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Sunday, 26 May, 2024
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पुरानी पेंशन योजना अब त्रिपुरा में बना एक चुनावी मुद्दा, CPI(M) ने कहा, ‘हमारे घोषणा पत्र का हिस्सा’

RBI ने पुरानी पेंशन योजना की बहाली पर राज्य सरकारों को भले ही आगाह किया हो, लेकिन राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब जैसे राज्य पहले ही इस व्यवस्था को लागू कर चुके हैं. 2004 में तत्कालीन एनडीए सरकार इसकी जगह एक नई पेंशन स्कीम लेकर आई थी.

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नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भले ही राज्यों को पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की ओर लौटने के खिलाफ चेतावनी दी हो, लेकिन कई राज्य पहले ही इसकी तरफ वापस आने की घोषणा कर चुके हैं. ऐसा करने वाले राज्यों की लिस्ट में नया नाम हिमाचल प्रदेश का है. फिलहाल तो ओपीएस त्रिपुरा में भी एक चुनावी मुद्दा बन चुकी है. यहां 16 फरवरी को विधानसभा चुनाव होने हैं.

वाम मोर्चे ने सत्ता में आने पर ओपीएस लाने का वादा किया है. गौरतलब है कि पूर्वोत्तर राज्य में 28 लाख मतदाताओं में 1.04 लाख सरकारी कर्मचारी और 80,800 पेंशनभोगी हैं. इसलिए यहां यह मुद्दा काफी मायने रखता है.

पुरानी पेंशन स्कीम को दरकिनार करते हुए वाजपेयी सरकार इसके बदले में एक नई पेंशन योजना (एनपीएस) लेकर आई थी जिसे 2004 से पूरे देश में लागू कर दिया गया था.

पुरानी पेंशन स्कीम में कम से कम 20 सालों तक काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों की पेंशन सेवानिवृति से पहले लिए गए अंतिम वेतन का 50 प्रतिशत होती है और यह पूरी राशि सरकार की तरफ से दी जाती है. पेंशन का भुगतान कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के समय किया जाता है.

वहीं दूसरी तरफ एनपीएस यानी नई पेंशन स्कीम अंशदान आधारित पेंशन योजना है. इसमें कर्मचारी के साथ-साथ सरकार भी अंशदान देती है. सरकार और कर्मचारी मिलकर कर्मचारी के वेतन का क्रमश: 10 फीसदी और 14 फीसदी पेंशन फंड में योगदान करते हैं. इस पेंशन फंड का निवेश पेंशन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण द्वारा डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो में किया जाता है. दरअसल विचार यह है कि ये अंशदान बढ़ेंगे और इसलिए सरकार जरूरत पड़ने पर पेंशन का भुगतान करने के लिए इन फंडों का इस्तेमाल कर सकती है.

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आरबीआई ने कई रिपोर्टों में ओपीएस में वापसी को राजकोष पर बढ़ते भार के रूप में रेखांकित किया है क्योंकि यह केंद्र सरकार की देनदारी को कई गुना बढ़ा देता है.

दिप्रिंट से बात करते हुए सीपीआई (एम) के त्रिपुरा राज्य सचिव जितेंद्र चौधरी ने कहा, ‘ओपीएस हमारे घोषणा पत्र का हिस्सा बनने जा रहा है. सरकारी कर्मचारियों के लिए हमारे पास चार प्रमुख चीजें होंगी. ओपीएस के अलावा, सरकारी कर्मचारियों की कोई मनमानी छंटनी नहीं होगी, सभी देय महंगाई भत्ते तुरंत जारी किए जाएंगे. इसके साथ ही अपनी नौकरी खो चुके (2014 के उच्च न्यायालय के आदेश के बाद) 10,323 शिक्षकों की आजीविका बहाल की जाएगी.

ओपीएस को वापस लाने वाले तीन राज्यों- राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़– में कांग्रेस की सरकार है. जबकि पंजाब में आम आदमी पार्टी (आप) सत्ता में है.

देश में सिर्फ एकमात्र वामपंथी शासित राज्य केरल है, जहां सरकारी कर्मचारियों के लिए अभी भी एनपीएस लागू है.


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सातवां वेतन आयोग

2018 में जब बीजेपी ने इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के साथ गठबंधन में त्रिपुरा में आश्चर्यजनक जीत हासिल की, तो इसका पहला चुनावी वादा सातवें वेतन आयोग को लागू करना था.

हालांकि पार्टी का दावा है कि उसने कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए संशोधित वेतनमान की घोषणा करके अपना वादा पूरा किया है. लेकिन सरकारी कर्मचारियों का दावा है कि वास्तव में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का सिर्फ एक हिस्सा राज्य में लागू किया गया था.

त्रिपुरा कर्मचारी समन्वय समिति के महासचिव अंजन रॉय चौधरी ने कहा, ‘पश्चिम बंगाल के बाद त्रिपुरा में सरकारी कर्मचारियों को सबसे कम वेतन मिलता है. सातवां वेतन आयोग एक चुनावी वादा था, जिसे असल में पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है. सिर्फ फिक्सेशन किया गया है (जिसका मतलब है कि मूल वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार है, भत्तों के अनुसार नहीं).

उन्होंने कहा, ‘जब भर्ती नियम समान हैं तो इसे अन्य चीजों को भी बराबर होना चाहिए? हम ओपीएस में भी वापसी चाहते हैं क्योंकि यह कर्मचारियों को अंतिम मूल वेतन के 50 प्रतिशत की पेंशन का हकदार बनाता है. एक अन्य लंबित मांग, घोषित 8 प्रतिशत महंगाई भत्ते (पिछले साल सरकार) की पूरी राशि जारी करने की है. त्रिपुरा सरकार ने तब राज्य सरकार के कर्मचारियों के महंगाई भत्ते को 20 प्रतिशत तक ले जाते हुए 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी की घोषणा की थी.

हालांकि, राजनीतिक दल वेतन आयोग के मुद्दे पर संजीदगी से कदम बढ़ा रहे हैं.

वरिष्ठ नेताओं ने ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में कहा कि त्रिपुरा की वित्तीय हालत ऐसी नहीं है कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को पूरी तरह से लागू किया जा सके.

सीटों के बंटवारे पर बातचीत

इधर त्रिपुरा में कांग्रेस और वाम मोर्चे ने सीटों के बंटवारे पर बातचीत भी शुरू कर दी है.

तिपरा स्वदेशी प्रगतिशील क्षेत्रीय गठबंधन (TIPRA) किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन करने से पहले ‘टिपरालैंड’ पर एक लिखित प्रतिबद्धता चाहता है. लेकिन सूत्रों की मानें तो कांग्रेस और वाम दोनों दलों ने टीआईपीआरए प्रमुख प्रद्योत देबबर्मा के साथ फोन पर बातचीत की है.

देबबर्मा ने गुरुवार को दिल्ली में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से भी मुलाकात की. बैठक के बाद उन्होंने कहा, ‘हमने उन्हें अपनी मांग के बारे में बता दिया है. ग्रेटर टिपरालैंड हमारा संघर्ष है. बीजेपी को भी नहीं पता था कि राम मंदिर (अयोध्या में) संभव है, लेकिन उन्होंने धारा 370 और तीन तलाक को खत्म करने जैसे मुद्दों पर जोर दिया, जिसमें वे विश्वास करते थे. ठीक इसी तरह यह हमारी प्रतिबद्धता है.’

उधर दूसरे दल भी टिपरा के साथ आगे बढ़ने को लेकर आशान्वित हैं. सीपीआई (एम) के चौधरी ने कहा, ‘हमें अगले 72 घंटों में सीट बंटवारे के बारे में घोषणा होने की उम्मीद है.’

पहले दौर की बैठकों के बाद कांग्रेस नेता सुदीप रॉय बर्मन ने कहा, ‘हम उन सभी दलों से साथ आने के लिए कह रहे हैं जो लोकतांत्रिक अधिकारों की हत्या करने वाली इस फासीवादी सरकार के खिलाफ लड़ना चाहते हैं. आज हमारे बीच लेफ्ट और त्रिपुरा पीपुल्स पार्टी है. हमने फोन पर प्रद्योत बाबू से भी बात की. फिलहाल वह चुनाव आयोग से मिलने के लिए दिल्ली गए हैं.

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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