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Thursday, 21 May, 2026
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मोदी सरकार ने देश के युवाओं को निराश किया, परीक्षा घोटालों ने ली है जान

नीट से लेकर यूजीसी-नेट तक—मोदी सरकार में भारत की प्रतियोगी परीक्षाएं बुरी तरह बिखर रही हैं.

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नरेंद्र मोदी सरकार की सबसे बड़ी प्रशासनिक विफलता अगर कहीं साफ दिखाई देती है, तो वह भारत की परीक्षा व्यवस्था का चरमराना है. नारे, प्रचार, मीडिया नैरेटिव और फोटो-ऑप में व्यस्त सरकार प्रतियोगी परीक्षाओं की ईमानदारी बचाने में पूरी तरह नाकाम रही है.

विपक्ष को निशाना बनाने, उसे “ठीक” करने और चुनाव “मैनेज” करने में व्यस्त मंत्री शासन की असली जिम्मेदारियों को नजरअंदाज कर रहे हैं. मोदी सरकार में केंद्रीय संस्थाओं का या तो राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है या फिर उन्हें अंदर से कमज़ोर होने के लिए छोड़ दिया गया है. संस्थागत गिरावट सबसे ज्यादा मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में दिखाई देती है. इसकी कीमत लाखों युवा चुका रहे हैं.

मैं यह लेख सिर्फ एक कॉलम लिखने वाली और सांसद के रूप में नहीं, बल्कि एक डॉक्टर की मां के तौर पर भी लिख रही हूं. मेरा बेटा 2013 में नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट फॉर अंडरग्रेजुएट्स (NEET-UG) देने वाले पहले बैच का हिस्सा था. उस समय उम्मीद थी कि एक राष्ट्रीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा से कई परीक्षाओं का तनाव कम होगा और छात्रों व अभिभावकों को लगातार यात्रा, भारी खर्च और चिंता से राहत मिलेगी, लेकिन 13 साल बाद वह वादा पूरी तरह बिखर चुका है. “न्यू इंडिया” की बात करने वाली सरकार देश के युवाओं को निराश कर चुकी है.

इसकी मानवीय कीमत बहुत दर्दनाक है. पेपर लीक सिर्फ एक “गड़बड़ी” नहीं है. इसका मतलब है एक 18 साल के छात्र का अंदर से टूट जाना, परेशान परिवार और बर्बाद भविष्य. इस साल नीट-यूजी परीक्षा रद्द होने के बाद कम से कम चार छात्रों ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली.

एक मां के तौर पर मैंने देखा है कि ये परीक्षाएं छात्रों पर कितना भारी दबाव डालती हैं. नीट के पहले साल में भी काफी भ्रम था. कुछ मेडिकल कॉलेज इस परीक्षा के खिलाफ थे, कुछ ने इसे स्वीकार किया, लेकिन किसी को ठीक से पता नहीं था कि कौन क्या कर रहा है. छात्र लगातार शहरों, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन और परीक्षा केंद्रों के बीच यात्रा करते रहे. कोचिंग क्लास, अव्यवस्था और बढ़ते खर्च ने छात्रों और परिवारों पर भारी मानसिक, शारीरिक और आर्थिक बोझ डाला.

और मेरा बेटा उन भाग्यशाली लोगों में था, जिन्हें परिवार का सहारा और आर्थिक स्थिरता मिली हुई थी, लेकिन करोड़ों लोगों के पास यह नहीं है. पूरे भारत में माता-पिता कोचिंग फीस और परीक्षा के सफर का खर्च उठाने के लिए गहने गिरवी रखते हैं, ज़मीन बेचते हैं और जीवनभर की बचत खत्म कर देते हैं. जबकि इन परीक्षाओं में अब संगठित अपराधी गिरोहों का दखल बढ़ता जा रहा है.

मेरे बेटे की नीट यात्रा के दौरान मेरी मुलाकात कई ऐसे माता-पिता से हुई, जो बेहद कठिन हालात की कहानियां लेकर घूम रहे थे. उनकी सिर्फ एक उम्मीद थी—उनके बच्चे को मेडिकल सीट मिल जाए.

ऐसी स्थिति में मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं—चाहे अंडरग्रेजुएट हों या पोस्टग्रेजुएट को लेकर मोदी सरकार का लापरवाह रवैया माफ करने लायक नहीं है.

आज नीट-यूजी में पेपर लीक, परीक्षा टलना, रद्द होना, कोर्ट केस और प्रशासनिक अव्यवस्था आम बात बन चुकी है. नीट-पीजी परीक्षाएं भी बार-बार प्रभावित हुई हैं. यह कोई एक बार की गलती नहीं, बल्कि बार-बार सामने आने वाला राष्ट्रीय शर्म का मामला और पूरी व्यवस्था के टूटने का संकेत है.

पंगु संस्थाएं, टूटी हुई व्यवस्था

आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं. 2005 से 2026 के बीच भारत में 21 राज्यों और केंद्र स्तर पर परीक्षा धोखाधड़ी या परीक्षा की निष्पक्षता बिखरने के 220 दर्ज मामले सामने आए हैं. इससे अनुमानित 9 से 10 करोड़ छात्र प्रभावित हुए हैं. इनमें से 72 मामले 2005 से 2014 के बीच हुए. जबकि 2015 से 2026 के बीच 148 मामले सामने आए—यानी ज्यादातर मामले मोदी सरकार के दौर में हुए. कुल 87 परीक्षाएं पूरी तरह रद्द करनी पड़ीं.

सरकार की जवाबदेही की कमी को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. 220 दर्ज मामलों में से 129 मामले बीजेपी या एनडीए सरकारों के दौरान हुए—यानी लगभग 59 प्रतिशत. 2015 के बाद यह संख्या और बढ़ गई. 148 मामलों में से 99 मामले, यानी 67 प्रतिशत परीक्षा लीक, बीजेपी या एनडीए शासन के दौरान हुए.

लेकिन शायद सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि 2015 के बाद 148 दर्ज मामलों के बावजूद सिर्फ एक मामले में सजा हुई है. सिर्फ एक.

सीबीआई ने 2015 के बाद कम से कम 17 परीक्षा घोटालों की जांच की, लेकिन एक भी सजा नहीं हुई. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी ऐसे कम से कम 11 मामलों की जांच की, लेकिन वहां भी एक भी सजा नहीं हुई.

यह मोदी सरकार की मूल पाखंडता को दिखाता है. आज देश की प्रमुख जांच एजेंसियां न्याय की संस्थाओं से ज्यादा राजनीतिक हथियार की तरह काम कर रही हैं, जिनका इस्तेमाल मोदी के राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ किया जाता है. विपक्षी नेताओं पर लगातार छापे, जांच और कार्रवाई की जाती है और इसे मीडिया में बड़े तमाशे की तरह दिखाया जाता है, लेकिन जब संगठित परीक्षा माफिया से छात्रों को बचाने की बात आती है, तो मोदी सरकार और उसकी ताकतवर एजेंसियां अचानक कमजोर और असहाय दिखने लगती हैं.

नीट 2024 पेपर लीक मामले में कथित मास्टरमाइंड को इसलिए जमानत मिल गई क्योंकि सीबीआई 90 दिनों की ज़रूरी समयसीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकी. पूरे 90 दिन और इतनी बड़ी शिक्षा घोटाले में मोदी सरकार बुनियादी कानूनी प्रक्रिया भी पूरी नहीं कर पाई.

परीक्षा धोखाधड़ी का तरीका भी बदल गया है. 2015 से पहले पारंपरिक यानी फिजिकल पेपर लीक कुल मामलों का लगभग 32 प्रतिशत थे. आज यह संख्या करीब 70 प्रतिशत हो गई है. व्हाट्सएप और फोन कैमरों ने बड़े स्तर पर नकल और पेपर लीक को आसान बना दिया है. अब प्रिंटिंग प्रेस, ट्रांसपोर्ट चेन, स्ट्रॉन्ग रूम या परीक्षा केंद्र में बैठा सिर्फ एक भ्रष्ट व्यक्ति लाखों छात्रों का भविष्य एक रात में बर्बाद कर सकता है.

नीट, एआईपीएमटी, राज्य पीटीएमटी, एम्स पीजी, एफएमजीई, जेआईपीएमईआर, सीओएमईडीके और अन्य परीक्षाओं से जुड़े कम से कम 15 बड़े विवाद दर्ज किए गए हैं.

फिर भी मोदी सरकार हर घोटाले को अलग-थलग घटना की तरह पेश करती रहती है. जबकि ऐसा नहीं है. यह लगातार प्रशासनिक विफलता का पैटर्न है.

मोदी सरकार द्वारा 2017 में बनाई गई नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) बेहद अपारदर्शी बनी हुई है. इसे कौन चला रहा है? इसकी पारदर्शी सालाना रिपोर्ट कहां हैं? जवाबदेही कहां है? करोड़ों युवाओं का भविष्य तय करने वाली संस्था पर सार्वजनिक निगरानी इतनी कम क्यों है?

2024 में मैंने शिक्षा मंत्री को पत्र लिखकर एनटीए के बारे में ज्यादा जानकारी मांगी थी. लेकिन मुझे कभी जवाब नहीं मिला.

नए एनटीए प्रमुख और पूर्व आईएएस अधिकारी अभिषेक सिंह ने नीट यूजी 2026 परीक्षा से कुछ हफ्ते पहले ही पद संभाला. आखिरी समय में की गई ऐसी अव्यवस्थित नियुक्तियों के बीच कोई संस्था देशव्यापी परीक्षा व्यवस्था को कैसे स्थिर रख सकती है? लेकिन मोदी सरकार में कभी सबक नहीं सीखा जाता, क्योंकि यहां जवाबदेही नाम की चीज ही नहीं है.

2024 में पूर्व इसरो प्रमुख के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में बनाई गई राधाकृष्णन समिति ने एनटीए में संरचनात्मक सुधार और ज्यादा पारदर्शिता की सिफारिश की थी, लेकिन उनका लागू होना अधूरा और सिर्फ दिखावटी बना हुआ है. मोदी सरकार में समितियां ज्यादातर लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए बनाई जाती हैं, जब तक अगला घोटाला सामने न आ जाए क्योंकि जब चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा लक्ष्य बन जाए, तो शासन प्राथमिकता नहीं रह जाता.

चुनाव, शासन से ऊपर

भारत के पास सिर्फ नाम के शिक्षा मंत्री हैं—धर्मेंद्र प्रधान. हरियाणा, बिहार और यहां तक कि पश्चिम बंगाल के चुनावों की जिम्मेदारी संभाल रहे प्रधान लगातार चुनाव प्रचार और पार्टी प्रबंधन में व्यस्त रहते हैं. ऐसा लगता है कि शिक्षा व्यवस्था सुधारने से ज्यादा उनकी ऊर्जा चुनाव प्रचार में खर्च हो रही है. एक फुल-टाइम शिक्षा मंत्री का न होना युवाओं के साथ बड़ा अन्याय है.

शासन की कीमत पर चुनावी राजनीति में डूब जाना मोदी सरकार की सबसे बड़ी पहचान बन चुका है.

गृह मंत्री अमित शाह की राजनीतिक ऊर्जा लंबे समय से चुनाव जीतने और राजनीतिक बदले की राजनीति में लगी हुई है. बड़े राष्ट्रीय सुरक्षा संकट होने के बावजूद शाह लगातार चुनावी मोड में बने रहते हैं.

2025 के पहलगाम आतंकी हमले ने राष्ट्रीय सुरक्षा में खतरनाक कमियों को उजागर किया. लेकिन किसी की जवाबदेही तय नहीं हुई. उसी साल दिल्ली के लाल किले पर हुए बम धमाकों ने दिखाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. शाह ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में लगातार प्रचार किया और बार-बार कहा कि “घुसपैठिए” या प्रवासी बांग्लादेश से आ रहे हैं. ऐसा लग रहा था जैसे वह भूल गए हों कि केंद्रीय गृह मंत्री होने के नाते सीमा सुरक्षा सीधे उनकी जिम्मेदारी है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार “परीक्षा पे चर्चा” कार्यक्रम करते हैं, जबकि खुद उनकी परीक्षा देने या विश्वविद्यालय की डिग्री हासिल करने को लेकर सवाल बने हुए हैं. मोदी ने Exam Warriors नाम की किताब भी लिखी है, लेकिन मोदी ने खुद कौन-सी परीक्षा पास की या किस परीक्षा में शानदार प्रदर्शन किया, यह जनता नहीं जानती.

मोदी “मन की बात” में पढ़ाई के टिप्स देते हैं. वह लगातार ‘स्टार्ट-अप इंडिया’ और ‘स्टैंड अप इंडिया’ की बात करते हैं, लेकिन जिस परीक्षा व्यवस्था पर करोड़ों युवाओं का भविष्य टिका है, उसे सुधारने के लिए प्रधानमंत्री ने क्या किया? क्या सिर्फ नारे परीक्षा के पेपर सुरक्षित रख सकते हैं? नहीं. अच्छी तरह तैयार किए गए फोटो-ऑप किसी ऐसे प्रधानमंत्री की भरपाई नहीं कर सकते, जिसके शासन में व्यवस्था टूट रही हो.

सबसे दुखद बात यह है कि कोविड की दो घातक लहरों के बाद भी, जिन्होंने भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरियां उजागर कर दीं, मोदी सरकार ने स्वास्थ्य और मेडिकल शिक्षा को प्राथमिकता नहीं दी. 1960 के दशक में ही कोठारी आयोग ने शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करने की सिफारिश की थी, लेकिन भारत में शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च अब भी केंद्रीय बजट का सिर्फ 2.5 प्रतिशत है और स्वास्थ्य पर सिर्फ 2 प्रतिशत.

पिछले दो सालों में ज्यादातर समय स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा बीजेपी अध्यक्ष के रूप में पार्टी के कामों में व्यस्त रहे. शिक्षा मंत्री संगठन की राजनीति में डूबे हुए हैं. गृह मंत्री राजनीतिक विरोधियों को “ठीक” करने में लगे हैं. चमकदार पीआर और एकतरफा मीडिया प्रचार के बीच मोदी सरकार की प्रशासनिक विफलताएं सामान्य बना दी गई हैं.

विश्वविद्यालयों में राजनीतिक दखल बढ़ता जा रहा है. कुलपतियों की नियुक्ति शैक्षणिक योग्यता की बजाय वैचारिक निष्ठा के आधार पर हो रही है. स्वतंत्र शैक्षणिक संस्थानों को धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है, जबकि केंद्रीकृत राजनीतिक नियंत्रण बढ़ रहा है.

नया विकसित भारत शिक्षा अधिनियम बिल 2025, जिस पर फिलहाल संयुक्त संसदीय समिति में विचार हो रहा है, उच्च शिक्षा पर लगभग पूरा नियंत्रण केंद्र सरकार के हाथ में दे देता है. इसके तहत यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) जैसी फंडिंग और मानक तय करने वाली संस्थाओं को खत्म किया जा रहा है. जरूरत से ज्यादा केंद्रीकरण करने वाली मोदी सरकार किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्टता का माहौल बनाने में विफल रही है, क्योंकि वह सिर्फ नियंत्रण चाहती है—और ज्यादा नियंत्रण.

मोदी सरकार के शासन की कमी को भारत की परीक्षा व्यवस्था के टूटने से बेहतर कुछ नहीं दिखाता. भारत के छात्र इस स्थायी चिंता और अव्यवस्था से बेहतर के हकदार हैं. चिंतित माता-पिता भी इससे बेहतर के हकदार हैं, बजाय इसके कि वे अपने बच्चों के सपनों को चुनावी राजनीति में उलझी सरकार के कारण टूटते देखें. मोदी सरकार सिर्फ PR और नारों की सरकार बनकर रह गई है.

नारों के इस दौर में एक नया नारा सामने है—

“मोदी सरकार: इतनी भी नीट नहीं.”

लेखिका अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सांसद (राज्यसभा) हैं. उनका एक्स हैंडल @sagarikaghose है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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