Wednesday, 25 May, 2022
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गुजरात ही नहीं, मोदी के स्टार IAS, IPS, IFS मनमोहन के काल में भी संभाल रहे थे अहम पद

जल शक्ति मंत्रालय में सचिव के तौर पर विनी महाजन की नियुक्ति एक तरह से उन आलोचनाओं को दरकिनार करती है कि मोदी खासकर उन अफसरों को तरजीह देते हैं जो गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर रहने के दौरान उनके विश्वासपात्र रहे हैं.

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नई दिल्ली: पंजाब की पूर्व मुख्य सचिव विनी महाजन की हाई-प्रोफाइल केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय में सचिव के तौर पर नियुक्ति यह बताने के लिए काफी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने नौकरशाही की योग्यता का सही तरीके से उपयोग किया है. हालिया पोस्टिंग पर दिप्रिंट के विश्लेषण से पता चलता है कि जिन अफसरों को अहम जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं, उनमें तमाम ऐसे हैं जिन्होंने मनमोहन सिंह सरकार के समय ही अपना रुतबा हासिल किया था.

महाजन के अलावा, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हाई-प्रोफाइल पदों पर रहे प्रशासनिक, विदेश और सुरक्षा सेवाओं से जुड़े एक दर्जन से अधिक सिविल सेवकों को मौजूदा समय में प्रधानमंत्री मोदी की प्रमुख नीतियों को लागू करने की अहम जिम्मेदारी मिली हुई है.

महाजन इससे पहले 2004 से 2012 के बीच आठ साल तक नई दिल्ली में अपनी सेवाएं दे चुकी हैं, जिनमें सात साल तो वह मनमोहन सिंह के पीएमओ में संयुक्त सचिव के रूप में कार्यरत थीं. पंजाब की मुख्य सचिव के तौर पर एक साल के कार्यकाल—जब उनके पति दिनकर गुप्ता राज्य के पुलिस महानिदेशक के तौर पर कार्यरत रहे—के बाद महाजन को महत्वाकांक्षी योजना नल से जल मिशन को सफलता के साथ आगे बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय राजधानी वापस लाया गया है.

उनकी नियुक्ति को इस लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है कि 2019 में नल से जल मिशन शुरू होने के समय से इसकी जिम्मेदारी संभाल रहे भारतीय वन सेवा अधिकारी के भरत लाल—जिन्हें प्रधानमंत्री का बेहद भरोसेमंद माना जाता है—औपचारिक तौर पर सेवा से रिटायर हो चुके हैं. भरत लाल सेवानिवृत्ति के बाद अनुबंध के तहत पूर्ण सचिव के दर्जे के साथ भ्रष्टाचार विरोधी निकाय लोकपाल में सचिव बन गए हैं.

ये नियुक्ति एक तरह से उन आलोचनाओं को दरकिनार करती है कि मोदी खासकर उन अफसरों को तरजीह देते हैं जो गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर रहने के दौरान उनके विश्वासपात्र रहे हैं.

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मनमोहन सिंह के समय कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी वी. रमानी कहते हैं, ‘इस आम धारणा के विपरीत कि एक विशेष कैडर का पीएमओ में दबदबा है या केवल विश्वासपात्रों अफसरों को ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलती है, एक व्यवस्थित प्रक्रिया है जिससे ये पूरा सिस्टम चलता है.’

रमानी ने कहा, ‘नियुक्तियां मुख्य रूप से दक्षता और योग्यता पर निर्भर करती हैं. हर प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों की कोशिश होती है कि काम ठीक से हो. और यह कतई सच नहीं है कि निष्ठा योग्यता पर भारी पड़ती है. सिस्टम इस तरह नहीं चलता है.’

शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी

मोदी सरकार में ऐसे प्रशासकों की सूची लगातार बढ़ रही है जो मनमोहन सिंह के समय में ही अपने कौशल का लोहा मनवा चुके हैं.

मोदी के कार्यकाल में कई सिविल सेवकों को हाई-प्रोफाइल स्थिति हासिल हुई हैं और यह सब पिछली सरकारों के प्रति उनकी कथित निष्ठा से पूरी तरह अप्रभावित है, जिसमें स्पष्ट तौर पर अनिल बैजल जैसे अफसर शामिल हैं जो मनमोहन सिंह के अधीन शहरी विकास की जिम्मेदारी संभालते थे और अब दिल्ली के उपराज्यपाल हैं.

मनमोहन सिंह के दोनों कार्यकाल के दौरान अपनी सेवाएं देने वाले बी.वी.आर. सुब्रह्मण्यम को मोदी ने 2014 में जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य (अब केंद्र शासित प्रदेश) में मुख्य सचिव के तौर पर नियुक्ति के लिए चुना. मौजूदा समय में वह वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के सचिव के रूप में कार्यरत हैं.

इसी तरह, 2017 में राजमार्ग सचिव के तौर पर पदभार संभालने के लिए नई दिल्ली लौटने से पहले पश्चिम बंगाल-कैडर के आईएएस अधिकारी संजय मित्रा ने मनमोहन सिंह के पीएमओ में संयुक्त सचिव के रूप में कार्य किया था, और फिर बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार में मुख्य सचिव रहे थे. वह 2019 में रक्षा सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुए.

Graphic: Soham Sen | ThePrint
ग्राफिक: सोहम सेन | दिप्रिंट

नाम जाहिर न करने की शर्त पर एक वरिष्ठ सिविल सेवक ने कहा, ‘ये मामले अपवाद भर नहीं हैं. बिहार-कैडर के अधिकारी अमरजीत सिन्हा ने यूपीए सरकारों में महत्वपूर्ण पदों पर काम किया और फिर मोदी पीएमओ में सलाहकार बने. भास्कर खुल्बे के मामले में भी ऐसा ही है.’

पश्चिम बंगाल कैडर के आईएएस अधिकारी खुल्बे अब प्रधानमंत्री के सलाहकार हैं.

झारखंड-कैडर के आईएएस अधिकारी अमित खरे 2008 से 2014 तक यूपीए सरकार के समय केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय (जो अब शिक्षा मंत्रालय है) के संयुक्त सचिव रहे. इसके बाद अपने कैडर में वापस चले गए और 2019 में बतौर एचआरडी सचिव जिम्मेदारी संभालने के लिए फिर केंद्र में लौट आए. वह अब पीएमओ में सलाहकार हैं.

2009-2013 तक गृह मंत्रालय में जनगणना संचालन की जिम्मेदारी संभालने वाले एस. गोपालकृष्णन, जो तमिलनाडु कैडर के आईएएस अधिकारी और आईआईटी मद्रास और आईआईएम बैंगलोर के पूर्व छात्र हैं, अब पीएमओ में अतिरिक्त सचिव के तौर पर कार्यरत हैं.

पीएमओ में एक और अतिरिक्त सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव पूर्व में यूपीए सरकार के दौरान शिपिंग और परिवहन से संबंधित महत्वपूर्ण पदों को संभाल चुकी हैं.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री मोदी दोनों के अधीन काम कर चुके एक सेवानिवृत्त सिविल सेवक ने दिप्रिंट को बताया कि ‘डॉ. सिंह के पीएमओ या उनकी सरकार में प्रशिक्षण हासिल करने वाले या प्रमुख पदों पर रहे नौकरशाहों ने प्रशासनिक क्षमता के मामले में खासी प्रतिष्ठा हासिल की है.’

नरेंद्र नाथ वोहरा के मामले को इस संदर्भ में असाधारण ही कहा जाएगा क्योंकि उन्होंने अलग-अलग सरकारों के समय अपनी काबिलियत के बूते अहम जिम्मेदारियां संभालीं. 2008 और 2018 के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों का भरोसा बरकरार रखते हुए वह 10 वर्षों तक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल रहे. इससे पूर्व उन्होंने प्रधानमंत्री आई.के. गुजराल के प्रधान सचिव के तौर पर काम करने के अलावा रक्षा और गृह मंत्रालयों के प्रशासनिक पद भी संभाले थे.


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विदेशों में नियुक्तियां

मोदी सरकार में शामिल होने से पहले भारतीय विदेश सचिव और राजदूत के रूप में काम कर चुके विदेश मंत्री एस. जयशंकर की तरह मनमोहन सिंह के समय अहम पद संभालने वाले भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के कई अफसर मोदी सरकार के अधीन भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहे हैं.

राष्ट्रीय सुरक्षा उप सलाहकार विक्रम मिश्री, जो मनमोहन सिंह के निजी सचिव रहे थे, का कैरियर मोदी के नेतृत्व में शानदार ढंग से आगे बढ़ा है. वह राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी पोस्टिंग पर आने से पहले चीन में राजदूत बने.

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ग्राफिक: सोहम सेन | दिप्रिंट

मनमोहन सिंह के निजी सचिव रहे विक्रम दोराईस्वामी अब ढाका में उच्चायुक्त हैं. गौरतलब है कि मोदी बांग्लादेश को कितनी अहमियत देते हैं, यह बात जगजाहिर है.

जावेद अशरफ, जो मनमोहन सिंह के पीएमओ में संयुक्त सचिव थे, अब फ्रांस में राजदूत हैं. उन्होंने 2016 के राफेल विमान सौदे के तहत जेट खरीदने संबंधी तमाम संवेदनशील वार्ताओं में हिस्सा लिया.

यूपीए शासनकाल में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के तौर पर सबसे चर्चित चेहरा रहे सैयद अकबरुद्दीन को मोदी सरकार के तहत संयुक्त राष्ट्र में भारत का दूत बनाया गया.


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सुरक्षा से जुड़े पदों में क्या है स्थिति

अपने आईएएस और आईएफएस समकक्षों की तरह ही यूपीए सरकार में अहम जिम्मेदारियां संभाल चुके भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के कई अफसरों और सैन्य अधिकारियों ने भी मोदी के नेतृत्व में सफलता के नए मुकाम हासिल किए हैं.

हालांकि, देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के तौर पर खास मुकाम हासिल कर चुके अजीत डोभाल के बारे में माना जाता है कि कभी उनके मेंटर रहे यूपीए के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन के साथ उनके रिश्ते अच्छे नहीं रहे थे, और खुफिया ब्यूरो के निदेशक के तौर पर एक संक्षिप्त कार्यकाल के बाद यूपीए में उनकी भूमिका काफी सीमित हो गई थी, लेकिन शीर्ष पदों पर उनका चयन इस अनुभव का कतई प्रभावित नजर नहीं आता.

जनवरी 2013 से दिसंबर 2014 तक इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक रहे सैयद आसिफ इब्राहिम—जो ये पद संभालने वाले पहले और एकमात्र मुसलिम हैं—को आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए विशेष दूत के तौर पर एनएसए में दरअसल नंबर-दो की हैसियत दी गई थी. वह 2019 में इस पद से सेवानिवृत्त हुए और अब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य हैं.

दिसंबर 2012 से दिसंबर 2014 तक रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के सचिव रहे आलोक जोशी को 2015 और 2018 के बीच सुपर-सीक्रेटिव नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन का प्रमुख नियुक्त किया गया था.

2014 में मनमोहन सिंह सरकार के समय विवादों के बीच सेना प्रमुख नियुक्त किए गए जनरल दलबीर सुहाग को रिटायरमेंट के बाद सेशेल्स में उच्चायुक्त के रूप में एक शानदार पोस्टिंग मिली है—जो हिंद महासागर में चीनी गतिविधियों को रोकने के भारत के प्रयासों के लिहाज से काफी संवेदनशील पद है.

सबसे दिलचस्प मामला तो वीरप्पन को मार गिराए जाने के बाद सुर्खियों में आए के. विजय कुमार का है. उन्हें पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल को एक आधुनिक उग्रवाद विरोधी बल में बदलने के लिए चुना था. मोदी सरकार में विजय कुमार गृह मंत्रालय के सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं.

पूर्व सेना प्रमुख वी.के. सिंह अब राज्य मंत्री के रूप में कार्यरत हैं. हालांकि, उनके मामले में सैन्य प्रमुख के पद पर रहने के दौरान मनमोहन सिंह सरकार के साथ उनके मतभेद किसी से छिपे नहीं हैं.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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