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Friday, 23 January, 2026
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जनगणना 2027 में प्रवासी मज़दूर कहां गिने जाएंगे—जन्मभूमि या कर्मभूमि?

यह जनगणना अलग-अलग जाति समूहों की संख्या और उनकी आय—दोनों का नक्शा तैयार करेगी. इससे उन लोगों को आधार मिलेगा, जो एससी/एसटी आरक्षण से ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर करने की मांग करते हैं.

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जनगणना से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा है, जिस पर ध्यान देना ज़रूरी है—लोग जहां रहते और काम करते हैं और जहां वे वोट डालते हैं, उनके बीच बढ़ता फासला. अनुभव के आधार पर हम जानते हैं कि भारत अब लाखों प्रवासियों का देश बन चुका है, जो अपने गृह राज्यों से बाहर शहरों में काम करते हैं. ये शहर अब उद्यमिता के नए केंद्र बन गए हैं और दूर-दराज़ के इलाकों से लोगों को अपनी ओर खींच रहे हैं.

बेंगलुरु, हैदराबाद, नोएडा, मोहाली, गुरुग्राम और मुंबई में इमारतों को खड़ा करने वाले कंस्ट्रक्शन वर्कर्स की गिनती बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में होती है. आतिथ्य और विमानन उद्योग में पूर्वोत्तर से आने वाले कामगारों की बड़ी संख्या है.

अब तो क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का नेतृत्व भी—चाहे तमिलनाडु के द्रविड़ दल हों, मुंबई की शिवसेना, पश्चिम बंगाल की टीएमसी या पंजाब का अकाली दल—यह समझने लगा है कि अगर प्रवासी खुद को असुरक्षित, डरे हुए और अनचाहा महसूस करेंगे, तो उनकी अर्थव्यवस्थाएं ठीक से चल ही नहीं पाएंगी.

हालांकि, जनगणना लोगों की गिनती इस आधार पर करेगी कि ‘गिनती वाले दिन वे कहां मौजूद हैं’, जबकि मतदाता सूची इस बात पर आधारित होती है कि व्यक्ति का जन्म कहां हुआ और उसने पढ़ाई कहां की. यह तब तक नहीं बदलता, जब तक कोई व्यक्ति जानबूझकर अपनी जन्मभूमि (जहां जन्म हुआ) से नाम कटवाकर कर्मभूमि (जहां काम करता है) में पंजीकरण न कराए.

यह सही है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) में छह महीने के निवास की शर्त रखी गई है, लेकिन सच्चाई यह है कि बहुत से प्रवासी मज़दूर और उनके परिवार आज भी अपने मूल गांव में वोट बनाए रखते हैं. इससे उन्हें अपनी जन्मभूमि की राजनीति में आवाज़ तो मिलती है, लेकिन इसकी कीमत उन्हें अपनी कर्मभूमि में वोट के अधिकार से वंचित होकर चुकानी पड़ती है.

कई लोग वोट ही नहीं डालते, क्योंकि घर जाकर मतदान करना महंगा पड़ता है. कुछ लोग ऐसे गांवों में वोट डालते हैं, जिनकी समस्याओं से वे अब जूझते ही नहीं हैं, जबकि उन शहरों में उनकी कोई आवाज़ नहीं होती, जिनका प्रशासन उनके जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित करता है.

इससे एक तरह का असंतुलन पैदा होता है. शहरों की योजना जनगणना की आबादी के आधार पर बनती है, जिसमें प्रवासी भी शामिल होते हैं, लेकिन वे नगर निकाय चुनावों में वोट नहीं डाल पाते, क्योंकि उनका नाम कहीं और दर्ज होता है. नतीजतन शहरी शासन शहरी निवासियों के प्रति जवाबदेह नहीं रहता और ग्रामीण इलाकों को उन नागरिकों के लिए संसाधन मिलते रहते हैं, जो अब वहां रहते ही नहीं हैं.

जाति गणना: क्रीमी लेयर

‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा, जो आज व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है और विशुद्ध रूप से भारतीय है, पहली बार 1969 में सुझाई गई थी. यह सुझाव तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करुणानिधि द्वारा गठित सतवाहना आयोग ने पिछड़ी जातियों के आरक्षण के संदर्भ में दिया था.

हालांकि, तब इसे स्वीकार नहीं किया गया, लेकिन राजनीतिक लामबंदी की ज़रूरत और न्यायालयों के फैसलों के चलते क्रीमी लेयर के मुद्दे की जांच के लिए जस्टिस आरएन प्रसाद आयोग का गठन किया गया. इस आयोग ने ओबीसी के भीतर क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर रखने के लिए दो मानदंड सुझाए.

पहला मानदंड उन लोगों के बच्चों से जुड़ा था, जो राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज, ग्रुप-ए सेवाओं के अधिकारी, सशस्त्र बलों में कर्नल या उससे ऊपर के रैंक पर हों, पेशेवर सेवाओं, व्यापार, उद्योग से जुड़े हों या बड़े संपत्ति मालिक हों. दूसरा मानदंड आय या संपत्ति से जुड़ा था, जिसमें व्यक्ति की सालाना आय को आधार बनाया गया. फिलहाल इसकी सीमा सालाना 8 लाख रुपये तय है.

यह जनगणना एससी और एसटी सहित सभी जाति समूहों की संख्या और उनकी आय—दोनों का नक्शा तैयार करेगी. इससे सभी समुदायों और जातियों की आय, संपत्ति और कुल संपदा से जुड़ा बारीक डेटा मिलेगा. हालांकि, प्रधानमंत्री ने एससी/एसटी से जुड़े भाजपा सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल को भरोसा दिलाया है कि सरकार उनके लिए क्रीमी लेयर को बाहर करने पर विचार नहीं कर रही है, लेकिन एससी/एसटी समुदाय के सबसे निचले तबके से यह मांग तेज़ होती जा रही है और इसे कई वर्गों का समर्थन भी मिल रहा है.

पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई का एससी/एसटी आरक्षण के दायरे से क्रीमी लेयर को बाहर करने के समर्थन में खुलकर सामने आना, इस तर्क को और मज़बूती देता है. जनगणना के नतीजे इस पर सोच-समझकर फैसला लेने के लिए ठोस आंकड़े देंगे, लेकिन एक बात तय है—यह बहस काफी तीखी होगी.

किसी भी हाल में यह नहीं भूलना चाहिए कि आरक्षण एक अस्थायी व्यवस्था के रूप में सोचा गया था. इसका उद्देश्य यह था कि समय के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और आर्थिक समावेशन इतना हो जाए कि लंबे समय तक इसकी ज़रूरत न पड़े.

उत्तर-दक्षिण विभाजन

उत्तर-दक्षिण विभाजन वास्तव में सभी विभाजनों की ‘जननी’ है. जनगणना 2027 के आधार पर नए परिसीमन के पक्ष और विरोध में दिए जा रहे तर्क सभी राजनीतिक दलों में देखने को मिलते हैं. संसद में सीटों के बंटवारे को लेकर मौजूदा स्थिति बदलने के खिलाफ सभी दक्षिणी राज्य ज़ोरदार विरोध कर रहे हैं.

ओपन मैगज़ीन में लिखते हुए शशि थरूर ने कहा था: “यह तर्क कुछ हद तक सही है कि लोकतंत्र में हर नागरिक को समान महत्व मिलना चाहिए—चाहे वह किसी प्रगतिशील राज्य में रहता हो या ऐसे राज्य में, जहां महिलाओं को सशक्त न कर पाने के कारण जनसंख्या बेकाबू हो गई हो, लेकिन कोई भी संघीय लोकतंत्र इस धारणा के साथ नहीं चल सकता कि अच्छा विकास करने वाले राज्यों की राजनीतिक ताकत घटा दी जाए, जबकि असफल रहने वाले राज्यों को संसद में ज़्यादा सीटें देकर इनाम दिया जाए.”

यह बात चंद्रबाबू नायडू, एमके स्टालिन या एमए बेबी के बयानों से अलग नहीं है.

पीछे न रहते हुए, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जे चेलमेश्वर की राय भी सामने आई है. उनका कहना है: “जब परिसीमन होगा, तो तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों को अपनी कई सीटें खोनी पड़ेंगी, जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों को, जहां जनसंख्या नियंत्रण नहीं हुआ है, ज़्यादा सीटें मिलेंगी. ऐसे में भारत में संघवाद की क्या स्थिति रह जाएगी? भारत संघ की उस मूल कल्पना का क्या होगा?”

भावनाएं इतनी तेज़ हैं कि दो पूर्व आईएएस अधिकारी—पूर्व कैबिनेट सचिव केएम चंद्रशेखर और पूर्व आरबीआई गवर्नर डी सुब्बाराव ने भी इसी तरह के तर्क रखे हैं. चंद्रशेखर का मानना है कि “सभी दक्षिण भारतीय राज्यों की राजनीतिक पकड़ उत्तर के मुकाबले कमजोर हो जाएगी.”

सुब्बाराव ने कहा कि उत्तर-दक्षिण विभाजन के दो पहलू हैं—वित्तीय और राजनीतिक. पिछले कुछ वर्षों से कुछ दक्षिणी राज्य यह चिंता जता रहे हैं कि जनसंख्या वृद्धि के आधार पर परिसीमन होने से दक्षिण में लोकसभा सीटों की संख्या उत्तर के मुकाबले घट जाएगी और इससे दक्षिणी राज्यों के साथ “अनुचित कर राशि वितरण” बढ़ेगा, जहां कर्नाटक और तमिलनाडु को केंद्र के कर कोष में दिए गए हर एक रुपये के बदले सिर्फ 15 पैसे मिलते हैं, वहीं बिहार और झारखंड को अपने योगदान के बदले एक रुपये से भी ज़्यादा मिलता है.

उन्होंने कहा, “इसका मतलब यह होगा कि दक्षिण को दोहरी मार झेलनी पड़ेगी—एक तरफ उसकी राजनीतिक ताकत घटेगी और दूसरी तरफ उसे देश के बाकी हिस्सों को सब्सिडी देना जारी रखना पड़ेगा.” उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकारें इस मसले को आपसी सहमति से सुलझा लेंगी, क्योंकि “हमें एक मज़बूत देश बने रहना है.”

दूसरी ओर, उत्तर के सांसदों का तर्क है कि उनकी सीटों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए, ताकि उनके मतदाताओं की आवाज़ दक्षिणी राज्यों के मतदाताओं के अनुपात में हो सके. उनका कहना है कि मौजूदा परिसीमन नीति उत्तर और पूर्वी राज्यों के लोगों को कम सीटें देकर उनके प्रतिनिधित्व से वंचित करती है.

उदाहरण के तौर पर, अगर समान प्रतिनिधित्व हो, तो बिहार को मौजूदा 40 की जगह 47 लोकसभा सीटें मिलेंगी, जबकि केरल की सीटें मौजूदा 20 से घटकर 15 रह जाएंगी.

(यह भारत में जनगणना पर चार-पार्ट की सीरीज़ का तीसरा लेख है, जो NUJS कोलकाता में वार्षिक न्यायिक सम्मेलन में दिए गए की-नोट भाषण पर आधारित है.)

संजीव चोपड़ा एक पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और वैली ऑफ वर्ड्स साहित्य महोत्सव के निदेशक हैं. हाल तक वे LBSNAA के निदेशक रहे हैं और लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल (एलबीएस म्यूज़ियम) के ट्रस्टी भी हैं. वे सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज़, पीएमएमएल के सीनियर फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @ChopraSanjeev है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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