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Sunday, 30 August, 2026
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अग्निपथ 2.0 की जरूरत क्यों है? भारत को कम खर्च वाली सेना चाहिए, सस्ते सैनिक नहीं

सरकार को अग्निपथ 1.0 को एक लोकलुभावन चुनावी उपाय के तौर पर पवित्र पहल बताने, या उसे रद्द करने के राजनीतिक लालच से बचना होगा.

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अग्निवीरों का पहला बैच अपनी चार साल की सेवा अवधि पूरी करने जा रहा है. भारतीय नौसेना में यह पहला बैच इस साल के अंत तक अपनी सीमा रेखा को छू लेगा. इसके बाद थलसेना और वायुसेना में इनके प्रथम बैच अगले साल के शुरू में अपनी-अपनी सेवा अवधि पूरी कर लेंगे. सरकार और सेनाओं के लिए, आजादी के बाद सेना की मानव शक्ति को लेकर सबसे परिणामकारी सुधारों में गिने जा रहे इस प्रयास का  यह पहला असली इम्तिहान होगा.

सरकार को अग्निपथ 1.0 को एक लोकलुभावन चुनावी उपाय के तौर पर पवित्र पहल बताने या रद्द करने के राजनीतिक लालच से बचना होगा. उसे विस्तृत सुधारों के साथ अग्निपथ 2.0 शुरू करने की कोशिश करनी चाहिए, जिसमें इसके वित्तीय पहलू को कायम रखते हुए सेना की प्रभावशीलता और निष्पक्षता को प्राथमिकता दी जाए.

सुधार जरूरी था

अग्निपथ के पीछे जो बुनियादी तर्क है वह मजबूत बना हुआ है. भारत भारी मानव शक्ति वाली सेना का बोझ अनिश्चित काल के लिए नहीं उठा सकता, जिसमें रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा वेतन-भत्तों और पेंशन पर खर्च होता हो और आधुनिकीकरण के लिए बहुत कम बचता हो.

सेनाओं को ज्यादा युवा, ज्यादा छरहरे और टेक्नोलॉजी के मामले में ज्यादा सक्षम बनने की जरूरत है. पेंशन पर खर्च केवल उसके नियमों में फेरबदल करके नहीं कम किया जा सकता. अधिक स्थायी समाधान मानव शक्ति के ढांचे में ही परिवर्तन हो सकता है. इसीलिए मैंने अग्निपथ योजना की घोषणा से बहुत पहले ही शॉर्ट सर्विस कमीशन का कुछ आपत्तियों के साथ समर्थन किया था. वैसे, जरूरी नहीं है कि एक मजबूत रणनीतिक लक्ष्य एक ठोस योजना को जन्म दे.

अग्निपथ योजना 2022 में शुरू की गई थी. इसमें चार साल की सेवा और 30,000-40,000 रुपये की तय सैलरी दी जाती है. इसके बाद हर बैच के अधिकतम 25 फीसदी लोगों को स्थायी सेवा के लिए चुना जा सकता था. बाकी 75 फीसदी लोग बिना पेंशन के सेवा से बाहर हो जाते, लेकिन उन्हें सेवा निधि पैकेज और नौकरी में बदलाव के दौरान दूसरी मदद दी जाती. इसके बाद हुआ विवाद पहले से ही अनुमानित था और यह सिर्फ राजनीतिक विवाद नहीं था. इस योजना ने ट्रेनिंग, सेना की क्षमता, जवानों के मनोबल, सेवा में बनाए रखने, वेतन और चार साल बाद सेवा छोड़ने वाले लोगों को रोजगार मिलने जैसे कई जायज सवाल खड़े किए.

अब, चार साल पूरे होने पर हम नीति के मसले से आगे बढ़कर, सबूतों की जांच कर सकते हैं.

चार साल बहुत कम होते हैं

एक सैनिक केवल एक बार ट्रेनिंग लेकर आजीवन सेवा देने के लिए तैयार नहीं हो जाता है. सैन्य क्षमता ट्रेनिंग, फील्ड के अनुभव, सेनाभ्यासों, यूनिट की तैनाती, और आधुनिकतम हथियारों के प्रयोग आदि से बनती है. यह टेक्निकल कर्मचारियों के लिए भी लागू है.

सेनाएं ज्यादा से ज्यादा जटिल सेंसर्स, संचार व्यवस्था, एयर डिफेंस सिस्टम, मानव रहित प्लेटफॉर्मों, और सटीक मार करने वाले हथियारों का इस्तेमाल करने लगी हैं. एक सेलर, एयरमैन, या सैनिक का इस्तेमाल करने के लिए उसकी ट्रेनिंग पहला कदम होता है. इन सिस्टम्स के रखरखाव और उनका इस्तेमाल करने का अनुभव भी उतना ही महत्वपूर्ण है. ऑपरेशन सिंदूर के अनुभवों ने इस सबक की पुष्टि ही की है. रिपोर्टों से पता लगता है कि सेनाओं ने ऑपरेशन के अनुभवों को मूल्यवान पाया और वे सेवा विस्तार देने के पक्ष में इसलिए भी हैं कि आधुनिक प्लेटफॉर्म लंबी ट्रेनिंग और ज्यादा परिचय की मांग करते हैं.

विरोधाभास स्पष्ट है. अग्निपथ योजना के तहत कई सैनिकों को ठीक उस समय हटा दिया जाता है जब वे उपयोगी बनने लगते हैं. यहां पुरानी व्यवस्था को वापस लाने की बात नहीं की जा रही है बल्कि सेना की जरूरतों के हिसाब से उन्हें बनाए रखने की बात की जा रही है. इसके साथ ही उनके कार्यकाल को पांच साल का किया जा सकता है.

बताया जा रहा है कि सेनाएं चाहती हैं कि सेवा विस्तार दिए जाने पर अग्निवीरों के अनुपात में वृद्धि की जाए. थलसेना और वायुसेना इस अनुपात को बढ़ाकर 50 फीसदी करने पर विचार कर रही है, और नौसेना अपने यहां काम के तकनीकी स्वरूप के कारण इससे भी ज्यादा वृद्धि चाहती है. अभी ऐसी किसी वृद्धि की मंजूरी नहीं दी गई है.

इस अनुपात को 50 फीसदी करने पर समस्या का कुछ समाधान तो होगा ही, लेकिन केवल रूल बुक में 25 के आंकड़े की जगह 50 का आंकड़ा दर्ज करने से मकसद अधूरा ही रह जाएगा. थलसेना के राइफल मैन, या टैंक के क्रू मैन, मिसाइल टेक्निशियन, या रडार ऑपरेटर, विमान टेक्निशियन या नेवल इंजीनियर, सबके अनुपात में समान वृद्धि करने की जरूरत नहीं है.

अग्निपथ 2.0 में, कार्यकाल पांच साल का किया जा सकता है और जिन्हें सेवा विस्तार दिया जाना है उनका अलग-अलग अनुपात रखा जा सकता है. सेनाओं को तय करना चाहिए कि किन वर्गों के कर्मचारियों की सेवा अवधि चार-पांच साल की रखना पर्याप्त होगा और किनकी सेवा अवधि बढ़ाने के लिए उन्हें ट्रेनिंग और ऑपरेशन के अनुभव दिलाने पर ज्यादा खर्च करना उचित होगा. सामान्य ड्यूटी वाले वर्गों के मुक़ाबले टेक्निकल और स्पेशल सेवाओं के वर्गों में सेवा विस्तार दिए जाने वालों का अनुपात ज्यादा रखा जा सकता है. लक्ष्य यह होना चाहिए कि कर्मचारियों की सिर्फ संख्या बढ़ाने की जगह उन हुनर वालों विस्तार दिया जाए जिनकी सेना को जरूरत है. इससे सेना का युवा स्वरूप भी बनेगा और प्रशिक्षित कर्मचारियों को अनावश्यक गंवाने से भी बचा जाएगा.

सबसे बड़ी खामी: गैर-बराबर सैनिक  

एक अग्निवीर और एक नियमित सैनिक एक ही सेक्शन में काम करेंगे, एक ही खंदक से लड़ाई लड़ेंगे, एक ही तरह के हथियार इस्तेमाल करेंगे और एक ही तरह के बुलेट का सामना करेंगे मगर सेवा काल में उन्हें काफी अलग-अलग वेतन मिलेगा, उनकी मौत या अपंगता के बाद काफी अलग-अलग तरह का मुआवजा मिलेगा. इसका सैन्य भावना, नैतिकता या संस्थागत आधार पर समर्थन करना मुश्किल है.

शॉर्ट सर्विस कमीशन वालों और स्थायी सेवा वालों की सेवा शर्तों में अंतर जायज है. लेकिन सेवा अवधि के दौरान उनके जीवन के मूल्य के आकलन में भेदभाव जायज नहीं है.

इसलिए अग्निपथ 2.0 के तहत, सक्रिय सेवा अवधि के दौरान वेतन तथा आवश्यक भत्तों, ऑपरेशन से जुड़े लाभों, बीमा, मृत्यु और अपंगता मुआवजा, मेडिकल केयर, परिवार कल्याण और सेवा से जुड़े दूसरे लाभों में पूरी समानता स्थापित की जाए. अंतर सेवा अवधि, पेंशन और सेवा के बाद के लाभों में हो सकता है. लेकिन सेवा में लगे किसी युवा से यह नहीं कहा जा सकता कि उसके जीवन का मूल्य इसलिए कम है क्योंकि उसने चार साल के अनुबंध पर दस्तखत किया है.

कर्मचारियों की संख्या का गणित सुधरे

शुरू में, 2022-23 में सालाना 40,000 अग्निवीरों की भर्ती की गई, 2026 में यह संख्या 70,000 हो गई. इस साल के अंत तक करीब 2.08 लाख अग्निवीर सेवा में लगे होंगे. सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर यह बताने से मना कर दिया है कि सेना में कुल कितने कर्मचारियों की कमी है. सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध सूचना के अनुसार सेना से हर साल करीब 60,000 कर्मचारी रिटायर होते हैं.

25 फीसदी अग्निवीरों को सेवा विस्तार देने का अनुपात रखा गया तो सेना से सालाना रिटायर होने वाले 60,000 कर्मचारियों के खाली पदों को भरने के लिए सालाना 2.4 लाख अग्निवीरों की भर्ती करनी पड़ेगी. इस अनुपात को अगर 50 फीसदी कर दिया गया तो 1.2 लाख की भर्ती करनी पड़ेगी. ये आंकड़े यही बताते हैं कि सेना में कुल मानव संसाधन के पुनर्गठन के मद्देनजर अग्निपथ पर अलगथलग विचार नहीं किया जा सकता.

लेकिन इसे मानव संसाधन पर ज्यादा ज़ोर देने वाले पुराने ढांचे को बहाल करने का बहाना नहीं बनाया जा सकता. पिछली सदी के पूर्णतः पारंपरिक किस्म के युद्ध के लिए सैनिकों की संख्या पर ज़ोर देने वाली जिस सेना का गठन किया गया था उसका आकार घटाने, उसमें सैनिकों की संख्या का अनुकूलन करने और सेना का पुनर्गठन करने वाले सुधारों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए.

स्थायी पदों पर बड़ी संख्या में भर्ती करने की जगह एक छोटा स्थायी काडर, और शॉर्ट सर्विस वालों का बड़ा काडर ही समाधान हो सकता है. इस दृष्टि से अग्निपथ 2.0 वास्तविक परिवर्तन करने वाला सुधार बन सकता है.

परिवर्तन के रास्ते

अग्निपथ की मूल खामी इस सोच में निहित थी कि चार साल के बाद सेना से अलग होने वाले युवा को सिविल सेवाओं में रोजगार मिल जाएगा. यह मान्यता उचित नहीं थी.

बाद में सरकार ने निकासी के ढांचे को काफी मजबूत करके अच्छा किया. गृह मंत्रालय ने जुलाई 2026 में घोषणा की कि पूर्व अग्निवीरों को ‘सीएपीएफ’ में सिपाही/जीडी के खाली पदों में और असम राइफल्स में राइफलमैन के खाली पदों में 50 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा और इसके साथ उम्र सीमा में वृद्धि तथा लिखित एवं शारीरिक परीक्षाओं से छूट दी जाएगी. गृह मंत्रालय में पूर्व अग्निवीरों की एक अलग शाखा ही बना दी गई है. रेलवे ने लेवल-1 के पदों में उन्हें 10 फीसदी और लेवल-2 वाले और उससे ऊपर केपदों में 5 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया है. विभिन्न राज्य सरकारों ने भी पुलिस और दूसरे विभागों में खाली पदों में उनके लिए व्यवस्था घोषित की है. राज्यों के स्तर पर इन आरक्षणों में समरूपता लाने के लिए केंद्र सरकार को तालमेल करने की जरूरत है.

सरकार ने सिविल सेवाओं के लिए सैन्य हुनर को औपचारिक मान्यता देने की पहल की है और सैन्य प्रशिक्षण को मान्यताप्राप्त योग्यता में शामिल करने के लिए शैक्षिक साधन भी तैयार किए हैं. ये सब स्वागत योग्य कदम हैं. आगे एक उपयुक्त मंत्रालय के तहत एक ‘नेशनल अग्निवीर ट्रांजिशन अथॉरिटी’ का गठन किया जा सकता है.

यह ‘सीएपीएफ’, राज्य पुलिस, रेलवे, डिफेंस क्षेत्र के पीएसयू, सरकारी नौकरियों, निजी उद्योगों, स्किल सर्टिफिकेशन, उच्च शिक्षा, एयर उद्यमशीलता आदि में ट्रांजीशन सिस्टम के लिए एक स्रोत का काम कर सकता है. भर्ती होने से पहले अग्निवीरों को पता होना चाहिए कि चार साल के बाद उनके केरियर के क्या विकल्प हो सकते हैं. निजी क्षेत्र इस मामले में सकारात्मक कदम उठाए इसके लिए सरकार कानून भी बना सकती है.

अग्निपथ 2.0

अग्निपथ योजना को हड़बड़ी में शुरू किया गया, उसे एक पाइलट प्रोजेक्ट वाला लाभ नहीं मिला. यह उसकी मूल कमजोरी रही. लेकिन चार साल से जारी इस योजना को लेकर व्यावहारिक अनुभव हासिल हुए हैं. सेना और रक्षा मंत्रालय को बड़ी संख्या में अग्निवीरों को रिलीज करने से पहले औपचारिक, पारदर्शी समीक्षा करनी चाहिए.

अग्निपथ 2.0 के ये छह मूल आधार होने चाहिए.

सबसे पहले तो इसे एकल किस्म का सुधार नहीं होना चाहिए बल्कि इसे सेना में मानव संसाधन के आकार को उपयुक्त बनाने, उसे छोटा करने, उसका पुनर्गठन करने और भर्ती को रिलीज/रिटायरमेंट के साथ संतुलित करने की दृष्टि से परिवर्तन लाने की आंतरिक प्रक्रिया का हिस्सा बनाना चाहिए.

दूसरे, शुरुआती रोजगार चार नहीं बल्कि पांच साल के लिए होना चाहिए. तीसरे, सीनियरिटी का बचाव करते हुए उन्हें अलग-अलग संख्या में सेवा विस्तार दिया जा सकता है. टेक्निकल और स्पेशलिस्ट सेवाओं के लिए उनकी संख्या में वृद्धि की जा सकती है जिसका फैसला व्यापक प्रतिशत के मनमाने निर्धारण के आधार पर नहीं बल्कि सेना की जरूरतों के आधार पर किया जाए. चौथे, अग्निवीरों और नियमित सैनिकों को सेवा अवधि के दौरान समान वेतन-भत्ते दिए जाएं और मृत्यु/अपंगता के कारण समान मुआवजे-लाभ आदि दिए जाएं. पांचवां आधार यह हो कि रोजगार, शिक्षा, स्किल सर्टिफिकेट और उद्यमशीलता आदि में समन्वय स्थापित करने के लिए ‘नेशनल अग्निवीर ट्रांजीशन ऑथरिटी’ का गठन किया जाए. छठी बात :  रोजगार का आश्वासन देने वाली घोषणाएं ही सिर्फ न की जाएं बल्कि ‘सीएपीएफ’ में 50 फीसदी आरक्षण के अलावा केंद्र तथा राज्य सरकारों में नौकरी के जो अवसर प्रस्तावित किए जा रहे हैं उन्हें समयबद्ध भर्तियों के द्वारा लागू भी किया जाए.

अग्निपथ का आकलन केवल एक रोजगार योजना के रूप में न किया जाए बल्कि मानव संसाधन की अधिकता वाली भारतीय सेना के व्यापक पुनर्गठन की प्रक्रिया के हिस्से के तौर पर किया जाए.

मोदी सरकार का इम्तिहान यह नहीं है कि वह यह कबूल करती है या नहीं, कि इस मूल योजना में खामियां थीं. उसका इम्तिहान यह है कि उसमें व्यापक लक्ष्य को कायम रखते हुए उन खामियों को दूर करने का राजनीतिक साहस है या नहीं.

भारत को एक युवा सेना चाहिए, लेकिन कम अनुभवी सेना नहीं; कम खर्चीली सेना चाहिए लेकिन सस्ते सैनिक नहीं; पेंशन बिल छोटा चाहिए लेकिन युद्ध क्षमता में कमी की कीमत पर नहीं. इस सबका जवाब अग्निपथ से कदम खींचना नहीं बल्कि अग्निपथ को भारतीय सैनिक के लिए सार्थक बनाना है.

लेफ्टिनेंट जनरल एच.एस. पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वे नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड में GOC-in-C रहे. रिटायरमेंट के बाद, वे आर्म्ड फोर्सेज़ ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

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