मुझे पहले से पता था कि यूरोप और अमेरिका एक-दूसरे से अलग हैं, लेकिन उनके बीच का यह फर्क कितना गहरा है, इसका मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था. यह बात मुझे तब समझ आई, जब मैं ब्रिटेन (यूके) आया. भारत में रहते हुए मेरे मन में अक्सर “पश्चिम” (West) एक ही जैसी संस्कृति वाला इलाका लगता था.
हम आमतौर पर यह नहीं सोचते कि यूरोप और अमेरिका के लोगों में कितने बड़े अंतर हैं या वे राजनीति, पहचान, इतिहास और यहां तक कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी के मुद्दों पर भी कितनी बार एक-दूसरे से टकराते हैं.
यहां कुछ समय बिताने के बाद मैंने देखा कि दोनों पक्ष एक-दूसरे को लेकर कई तरह की स्टीरियोटाइप रखते हैं. यूरोप के लोग अक्सर अमेरिकियों को ज्यादा शोर-शराबा करने वाला, पैसों पर ज़रूरत से ज्यादा ध्यान देने वाला और अपने देश के बाहर की दुनिया से लगभग अनजान मानते हैं. वहीं अमेरिकी लोगों की नज़र में यूरोपीय खुद को दूसरों से बेहतर समझते हैं और हमेशा अमेरिका की आलोचना करते रहते हैं.
मुझे लगा था कि मैं ऐसे ज्यादातर विवाद देख चुकी हूं, लेकिन फिर मेरी हैरानी की कोई सीमा नहीं रही, जब मैंने एक बिल्कुल नए विवाद को जन्म लेते देखा. यह विवाद किसी राजनीति, इतिहास या पहचान का नहीं, बल्कि हीटवेव (भीषण गर्मी) का था.
महाद्वीपों के बीच तंज
इस समय यूरोप दुनिया का सबसे तेज़ी से गर्म होने वाला महाद्वीप है. यहां तापमान वैश्विक औसत से दो गुना से भी ज्यादा तेज़ी से बढ़ रहा है, लेकिन मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि इस हीटवेव पर कुछ अमेरिकी लोग खुशी जताते और यूरोप का मजाक उड़ाते नजर आए.
नोआ स्मिथ ने एक्स पर लिखा, “अरे यार, बस AC लगवा लो और अपनी दादी की जान बचा लो, यूरोप के दोस्तों!” यह कॉमेन्ट व्यंग्य से भरा था, लोगों को उकसाने वाली थी और कई अमेरिकियों की सोच को भी दिखाती थी.
वह अकेले ऐसे नहीं थे.
Stripe के CEO पैट्रिक कॉलिसन ने Claude AI द्वारा तैयार किया गया एक स्क्रीनशॉट शेयर किया. उसमें लिखा था कि एयर कंडीशनर न होने पर यूरोप में जो लंबी-लंबी बहस होती है, वह असल में इस असहज सच्चाई को स्वीकार करने का तरीका है कि गर्मियों को लेकर अमेरिका शुरू से ही सही था.
एलन मस्क ने भी उस पोस्ट को दोबारा शेयर किया और उसे “जबरदस्त” बताया. इस तरह एक हीटवेव किसी तरह यूरोप और अमेरिका के बीच लंबे समय से चली आ रही सांस्कृतिक प्रतिद्वंद्विता का नया अध्याय बन गई. यूरोप के लोग आज भी एयर कंडीशनर (AC) को ज्यादा पसंद नहीं करते. ऐसा नहीं है कि वे एसी खरीद नहीं सकते. कई मामलों में वे खुद AC लगाना ही नहीं चाहते. यूरोप में सिर्फ करीब 20 प्रतिशत घरों में एसी है, जबकि अमेरिका में लगभग 90 प्रतिशत घरों में एसी लगा हुआ है.
यहां तक कि स्कूल, अस्पताल और सरकारी दफ्तर जैसी कई सार्वजनिक इमारतों में भी अक्सर एसी नहीं होता. भारत से आने वाली मैं, मेरे लिए यह बात समझना मुश्किल था. भारत में गर्मियों के दौरान एसी और कूलर अब धीरे-धीरे ज़रूरत बन चुके हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि जब भीषण गर्मी से बचने की तकनीक मौजूद है और ज्यादातर यूरोपीय लोग उसे खरीद भी सकते हैं, तो फिर वे इतनी गर्मी क्यों सहते हैं?
यूरोप के लोग अपने ऐतिहासिक शहरों और सदियों पुरानी इमारतों पर बहुत गर्व करते हैं.
इन पुरानी इमारतों में एसी लगाना आसान नहीं होता, क्योंकि इससे उनकी मूल बनावट और पहचान बदल सकती है, लेकिन वजह सिर्फ ऐतिहासिक इमारतों को बचाना नहीं है.
एसी बहुत ज्यादा बिजली खर्च करता है और कमरे की गर्मी बाहर सड़कों पर छोड़ देता है. इससे शहरों में अर्बन हीट आइलैंड का असर बढ़ जाता है और लंबे समय में शहर पहले से भी ज्यादा गर्म हो जाते हैं. यानी यह ऐसा समाधान है, जो सिर्फ समस्या के लक्षणों को कम करता है, लेकिन असली समस्या को और बढ़ा देता है.
इसे जलवायु परिवर्तन के लिए गलत समाधान (Maladaptation) भी कहा जाता है, क्योंकि इससे हालात और बिगड़ सकते हैं.
इसके पीछे आर्थिक कारण भी हैं. यूरोप के कई देशों में बिजली की कीमत अमेरिका जैसे देशों की तुलना में काफी ज्यादा है. इसलिए एसी सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि जेब का भी सवाल है. हर कमरे को कई महीनों तक ठंडा रखने के बजाय, यूरोप के लोग पारंपरिक रूप से बेहतर इमारतों की डिजाइन, हवा आने-जाने की व्यवस्था, छाया और कुछ हफ्तों की गर्मी सहने को ही बेहतर तरीका मानते रहे हैं.
और शायद सबसे बड़ी वजह यह है कि पहले यूरोप को एसी की जरूरत ही नहीं पड़ती थी. वहां गर्मियां बहुत छोटी होती थीं. ऐसे में सिर्फ कुछ हफ्तों के मौसम के लिए हज़ारों रुपये खर्च करके एसी लगवाना लोगों को सही नहीं लगता था.
कारण और नतीजा
बेशक, सिर्फ अमेरिकी ही इस मौके का फायदा उठाकर तंज नहीं कस रहे थे. यूरोप के लोगों ने भी उन्हें उसी अंदाज में जवाब दिया. पेरिस की उप-मेयर ऑड्रे पुलवार ने जवाब देते हुए याद दिलाया कि अमेरिका दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों का दूसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है.
उन्होंने लिखा, “दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों का दूसरा सबसे बड़ा उत्सर्जन करने वाले देश के रूप में, ग्लोबल वार्मिंग और उसके उन असर के लिए आपकी बड़ी जिम्मेदारी है, जिनका सामना हम फ्रांस में कर रहे हैं. आपके शहर, जहां 90 प्रतिशत जगहों पर एयर कंडीशनर लगे हैं, इसका इससे कोई संबंध नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता.”
एक और वीडियो भी खूब वायरल हुआ.
इस बार एक फ्रांसीसी महिला ने व्यंग्य करते हुए पूछा कि क्या हर जगह एसी लगा देने से जंगलों में लगने वाली आग रुक जाएगी या फसलों का नुकसान बंद हो जाएगा? फ्रांस के लोग सिर्फ सोशल मीडिया पर जवाब नहीं दे रहे, बल्कि गर्मी से बचने के लिए अपने पुराने तरीकों पर भी भरोसा कर रहे हैं. वे तुरंत एसी चलाने के बजाय दिन में खिड़कियों के बाहर लगे शटर बंद कर देते हैं, ताकि धूप अंदर न आए. रात में वे खिड़कियां खोल देते हैं, जिससे दोनों तरफ से हवा चलती रहे और घर ठंडा हो जाए. पुरानी इमारतों की मोटी पत्थर की दीवारें भी घर के अंदर तापमान कम रखने में मदद करती हैं.
एक तरीका जिसने मेरा खास ध्यान खींचा, वह था ब्लांक डे म्यूडॉन (Blanc de Meudon) का इस्तेमाल. यह चॉक (खड़िया) से बना एक पाउडर है, जिसका इस्तेमाल पहले पेंट और सफाई के काम में किया जाता था. अब भीषण गर्मी के दौरान कुछ लोग इसे अपनी खिड़कियों पर लगा रहे हैं, ताकि धूप वापस परावर्तित हो जाए और घर के अंदर कम गर्मी पहुंचे. बताया जा रहा है कि स्कूलों और कई घरों ने भी गर्मी से बचने के लिए इस आसान और कम खर्च वाले तरीके को अपनाया है.
भारत से आने के कारण मुझे ये तरीके बिल्कुल अजनबी नहीं लगे. हम भी लंबे समय से भीषण गर्मी से बचने के लिए ऐसे ही आसान उपाय अपनाते रहे हैं. जैसे गर्म रातों में खुले में सोना, मिट्टी के घड़ों में पानी रखना, घरों को इस तरह बनाना कि हवा आसानी से आती-जाती रहे और आंगन, बरामदे और छाया का इस्तेमाल करना. यह सब तब से होता आ रहा है, जब एसी आम नहीं था.
लेकिन एसी को लेकर चली इस बहस ने मुझे एक और बात सोचने पर मजबूर किया. यूरोप के लोग एसी खरीद सकते हैं और कई बार जानबूझकर उसे नहीं लगाते, लेकिन भारत में करोड़ों लोगों के पास यह विकल्प ही नहीं है. ज्यादातर परिवारों के लिए एसी खरीदना और उसे चलाने का खर्च उठाना आज भी एक लग्जरी है, जिसे वे वहन नहीं कर सकते. शायद यही बात मुझे सबसे ज्यादा चिंता में डालती है.
जैसे-जैसे धरती और गर्म होती जाएगी, सबसे ज्यादा परेशानी उन लोगों को होगी, जिनके पास खुद को बचाने के सबसे कम साधन हैं. जलवायु परिवर्तन सिर्फ पर्यावरण का संकट नहीं है, बल्कि यह असमानता (इक्वालिटी) का भी एक बड़ा सवाल है.
आमना बेगम अंसारी एक कॉलमिस्ट, राइटर और टीवी न्यूज़ पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय अमाना एंड खालिद’ नाम का एक वीकली यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: भारत की मजबूत तैयारी: होर्मुज संकट के दौरान इसने घरेलू किचन को कैसे बचाया