 May, 2024
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2022 के यूपी विधानसभा चुनावों के लिए यह है BJP का नया जातीय गठबंधन – 7 दल और उनके सदस्य

अपने पूर्व सहयोगी ओ.पी. राजभर के नेतृत्व वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी द्वारा अक्टूबर में सपा के साथ गठजोड़ किये जाने की घोषणा के बाद, भाजपा ने विभिन्न समूहों के बीच जातिगत अपील रखने वाले सात छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन को अंतिम स्वरुप दे दिया है.

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लखनऊ: एक ‘मुंबई से लौटा शख्स’ जो पुरे पूर्वी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य को बदलना चाहता है, एक पार्टी जो ‘शोषित (दबाये गए)’ लोगों की आवाज होने का दावा करती है, और एक अन्य पार्टी जिसने 2019 के लोकसभा चुनाव में तीन सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन सभी सीटों में जमानत गवां दी थी.

ये सब पूरे उत्तर प्रदेश में फैले विभिन्न जाति समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले राज्य की सत्तारूढ़ भाजपा के साथ हाथ मिलाने के लिए एक साथ आए हैं.

चूंकि उसके पूर्व सहयोगी ओपी राजभर के नेतृत्व वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) के ने पिछले महीने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की घोषणा की थी, इसलिए भाजपा ने अब अपना ध्यान राज्य के छोटे-छोटे दलों पर केंद्रित कर दिया है.

अक्टूबर में, भाजपा ने विभिन्न समूहों के बीच जातिगत अपील रखने वाले सात छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन को अंतिम स्वरुप दे दिया है.

ये पार्टियां हिस्सेदारी मोर्चा का हिस्सा हैं, जो इस साल बना छोटे दलों का एक ऐसा गठबंधन है जो अपने-अपने समुदायों को एक बड़ी आवाज प्रदान करने के उद्देश्य से एक साथ आया है. इसमें बिंद, गडरिया, कुम्हार, धीवर, कश्यप और राजभर सहित विभिन्न ओबीसी समूहों का प्रतिनिधित्व है.

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उनमें से कुछ पहले ओपी राजभर के द्वारा बनाये गए भागीदारी संकल्प मोर्चा, जो 2022 के चुनावों के लिए गठित एक गठबंधन था और जिसमें एआईएमआईएम भी शामिल थी, के साथ थे; लेकिन अब ये सब इससे अलग हो गए हैं.

हिस्सेदारी मोर्चा के संयोजक केवट रामधनी बिंद ने दिप्रिंट को बताया कि वे यूपी के आगामी चुनाव में भाजपा से कम-से-कम 15 सीटों की उम्मीद कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि, ‘हमें विभिन्न जातियों का समर्थन प्राप्त है. हमने देखा कि भाजपा गैर-यादव ओबीसी और दलितों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है, इसलिए हमने उनसे गठबंधन के लिए संपर्क करने का फैसला किया. हम अपने मोर्चा को एक बड़ा मंच देने के लिए भाजपा नेतृत्व के आभारी हैं.‘


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ये सात दल हैं : भारतीय मानव समाज पार्टी, शोषित समाज पार्टी, भारतीय सुहेलदेव जनता पार्टी, भारतीय समता समाज पार्टी, मानवहित पार्टी, पृथ्वीराज जनशक्ति पार्टी और मुसहर आंदोलन मंच उर्फ गरीब पार्टी.

भारतीय मानव समाज पार्टी

प्रमुख: केवट रामधनी बिंदी

स्थापना वर्ष: 2017

इस पार्टी का का ध्यान मुख्य रूप से बिंद, जो आम तौर पर निषादों के रूप में गिने जाने वाला ओबीसी समूह है, पर केन्दित है. केवट रामधनी ने कहा, ‘पूर्वी यूपी में बिंद लोगों की आबादी लगभग 6 फीसदी है, खासकर प्रयागराज, जौनपुर, वाराणसी, मिर्जापुर, सोनभद्र और गाजीपुर सहित 10 जिलों में. वे इन जिलों की कई विधानसभा सीटों पर चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं.’

41-वर्षीय केवट ने खुद को बॉम्बे से लौटे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में वर्णित किया जो पूर्वी यूपी में राजनीतिक परिदृश्य को बदलना चाहता है.

केवट, जो पहले भागीदारी संकल्प मोर्चा के साथ थे, ने इसी साल हिस्सेदारी मोर्चा का गठन किया है .

पार्टी के एक पदाधिकारी ने बताया कि बिंद पहले यूपी में बसपा और सपा के पारंपरिक मतदाता थे. वे कहते हैं, ‘खास तौर पर बसपा का पहले बिन्दो के बीच एक बड़ा आधार था, लेकिन निषाद पार्टी के साथ भाजपा के गठबंधन के बाद (2022 के लिए इन दोनों के बीच समझौता इसी साल सितंबर में हीं तय कर दिया गया था), यह पार्टी उनके लिए एक और विकल्प के रूप में उभरी है.’

शोषित समाज पार्टी

प्रमुख: बाबू लाल राजभर

स्थापन वर्ष : 2020

इस पार्टी का कहना है कि कमजोर तबकों, खासकर राजभरों, की आवाज उठाना उसकी प्राथमिकता है. हालांकि, बाबू लाल का कहना है कि उनकी पार्टी केवल राजभरों के हितों का साधन नहीं है बल्कि यह सभी जातियों का प्रतिनिधित्व करना चाहती है.

उनके अनुसार, वह पहले ओ.पी. राजभर से बहुत प्रभावित थे, लेकिन बाद में उन्हें भी एक वंशवाद समर्थक पाया. इसलिए, उन्होंने उसी इलाके में अपनी पार्टी की स्थापना की है .

बाबू लाल ने कहा कि पूर्वी यूपी में राजभरों की आबादी कुल आबादी के 14 फीसदी से 22 फीसदी के बीच है. उनके अनुसार ‘उन्होंने (राजभरों ने) देखा है कि कैसे ओपी राजभर सिर्फ अपने परिवार के लिए काम करते हैं, समुदाय के लिए नहीं. इसलिए इस बार सारा समुदाय मेरी पार्टी का समर्थन कर रहा है.’

भारतीय सुहेलदेव जनता पार्टी

प्रमुख: भीम राजभर

स्थापना वर्ष : 2020

यह पार्टी बलिया जिले के आस-पास के राजभर समुदाय पर केंद्रित है. भीम राजभर पहले ओपी राजभर की एसबीएसपी के सदस्य भी थे. वह हिस्सेदारी मोर्चा के एक सह-संस्थापक सदस्य हैं.

भारतीय समता समाज पार्टी

प्रमुख: महेंद्र प्रजापति

स्थापना वर्ष: 2008

इस पार्टी का सारा ध्यान मुख्य रूप से अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी) के तहत आने वाला प्रजापति समुदाय पर है, और पार्टी का उद्देश्य इस समुदाय के सदस्यों की वित्तीय स्थिरता के लिए काम करना है. महेंद्र प्रजापति का कहना है कि राज्य की कुल आबादी में इस समुदाय की आबादी 5 फीसदी से ज्यादा है.

पार्टी के एक पदाधिकारी ने कहा कि प्रजापति मुख्य रूप से कुम्हार हैं, यानि वे लोग जो मिट्टी के बर्तनों के निर्माण कार्य में लगे हैं. इस पदाधिकारी ने यह भी कहा कि वे परंपरागत रूप से सपा के समर्थक रहे हैं, लेकिन 2017 में भाजपा द्वारा गैर-यादव ओबीसी समुदाय के बीच बड़े पैमाने पर पहुंच बनाने के प्रयास के बाद इसका एक बड़ा वर्ग भाजपा के साथ चला गया.

योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा कुछ ही महीने पहले की गई ‘माटी कला बोर्ड’ का गठन करने की पहल, जिसका उद्देश्य राज्य के मिट्टी के कारीगरों को प्रशिक्षण और सहायता प्रदान करना है, ने भी भाजपा के पक्ष में काम किया है.

पार्टी ने तीन संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा थे, लेकिन इसने सभी सीटों पर अपनी जमानत गवां दी थी.

मानवहित पार्टी

प्रमुख: कृष्ण गोपाल सिंह कश्यप

स्थापना वर्ष : 2015

पार्टी कश्यप समुदाय, निषादों के तहत आने वाली एक और उप-जाति, का प्रतिनिधित्व करती है. कश्यप लोग 1998 से 2014 के बीच बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ थे.

गोपाल कश्यप ने कहा, ‘हमने 2017 का चुनाव भी लड़ा था. उस समय हमारा वोट प्रतिशत 1 प्रतिशत से कम था. 2019 के लोकसभा चुनावों में, हमने कांग्रेस का समर्थन किया क्योंकि उन्होंने हमसे 2022 के विधानसभा चुनावों में गठबंधन का वादा किया था, लेकिन उन्होंने उसके बाद फिर कोई जवाब नहीं दिया, इसलिए हमने हिस्सेदारी मोर्चा में शामिल होने का फैसला किया.’

उन्होंने कहा कि यूपी की आबादी में कश्यप आबादी की संख्या तीन फीसदी से भी ज्यादा है.

पृथ्वीराज जनशक्ति पार्टी

प्रमुख: चंदन सिंह चौहान

स्थापना वर्ष : 2018

इस पार्टी के प्राथमिकता वाले समूहों में शामिल हैं नोनिया, एक ओबीसी जाति जो मुख्य रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश में पाई जाती है. पार्टी के एक पदाधिकारी ने कहा कि वाराणसी, चंदौली और मिर्जापुर सहित पूर्वी यूपी के जिलों में नोनिया तबके की आबादी 3 प्रतिशत से अधिक है. इस पार्टी का मुख्य आधार वाराणसी में है.

मुसहर आंदोलन मंच (गरीब पार्टी)

प्रमुख: चंद्रमा वनवासी

स्थापना वर्ष : 2018

इस समूह ने ‘गरीब पार्टी’ नाम से एक पार्टी के रूप में अपने पंजीकरण के लिए आवेदन किया हुआ है. गाजीपुर जिले में सक्रिय यह पार्टी दलितों, विशेषकर मुसहरों, पर केंद्रित है.

पार्टी के एक सदस्य ने कहा कि मुसहर शब्द का शाब्दिक अनुवाद है ‘चूहा खाने वाला’ और उन्हें इस समुदाय द्वारा चूहों को पकड़ने के अपने प्राथमिक व्यवसाय के कारण इस नाम से जाना जाता है.

पार्टी के इस सदस्य ने कहा कि समुदाय में कई लोग, जिन्हें बनबासी के नाम से भी जाना जाता है, अभी भी गरीबी और तंगहाली के कारण इस काम को करने के लिए मजबूर हैं. वे पूर्वी उत्तर प्रदेश में आबादी का लगभग 1 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं.

इनका महत्व

यूपी बीजेपी के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि, ‘कई जिलों में इन सभी सात छोटी पार्टियों का अपना-अपना महत्व है.’

त्रिपाठी ने कहा ‘उन्हें कमजोर वर्गों का समर्थन प्राप्त है. भाजपा ने उन्हें एक बड़ा मंच दिया है वे पीएम मोदी और सीएम योगी के नेतृत्व में भाजपा सरकारों की नीतियों से प्रभावित हैं इसलिए उन्होंने गठबंधन के लिए हमसे संपर्क किया.’

यूपी भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने अपना नाम न बताने की शर्त पर कहा कि, ‘ये सात छोटी पार्टियां कई जातियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, खासकर ओबीसी और अनसूचित जनजातियों के बीच’.

इस पदाधिकारी ने कहा, ‘वे पूर्वी यूपी की 25 प्रतिशत से भी अधिक आबादी, विशेष रूप से कमजोर तबकों के बीच, को प्रभावित करते हैं. वे हमारी इन समुदायों तक पहुंच बढ़ाने में मदद करेंगे, खासकर गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़, जौनपुर और वाराणसी जैसे जिलों में. इस इलाके में उत्तर प्रदेश विधानसभा की कुल 403 में से 50 से अधिक विधानसभा सीटें हैं. सपा और ओपी राजभर की भी इस इलाके में पहुंच है, इसलिए उनका मुकाबला करने में ये छोटी-छोटी पार्टियां अहम भूमिका निभाएंगी.’


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इस नेता का कहना है कि हिस्सेदारी मोर्चा के तहत आने वाले सात दलों को भाजपा के साथ गठबंधन के बाद और आकर्षण प्राप्त होगा और वे आने वाले चुनावों में हमारी मदद करेंगे.

उनका कहना था, ‘2014 में जब ओपी राजभर, संजय निषाद और अनुप्रिया पटेल ने हमारे साथ गठबंधन किया था तो उससे पहले उनकी पार्टियों के बारे में कोई भी नहीं जानता था. उनका मूल्य और महत्त्व सिर्फ इसलिए बढ़ गया क्योंकि उन्होंने हमारे साथ गठबंधन किया था.’

हालांकि लखनऊ के गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज में सहायक प्रोफेसर डॉ शिल्प शिखा सिंह का कहना है कि, ‘ये नई पार्टियां और उनके नेता बड़े पैमाने पर अपने समुदायों को संगठित करने के लिहाज से बहुत नए और बहुत छोटे हैं’.

सिंह कहती हैं, ‘भाजपा के ये प्रयास राजनीतिक रूप से जागरूक गैर-प्रमुख पिछड़े समूहों के बीच वैकल्पिक नेतृत्व बनाने की उसकी रणनीति के अनुरूप हीं किये जा रहे हैं, लेकिन ऐसे प्रयासों की भी एक तयशुदा सीमा है, क्योंकि ये नेता अपने आप से उभरे नेता नहीं हैं. वे सब भाजपा के आधिपत्य वाली छत्रछाया के तहत विकसित हो रहे हैं. ओम प्रकाश राजभर जैसे स्वयंभू तरीके से उभरे नेताओं को मुकाबला करने में वे किस हद तक प्रभावी होंगे … यह अभी काफी संदिग्ध मुद्दा है.’

उन्होंने कहा कि, ‘अभी तक की उनकी अधिकतम ताकत उनके अपने समुदाय में उनके साथ सहानुभूति रखने वालों की जिला-स्तरीय आंशिक लामबंदी तक हो सीमित सकती है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

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