नई दिल्ली: 1986 से 1991 के बीच दिल्ली नगर निगम (MCD) द्वारा चलाए जाने वाले स्कूलों में पार्ट-टाइम पंजाबी भाषा के टीचर के तौर पर नियुक्त किए गए एक समूह ने आखिरकार अपने नियोक्ता पंजाबी अकादमी के खिलाफ कानूनी लड़ाई जीत ली है. अब उन्हें उचित वेतन मिलने की गारंटी मिल गई है.
इस हफ्ते दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि टीचर्स को दशकों तक कानूनी न्यूनतम वेतन से कम पैसे पर काम करने के लिए मजबूर करना “फोर्स्ड लेबर” की परिभाषा में आता है और यह आर्थिक और सामाजिक शोषण का गंभीर रूप है.
चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने पंजाबी अकादमी और दिल्ली सरकार के डायरेक्टोरेट ऑफ एजुकेशन की ओर से दायर की गई कई अपीलों को खारिज कर दिया. इस तरह जुलाई 2025 के हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा गया, जिसमें अकादमी को इन पार्ट-टाइम टीचर्स की सैलरी दोबारा तय करने का आदेश दिया गया था. यह सैलरी नियमित रूप से नियुक्त फुल-टाइम असिस्टेंट या प्राइमरी टीचर की सैलरी 50 प्रतिशत होनी थी.
कोर्ट ने निर्देश दिया कि आठ हफ्तों के अंदर सैलरी दोबारा तय की जाए. इसके बाद अगले चार हफ्तों के अंदर बकाया पैसा 6 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ दिया जाए.
जब इन टीचर्स को शुरुआत में 1980-90 के दशक में नियुक्त किया गया था, तब इनमें से ज्यादातर पार्ट-टाइम पंजाबी टीचर्स को हर महीने सिर्फ 500 से 600 रुपये मिलते थे.
कई बार सैलरी में बदलाव किए जाने और 2016 में कैबिनेट के उस फैसले के बाद भी, जिसमें उनकी सैलरी को कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) से जोड़ दिया गया था, 2025 में सीनियर सेकेंडरी (10+2) योग्यता वाले टीचर्स को सिर्फ 7,168 रुपये प्रति महीने मिल रहे थे. वहीं B.A. या M.A. डिग्री वाले टीचर्स को क्रमशः 8,192 रुपये और 8,885 रुपये मिल रहे थे.
इसके मुकाबले, सितंबर 2024 में दिल्ली सरकार के लेबर डिपार्टमेंट की एक नोटिफिकेशन में एक अनस्किल्ड लेबरर के लिए कानूनी न्यूनतम वेतन 18,066 रुपये प्रति महीने, सेमी-स्किल्ड लेबरर के लिए 19,929 रुपये और स्किल्ड लेबरर के लिए 21,917 रुपये तय किया गया था.
कोर्ट ने कहा कि ये टीचर्स सिर्फ पढ़ाते ही नहीं थे, बल्कि पेपर सेट करने, परीक्षा में निगरानी करने और परीक्षा की कॉपियां जांचने जैसे एडमिनिस्ट्रेटिव कामों की जिम्मेदारी भी संभालते थे. इसके बावजूद उन्हें एक अनस्किल्ड लेबरर के न्यूनतम वेतन के आधे से भी कम पैसे दिए जा रहे थे.
दिल्ली सरकार से पूरी तरह फंड मिलने वाली, उसी की निगरानी में रहने वाली और उसी के कंट्रोल में काम करने वाली पंजाबी अकादमी सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत रजिस्टर्ड एक सोसाइटी के रूप में काम करती है. इसने स्कूलों में पंजाबी भाषा को बढ़ावा देने के लिए पंजाबी लैंग्वेज टीचिंग स्कीम शुरू की थी.
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अकादमी ने 2025 के फैसले को चुनौती क्यों दी
2025 के फैसले के खिलाफ अपनी अपील में पंजाबी अकादमी ने इस बड़े वेतन अंतर को सही ठहराने की कोशिश की. इसके लिए उसने 2010 के एक महत्वपूर्ण केस दुर्रज फ़ातिमा नक़वी में दिए गए फैसले को लागू होने से रोकने की कोशिश की. उस केस में इसी तरह की एक सरकारी अकादमी के तहत काम करने वाले पार्ट-टाइम उर्दू टीचर्स को 50 प्रतिशत पे पैरिटी का नियम दिया गया था.
इन फायदों को पंजाबी टीचर्स तक पहुंचने से रोकने के लिए पंजाबी अकादमी ने दो मुख्य कानूनी दलीलें दीं.
पहली, उसने कहा कि दुर्रज फ़ातिमा नक़वी केस में उर्दू टीचर्स “ट्रेंड टीचर्स” थे और उनके पास प्रोफेशनल B.Ed या उसके बराबर की डिग्री थी. इसके उलट, अकादमी ने कहा कि पंजाबी टीचर्स “अनट्रेंड” थे, क्योंकि उनमें से कई के पास सिर्फ मैट्रिकुलेशन या 10+2 की योग्यता थी.
दूसरी, अकादमी ने कहा कि राइट ऑफ चिल्ड्रन टू फ्री एंड कंपल्सरी एजुकेशन (RTE) एक्ट की धारा 23(1) के तहत बाद में जारी की गई नोटिफिकेशंस में न्यूनतम योग्यता तय की गई थी, जो इन टीचर्स के पास नहीं थी. इसलिए कानून के हिसाब से वे बराबर के फायदे मांगने के हकदार नहीं थे.
हाई कोर्ट ने दोनों दलीलों को साफ तौर पर खारिज कर दिया और उचित वेतन देने से बचने की इन कोशिशों को “इंजेनियस बट एर्रोनियस” यानी चतुर लेकिन गलत बताया.
शैक्षणिक योग्यता वाली दलील पर कोर्ट ने साफ किया कि 2010 के दुर्रज फ़ातिमा नक़वी फैसले का टीचर्स की एजुकेशनल क्वालिफिकेशन से कोई लेना-देना नहीं था.
इसके बजाय, वह फैसला इसलिए आया था क्योंकि दशकों तक सेवा देने के बाद भी टीचर्स को सिर्फ 5,000 से 5,500 रुपये देना “कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोरने वाला” था.
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब इन पंजाबी टीचर्स को कई दशक पहले पहली बार नौकरी पर रखा गया था, तब उन्होंने विज्ञापनों में बताई गई सभी क्वालिफिकेशन पूरी की थीं. इसके अलावा, 30 साल से ज्यादा समय तक लगातार सेवा करना उनकी क्षमता और योग्यता का सबूत था.
RTE एक्ट के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि 23 अगस्त 2010 की एक नोटिफिकेशन, जो एक्ट की धारा 23(1) के तहत जारी की गई थी, उसमें साफ तौर पर उन टीचर्स को नई और ज्यादा योग्यता हासिल करने से छूट दी गई थी, जिन्हें इस नोटिफिकेशन से पहले नियुक्त किया गया था.
इसलिए अकादमी RTE एक्ट का इस्तेमाल करके उनकी सैलरी बढ़ाने से रोक नहीं सकती थी.
नियम 101 की कानूनी ताकत
कोर्ट के फैसले का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली स्कूल एजुकेशन रूल्स, 1973 के नियम 101 पर था. नियम 101(1) के तहत दिल्ली के स्कूलों को कानूनी रूप से पार्ट-टाइम टीचर्स को नियमित आधार पर नियुक्त करने की अनुमति है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नियम 101(2) साफ तौर पर कहता है कि पार्ट-टाइम टीचर की सैलरी और अलाउंस नियमित रूप से नियुक्त फुल-टाइम टीचर की सैलरी और अलाउंस का आधा यानी 50 प्रतिशत होना चाहिए.
कोर्ट ने फैसला दिया कि सरकार कानून में दिए गए नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकती. कर्मचारियों के साथ ऐसा कोई कॉन्ट्रैक्ट, जिसमें कानून में तय रकम से कम भुगतान किया जाता है, कानूनी रूप से मान्य नहीं है. कोर्ट ने कहा कि पंजाबी टीचर्स ने बिना किसी ब्रेक के लगातार काम किया था, इसलिए वे इस कानूनी गारंटी से पूरी तरह सुरक्षित थे.
बेंच ने सरकारी संस्थाओं की नैतिक जिम्मेदारियों को लेकर भी साफ शब्दों में बात की. सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने जोर दिया कि सरकार और उसके द्वारा पूरी तरह फंड किए जाने और निगरानी में चलने वाले संस्थानों को “मॉडल एम्प्लॉयर्स” की तरह निष्पक्षता, एकरूपता और तर्कसंगतता के साथ काम करना चाहिए.
चीफ जस्टिस उपाध्याय ने निष्कर्ष निकाला कि अकादमी का व्यवहार संविधान के आर्टिकल 23(1), यानी फोर्स्ड लेबर पर रोक, के साथ-साथ आर्टिकल 39, 41 और 42 में दिए गए डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स और संविधान के आर्टिकल 14 में दिए गए समानता के अधिकार का पूरी तरह उल्लंघन था.
अपीलों को खारिज करके दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ तौर पर तय कर दिया कि कानूनी रूप से मिले रोजगार के अधिकारों को मनमाने पदनाम या कॉन्ट्रैक्ट की कमियों का फायदा उठाकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इससे इन टीचर्स को आखिरकार उचित वेतन मिलने की गारंटी मिल गई.
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