नई दिल्ली: चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल प्लेयर’ चुनाव चिह्न दिया है, जबकि अरूप रॉय के नेतृत्व वाले बागी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न दिया है.
गुरुवार देर रात EC ने एक अंतरिम आदेश में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) नाम को फ्रीज कर दिया. आयोग ने पार्टी में मौजूद प्रतिद्वंद्वी गुटों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया. इसलिए, आगामी उपचुनावों के लिए अंतिम रूप से संगठनात्मक विवाद का फैसला होने तक दोनों में से कोई भी गुट पार्टी का नाम, उसका आरक्षित ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न या AITC नाम इस्तेमाल नहीं कर सकता था.
यह फैसला पश्चिम बंगाल की रेजीनगर और नंदीग्राम और असम की नगांव सीट पर होने वाले उपचुनाव से 20 दिन से भी कम समय पहले आया है. इन तीनों सीटों पर चुनाव 6 अक्टूबर को होने हैं, लेकिन नामांकन पत्रों की जांच की आखिरी तारीख 17 सितंबर थी. इस तारीख को बढ़ाकर 18 सितंबर कर दिया गया.
आयोग ने रेजीनगर, नंदीग्राम और नगांव के रिटर्निंग अधिकारियों को निर्देश दिया है कि AITC नाम के तहत दोनों गुटों की ओर से उतारे गए संबंधित उम्मीदवारों पर उनके नए नाम और चुनाव चिह्न के साथ विचार किया जाए.
आयोग ने कहा, “70-रेजीनगर विधानसभा क्षेत्र, 210-नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र और 9-नगांव संसदीय क्षेत्र के रिटर्निंग अधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि नामांकन पत्रों की जांच और चुनाव चिह्नों के आवंटन के दौरान इस आदेश का सख्ती से पालन करें.”
गुरुवार के आदेश में कहा गया कि दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को “समान स्थिति में रखने और उनके अधिकारों और हितों की रक्षा करने और पिछले उदाहरण को देखते हुए”, आयोग ने उपचुनावों के लिए एक अंतरिम आदेश पारित किया है. यह आदेश तब तक लागू रहेगा, जब तक विवाद का निपटारा नहीं हो जाता.
आयोग ने कहा कि पैराग्राफ 15 के तहत कार्रवाई पूरी करने के लिए उपलब्ध समय पर्याप्त नहीं था. “हालांकि, आयोग मौजूदा उपचुनावों में पार्टी के चुनाव चिह्न और पार्टी के नाम के इस्तेमाल को लेकर मौजूद जल्दबाजी को ध्यान में रखता है.”
पैराग्राफ 15 में कहा गया है कि अगर किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के अंदर प्रतिद्वंद्वी गुट हैं और हर गुट खुद को असली पार्टी होने का दावा करता है, तो EC यह तय कर सकता है कि इनमें से कौन सा गुट, अगर कोई है, मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी है.
EC यह फैसला मामले से जुड़े सभी उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखने और संबंधित गुटों या वर्गों के प्रतिनिधियों और उन दूसरे लोगों को सुनने के बाद कर सकता है, जो अपनी बात रखना चाहते हैं. आयोग का फैसला ऐसे सभी प्रतिद्वंद्वी गुटों या वर्गों पर बाध्यकारी होगा.
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