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Friday, 9 January, 2026
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ताशकंद घोषणा में शास्त्री की नैतिक और वैचारिक जीत क्यों छिपी थी

अयूब खान के साथ अपनी द्विपक्षीय बातचीत में लाल बहादुर शास्त्री ने कहा कि हालांकि भारत ने कभी भी दो-राष्ट्र सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया, लेकिन पाकिस्तान में कुछ तत्व इसे 'दो दुश्मन राष्ट्र' बनाने पर तुले हुए हैं.

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14, 16 और 22 सितंबर को संघर्षविराम (सीज़फायर) की तीन नाकाम कोशिशों के बाद, भारत और पाकिस्तान—दोनों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के उस प्रस्ताव को स्वीकार किया, जिसमें दोनों देशों से कहा गया था कि वे 5 अगस्त से पहले वाली अपनी-अपनी स्थितियों पर वापस लौट जाएं. यह भारत की उस मांग से कम था, जिसमें वह पाकिस्तान को ‘आक्रामक देश’ घोषित करने की बात कर रहा था, लेकिन 5 अगस्त को आधार मानना भारत के इस रुख की पुष्टि थी कि ‘घुसपैठ, आक्रमण के समान है’.

अब 5 अगस्त को भारत-पाकिस्तान सीमा पर ज़मीनी स्थिति को देखते हैं. जम्मू-कश्मीर सेक्टर में चंब भारत के नियंत्रण में था और पाकिस्तान ने हाजी पीर दर्रा अपने कब्ज़े में ले रखा था. जब लड़ाई बंद हुई, तब तक पाकिस्तान ने चंब कस्बा अपने कब्ज़े में ले लिया था और भारत ने हाजी पीर पर तिरंगा फहरा दिया था. इसी तरह, पंजाब और राजस्थान सेक्टरों में भी दोनों तरफ़ से कुछ जगहों पर फायदे और नुकसान हुए, जहां भारत ने लाहौर में बुरकी पुलिस स्टेशन पर कब्ज़ा कर लिया था और सियालकोट—जो जम्मू-कश्मीर सेक्टर का ऑपरेशन बेस है, से महज़ दो किलोमीटर दूर था, वहीं पाकिस्तान अमृतसर ज़िले के खेम करन के बाहरी इलाक़ों पर काबिज़ था. राजस्थान में पाकिस्तानी रेंजर्स ने कृष्णगढ़ जैसे अहम किलेबंदी वाले ठिकानों पर कब्ज़ा कर लिया था और करीब 12,000 वर्ग मील रेगिस्तानी इलाके पर भी उनका नियंत्रण था.

हालांकि, हाजी पीर दर्रा एक भावनात्मक प्रतीक बन गया था क्योंकि इस पीक को हासिल करने में कई जवानों ने अपना खून बहाया था, लेकिन अपने दिल के अंदर, लाल बहादुर शास्त्री जानते थे कि शांति के लिए शायद इसे छोड़ना पड़े. उनके विश्वासपात्र और पूर्व प्रेस सचिव कुलदीप नायर ने 21 अक्टूबर 1965 को हिंदुस्तान टाइम्स में लिखा था कि “यह मानना पूरी तरह गलत होगा कि हाजी पीर दर्रे को अपने पास रखने से भारत सभी घुसपैठियों का रास्ता पूरी तरह बंद कर देगा क्योंकि कई और रास्ते थे जिनका इस्तेमाल किया जा सकता था और अगस्त 1965 में पाकिस्तानी घुसपैठियों ने वास्तव में उनका इस्तेमाल किया भी.”

दरअसल, संघर्षविराम के बाद शास्त्री ने अपनी भाषा नरम करनी शुरू कर दी थी और सार्वजनिक तौर पर हाजी पीर और तिथवाल का ज़िक्र करने से बचते थे, ताकि यह न लगे कि ये मुद्दे किसी भी हालत में समझौते से बाहर हैं. कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्ल्यूसी) को दिए अपने ब्रीफिंग में उन्होंने कहा कि “हाजी पीर की वापसी, घुसपैठ पूरी तरह खत्म होने से जुड़ी ज़मीनी परिस्थितियों पर निर्भर करेगी.”

इसी बीच, विपक्ष ने सिंधु जल संधि को लेकर दबाव बढ़ाया, खासकर 80 करोड़ रुपये की छह किस्तों में से आखिरी किश्त के भुगतान को लेकर, जिसे भारत ने विश्व बैंक के समझौते के तहत देने का वादा किया था.

अगर शास्त्री पर जनमत का दबाव था, तो राष्ट्रपति अयूब खान पर दबाव उससे भी ज़्यादा था, जहां भारत ने अपने युद्ध के तीनों लक्ष्य पूरे कर लिए थे, वहीं पाकिस्तान पूरी तरह असफल रहा. ऑपरेशन जिब्राल्टर बुरी तरह नाकाम हो गया था, उनके मंसूबे कश्मीर में असंतोष फैलाने में नाकाम रहे, पैटन टैंकों वाली उनकी मशहूर युद्ध मशीन ठप पड़ गई थी और अंत में यूएनएससी के प्रस्ताव ने 5 अगस्त की घुसपैठ (ऑपरेशन जिब्राल्टर) को युद्ध की कार्रवाई के रूप में स्वीकार किया. यह फैसला भारत और पाकिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह (UNMOGIP) की ज़मीनी रिपोर्टों के आधार पर लिया गया था, जिसे दोनों देशों के बीच संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से बनी संघर्षविराम रेखा (1 जनवरी 1949 से प्रभावी) पर स्थिति की निगरानी की ज़िम्मेदारी दी गई थी.

कोसिगिन का भाषण

जो भी हो, जब ताशकंद में दोनों प्रतिनिधिमंडल अपनी पहली दोपहर की बैठक के लिए मिले, तो सोवियत प्रधानमंत्री एलेक्सी कोसिगिन ने एक अच्छी तरह तैयार किया गया शुरुआती भाषण दिया. उन्होंने कहा: “भारत और पाकिस्तान के लोगों का इतिहास ऐसे कई उदाहरण जानता है, जब वे विदेशी शासन के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए. उपनिवेशवाद पर जीत साझा प्रयासों से मिली और इसके लिए दोनों ने एक जैसे बलिदान दिए. आज भी, जैसे अतीत में था, केवल भारत और पाकिस्तान के दुश्मन ही उनके बीच टकराव में दिलचस्पी रख सकते हैं.”

शास्त्री और अयूब—दोनों के भाषण भी मेल-मिलाप वाले थे.

शास्त्री ने कहा, “एक-दूसरे को बल प्रयोग न करने का हमारा आश्वासन यह भी मतलब होगा कि हम दोनों एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता को स्वीकार करते हैं.”

अयूब ने भी गर्मजोशी से जवाब दिया. कश्मीर का सीधा ज़िक्र करने से बचते हुए उन्होंने कहा, “हमारे बीच ऐसा कोई भी मुद्दा नहीं है जिसे शांतिपूर्ण और सम्मानजनक तरीके से हल न किया जा सके. हमें पूरी गंभीरता के साथ उन पर काम करना चाहिए.”

हालांकि, शुरुआती बयान सकारात्मक थे, फिर भी कश्मीर का मुद्दा (पाकिस्तान की ओर से), नो-वॉर पैक्ट यानी युद्ध न करने का समझौता (भारत की ओर से) और 5 अगस्त की स्थिति के अनुसार इलाकों की अदला-बदली जैसे विवादित मुद्दे बने रहे, लेकिन कोसिगिन ने पूरी तैयारी कर रखी थी. उन्होंने शास्त्री और अयूब—दोनों से कहा कि UNSC के आदेश के अनुसार, दोनों को एक-दूसरे के कब्ज़े वाले इलाकों से पीछे हटना होगा और अपनी सेनाओं को 5 अगस्त वाली रेखा तक ले जाना होगा.

पाकिस्तान के बार-बार कश्मीर मुद्दा उठाने पर, कोसिगिन ने उनसे कहा (खासतौर पर ज़ुल्फिकार अली भुट्टो से, अयूब खान से ज़्यादा) कि भारतीय प्रधानमंत्री ने इसे साफ तौर पर मानने से इनकार कर दिया है. वास्तव में, शास्त्री ने अपने सोवियत समकक्ष से कहा था कि “भारत का कोई भी प्रधानमंत्री ऐसे किसी समझौते को स्वीकार करने का अधिकार नहीं रखता, जिससे अपने आप कुछ परिस्थितियों में जम्मू-कश्मीर के किसी हिस्से को अलग करने की स्थिति पैदा हो.”

संयुक्त राष्ट्र के संदर्भ में अपनी बात मज़बूत करते हुए उन्होंने कहा, “संयुक्त राष्ट्र के पास अपने चार्टर के तहत यह तय करने की कोई शक्ति नहीं है कि कोई संप्रभु देश अपने क्षेत्र का कोई हिस्सा छोड़ दे. इसके बिल्कुल उलट, संयुक्त राष्ट्र का पहला उद्देश्य और मकसद यही है कि उसके हर सदस्य देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता सुरक्षित रहे.”

अयूब के साथ द्विपक्षीय बातचीत में शास्त्री ने कहा कि भारत ने कभी भी द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया, लेकिन पाकिस्तान में कुछ तत्व (जैसे भुट्टो) इसे ‘दो-दुश्मन राष्ट्र’ की सोच में बदलने पर तुले हुए थे. दूसरी ओर, भारत ने पाकिस्तान के गठन को स्वीकार किया था और उसके नागरिकों के लिए हमेशा अच्छे भविष्य की कामना की थी.

इसी संदर्भ में प्रस्तावित नो-वॉर पैक्ट यह सुनिश्चित करता कि दोनों देश अपना समय और ऊर्जा अपने नागरिकों की स्थिति बेहतर करने में लगा सकें.

शास्त्री की जीत

आखिरकार, जिसे कूटनीतिक मसौदा तैयार करने की एक बेहतरीन मिसाल कहा जा सकता है, उसमें दोनों प्रतिनिधिमंडलों के विचार शामिल किए गए—हालांकि, बहुत संतुलित और सीमित तरीके से. भारत के नो-वॉर पैक्ट प्रस्ताव को लेकर संयुक्त बयान में कहा गया, “भारत और पाकिस्तान सहमत हैं कि दोनों पक्ष संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार, दोनों देशों के बीच अच्छे पड़ोसी संबंध बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे. वे बल प्रयोग न करने और अपने विवादों को शांतिपूर्ण तरीकों से सुलझाने के चार्टर के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं की फिर से पुष्टि करते हैं.”

जम्मू-कश्मीर का ज़िक्र भी इस तरह किया गया कि भारत को कोई आपत्ति न हो: “यह सहमति बनी कि भारत और पाकिस्तान के लोगों के हित दोनों देशों के बीच तनाव जारी रहने से पूरे नहीं होते. इसी पृष्ठभूमि में दोनों देशों ने अपने-अपने रुख साझा किए.”

इस तरह, ताशकंद शास्त्री के लिए नैतिक और शब्दों के स्तर पर दोनों तरह की जीत थी, लेकिन दुर्भाग्य से, जीत का यह क्षण एक त्रासदी में बदल गया, क्योंकि समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ ही घंटों बाद शास्त्री का निधन हो गया.

भारत ने हाजी पीर खो दिया, लेकिन चंब वापस हासिल कर लिया. दुर्भाग्य से, 1971 की निर्णायक जीत के बाद भी भारत ने चंब फिर खो दिया—युद्ध के मैदान में भी और 1972 में शिमला में हुई बाद की बातचीत में भी.

यह ताशकंद घोषणा पर आधारित लेखों की सीरीज़ का तीसरा लेख है.

संजीव चोपड़ा एक पूर्व IAS अधिकारी हैं और वैली ऑफ वर्ड्स साहित्य महोत्सव के निदेशक हैं. हाल तक वे LBSNAA के निदेशक रहे हैं और लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल (LBS म्यूज़ियम) के ट्रस्टी भी हैं. वे सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज़, PMML के सीनियर फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @ChopraSanjeev है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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