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Saturday, 13 July, 2024
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क्रिकेट के लिए हम जुनूनी या पक्षपाती सही, पर नाज़ी नहीं हैं; गुजरातियों की बदनामी नहीं करनी चाहिए

खेल के मैदान में धार्मिक नारों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, लेकिन सभी प्रतिस्पर्द्धी खेलों के साथ जुनून जुड़ा ही होता है इसलिए दर्शकों, खासकर भारत-पाकिस्तान अगर एक-दूसरे के यहां खेल रहे हों तब उनके दर्शकों से तटस्थ रहने की उम्मीद रखना तो सपने देखने जैसा ही है

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क्रिकेट वर्ल्ड कप में एक सप्ताह पहले अहमदाबाद में भारत-पाकिस्तान के बीच जो मैच हुआ उसे क्रिकेट के हलके में ‘फुस्स’ ही कहा जा सकता है, लेकिन मैच देखने के लिए इकट्ठा हुई भीड़ ऐसा नहीं मानती थी. उनके लिए या किसी एक टीम के समर्थकों के लिए मैच जितना एकतरफा हो उतना बेहतर, बशर्ते उनकी टीम जीत रही हो.

लेकिन बहस के लिए तीन मुद्दे बचे रहते हैं. अंततः, भारतीय टीम नहीं बल्कि मैच देखने वाली भीड़ ही खबर बन गई. केवल इसलिए नहीं कि कुछ लोगों ने पैवेलियन लौट रहे पाकिस्तानी विकेट कीपर-बल्लेबाज मोहम्मद रिजवान के लिए ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए. इस पर भारत की उदारवादी जमात ने नाक-भौं सिकोड़े. इसके पीछे कुछ वजह यह भी रही होगी कि वह मैच गुजरात में नरेंद्र मोदी स्टेडियम में हुआ और वहां अमित शाह भी दर्शकों के बीच मौजूद थे.

इससे यह सवाल उभरता है कि क्या खेल के मैदान में इस तरह के धार्मिक नारों की कोई जगह होनी चाहिए, खासकर ऐसे खेल में जिसे इस सब-कॉन्टिनेंट का असली मजहब कहा जाता है? क्या हम खेलों को भी सांप्रदायिक रंग नहीं दे रहे हैं?

हम इस बहस की गहराई में जाएं, इससे पहले मैं अपना मत रख दूं. नहीं, खेलों में धर्म का घालमेल कतई अच्छी बात नहीं है. राष्ट्रवाद, या अपने पसंदीदा फुटबॉल क्लब के लिए लगाव की खातिर बात किसी की जान लेने तक जा सकती है. लेकिन यह जो ‘जा सकती है’ वाली बात है वह किसी कानून में नहीं लिखी है या उसे कोई नजीर नहीं माना जा सकता. बहरहाल, इस मुद्दे पर आगे बात करेंगे.

पाकिस्तानी टीम के कोच, दक्षिण अफ्रीकी-ऑस्ट्रेलियाई मिकी आर्थर ने क्रिकेट से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया. मैच खत्म होने के बाद हुए प्रेस कन्फ्रेंस में ऑर्थर ने क्रिकेट पर पूरी नरमी और विनम्रता से अपनी बातें रखी और इस मैच में अपनी टीम के खराब प्रदर्शन के लिए एकतरफा दर्शकों को भी कुछ हद तक जिम्मेदार बतायाः यह काफी दुःखद था कि पाकिस्तानी फैन्स की गैर-हाज़िर थे, ऐसा लगा मानो यह आइसीसी का टूर्नामेंट न हो बल्कि दो पक्षों के बीच का मैच हो, मैच के दौरान ‘दिल…दिल…पाकिस्तान’ के नारे नहीं सुनाई दिए.

महत्वपूर्ण बात यह थी कि ऑर्थर ने पिच, आउटफील्ड, हवा या रोशनी आदि क्रिकेट संबंधी बातों की शिकायत नहीं की जिनकी वजह से किसी घरेलू टीम को फायदा पहुंचता है. उन्होंने पूरे माहौल के बारे में शिकायत की.

अब हम समझ सकते हैं कि पाकिस्तानी क्रिकेट टीम का कोच कितने दबाव में रहता है, खासकर ऑर्थर के पूर्ववर्ती बॉब वुल्मर की रहस्यमय मौत के बाद (वे 2007 के वर्ल्ड कप से पाकिस्तान के बाहर हो जाने के बाद जमैका के एक होटल के कमरे में मृत पाए गए थे). दुनिया में क्रिकेट के लिए शायद सबसे ज्यादा जुनून रखने वाले देश की क्रिकेट टीम की जिम्मेवारी उठाना बेहद कठिन है. लेकिन भारत में निष्पक्ष दर्शकों की उम्मीद रखना कुछ ज्यादा ही हो गया, और भारत के किसी क्रिकेट स्टेडियम में लाउडस्पीकर पर ‘दिल…दिल…पाकिस्तान’ के नारे सुनने की ख़्वाहिश रखना तो सपने देखने जैसा ही माना जाएगा.


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यह सब कहने के बाद, यह ज़रूर कहा जा सकता है कि कई समझदार पाकिस्तानियों की इस बात में दम है कि बेहतर यह होता, और टूर्नामेंट के लिए भी अच्छा यही होता कि ज्यादा नहीं तो कुछ सौ पाकिस्तानी फैन्स को मैच देखने के लिए भारत आने का वीज़ा दिया जाता. आखिर यह आइसीसी टूर्नामेंट है और इसमें भाग ले रही हर टीम का अधिकार है कि स्टेडियम में उनके अपने फैन्स भी हों.

हमें मालूम है कि भारत-पाकिस्तान के वीज़ा काफी कठिन मसले हैं और इस मामले को लेकर आपस में काफी तू-तू, मैं-मैं होती है. लेकिन मेज़बान के तौर पर भारत उदारता दिखा सकता था.

कोच ने चाहे जो बहाने दिए हों, पाकिस्तान के क्रिकेटर पक्के खिलाड़ी हैं और वे कठिन हालात में खेलना जानते हैं. लेकिन भारतीय टीम को देखिए. इस टीम ने पाकिस्तान में नहीं खेला है, लेकिन यह ऑस्ट्रेलिया में लगातार दो सीरीज़ जीत चुकी है, जहां के दर्शक भी किसी भी देश के दर्शकों की तरह पक्षपाती हैं. वैसे, अहमदाबाद में बीयर नहीं मिलती, पूरे ‘ड्राई’ गुजरात में कहीं भी आपको कानूनन तो नहीं ही मिल सकती. छह सप्ताह तक उन्हें पूरी तरह भारतीय दर्शकों के सामने खेलना है, और अगर आप सोचते हैं कि आप उनकी अनदेखी कर सकते हैं, तो मैं तो आपको सावधान रहने की ही सलाह दूंगा.

बहस का तीसरा मुद्दा ऑस्ट्रेलियाई लेखक गिडियन हेग ने दिया है. वे दुनिया में आज सबसे अच्छे और सम्मानित क्रिकेट लेखक हैं. शेन वॉर्न के जीवनीकार हैं. वे भारतीय क्रिकेट के उत्कर्ष के पुराने प्रशंसक रहे हैं. उनकी बातचीत का एक क्लिप वायरल हुआ है जिसमें वे अहमदाबाद के दर्शकों के व्यवहार को लेकर काफी सदमे में दिखे, और सच कहूं तो मुझे तो इसमें उपहास का भाव भी दिखता है.

उन्होंने कुछ बेखयाली में कहा है कि नीली कमीजों की आई बाढ़ को देखकर लगता था मानो न्यूरमबर्ग रैली हो रही हो. अब हमें मालूम हो रहा है कि मोदी-शाह की भाजपा, उनकी सरकार, और बीसीसीआई का नेतृत्व जय शाह के हाथों में होना—इन सबने क्रिकेट की दुनिया में बेशक कई लोगों को परेशान किया है, लेकिन टिकट खरीद कर मैच देखने वाले, नीली कमीज पहने फैन्स को 21वीं सदी का नाज़ी कहना कहां तक ठीक है?

जुनून सभी प्रतिस्पर्द्धी खेलों के साथ जुड़ा होता है. यह जुनून ही है जो फैन्स से मैच के टिकट, टीवी सेट, स्टार खिलाड़ियों से जुड़े साबुन-शैंपू-परफ्यूम के रूप में बेचे जाने वाले डियोडोरेंट, पान मसाला, बीमा, बैंक कर्ज खरीदवाता है.

यह सब, इस मामले में, बीसीसीआई को अमीर बनाता है और इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल (आइसीसी) तथा दुनियाभर में क्रिकेट से जुड़ी संस्थाओं की झोली भरता है. जुनून के बिना कोई खेल जिंदा नहीं रह सकता, और जुनून तो पक्षपाती ही होता है. यह किसी देश, किसी क्लब, और किसी व्यक्ति के लिए भी हो सकता है. ज़रा, नडाल और फेडरर के बीच हो रहे मैच को याद कीजिए.

क्या आप 1 लाख रुपये देकर टिकट खरीदने वाले फैन्स का आकलन सिर्फ इस आधार पर कर सकते हैं कि वे मोदी के राज्य के हैं, और उनमें ज़्यादातर उनको वोट देने वाले मतदाता हो सकते हैं? क्या आप उन्हें नीली कमीज वाले नाज़ी कह सकते हैं? ओल्ड ट्रैफर्ड में जब मैनचेस्टर यूनाइटेड टीम खेल रही हो तब स्टेडियम में लाल कमीज़ की आई बाढ़ की कल्पना कीजिए. बीयर पीकर शोर मचाती उन लाल कमीजों को क्या आप न्यूरमबर्ग रैली नाम दे सकते हैं?

1960 के दशक के बाद लंबे अंतराल के बाद 1970 के दशक के मध्य से भारत, पाकिस्तान ने फिर से एक-दूसरे के साथ खेलना शुरू किया. इन 45 वर्षों में दोनों देशों के आपसी रिश्तों में कई बार उतार-चढ़ाव आए. इसी के साथ खेल के दर्शकों का व्यवहार, दोस्ती के स्वरूप में भी उतार-चढ़ाव आता रहा.

जनवरी 1999 में पाकिस्तान ने चेन्नई में जब कांटे की एक टक्कर में टेस्ट मैच जीत लिया था तब वहां के दर्शकों ने जिस तरह रुककर उसका स्वागत किया था उसकी बहुत चर्चा की जाती है. यह वह दौर था जब भारत-पाकिस्तान के रिश्ते बेहतर थे, इसके ठीक बाद अटल बिहारी वाजपेयी बस से लाहौर जा पहुंचे थे. 2003-04 की सीरीज़ में पाकिस्तान में भारतीय टीम की जीत का गर्मजोशी से स्वागत किया गया था क्योंकि जनरल परवेज़ मुशर्रफ और वाजपेयी ने उस शांति समझौते पर दस्तखत किए थे, जो उस समय अच्छा लग रहा था.

दूसरी ओर, मुझे पाकिस्तान में हुई 1989-90 की सीरीज़ की याद आ रही है जब मैंने देखा था कि वहां के दर्शकों का व्यवहार इतना बुरा था जितना शायद ही कहीं और के दर्शकों का रहा हो. अहमदाबाद वालों को उन दर्शकों की बराबरी करने में समय लगेगा. और मैं यही उम्मीद करूंगा कि वे इसकी कोशिश नहीं करेंगे. मेरे दिमाग में आज भी उनके नारे गूंजते हैं— ‘पाकिस्तान का मतलब क्या? ला इलाहा इल अल्लाह/ हिंदुस्तान का मतलब क्या? भाड़ में जाए, हमको क्या’.

उसी दौरान लाहौर में हॉकी का वर्ल्ड कप भी चल रहा था. जिस भी मैच में भारत खेल रहा होता था, नारे और भी तीखे हो जाते थे. बराबर यह नारा लगाया जाता था— ‘हिलती हुई दीवार है, एक धक्का और दो’. 12 टीमों में भारत तब 10वें नंबर पर रहा था. तब हमने नहीं सुना कि किसी एकपक्षीय दर्शकों को दोषी ठहराया हो.

हकीकत यह है कि दर्शक भारत के खिलाफ खेलने उतरी सभी टीमों का समर्थन कर रहे थे. दो मुल्कों के रिश्ते जब खराब होते हैं तब उनके दर्शक ऐसा ही व्यवहार करते हैं. उसी दौरान कश्मीर में बगावत शुरू हुई थी, कश्मीरी पंडितों को वहां से भगाया जा रहा था, पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था, सोवियत संघ अफगानिस्तान से अपने कदम बाहर खींच रहा था, और पाकिस्तानियों को लग रहा था कि वे क्रिकेट-हॉकी के अलावा दूसरे मैदानों पर भी जीत रहे हैं.

यहां आकर मैं पहली शिकायत की ओर लौटता हूं, कि अहमदाबाद में ‘जय श्री राम’ के नारे लगाकर खेलों में धर्म का घालमेल किया गया. यहां हमें एक असुविधाजनक सवाल करने की भी जरूरत है, कि क्रिकेट खेलने वाले किस देश ने इसकी शुरुआत की, और अभी भी यह करता जा रहा है?

इस ‘सब-कॉन्टिनेंट’ पर नजर दौड़ाइए. बांग्लादेश यह नहीं कर रहा है. इस वर्ल्ड कप की सबसे लाड़ली और प्रशंसित टीम (बेशक भारत के अलावा) अफगानिस्तान ने यह नहीं किया.

अब, हिचक और तहजीबों को भुला दिया गया है, वे ब्लैक ऐंड व्हाइट वीडियो दिखाए जा रहे हैं जिनमें 1999 का चेन्नई टेस्ट जीतने वाली पाकिस्तानी टीम को ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाह-हू-अकबर’ के नारे लगाते देखा जा सकता है. दशकों से यह भी देखा जाता रहा है कि भारत के खिलाफ क्रिकेट में शतक ठोकने वाले या हॉकी मैच जीतने वाले पाकिस्तानी खिलाड़ी किस तरह मैदान पर इबादत में झुकते रहे हैं.

रिज़वान ने 2021 में दुबई में भारत के खिलाफ टी-20 मैच जीतने के बाद ऐसा किया था. तब वकार यूनिस ने कहा था कि हिंदुओं के बीच रिज़वान ने जिस तरह नमाज़ अता की उसने कितना सुकून दिया. बाद में उन्होंने माफी मांगी, उन्हें माफ किया भी गया और आज वे भारत में टीवी कमेंट्री करने वाली टीम में शामिल हैं. उन्हीं रिज़वान के सामने जब ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए गए तब आप कह सकते हैं कि दो और दो मिलकर चार ही होते हैं.

जो भी हो, भारत और पाकिस्तान आपस में जितना खेलेंगे, ऐसी धार उतनी ही तेज़ होगी. क्या पता, आगे, भारत-पाकिस्तान फिर एक-दूसरे के आमने-सामने हों, जो कि संभवतः नॉक आउट स्टेज पर ही हो पाएगा. और अगर उसका नतीजा अलग हो (हालांकि मुझे उम्मीद है ऐसा नहीं होगा), तो यह इसलिए होगा कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने दर्शकों के बावजूद बेहतर खेल का प्रदर्शन किया होगा. और आप तय मानिए, वे इबादत के लिए ज़रूर झुकेंगे. तब भी कोई न कोई खेलों में धर्म का घालमेल करने की बात कह सकता है?

(संपादनः शिव पाण्डेय)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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