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Saturday, 13 July, 2024
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पाकिस्तान के PM का लक्ष्य नोबेल शांति पुरस्कार है, शांति वार्ता नहीं; भारत पहले भी यह देख चुका है

कश्मीर का जिक्र किए बिना पाकिस्तान का कोई भी पीएम भारत से बातचीत का विचार नहीं कर सकता. यह मुद्दा न्यू रेड लाइन है जो मोदी सरकार ने पाकिस्तान के लिए खींची है.

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आदतन अपराधी पाकिस्तान ने एक बार फिर भारत के साथ शान्ति के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है और शांति वार्ता की इच्छा व्यक्त की है. यह नई दिल्ली के लिए ‘डेजा वू’ वाली फीलिंग है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने भारत के साथ हुए कई युद्धों को याद किया और कहा कि ‘संघर्ष किसी भी पक्ष के लिए दुख और गरीबी के अलावा कुछ भी अच्छा नहीं लाया’. यह नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त करने के लिए तैयार एक शांतिदूत की तरह अधिक लग रहा था, उन्होंने यहां तक भविष्यवाणी की कि ‘क्या हुआ, यह बताने के लिए कौन जीवित रहेगा, अगर भगवान न करे कि युद्ध शुरू हो जाए, क्योंकि दोनों पक्ष परमाणु शक्ति संपन्न हैं’. नई दिल्ली निश्चित रूप से खुश नहीं है, लेकिन चुपचाप देख रही है कि पाकिस्तान में आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती जा रही है.

यह पहली बार नहीं है जब किसी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया है.

देश के राजनीतिक नेताओं के साथ-साथ पाकिस्तानी सेना के जनरल, जो इस्लामाबाद में वास्तविक शासक हैं, उन्होंने नियमित रूप से दो पड़ोसियों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों और शत्रुता को समाप्त करने का आह्वान किया है. लेकिन इस तरह के हर शांति समर्थक बयान के बाद ‘कश्मीर के लंबे समय से लंबित मुद्दे को निपटाने’ के लिए एक शर्त का पालन किया जाता है. जनरल अपनी ओर से अपनी शांति कॉल को इस चेतावनी के साथ विराम देना नहीं भूलेंगे कि पाकिस्तानी सेना युद्ध के मैदान में भारतीय सेना को उचित जवाब देने में सक्षम है, चाहे इसका कोई भी मतलब हो.


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कहां है बातचीत की तैयारी?

पिछले साल जनवरी में तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने कहा था कि पाकिस्तान आपसी सम्मान और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के विचार के लिए प्रतिबद्ध है और यह सभी दिशाओं में शांति के लिए हाथ बढ़ाने का समय है. दिलचस्प बात यह है कि यह शांति सलाह एक ऐसे जनरल की ओर से आई है, जिसने पुलवामा हमले के बाद 2019 में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकी प्रशिक्षण शिविरों पर हुए हवाई हमलों के बाद भारत के खिलाफ जहर उगला था. यहां तक कि नई दिल्ली में शाहबाज शरीफ के शांति का प्रस्ताव भी एक शर्त के साथ आता है जो उनके भारतीय समकक्ष नरेंद्र मोदी से ‘कश्मीर और अन्य मुद्दों को बातचीत के माध्यम से हल करने’ के लिए कहती है. अन्य मुद्दे क्या हैं स्पष्ट नहीं किया गया है.

उन्होंने कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन की ओर इशारा करते हुए कश्मीरियों की दुर्दशा का भी जिक्र किया. कड़वी सच्चाई यह है कि पाकिस्तान का कोई भी प्रधानमंत्री कश्मीर का जिक्र किए बिना भारत के साथ बातचीत का विचार नहीं कर सकता है. यह रूस में 2015 के बाद के ऊफ़ा संयुक्त विज्ञप्ति से स्पष्ट है जिसमें कश्मीर का उल्लेख नहीं किया गया था.

भारत और पाकिस्तान के बीच शांति वार्ता के लिए अच्छी तैयारी, होमवर्क और मजबूत ट्रैक-टू कूटनीतिक अभ्यास की जरूरत है. जब नई दिल्ली ने संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का फैसला किया, तो इस बारे में भी अच्छे से विचार किया गया होगा कि पाकिस्तान किस-किस तरह की प्रतिक्रिया दे सकता है. साथ ही इस्लामाबाद को यह भी ‘सूचित’ करना जरूरी था कि एक खास स्तर के बाद किसी कदम का विरोध करना व्यर्थ होगा. पहले की व्यवस्थाओं के रवैये के विपरीत, नरेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के लिए एक नई रेड लाइन खींच दी.

जबकि नवाज शरीफ, जो 2014 में मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए थे, जम्मू-कश्मीर के किसी भी अलगाववादी से नहीं मिले, नई दिल्ली ने विदेश सचिव स्तर की वार्ता रद्द कर दी क्योंकि नई दिल्ली में पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने ऐसा किया था. यह संभव है कि बाद की ‘ट्रैक-टू’ बैठकों में, पाकिस्तानी पक्ष को चेतावनी दी गई थी कि अनुच्छेद 370 खत्म हो जाएगा और इस्लामाबाद को यह महसूस करना चाहिए कि वह मोदी के तहत एक नए और अलग भारत से निपट रहा है.


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कहां है पाकिस्तान का मजबूत केंद्र?

इसी तरह, ऐसा प्रतीत होता है कि इस्लामाबाद ने कई ट्रैक-टू बैठकों के माध्यम से, किसी भी दुस्साहस के लिए इस्लामाबाद को दंडित करने और 1971 की पुनरावृत्ति को अंजाम देने के लिए भारत में एक मजबूत केंद्र सरकार की क्षमता को महसूस किया है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से लेकर सेवारत सेना जनरलों और ट्रैक-टू वार्ता के माध्यम से, भारत ने पाकिस्तान को उन सभी भाषाओं में संदेश दिया है जिन्हें वह समझेगा कि उन्हें नए भारत से निपटने के लिए बेहतर तरीके से तैयार रहना चाहिए.

इस्लामाबाद एक मजबूत और लोकप्रिय केंद्र सरकार का दावा नहीं कर सकता है जो स्थिति उत्पन्न होने पर बहु-मोर्चा संघर्षों से निपट सकती है. जब पाकिस्तानी गृहमंत्री राणा सनाउल्लाह ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के अफगानिस्तान स्थित ठिकानों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी, तो टीटीपी ने 1971 की कुख्यात पाकिस्तानी सेना के भारत के सामने आत्मसमर्पण करने की तस्वीर को ट्वीट कर निशाना साधा.

यहां तक कि पाकिस्तानी शहरों में भोजन संबंधी दंगे बढ़ रहे हैं और आर्थिक स्थिति हर दिन बिगड़ती जा रही है, विश्व बैंक ने अगले वित्तीय वर्ष तक 1.1 बिलियन डॉलर के दो ऋणों की मंजूरी में देरी की है. विश्व बैंक ने स्थायी अर्थव्यवस्था ऋण के लिए दूसरे लचीले संस्थानों और सस्ती ऊर्जा के लिए दूसरे कार्यक्रम की मंजूरी को रोकने का भी फैसला किया है – दोनों की कीमत $450 मिलियन और $600 मिलियन है. एक और झटका देते हुए, एक अमेरिकी कांग्रेस के एक सदस्य ने एक प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी के रूप में पाकिस्तान के डेज़िगनेशन को समाप्त करने के लिए एक कानून पेश किया है.

प्रधानमंत्री शरीफ को भारत के साथ ट्रैक-टू वार्ता के अगले दौर के लिए सलाहकारों की अपनी टीम तैयार करने की जरूरत है ताकि उन्हें और अधिक ‘नई रेड लाइन’ के बारे में आगाह किया जा सके. इस बीच, उनके शांति प्रस्तावों के लिए, नई दिल्ली सुरक्षित रूप से कह सकती है, ‘इस पर टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी.’

(शेषाद्री चारी ‘ऑर्गनाइजर’ के पूर्व संपादक हैं. उनका ट्विटर हैंडल @sesadrichari है. व्यक्त विचार निजी है.)

(संपादन: ऋषभ राज)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़नें के लिए यहां क्लिक करें)


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