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Monday, 27 July, 2026
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PM मोदी और BJP को कॉकरोचों का शुक्रिया कहना चाहिए, उन्होंने उनका बहुत भला किया है

कॉकरोच जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी सरकार को उसके आराम वाले दायरे से बाहर निकाल दिया. उसने सरकार को याद दिलाया कि सिर्फ नारे, दिखावा और छोटे-मोटे सुधार छात्रों को प्रभावित नहीं करेंगे.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ज़रूर झटका लगा होगा. गांधीनगर और नई दिल्ली में पिछले 25 साल के अपने नेतृत्व के दौरान उन्हें कभी भी दबाव में आकर किसी मंत्री की कुर्बानी नहीं देनी पड़ी. सीधे उनके अधीन काम करने वालों की बात तो छोड़िए, उन्होंने उन मुख्यमंत्रियों को भी नहीं हटाया, जिन पर मध्य प्रदेश में मोहन यादव की तरह रियल एस्टेट कारोबारी बनने या अरुणाचल प्रदेश में पेमा खांडू की तरह अपने परिवार के लोगों को सैकड़ों करोड़ रुपये के सरकारी ठेके दिलाने के आरोप लगे.

ऐसा नहीं है कि पीएम मोदी लोगों को पद से नहीं हटाते. जब ज़रूरत होती है, तो उन्होंने मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों को उतनी ही आसानी से बदला है, जितनी आसानी से लोग अपने घर के रसोइए या ड्राइवर बदल लेते हैं, लेकिन वह जनता की मांग पर किसी को नहीं हटाते, कम से कम तुरंत तो बिल्कुल नहीं. यह उनके इकबाल का सवाल होता है.

यही वजह है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का हटाया जाना इतना अलग और असामान्य है. आखिर पीएम मोदी ने जेन ज़ी के सामने इतनी जल्दी झुकने का फैसला क्यों किया? मेरा अंदाज़ा है कि उन्हें कॉकरोचों के बारे में जानकारी दी गई होगी. साइंटिफिक जर्नल द इनोवेशन में छपी “लिटिल माइटी” कॉकरोचों पर एक स्टडी के मुताबिक, उनमें चार बायोलॉजिकल खासियतें होती हैं—बहुत ज़्यादा भूख और भुख बर्दाश्त करना, मज़बूत जन्मजात इम्यूनिटी और डिटॉक्स करने की क्षमता, डेवलपमेंटल प्लास्टिसिटी, बहुत अच्छी फर्टिलिटी और मज़बूत रीजेनरेटिव क्षमता.

अगर इन गुणों को प्रतीकात्मक और रूपक के तौर पर देखें, तो समझ आएगा कि नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर मौजूद ये “छोटे ताकतवर” कॉकरोच कैसे टाइटेनियम जैसी मजबूत छवि वाले प्रधानमंत्री को भी हिला गए.

2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने उन्हें “नीच आदमी” कहा था, तब मोदी और बीजेपी ने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया था. बाद में राहुल गांधी को ‘मोदी’ सरनेम को चोरों से जोड़ने वाली टिप्पणी पर दोषी ठहराया गया और उन्हें दो साल की जेल की सज़ा भी सुनाई गई थी.

लेकिन यहां यही कॉकरोच प्रधानमंत्री के खिलाफ बेहद अपमानजनक नारे लगा रहे थे, उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल कर रहे थे, फिर भी बीजेपी और सरकार ने चुप्पी बनाए रखी. शायद पीएम मोदी समझ गए थे कि भले ही जेन ज़ी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रही थी, लेकिन उनका असली निशाना प्रधानमंत्री खुद थे. इसलिए इस मामले को वहीं रोकना ज़रूरी था.

मुझे पूरा यकीन है कि सरकार का हर मंत्री और बीजेपी का हर नेता अंदर ही अंदर गुस्से में होगा, लेकिन उन्हें इसका दूसरा पहलू भी देखना चाहिए. जेन ज़ी ने उनका एक तरह से भला ही किया है. उसने सरकार को उसके आराम वाले दायरे से बाहर निकाल दिया और शायद सही समय पर उसे हकीकत का एहसास भी करा दिया. किसी भी मामले में जिम्मेदारी लेने से लगातार इनकार करने की वजह से मोदी सरकार लोगों को घमंडी नज़र आने लगी थी.

मणिपुर से पहलगाम तक

ट्रेन हादसों में सैकड़ों लोगों की मौत हुई, लेकिन राजनीतिक जवाबदेही सिर्फ हादसे की जगह पर जाकर फोटो खिंचवाने तक सीमित रही. देश की राजधानी के बीचोंबीच एक रेलवे स्टेशन पर भगदड़ में लोगों की जान गई. तब भी राजनीतिक जवाबदेही सिर्फ पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने तक सीमित रही. भगदड़ के कुछ ही घंटों के भीतर कई परिवारों को नकद पैसे दे दिए गए. इतनी बड़ी मात्रा में नकद पैसा इतनी जल्दी कैसे जुटाया गया, यह आज भी रहस्य है. खैर, लाखों रुपये नकद मिलने के बाद दुखी परिवारों को अपने मृत परिजनों के शव लेकर जल्द से जल्द दिल्ली छोड़नी पड़ी.

चीन के रोबोडॉग की वजह से AI समिट में भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी झेलनी पड़ी, लेकिन मंत्री स्तर पर जवाबदेही का सवाल ही नहीं उठा. क्या आपको याद है कि IndiaAI मिशन के सीईओ अभिषेक सिंह के साथ क्या हुआ? पिछले मार्च में उन्हें राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) का महानिदेशक बनाया गया था. यह नियुक्ति उस विवादित नीट-यूजी परीक्षा से सिर्फ चार हफ्ते पहले हुई थी, जिसकी वजह से आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान को अपना पद गंवाना पड़ा.

लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर पीएम मोदी राजनीतिक जवाबदेही कब तय करेंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगे शायद इतने बड़े नहीं थे. पहलगाम में हुई खुफिया चूक भी नहीं. मणिपुर का जातीय आधार पर लगभग दो हिस्सों में बंट जाना और वहां लगातार जारी हिंसा भी नहीं.

ये तो सिर्फ कुछ उदाहरण हैं. ऐसे और भी कई मामले हैं. धर्मेंद्र प्रधान को यह लगता होगा कि उनके साथ गतल हुआ. उनके कई कैबिनेट सहयोगी इससे कहीं ज्यादा गंभीर मामलों के बाद भी अपने पद पर बने रहे. दिलचस्प बात यह है कि अगर नीट-यूजी परीक्षा कंप्यूटर आधारित टेस्ट (सीबीटी) के रूप में हुई होती, तो पेपर लीक का खतरा लगभग निश्चित रूप से कम होता. जानते हैं ऐसा क्यों नहीं हुआ?

क्योंकि जे.पी. नड्डा के नेतृत्व वाले स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. इस हिसाब से पेपर लीक के लिए नड्डा भी उतने ही जिम्मेदार हैं. बेशक, धर्मेंद्र प्रधान अपने पूर्व पार्टी अध्यक्ष के बारे में ऐसा नहीं कह सकते. बाद में नड्डा और केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कॉकरोच जनता पार्टी के साथ बातचीत की, जिसके बाद धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया. धर्मेंद्र प्रधान इस बात से कुछ संतोष ज़रूर कर सकते हैं कि उनके इस्तीफे से आखिरकार मोदी सरकार में राजनीतिक जवाबदेही की शुरुआत हुई है. अब माना जा सकता है कि मंत्री पहले से ज्यादा सतर्क रहेंगे. इसका क्रेडिट जेन ज़ी को मिलना चाहिए.

नारे नहीं, नौकरियां चाहिए

कॉकरोचों ने दूसरा अच्छा काम यह किया कि उन्होंने बीजेपी की अगुआई वाली सरकार को याद दिलाया कि अमृत काल और विकसित भारत जैसे नारे जेन ज़ी को प्रभावित नहीं कर पाए हैं. 2014 में नरेंद्र मोदी को दिल्ली की सत्ता तक पहुंचाने वाले सपने देखने वाले छात्र और युवा अब सिर्फ नारे, दिखावा और छोटे-मोटे सुधारों से खुश नहीं हैं. देखिए, 2024 के लोकसभा चुनाव में झटका मिलने के बाद सरकार ने क्या किया. चुनाव के बाद पेश किए गए पहले बजट में एक बड़े इंटर्नशिप कार्यक्रम (PMIS) का ऐलान किया गया.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि अगले पांच साल में 500 कंपनियों में एक करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप दी जाएगी. सरकार ने इस योजना को और आकर्षक बनाने के लिए हर महीने 5,000 रुपये का स्टाइपेंड देने का भी ऐलान किया. सरकार ने यह साफ नहीं कहा, लेकिन माना जा रहा था कि इन इंटर्नशिप के बाद युवाओं को नौकरी भी मिलेगी.

दो साल बाद न प्रधानमंत्री और न ही वित्त मंत्री अब PMIS की बात करते हैं, जैसे कई दूसरी योजनाओं की बात भी नहीं होती. पहले दो पायलट चरणों में सिर्फ 16,000 युवाओं ने वास्तव में जाकर इंटर्नशिप शुरू की. इनमें से भी बड़ी संख्या ने बीच में ही छोड़ दिया. इसके बाद सरकार ने स्टाइपेंड बढ़ाकर 9,000 रुपये कर दिया. फिर भी तीसरे पायलट चरण में सिर्फ करीब 10,000 उम्मीदवारों ने वास्तव में जाकर इंटर्नशिप शुरू की. इनमें से कितने लोग बीच में छोड़ देंगे, यह अभी पता नहीं है. यानी दो साल में इस बहुत प्रचारित योजना के तहत सिर्फ 26,000 से ज्यादा युवाओं ने इंटर्नशिप चुनी, जबकि लक्ष्य पांच साल में एक करोड़ युवाओं का था. बीच में योजना छोड़ने वालों की बात तो रहने ही दीजिए. PMIS इस बात का बड़ा उदाहरण है कि प्रचार और हकीकत में कितना बड़ा अंतर है.

प्रधानमंत्री का हर कुछ महीनों में बड़े समारोह के साथ कहीं कुछ हज़ार और कहीं कुछ हज़ार नियुक्ति पत्र बांटना भी ज्यादा भरोसा नहीं जगाता. ऐसा इसलिए नहीं कि सरकार इन नियुक्तियों का पूरा ब्योरा सार्वजनिक नहीं करती. सरकार जो भी आंकड़े देती है, लोग अब उनके साथ जीना सीख चुके हैं. भरोसा इसलिए नहीं बनता क्योंकि जिस देश में हर दिन 20,000 से 27,000 लोग जॉब मार्केट में आते हैं, वहां प्रधानमंत्री का हर कुछ महीनों में 51,000 या 71,000 नियुक्ति पत्र बांटना बहुत बड़ा समाधान नहीं लगता.

इनमें बड़ी संख्या तथाकथित जेन ज़ी की है, जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है. 2023-24 के पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के अनुसार, भारत में 15 से 26 साल की उम्र के लगभग 29.94 करोड़ कामकाजी उम्र के जेन ज़ी युवा हैं. द हिंदू ने यह रिपोर्ट दी है.

खतरे की घंटी बजा दी

मोदी सरकार से उसके कामकाज पर सवाल पूछे जाते हैं, तो उसका आम जवाब यही होता है कि पिछले 70 साल की सरकारों की नाकामियों और गलतियों को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए, लेकिन अब एक पूरी नई पीढ़ी है, जो 2014 में किशोर भी नहीं थी. उसने सिर्फ मोदी सरकार को ही काम करते देखा है. इसलिए वह जवाबदेही भी इसी सरकार से मांगती है. ऐसे लोगों को यह बताना कि मोदी से पहले की सरकारों ने क्या किया था, अब ज्यादा असर नहीं करता.

इसके अलावा एक और पीढ़ी है, जो 2014 में जॉब मार्केट में आने वाली थी या अभी-अभी आई थी. जब भी मोदी उभरते हुए भारत की बात करते थे, यह पीढ़ी पूरे जोश और उम्मीद के साथ उनका समर्थन करती थी, लेकिन अब इस पीढ़ी ने अपने सपनों के भारत का इंतज़ार करते हुए 12 साल बिता दिए हैं. यानी अब छात्रों और युवाओं की दो पीढ़ियां हैं, जिनका धैर्य जवाब देने लगा है.

कॉकरोचों ने सरकार को यह समझाने का अच्छा काम किया कि सिर्फ नारे और बड़ी-बड़ी बातें अब इन युवाओं के लिए काफी नहीं हैं. सरकारी आंकड़े लोगों के अपने अनुभवों को नहीं भुला सकते. सरकार के लिए खतरे की घंटी बजाना, जेन ज़ी का मोदी सरकार के लिए किया गया दूसरा अच्छा काम है.

उनकी सफलता सरकार की छवि संभालने वालों और प्रचार की रणनीति बनाने वालों के लिए भी एक संदेश है कि लोग अब बार-बार “विदेशी फंडिंग” और “राष्ट्र-विरोधी” जैसे आरोप सुनकर थक चुके हैं. उन्होंने शायद उन युवाओं को देखा होगा, जो प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अपमानजनक नारे लगा रहे थे और कैमरे के सामने गर्व से खुद को “राष्ट्र-विरोधी” बता रहे थे. 12 साल बाद साजिश की कहानियां और विपक्ष की पुरानी कथित गलतियों का जिक्र अब पहले जैसा असर नहीं डाल रहा है. जेन ज़ी ने आखिरकार सत्तारूढ़ पार्टी के नेतृत्व को यह बात समझा दी है.

और चौथा अच्छा काम जो उन्होंने किया, वह यह है कि उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को भी बोलने पर मजबूर कर दिया. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने सरकार के लिए अपने संदेश में बिना घुमाए-फिराए अपनी बात कही.

उन्होंने शुक्रवार शाम कहा, “नई पीढ़ी सवाल पूछती है और हर बात का कारण बताना पड़ता है. लोगों को अपनापन देना, उनके लिए समय निकालना और उनसे बातचीत करना बहुत ज़रूरी है. आदेश देने के बजाय चर्चा होनी चाहिए और फैसले थोपने के बजाय सहमति बननी चाहिए. आजकल परिवारों के अंदर भी बातचीत बंद हो गई है, इसे बदलना होगा.”

यह संघ का अपने वैचारिक सहयोगी को रास्ता बदलने और अपनी कार्यशैली सुधारने का संदेश था. ऐसा काफी लंबे समय बाद देखने को मिला.

प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी के पास जेन ज़ी का शुक्रिया अदा करने की और भी कई वजहें हैं.

लेकिन उस पर चर्चा फिर कभी.

डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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