Sunday, 3 July, 2022
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कैबिनेट विस्तार पर मोदी-शाह की मंजूरी के लिए अंतहीन इंतजार कर रहे हैं मुख्यमंत्री नीतीश और येदियुरप्पा

भाजपा नेताओं का कहना है कि आलाकमान बिहार और कर्नाटक में मंत्रिमंडल विस्तार की प्रक्रिया इसलिए तेज नहीं कर रहा क्योंकि इन राज्यों में हाल-फिलहाल में कोई चुनाव नहीं है.

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नई दिल्ली: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और कर्नाटक में समकक्ष बी.एस. येदियुरप्पा के बीच एक बात समान है कि दोनों ही बेहद बेसब्री से अपने संबंधित मंत्रिमंडल विस्तार के लिए भाजपा के शीर्ष नेताओं की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं.

वहीं, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक लंबे इंतजार के बाद आखिरकार रविवार को दो मंत्रियों को शामिल करने की मंजूरी पाने में सफल रहे लेकिन येदियुरप्पा और नीतीश ऐसे भाग्यशाली नहीं रहे.

नीतीश कुमार की सरकार बने करीब डेढ़ महीने से ज्यादा वक्त बीत चुका है. बिहार मंत्रिमंडल में अभी नीतीश कुमार को मिलाकर 14 मंत्री हैं. उनमें भाजपा के सात, जो अब गठबंधन में बड़ा भाई बन चुकी है, जद(यू) के चार और एक-एक जीतनराम मांझी के नेतृत्व वाले हम और मुकेश साहनी की वीआईपी के हैं.

मंत्रिमंडल में 36 मंत्रियों को शामिल किया जा सकता है. पहले यह अनुमान लगाया जा रहा था कि मंत्रिमंडल विस्तार छठ पूजा के बाद होगा लेकिन भाजपा की ओर से इस पर कोई कम्युनिकेशन नहीं किया गया.

एक हफ्ते पहले बिहार के दोनों उपमुख्यमंत्रियों तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी ने दिल्ली में कई नेताओं से मुलाकात की थी, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद और पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान शामिल हैं. लेकिन किसी ने भी कैबिनेट विस्तार पर रुख स्पष्ट नहीं किया.

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मंत्रिमंडल विस्तार में देरी के कारण बिहार के मौजूदा मंत्रियों पर काम का बोझ बढ़ गया है क्योंकि उन सबको एक से ज्यादा विभाग की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही है.

उदाहरण के तौर पर, उपमुख्यमंत्री प्रसाद छह विभागों के प्रभारी हैं, जबकि रेणु देवी अकेले चार विभागों को संभाल रही हैं. स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे सड़क निर्माण और संस्कृति मंत्रालय का भी जिम्मा संभाले हैं जबकि जदयू के मंत्री विजय कुमार चौधरी और अशोक चौधरी पांच-पांच विभागों के प्रभारी हैं.

नीतीश ने 15 दिसंबर को संवाददाताओं को बताया था कि उन्हें मंत्रिमंडल विस्तार के बारे में अभी तक भाजपा की ओर से कोई प्रस्ताव नहीं मिला है. उन्होंने कहा था, ‘मुझे मंत्रिमंडल विस्तार के लिए भाजपा से कोई प्रस्ताव नहीं मिला है. जब यह आएगा तभी विस्तार किया जाएगा.’

नीतीश कुमार जहां एक महीने से अधिक समय से भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की हरी झंडी का इंतजार कर रहे हैं, कर्नाटक में उनके समकक्ष येदियुरप्पा तो पिछले साल जनवरी से ही अपने मंत्रिमंडल के विस्तार की प्रतीक्षा कर रहे हैं. वह तो विस्तार के संबंध में कम से कम चार बार ऐलान भी कर चुके हैं लेकिन इस मोर्चे पर अब तक कोई प्रगति नहीं हो पाई है. वह नवंबर में दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा से मिले थे लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार के संबंध में कोई तिथि तय नहीं करा पाए.

भाजपा नेताओं ने दिप्रिंट को बताया कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व बिहार और कर्नाटक में मंत्रिमंडल विस्तार में इसलिए देरी कर रहा है क्योंकि वह कई अन्य मुद्दों जैसे किसान आंदोलन, पश्चिम बंगाल चुनाव और कोविड-19 वैक्सीन लॉन्च करने आदि में व्यस्त है.

उन्होंने आगे कहा कि पार्टी हाई कमान मंत्रिमंडल विस्तार प्रक्रिया इसलिए भी तेज नहीं कर रहा है क्योंकि संबंधित राज्यों में कोई चुनाव नहीं होने वाले हैं.


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‘खरमास के कारण मंत्रिमंडल विस्तार में देरी’

भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने बताया कि पार्टी आलाकमान राष्ट्रीय महत्व के अन्य अहम मुद्दों को निपटाने के बाद ही दोनों राज्यों में कैबिनेट विस्तार पर ध्यान केंद्रित करेगा.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘मंत्रिमंडल विस्तार के लिए ऐसी क्या आफत आई जा रही है? सरकार काम कर रही है, सरकार चलाने के लिए मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और मंत्री हैं. केंद्र अन्य बातों में व्यस्त है, किसान आंदोलन का मुद्दा सुलझाने की कोशिशें की जा रही है. एक बार इन्हें सुलझा लें तो फिर विस्तार के बारे में सोचेंगे. इसके अलावा, अभी खरमास (15 दिसंबर-14 जनवरी के बीच) चल रहा है. इसलिए कोई शुभ कार्य 14 जनवरी के बाद ही किया जा सकता है.’

बिहार के भाजपा विधायक नितिन नवीन, जिन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने के आसार हैं, ने भी दिप्रिंट को बताया कि खरमास के कारण मंत्रिमंडल विस्तार में देरी हो रही है.

ऊपर उद्धृत पार्टी के वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘भूपेन्द्र (यादव) जी जनवरी के पहले सप्ताह में बिहार का दौरा करेंगे. वह पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ (कैबिनेट विस्तार के मामले में) विचार-विमर्श करेंगे.’

अपना नाम न छापने की शर्त पर भाजपा के एक महासचिव ने कहा, ‘आपको मोदी और शाह की कार्यशैली समझनी होगी. वे जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं लेते हैं. फैसले से पहले वे कई फैक्टर पर ध्यान देते हैं. वे तीन बातें ध्यान में रखते हुए निर्णय लेते हैं— नैरेटिव, आगामी चुनाव और पार्टी विस्तार. दोनों ही राज्यों में ऐसी कोई जल्दी नहीं है. किसी भी राज्य में चुनाव नहीं है. कुछ मामलों में ये कार्यशैली क्षेत्रीय आकांक्षाओं और धैर्य की परीक्षा लेती नज़र आती है पर उनके काम करने का तरीका यही है.’


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बिहार विधान परिषद चुनाव देरी की वजह?

बिहार भाजपा नेताओं का कहना है कि मंत्रिमंडल विस्तार में देरी की एक वजह राज्यपाल की तरफ से विधान परिषद के 12 सदस्यों को नामित किए जाने का मुद्दा भी हो सकता है क्योंकि अभी इस पर दोनों सहयोगियों के बीच कुछ सहमति नहीं बन पाई है.

इसके अलावा, विधान परिषद में दो सीटें रिक्त भी हैं और दोनों भाजपा की हैं. जदयू को अपने मंत्री अशोक चौधरी को विधान परिषद में लाने के लिए भाजपा को मनाने की जरूरत है क्योंकि वह किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं.

वीआईपी के मुकेश साहनी के मामले में भी यही बात है, जो विधानसभा चुनाव हार गए हैं लेकिन उन्हें मंत्री बनाया गया है.

भाजपा के राज्य सभा सांसद विवेक ठाकुर ने कहा, ‘विधान परिषद के चुनाव और 12 सदस्यों के नामित होने के बाद विस्तार हो सकता है. केंद्रीय भाजपा नेतृत्व एक ही बार में दोनों काम करने पर विचार कर सकता है.’


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‘जदयू का सम्मान बरकरार रखा जाना चाहिए’

जदयू नेता के.सी. त्यागी ने दिप्रिंट को बताया कि पार्टी के सम्मान की रक्षा की जानी चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘हम केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार को बिहार कैबिनेट विस्तार से नहीं जोड़ रहे हैं. लेकिन जदयू के सम्मान को बरकरार रखा जाना चाहिए. बिहार में भाजपा के मंत्री हैं लेकिन केंद्रीय मंत्रिमंडल में हमारे कोटे के मंत्री नहीं हैं.’

भाजपा सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि हालांकि पार्टी ने अभी मंत्रिमंडल विस्तार के मुद्दे पर विचार-विमर्श नहीं किया है लेकिन नीतीश 50:50 की भागीदारी पर जोर दे रहे हैं.

भाजपा के एक सूत्र ने कहा, ‘पार्टी का मानना है कि सत्ता में हिस्सेदारी आनुपातिक होनी चाहिए. भाजपा के 74 विधायक हैं और यह उसके प्रतिनिधित्व में नज़र आना चाहिए.’

इसके अलावा दोनों सहयोगियों के बीच जो एक अन्य मुद्दा सुलझाने की जरूरत है, वह शिक्षा, गृह, जल संसाधन जैसे महत्वपूर्ण विभागों का बंटवारा है. नीतीश गृह विभाग के प्रभारी हैं.

कुछ दिन पहले भाजपा एमएलसी संजय पासवान ने कथित तौर पर कहा था कि नीतीश को गृह मंत्रालय भाजपा को दे देना चाहिए क्योंकि मुख्यमंत्री के पास पहले से ही कई जिम्मेदारियां हैं. उन्होंने कहा कि अगर इस मोर्चे पर पूरा ध्यान न दिया गया तो राज्य में कानून-व्यवस्था बाधित होगी.

भाजपा के एक दूसरे नेता ने हालांकि इस मामले को तूल न देते हुए कहा, ‘ये कोई बड़ी बात नहीं है, लब्बोलुआब यह है कि दोनों को जनादेश को समझना होगा और उसके अनुसार काम करना होगा.’

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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