scorecardresearch
Friday, 23 January, 2026
होमThe FinePrintतिलक से गांधी और आज मोदी तक — भगवद्गीता का लंबा राजनीतिक सफर

तिलक से गांधी और आज मोदी तक — भगवद्गीता का लंबा राजनीतिक सफर

राजनीतिक क्षेत्र में गीता के फिर से पॉपुलर होने की वजह क्या है? क्या यह राजनीतिक लामबंदी के लिए इसे आगे बढ़ाने की सोची-समझी कोशिश है, या यह अपने आप हो रहा है? आधुनिक भारतीय इतिहास में इसके राजनीतिक सफर पर एक नज़र.

Text Size:

नई दिल्ली: “क्या अफजल खान को मारकर शिवाजी ने कोई पाप किया था?” यह सवाल बाल गंगाधर तिलक ने 12 जून 1897 को शिवाजी जयंती के अवसर पर आयोजित एक सभा में पूछा था. अफजल खान आदिलशाही सल्तनत का एक शक्तिशाली सेनापति था, जिसे लगभग ढाई सौ साल पहले शिवाजी को कुचलने के लिए भेजा गया था. उसी अफजल खान को शिवाजी ने उस मुलाकात में मार दिया था, जो समझौते के लिए होनी थी.

तिलक ने कहा कि यह तय करने का जवाब कि वह हत्या पाप थी या नहीं, महाभारत में मिलता है. उन्होंने कहा, “गीता में श्रीकृष्ण का उपदेश है कि अपने ही गुरुजनों और रिश्तेदारों तक को मार देना चाहिए. अगर कोई व्यक्ति कर्म के फल की इच्छा के बिना काम करता है, तो उस पर कोई दोष नहीं लगता.”

तिलक ने भारतीयों से अपील की कि वे किसी बड़े उद्देश्य के लिए फिर से कानूनी बंधनों और नैतिक संकोचों को तोड़ें. उन्होंने कहा, “अपनी सोच को मेंढक की तरह सीमित मत करो, बल्कि श्रीमद्भगवद्गीता के ऊंचे वातावरण में प्रवेश करो और महान पुरुषों के कर्मों को देखो.”

19वीं सदी के आखिरी वर्षों और 20वीं सदी की शुरुआत तक, भगवद्गीता, जो महाभारत के एक लाख श्लोकों वाले महाकाव्य में 700 श्लोकों का ग्रंथ है और जिसे सदियों से हिंदुओं में सम्मान मिला है, क्रांतिकारियों के लिए एक तरह का ताबीज बन गई थी. यह राजनीतिक क्षेत्र में, खासकर हिंसक कार्रवाई के लिए, धार्मिक और दार्शनिक आधार बन गई. तिलक से लेकर अरविंदो तक, जिन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को हिंसा के बदले हिंसा की रणनीति से हराना चाहा, उन्होंने गीता की अपनी व्याख्या से वैधता हासिल की.

करीब एक सदी बाद, भगवद्गीता फिर से राजनीतिक गतिविधियों के केंद्र में है. पिछले हफ्ते, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सी.वी. आनंद बोस, बीजेपी नेताओं, और राज्य भर से आए साधु-साध्वियों समेत पांच लाख से ज्यादा लोग कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड में गीता के सामूहिक पाठ के लिए जुटे.

बीजेपी नेता दिलीप घोष ने, जो इस कार्यक्रम में शामिल थे, दिप्रिंट से कहा, “बंगाल में पिछले तीन साल से गीता का कार्यक्रम हो रहा है. जैसे आजादी के आंदोलन के दौरान, जब देश हिंदू-मुस्लिम मुद्दे पर बंट रहा था, तब गीता ने हिंदुओं को एकजुट किया था, वैसे ही आज बंगाल में हमें फिर से गीता की जरूरत है.” उन्होंने कहा, “बंगाल में हिंदुओं को अपने ही देश में शरणार्थी बनने का खतरा है. इसलिए गीता उन्हें जोड़ने का सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि पहली बात तो यह कि हर हिंदू, चाहे वह किसी भी संप्रदाय का हो, गीता में विश्वास करता है, और दूसरी बात यह कि गीता कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में कही गई है, जो लोगों को लड़ने की ऊर्जा देती है.”

उन्होंने कहा, “गीता ऊर्जा, शक्ति और सही लड़ाई लड़ने का ग्रंथ है.”

कोलकाता से दूर, नई दिल्ली में भी गीता हाल के हफ्तों में भारतीय कूटनीति के केंद्र में रही. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत यात्रा पर आए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को गीता का रूसी अनुवाद भेंट किया.

आरएसएस से जुड़े एक लेखक ने कहा, “गीता भारत की सबसे शक्तिशाली सॉफ्ट पावर हथियार है. यह पूरी दुनिया में हिंदुस्तान की आध्यात्मिक पहचान है.”

इस महीने की शुरुआत में, केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पत्र लिखकर स्कूलों के पाठ्यक्रम में भगवद्गीता को शामिल करने की मांग की. इस पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने उन्हें “मनुवादी” कहा. कुमारस्वामी ने कहा था कि यह ग्रंथ युवाओं को नशे के रास्ते से दूर ले जाएगा.

लखनऊ से कुरुक्षेत्र तक, और शिवमोग्गा से हैदराबाद तक, देश भर में बड़े स्तर पर सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें मुख्यमंत्री, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और सेवानिवृत्त नौकरशाह शामिल हो रहे हैं. इन आयोजनों में इस प्राचीन ग्रंथ की शिक्षाओं पर चर्चा और पाठ किया जा रहा है.

तो राजनीति में भगवद्गीता की यह वापसी क्यों हो रही है. क्या इसे राजनीतिक और धार्मिक लामबंदी के लिए बढ़ावा देने की कोई सोची-समझी कोशिश है, या यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. इसके अलावा, आधुनिक भारतीय इतिहास में भगवद्गीता का राजनीतिक सफर क्या रहा है. यह कब राजनीतिक लामबंदी का औजार बनी. और क्या तिलक द्वारा सार्वजनिक जीवन में गीता के इस्तेमाल और गांधी द्वारा इसकी व्याख्या में कोई फर्क था.

कूटनीति से घरेलू राजनीति तक

शुरुआत में, संघ परिवार से जुड़े अलग-अलग नेताओं और लेखकों ने दिप्रिंट को बताया कि आरएसएस या विश्व हिंदू परिषद द्वारा इन कार्यक्रमों को आयोजित करने की कोई संगठित या योजनाबद्ध कोशिश नहीं है.

हालांकि, गीता की मुख्य शिक्षा, यानी भारत की सोच आध्यात्मिकता और शक्ति दोनों से जुड़ी है, यही न केवल मौजूदा सरकार बल्कि पूरे संघ परिवार के लिए प्रेरक शक्ति रही है, हरियाणा के एक आरएसएस नेता ने कहा. उन्होंने कहा कि हरियाणा से लेकर बंगाल और अंतरराष्ट्रीय मंच तक, “पिछले दस वर्षों में गीता की वापसी इसलिए दिखती है क्योंकि हमारी विश्वदृष्टि गीता से ही निकलती है.”

इसके अलावा, गीता का संदेश इतना सरल और स्पष्ट है कि लोग स्वाभाविक रूप से उसकी ओर आकर्षित होते हैं, ऊपर जिक्र किए गए आरएसएस से जुड़े लेखक ने कहा. उन्होंने कहा, “जनरेशन जेड, जो साफ तौर पर जीवन में एक खालीपन महसूस कर रही है, अपने आप गीता की ओर बढ़ रही है, क्योंकि इसका संदेश सरल है. कृष्ण आज भी सबसे लोकप्रिय देवताओं में हैं, इसलिए गीता लोगों से तुरंत जुड़ जाती है.”

साथ ही, दशकों से भगवद्गीता की अंतरराष्ट्रीय अपील रही है. उन्होंने कहा, “अगर आपने ओपेनहाइमर फिल्म देखी है, तो आपको पता होगा कि परमाणु बम के जनक रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने भी गीता पढ़ी थी और वह उससे गहराई से प्रभावित थे. इससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीयों का आत्मविश्वास बढ़ता है और भारत को विश्व गुरु के रूप में देखने की सोच मजबूत होती है.”

उन्होंने कहा, “इसीलिए जब प्रधानमंत्री पुतिन या ओबामा को कुछ भेंट करते हैं, तो वह रामायण या शिव पुराण नहीं बल्कि भगवद्गीता होती है, क्योंकि इसे दुनिया पहले से जानती है.” उन्होंने यह भी कहा कि औपनिवेशिक दौर के विद्वान भी इसे बहुत सम्मान देते थे.

गीता का अंतरराष्ट्रीयकरण और उससे जुड़ा हिंदू आत्मसम्मान का बढ़ना वास्तव में एक लंबा इतिहास रखता है.

गीता की ‘खोज’

19वीं सदी के शुरुआती और मध्य वर्षों में यूरोप में ‘स्थानीय’ भारतीयों को लेकर गहरी जिज्ञासा थी. यूरोपीय लोग भारत के विविध धर्मों, संस्कृतियों, भाषाओं और स्थापत्य से मोहित थे और उपमहाद्वीप के अतीत को जानने की कोशिश कर रहे थे. धार्मिक ग्रंथ खोजे गए और अनुवाद किए गए. लोगों और भाषाओं की ‘उत्पत्ति’ पर शोध हुआ. ऐतिहासिक स्थलों की पुरातात्विक जांच की गई.

मनु पिल्लै ने अपनी किताब गॉड्स, गन्स एंड मिशनरीज में तर्क दिया है कि भारतीय इतिहास की इस यूरोपीय ‘खोज’ का एक “अनपेक्षित परिणाम” यह हुआ कि भारतीयों में अपने इतिहास को लेकर गर्व तेजी से बढ़ा. जैसे-जैसे यूरोपीय भारत के अतीत से प्रभावित हुए, वैसे-वैसे भारतीय भी यूरोपीय नजर से देखे गए अपने अतीत से प्रभावित होने लगे.

1785 में पहली बार अंग्रेजी में अनूदित भगवद्गीता की ‘खोज’ इसका एक उदाहरण थी. ओरिएंटलिस्ट, मिशनरी, औपनिवेशिक अधिकारी और रोमांटिक विचारक, सभी इस आध्यात्मिक ग्रंथ से प्रभावित थे, जो दुनिया के किसी और ग्रंथ की तरह नहीं बल्कि एक युद्धभूमि में स्थापित है.

औपनिवेशिक भारत के शुरुआती और प्रभावशाली ब्रिटिश प्रशासक वॉरेन हेस्टिंग्स ने कहा कि गीता का धर्मशास्त्र ईसाई धर्म की बुनियादी शिक्षाओं से “सटीक रूप से मेल खाता है”. हिंदू धर्म में बाइबिल के समकक्ष ग्रंथ की तलाश में, गीता के अनुवादक चार्ल्स विल्किंसन ने कहा कि इस ग्रंथ में हिंदू धर्म के सभी “महान रहस्य” मौजूद हैं. पश्चिम में भगवद्गीता एक सनसनी बन गई. विद्वानों और दार्शनिकों ने इसे पूर्वी ज्ञान की खिड़की बताया. कृष्ण की केंद्रीय भूमिका को ‘अशुद्ध न हुए हिंदू धर्म’ के एकेश्वरवाद के प्रमाण के रूप में आगे बढ़ाया गया.

जैसे-जैसे भारतीयों ने यूरोपीय अनुवादों के जरिए अपने अतीत को जानना शुरू किया, हिंदुओं ने इस यूरोपीय व्याख्या वाली गीता को नए उत्साह से अपनाया. गीता की बढ़ती प्रतिष्ठा ने उस समय हिंदू आत्मसम्मान को बढ़ाया, जब अंग्रेज उन्हें मूर्तिपूजा के लिए नीचा दिखाते और अपमानित करते थे.

हालांकि, हिंदू गर्व का बढ़ना ही ओरिएंटलिस्ट रुचि का अकेला “अनपेक्षित परिणाम” नहीं था. 19वीं सदी के अंत तक, क्रांतिकारियों और उग्र राष्ट्रवादियों ने इसी दोबारा खोजी गई गीता में राजनीतिक हिंसा के लिए धार्मिक आधार ढूंढ लिया, जिसे वे औपनिवेशिक शासन को खत्म करने का एकमात्र रास्ता मानने लगे थे. अर्जुन को धर्मयुद्ध लड़ने के लिए कृष्ण का उपदेश, उन्हें अपने समय का प्रतीक लगा, यानी जरूरत पड़ने पर हिंसा के जरिए ब्रिटिश शासन का अंत.

आने वाले वर्षों में, क्रांतिकारी एक हाथ में गीता और दूसरे हाथ में रिवॉल्वर लेकर चलने लगे. यह गीता की ऐसी व्याख्या थी, जो रिवॉल्वर उठाने को न केवल सही ठहराती थी बल्कि जरूरी भी बताती थी.

‘राजनीतिक साधुओं’ की समस्या

20वीं सदी के पहले दो दशकों में, जब उग्र राष्ट्रवाद मजबूत हो रहा था, औपनिवेशिक सरकार एक अजीब समस्या दर्ज कर रही थी, यानी ‘राजनीतिक साधुओं’ की समस्या.

जून 1908 में, बॉम्बे प्रशासन ने शिवाजी क्लब, खेड़ क्लब, बेलापुर स्वामी मठ क्लब, पेन क्लब और अभिनव भारत जैसे गुप्त संगठनों का पता लगाया. इन क्रांतिकारी संगठनों में प्रशासन ने पाया कि “कई साधु राष्ट्रवादी उद्देश्यों के लिए भगवद्गीता का इस्तेमाल कर रहे थे.”

1907 में, जब तिलक के करीबी मित्र केशव कृष्णाजी दामले ने अलग-अलग जगहों पर गीता पर व्याख्यान दिए, तो जिला मजिस्ट्रेट ने टिप्पणी की, “यह व्याख्यान बेहद प्रभावशाली है. उन्होंने इतनी चतुराई से विद्रोह का प्रचार किया कि यह संदिग्ध है कि दंड संहिता उन्हें छू भी पाएगी.”

गीता का क्रांतिकारी राजनीति में इस्तेमाल जल्द ही पूरे देश में औपनिवेशिक खुफिया तंत्र के लिए सिरदर्द बन गया. बंगाल में खुफिया रिपोर्ट में कहा गया, “अरविंद और बरिंद्र कुमार घोष द्वारा बनाई गई अराजकतावादी संस्था की गतिविधियां धार्मिक स्वरूप की थीं, और जो लोग मणिकटोला गार्डन आते थे, वे गीता के अध्ययन को बम और विस्फोटक बनाने की तैयारी के साथ जोड़ते थे.”

शिमला में, 1910 में आपराधिक खुफिया निदेशक ने लिखा, “ये लोग अधिकतर ब्राह्मण होते हैं और उच्च बौद्धिक क्षमता के कारण लोगों की भावनाओं को छूकर उन्हें अपने पक्ष में कर लेते हैं. मेरा दृढ़ मत है कि ये लोग लापरवाह उग्रवादी अखबारों से ज्यादा नुकसान करते हैं.”

उन्होंने लिखा, “वे आम तौर पर पुराणों से, खासकर भगवद्गीता से, किसी एक श्लोक को चुनते हैं और यह संदेश देते हैं कि दुश्मन को मारना पाप नहीं है, क्योंकि भौतिक शरीर का नाश आत्मा का नाश नहीं होता.” उन्होंने कहा, “फिर वे इन सिद्धांतों को तोड़-मरोड़ कर वर्तमान राजनीति पर लागू करते हैं.”

सरकार ने जवाबी कदम उठाने शुरू किए. स्कूलों के पाठ्यक्रम की जांच होने लगी कि नैतिक शिक्षा की कक्षा में गीता पढ़ाई जा रही है या नहीं. जिन स्कूलों में गीता पढ़ाई जाती थी, उन्हें ‘राजद्रोह के स्कूल’ कहा गया. जिन नाटकों में अर्जुन को दिए गए कृष्ण के उपदेशों का जिक्र था, उन्हें प्रतिबंधित कर दिया गया.

‘राजनीतिक साधुओं’ से जुड़ी बारीक जानकारियां दर्ज की जाने लगीं, और अंततः 1910 में भारत सरकार ने भारतीय प्रेस अधिनियम लागू किया. इस विधेयक को पेश करते समय गृह सचिव सर हरबर्ट रिस्ले ने भी गीता का जिक्र किया. उन्होंने कहा, “गीता में अर्जुन और कृष्ण का संवाद, जो हिंदुओं के लिए वही महत्व रखता है जो भावुक ईसाइयों के लिए ‘इमिटेशन ऑफ क्राइस्ट’, उसे प्रभावशाली दिमागों को भड़काने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.”

यह एक सोची-समझी रणनीति थी.

1905 में बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन के वर्षों में, जब राजनीतिक गतिविधियों पर कड़ी निगरानी थी और औपनिवेशिक दमन पूरी ताकत से दिख रहा था, राष्ट्रवादी ऐसे तरीकों की तलाश में थे जिनसे वे जनता को संगठित कर सकें और राज्य की नजर से बच सकें. थिएटर, मेला गीत, भजन-कीर्तन और प्रवचन उनके सहारे बने.

लेकिन इन सबको जोड़ने वाली कड़ी गीता थी. दीपेश चक्रवर्ती ने गांधी की गीता और राजनीति में तर्क दिया है कि गीता के जरिए राष्ट्रवादी न केवल राज्य की निगरानी से बच पाए, बल्कि यह भी स्थापित किया कि महाभारत से लेकर 1857 के स्वतंत्रता संग्राम तक भारत में “न्यायसंगत हिंसा की एक लंबी परंपरा” रही है. इसलिए स्वराज के लिए भारतीयों को अपनी इसी परंपरा की ओर लौटना था, जो नई व्याख्या वाली “क्रांतिकारी” गीता में दर्ज थी.

मकरंद परांजपे कहते हैं, “गीता निस्संदेह वह सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक या धार्मिक ग्रंथ है, जिसका इस्तेमाल भारतीय नेताओं ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान किया.” उन्होंने कहा, “विवेकानंद, तिलक, अरविंदो, गांधी और विनोबा भावे जैसे नेताओं ने न केवल इसका गहन अध्ययन किया, बल्कि इस पर टीकाएं भी लिखीं. क्यों. क्योंकि उन्हें ‘कर्म योग’ के सिद्धांत में राष्ट्रीय पुनर्जागरण की कुंजी दिखी.”

उन्होंने कहा, “इससे पहले, बंकिमचंद्र ने भी सुझाव दिया था कि भारत को भक्ति परंपरा के भावुक और कोमल कृष्ण से हटकर गीता के अधिक पुरुषार्थी और रणनीतिक कृष्ण की ओर बढ़ना चाहिए. विचार यह था कि हम अपने कर्म और प्रयास से स्वयं को मुक्त कर सकते हैं, केवल किसी दैवी या अलौकिक शक्ति से प्रार्थना और विनती करके नहीं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: पंजाब में आपराधिक हिंसा का नया और खतरनाक दौर — ‘गैंग और आतंकवाद का मेल’


 

share & View comments