नई दिल्ली: 30 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के आठ दिन बाद हुई केंद्रीय कैबिनेट की पहली बैठक में भारी सन्नाटा था. भारत इस भयानक घटना से सदमे में था. लोग गुस्से में थे. वे आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई चाहते थे. कुछ लोग बदला भी चाहते थे.
मेज के शीर्ष पर बैठे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरी शांति और ध्यान में दिखाई दिए. फिर उन्होंने एक सख्त वादा किया: “वे जहां भी होंगे, हम उन्हें नहीं छोड़ेंगे.”
यह अंदर की कहानी केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की नई किताब ‘अपनापन: नरेंद्र मोदी संग मेरे अनुभव’ का मुख्य हिस्सा है, जो 26 मई को जारी होने वाली है.
यह किताब हिंदी में लिखी गई है और प्रभात प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है. यह सिर्फ सामान्य राजनीतिक बातें नहीं बताती, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के काम करने के तरीके को दिखाती है. इसमें ऑपरेशन सिंदूर की योजना बनाने, नितिन नबीन को भाजपा अध्यक्ष बनाने और युद्ध क्षेत्रों में फंसे भारतीयों को निकालने के लिए लगातार संपर्क करने जैसी बातें शामिल हैं.
केंद्रीय कृषि मंत्री लिखते हैं, “मैं खासकर गुजरात के कार्यक्रमों में बार-बार कहता हूँ कि गुजरात ने देश को तीन महान पुरुष दिए हैं. महात्मा गांधी, सरदार पटेल और अब नरेंद्र मोदी.”
किताब में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मोदी को ‘ऋषि’ और ‘तपस्वी’ बताते हैं और उनके नेतृत्व, व्यक्तित्व और राजनीति के अलग-अलग पहलुओं पर रोशनी डालते हैं.
247 पन्नों की इस किताब में चौहान और मोदी के 35 साल पुराने संबंधों का जिक्र है. दिप्रिंट ने किताब में बताए गए पाँच मुख्य घटनाओं को देखा है, जो चौहान के अनुसार मोदी के निष्पक्ष और संवेदनशील नेतृत्व को दिखाती हैं.
“गुजरात ने देश को तीन महान पुरुष दिए हैं. महात्मा गांधी, सरदार पटेल और अब नरेंद्र मोदी.” शिवराज चौहान ने अपनी किताब में लिखा.
नितिन नबीन को BJP अध्यक्ष कैसे चुना गया
मीडिया में कई महीनों की चर्चा और जेपी नड्डा के कार्यकाल बढ़ने के बाद BJP ने 14 दिसंबर 2025 को नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया. उन्होंने इस साल 20 जनवरी को औपचारिक रूप से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला और भाजपा के सबसे युवा अध्यक्ष बने.
कई लोगों के लिए नबीन का चयन चौंकाने वाला था. लेकिन चौहान कहते हैं कि यह सिर्फ उन लोगों के लिए आश्चर्य था जो “मोदी के विस्तार से राय लेने के तरीके” को नहीं जानते थे.
चौहान लिखते हैं कि यह घोषणा “कई महीनों की समीक्षा, चर्चा और विचार-विमर्श” के बाद हुई.
वे लिखते हैं, “सच्चाई यह है कि बहुत पहले तय हो गया था कि पार्टी को ऐसा अध्यक्ष चुनना होगा जो कुछ युवा हो, यानी 50 साल से कम उम्र का कार्यकर्ता.”
और पार्टी ने सच में एक विस्तृत प्रक्रिया अपनाई, वे लिखते हैं.
वे लिखते हैं, “पूरे भारत से नाम मांगे गए. उनमें से 200 से ज्यादा लोगों को चुना गया और यह चयन केवल योग्यता के आधार पर हुआ. इन 200 नामों पर विस्तार से चर्चा के बाद नौ नामों की सूची बनाई गई. आखिर में इन नौ लोगों में से श्री नितिन नबीन जी को उनके अनुभव और काम के रिकॉर्ड के आधार पर चुना गया.”
चौहान लिखते हैं कि यह प्रधानमंत्री मोदी की उस नेतृत्व शैली को दिखाता है जो “पारदर्शिता, भागीदारी और निष्पक्षता” पर आधारित है.
वे आगे कहते हैं, “इसी वजह से जनता को उन पर पूरा भरोसा है. वे राय लेते समय लोगों की गलतियां नहीं खोजते, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाने और हर भूमिका की गरिमा बनाए रखने की कोशिश करते हैं. अपने काम करने के तरीके से वे हम सबको यह उदाहरण देते हैं कि नेतृत्व का मतलब सब कुछ खुद जानना नहीं, बल्कि आसपास के लोगों से सीखना है.”
इसके बाद चौहान लिखते हैं कि पीएम मोदी का नेतृत्व सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक भी है.
वे लिखते हैं, “एक ऐसी संस्कृति जहां हर विचार को सुना जाता है, हर प्रतिभा का सम्मान होता है और विचारधारा किसी संग्रहालय में बंद किताब की तरह नहीं बल्कि बहती हुई धारा की तरह चलती है. और जब भी मैं कार्यकर्ताओं के साथ बैठता हूं, तो मैं देखता हूं कि वे गर्व से कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री मोदी को मेरा नाम याद था. उन्होंने मेरे परिवार का हाल पूछा.’ यह कहना गलत नहीं होगा कि ऐसे ही पलों में बड़ी राजनीति बनती है.”
ऑपरेशन सिंदूर
30 अप्रैल की कैबिनेट बैठक में पीएम मोदी ने जो वादा किया था, वह आठ दिनों के अंदर पूरा किया गया. भारतीय सेना ने 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया. इसमें सीमा पार आतंकियों और उनके ठिकानों पर सटीक हमले किए गए.
केंद्रीय मंत्री उस कैबिनेट बैठक को याद करते हैं.
चौहान लिखते हैं, “मुझे 30 अप्रैल 2025 की कैबिनेट बैठक से पहले का सन्नाटा याद है. यह पहलगाम में हुए भयानक आतंकी हमले के कुछ दिन बाद पहली कैबिनेट बैठक थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शांत, केंद्रित और पूरे ध्यान में बैठे थे.”
वे लिखते हैं, “वे धैर्य और दृढ़ निश्चय की मिसाल लग रहे थे. जहाँ कोई सामान्य नेता घबरा सकता था, मोदी पूरी तरह शांत थे और उनकी आँखों में दृढ़ संकल्प दिखाई दे रहा था. कैबिनेट में उनका संदेश साफ था: ‘वे जहाँ भी होंगे, हम उन्हें नहीं छोड़ेंगे.’”
वे आगे लिखते हैं, “मैंने 7 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस दृढ़ता को अपनी आँखों से देखा. यह एक सटीक और समन्वित अभियान था, जिसने दुनिया को दिखाया कि भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर कितना गंभीर है. हर हमला पूरी योजना के साथ किया गया.”
किताब में कहा गया है कि पीएम मोदी के नेतृत्व में आतंकवाद के खिलाफ एक ‘नया सामान्य’ बना है और इतिहास ऑपरेशन सिंदूर को एक बड़े बदलाव के रूप में याद करेगा. “जब अभियान खत्म हुआ, तब कोई अनावश्यक जश्न नहीं मनाया गया. सेना के प्रति आभार था, पाकिस्तान की प्रतिक्रिया को लेकर सावधानी थी और देश को साफ संदेश दिया गया कि भारत आतंकवाद के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए हमेशा दृढ़ रहेगा.”
वे कहते हैं, “मोदी के नेतृत्व में पाकिस्तान समर्थित आतंकी हमलों पर भारत की प्रतिक्रिया की तुलना 2004-14 के कांग्रेस शासन से कीजिए. 2016 में पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर 2019 में पाकिस्तान में एयर स्ट्राइक और 2025 में पूरी पाकिस्तानी सेना का मनोबल तोड़ने तक, भारत ने कड़ा जवाब दिया. जबकि कांग्रेस शासन में लगभग हर महीने आतंकी हमले होते थे और भारत चुप रहता था.”
चौहान यह भी लिखते हैं कि फरवरी 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर बड़ा हमला शुरू किया, तब 20,000 से ज्यादा भारतीय छात्र युद्ध के बीच फंस गए थे. वे कहते हैं कि मोदी ने तुरंत फैसला लिया और ऑपरेशन गंगा के तहत हर छात्र को सुरक्षित वापस लाने का काम शुरू किया.
चौहान कहते हैं कि पूरे समय मोदी ने रूस और यूक्रेन के नेताओं से कई बार बात की और भारतीय छात्रों की सुरक्षित वापसी की अपील की. “इसके परिणामस्वरूप, भारी लड़ाई के बीच दोनों देशों की सेनाओं ने कुछ समय के लिए संघर्ष रोक दिया और एक सुरक्षित रास्ता बनाया, जिससे भारतीय छात्रों को ले जा रही बसें सुरक्षित और जल्दी निकल सकीं.”
वे लिखते हैं कि भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा सबसे कठिन युद्ध क्षेत्रों में भी सुरक्षित रास्ते का प्रतीक बन गया था. “भारत की योजना इतनी प्रभावी थी और भारतीय तिरंगे की ताकत इतनी मजबूत थी कि दूसरे देशों के छात्रों ने भी यूक्रेन से सुरक्षित निकलने के लिए भारतीय झंडे का सहारा लिया.”
चौहान किताब में लिखते हैं कि उन्होंने कैबिनेट बैठकों में देखा है कि जब भी कोई संवेदनशील सुरक्षा स्थिति पर चर्चा होती है, मोदी सीधे मुद्दे पर आते हैं और तुरंत कार्रवाई पर जोर देते हैं, क्योंकि लोगों की जान दाँव पर होती है.
वे आगे लिखते हैं, “दया और संवेदनशीलता से पैदा हुई यही जल्दी भारत को सच्चा ‘विश्वबंधु’ बनाती है, यानी दुनिया का भरोसेमंद मित्र. इन सभी अनुभवों ने मुझे सिखाया कि मोदी जी की विदेश नीति सिर्फ दोस्त और दुश्मन की गणना नहीं है, बल्कि संकट के समय मानवता की सेवा करने से जुड़ी है.”
BJP की MP लिस्ट में चौहान का नाम नहीं था
केंद्रीय मंत्री कहते हैं कि पीएम मोदी का नेतृत्व “संवेदनशीलता और करुणा से भरा हुआ” है. वह 2023 के मध्य प्रदेश चुनाव का उदाहरण देते हैं, जब BJP की पहली उम्मीदवार सूची में उनका नाम नहीं था.
चौहान लिखते हैं, “2023 मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा उम्मीदवारों की घोषणा हुई और स्वाभाविक रूप से पहले उन सीटों के नाम घोषित किए गए जहाँ पार्टी अपेक्षाकृत कमजोर थी. यह भी स्वाभाविक था कि शुरुआती सूचियों में मेरा नाम शामिल नहीं था. उसी समय, एक सार्वजनिक भाषण में मैंने कहा था, ‘जब मैं चला जाऊंगा, तब बहुत याद आऊंगा.’”
“जैसा अक्सर होता है, मेरे विरोधियों ने इस बात को तोड़-मरोड़कर फैलाया कि मेरा राजनीतिक करियर खत्म हो गया है. विपक्ष के कुछ लोगों ने मेरा मजाक उड़ाया और कहा, ‘अंकल को दफना दिया गया है.’”
चौहान कहते हैं कि कांग्रेस ने भ्रम फैलाने की कोशिश की और सोशल मीडिया पर उनके बयान को “तोड़-मरोड़कर” शेयर करना शुरू कर दिया.
चौहान लिखते हैं, “आज जब मैं उस समय को याद करता हूँ, तो मुझे कांग्रेस का मजाक नहीं बल्कि मोदी जी की दिल से की गई संवेदनशीलता याद आती है. चुनाव के व्यस्त माहौल के बावजूद उन्होंने मुझे खुद फोन किया.”
पीएम मोदी ने चौहान से पूछा कि वे परेशान क्यों दिख रहे हैं और अगर वे किसी गुरु को मानते हैं तो उनसे मार्गदर्शन लेने को कहा.
“वे चाहते थे कि मैं रुकूं, सोचूं और अपनी अंदर की ताकत को फिर से जगाऊं. उनके स्नेह ने मेरे दिल को छू लिया. देश की जिम्मेदारियों में व्यस्त एक नेता मेरी व्यक्तिगत स्थिति को लेकर भी चिंतित था. यही सच्ची संवेदनशीलता है,” उन्होंने कहा.
पीएम की सलाह मानकर चौहान उत्तराखंड गए. बहते पानी और अडिग पहाड़ों को देखकर उन्हें स्पष्टता मिली, वे लिखते हैं.
वे लिखते हैं, “मैं पूरी तरह समझ गया कि मोदी जी ने क्या किया था. उनका स्नेह सिर्फ मेरे लिए नहीं था, बल्कि रणनीतिक भी था. वे अच्छी तरह समझते थे कि अगर मीडिया की भ्रामक खबरों से मैं निराश हो जाता, तो उसका असर हमारे कार्यकर्ताओं पर पड़ता. भावनात्मक रूप से मेरे साथ खड़े होकर और मुझ पर व्यक्तिगत भरोसा दिखाकर उन्होंने सिर्फ मेरा ही नहीं बल्कि हजारों समर्पित कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया.”
“यह नेतृत्व का सबसे ऊंचा स्तर है, जहां संवेदनशीलता और रणनीति एक साथ चलती हैं. मैं इस बात से भी विनम्र हुआ कि उन्होंने सिर्फ मेरे एक बयान से मेरी भावनाओं को समझ लिया और मुझे फोन किया. उनके शब्द मार्गदर्शन देने वाले और भरोसा दिलाने वाले दोनों थे.”
भाजपा ने वह चुनाव जीत लिया, लेकिन चौहान को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया, जो लोगों की उम्मीदों के खिलाफ था.
चौहान लिखते हैं कि मुख्यमंत्री न बनाए जाने पर वे दुखी नहीं थे. छह महीने बाद उनके सामने एक नया मौका आया.
9 जून 2024 को उन्होंने तीसरी मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ली.
“मुझे कृषि और ग्रामीण विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई. उसी समय मुझे एहसास हुआ कि भोपाल में शपथ ग्रहण समारोह के दौरान मोदी जी ने मुझसे जो बात की थी, उसमें उन्होंने मेरे बारे में पहले से सोच रखा था.”
फीडबैक सिस्टम
यह किताब इस बात पर भी रोशनी डालती है कि मोदी लोगों, योजनाओं और नीतियों की जानकारी लेने के लिए ‘फीडबैक व्यवस्था’ का इस्तेमाल कैसे करते हैं.
चौहान एक घटना बताते हैं जब 2023 में इंदौर में प्रवासी भारतीय दिवस खत्म होने के बाद उन्हें पीएम का फोन आया और उन्होंने पूछा कि कार्यक्रम को लोगों ने कैसा माना.
उस समय मुख्यमंत्री रहे चौहान ने पीएम से कहा कि कार्यक्रम अच्छा था और लोग व्यवस्थाओं से संतुष्ट थे. उनका अनुभव भी अच्छा रहा.
लेकिन पीएम ने उनसे फीडबैक व्यवस्था के बारे में सवाल पूछे और पूछा कि क्या ऐसी कोई व्यवस्था मौजूद थी. मोदी ने यह भी कहा कि मंच पर तीन राष्ट्रपति बैठे होने के बावजूद चौहान और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का लंबा भाषण देना ठीक नहीं था.
“फिर उन्होंने मुझे वह जानकारी बताई जो उन्हें पहले ही मिल चुकी थी. हॉल में जगह कम पड़ रही थी. कुछ अधिकारियों ने मेहमानों के लिए रखी सीटों पर गलत तरीके से कब्जा कर लिया था. माहौल शोरगुल वाला हो गया था और भीड़ की वजह से बाहर रह गए सम्मेलन के प्रतिनिधि भी नाराज थे.
“लेकिन इस पूरे फीडबैक से भी ज्यादा महत्वपूर्ण था मोदी जी का औपचारिक शिष्टाचार की याद दिलाना. उस कार्यक्रम में मंच पर तीन राष्ट्रपति बैठे थे. गुयाना के डॉ. मोहम्मद इरफान अली, सूरीनाम के श्री चंद्रिका प्रसाद संतोषी जी और हमारे तत्कालीन राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी. उन्होंने कहा कि जब इतने महत्वपूर्ण मेहमान मौजूद हों, तो उनसे पहले बोलने वालों के भाषण छोटे और सीधे होने चाहिए. जबकि ज्योतिरादित्य सिंधिया और मैंने लंबे भाषण दिए थे. मोदी जी ने मुझे सलाह दी कि ‘ऐसी स्थिति में छोटा भाषण काफी होता है. भाषण में ज्यादा समय लेना उचित नहीं है.’”
“मोदी जी के काम करने का यह तरीका उनके नेतृत्व के हर पहलू में दिखता है. उनका फीडबैक लेने का तरीका सिर्फ कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है. यह नीतियों, अच्छे शासन और जिम्मेदार लोगों के चयन तक जाता है. चाहे उपराष्ट्रपति की नियुक्ति हो, राज्यपाल चुनना हो, किसी को राज्यसभा भेजना हो या बड़ी जिम्मेदारी देना हो, मोदी जी कभी भी अपनी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद को बीच में नहीं आने देते.”
वे लिखते हैं कि मोदी कई लोगों से राय लेते हैं, उन्हें अच्छी तरह परखते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी को नजरअंदाज न किया जाए. जो लोग मेहनत और समर्पण से काम करते हैं, भले ही वे चर्चा में न हों, उनकी मेहनत कभी बेकार नहीं जाती.
“उनकी मेहनत बड़े राजनीतिक शोर में दबती नहीं है. मैंने हाल ही में श्री सी.पी. राधाकृष्णन को भारत का उपराष्ट्रपति चुने जाने की प्रक्रिया में मोदी जी की इस व्यापक और अच्छी योजना वाली प्रक्रिया को खुद देखा,” चौहान कहते हैं.
मोदी का कार्यकाल ‘स्वर्णिम अध्याय’
चौहान किताब में मोदी को ‘ऋषि’, ‘समाज सुधारक’, ‘तपस्वी’, ‘महापुरुष’ जैसे शब्दों से बताते हैं और कहते हैं कि उनका कार्यकाल भारत के लिए ‘स्वर्णिम अध्याय’ कहा जा सकता है.
वे लिखते हैं, “तीन दशकों से ज्यादा के सार्वजनिक जीवन में मैंने कई नेताओं को देखा है. कुछ सत्ता चाहते हैं, कुछ पहचान चाहते हैं. लेकिन बहुत कम लोग सच्चे महापुरुष होते हैं. वे लोग जो इतिहास और भविष्य दोनों बदल देते हैं. मैं पूरी ईमानदारी से कह सकता हूं कि जब मोदी जी ने सत्ता संभाली, तो वह भारत के राजनीतिक इतिहास का एक बड़ा मोड़ था.”
‘विस्तार, सटीकता और सफलता: मोदी कैबिनेट का तरीका’ शीर्षक के तहत चौहान बताते हैं कि मोदी कैबिनेट कैसे काम करती है.
चौहान किताब में लिखते हैं कि लोग सोचते हैं कि कैबिनेट बैठकें सिर्फ औपचारिकता होती हैं, जहां एक व्यक्ति बोलता है और बाकी लोग सिर्फ सहमति में सिर हिलाते हैं, लेकिन सच्चाई अलग है.
केंद्रीय मंत्री लिखते हैं, “मोदी सरकार की कैबिनेट बैठकों का मेरा अनुभव बिल्कुल अलग रहा है. वहाँ प्रधानमंत्री हर सदस्य को खुलकर अपनी राय रखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.”
“वे अक्सर बैठक में आते हैं, चारों ओर देखते हैं और बहुत सामान्य और दोस्ताना अंदाज में कहते हैं, ‘अगर किसी को कुछ कहना है, तो कह सकता है.’ अगर किसी विषय पर चर्चा की जरूरत हो, तो मोदी जी तुरंत कहते हैं कि उस विषय पर फिर से बैठक हो ताकि उसके व्यावहारिक पहलुओं को समझा जा सके और यह देखा जा सके कि हमारी समय सीमा वास्तविक है या नहीं,” उन्होंने कहा.
वे लिखते हैं, “मैंने कई बार देखा है कि जब कोई मंत्री नया विचार या नया नजरिया देता है, तो मोदी जी बिना झिझक उस प्रस्ताव को दोबारा विचार के लिए रोक देते हैं, चाहे वह कैबिनेट मंजूरी के लिए पहले ही तय हो चुका हो.”
चौहान लिखते हैं कि यह उनके शासन शैली की खास पहचान है, जहां फैसले जल्दबाजी में नहीं बल्कि गहराई और दूरदृष्टि के आधार पर लिए जाते हैं.
चौहान कहते हैं कि यही सबको साथ लेकर चलने वाला तरीका सरकार को बेहतर और ज्यादा व्यावहारिक समाधान तक पहुँचने में मदद करता है.
इसके बाद चौहान मोदी की नेतृत्व शैली की एक सबसे खास बात बताते हैं. वे ज्यादा सुनते हैं और कम बोलते हैं. “मैंने इससे पहले ऐसा श्रोता कभी नहीं देखा.”
केंद्रीय मंत्री किताब में कहते हैं, “पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठकों में भी मोदी कभी पहले नहीं बोलते. जिस राज्य पर चर्चा हो रही होती है, वहां के BJP मुख्यमंत्री पहले बोलते हैं. अगर उस राज्य में भाजपा की सरकार नहीं है, तो उस राज्य का विपक्ष का नेता भाजपा की ओर से बोलता है,” वे लिखते हैं.
चौहान के अनुसार मोदी सबकी बात ध्यान से सुनने के बाद ही अपने सुझाव देते हैं. “वे फैसले थोपते नहीं, बल्कि सहमति बनाते हैं. उनका नेतृत्व विनम्रता, अनुशासन और सामूहिक बुद्धिमत्ता के सम्मान से भरा है, जो आज की राजनीति में बहुत दुर्लभ है.”
चौहान आगे मोदी को “संन्यासी सोच वाले कर्मयोगी” बताते हैं.
चौहान कहते हैं कि कर्तव्य स्पष्टता मांगता है और “हमें साहस और सावधानी दोनों के साथ आगे बढ़ना चाहिए.”
वे आगे कहते हैं, “भावना और कर्तव्य के बीच यही संतुलन कैबिनेट के सामूहिक फैसलों में मोदी जी के नेतृत्व में भी दिखाई देता है. मेरा मानना है कि मोदी जी के कार्यकाल में किए गए सुधारों ने ऑपरेशन सिंदूर की सफलता में भी बड़ी भूमिका निभाई. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का गठन, एकीकृत थिएटर कमांड, संयुक्त लॉजिस्टिक्स, तीनों सेनाओं का संयुक्त प्रशिक्षण और इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम जैसे नेटवर्क ने हमारी सेनाओं को भविष्य के लिए तैयार बल बना दिया है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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