भारत में हर 11वां व्यक्ति तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय को प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे सही मानता है. किसी ऐसे व्यक्ति के लिए, जिसे मुख्यमंत्री बने अभी सिर्फ चार महीने—सही-सही कहें तो 114 दिन—ही हुए हैं, इंडिया टुडे का ताज़ा मूड ऑफ द नेशन सर्वे काफी उत्साहित करने वाला हो सकता है. तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) के संस्थापक विजय 9.2 प्रतिशत लोगों की पसंद के साथ प्रधानमंत्री पद के लिए तीसरे सबसे पसंदीदा उम्मीदवार रहे. वहीं 48.7 प्रतिशत लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और 27.1 प्रतिशत लोगों ने राहुल गांधी को चुना.
विजय मुख्यमंत्री के पद पर 100 दिन पूरे करने के अंदर ही PM पद के लिए तीसरे सबसे पसंदीदा उम्मीदवार बन गए होंगे क्योंकि MOTN सर्वे 25 अगस्त से पहले किया गया था. उनके मंत्री पहले से ही इसकी भविष्यवाणी कर रहे थे. मानव संसाधन प्रबंधन मंत्री डी. सरथकुमार ने कहा, “आप AM या PM की तरफ देखे बिना काम करते हैं, तो आप निश्चित रूप से अगले PM हैं.” लोक निर्माण मंत्री आधव अर्जुन ने कहा कि अब दक्षिणी राज्य से PM बनने का समय है और इसके लिए तमिलनाडु सबसे सही राज्य है.
इन बयानों को सिर्फ चापलूसी कहकर खारिज न करें. सोशल मीडिया पर हिंदी में मौजूद वीडियो देखें. जैसा कि मेरी सहयोगी श्वेता त्रिपाठी ने चेन्नई से रिपोर्ट किया, इनमें से ज्यादातर वीडियो तथ्यों से ज्यादा इच्छाओं पर आधारित हैं—विजय बलात्कार के आरोपियों को मौत की सज़ा देने का आदेश दे रहे हैं, पुलिस आरोपियों का एनकाउंटर कर रही है, प्राइवेट अस्पतालों के बिल माफ किए जा रहे हैं और कुछ ही हफ्तों में राज्य का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात भारत के कुल निर्यात का करीब आधा हो गया है. इन हिंदी वीडियो के पीछे कौन हो सकता है? इसका जवाब अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है.
तमिलनाडु में कांग्रेस के नेता विजय को PM बनाने की मांग से खुश नहीं हैं और इसकी वजह समझी जा सकती है. खासकर तब, जब विजय कांग्रेस शासित केरल में भी कदम रखने की तैयारी कर रहे हैं. केरल के अभिनेता से नेता बने एस. देवन ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) से इस्तीफा दे दिया है और अब टीवीके में शामिल होने वाले हैं. विजय साफ तौर पर जल्दबाजी में हैं.
एक आम राजनेता
हालांकि, अब हकीकत को समझने का समय है. विजय के PM बनने की बात अभी बहुत दूर की है. पहले उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर बहुत कुछ साबित करना होगा. अभी शुरुआत ही है, लेकिन पर्दे की दुनिया के हीरो ने असली ज़िंदगी के राजनेता और प्रशासक के तौर पर अब तक बहुत कम नई सोच दिखाई है. सत्ता में आने के लिए उन्होंने अपने पूर्ववर्ती और ‘राजनीतिक दुश्मन’ एम.के. स्टालिन के पुराने साथियों—कांग्रेस, वाम दलों, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और वीसीके—का साथ लिया. अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए वह पुरानी और स्थापित पार्टियों के पारंपरिक तरीकों को अपना रहे हैं.
ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (AIADMK) के छह विधायक पहले ही इस्तीफा देकर उनकी पार्टी में शामिल हो चुके हैं. साफ मकसद यह है कि उन्हें उपचुनाव में फिर से जिताया जाए और उसके हिसाब से उन्हें इनाम दिया जाए. हालांकि, कोई यह तर्क दे सकता है कि ये कदम दिखाते हैं कि पर्दे का हीरो अब असली राजनीति सीख रहा है. क्योंकि द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) और एआईएडीएमके साथ आने का विकल्प तलाश रहे थे और राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की संभावना भी थी, ऐसे में विजय ने बहुमत जुटाकर सरकार बनाने में खुद को एक समझदार राजनेता साबित किया.
लेकिन उनके प्रशंसकों को जो बात परेशान कर सकती है, वह यह है कि सत्ता में आने के बाद वह एक आम राजनेता की तरह ही नजर आने लगे हैं. बात सिर्फ सरकारी मदद और मुफ्त की चीजों तक सीमित नहीं है. तमिलनाडु में जयललिता-करुणानिधि के दौर की बदले की राजनीति की याद दिलाते हुए उन्होंने विधानसभा में विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन को गिरफ्तार करवा दिया. आरोप था कि उन्होंने मुख्यमंत्री के अभिनेता दोस्त त्रिशा को लेकर दोहरे मतलब वाली टिप्पणी की थी. उन्होंने अपने करीबी लोगों को बड़े पद भी दिए हैं. उन्होंने अपने ज्योतिषी रिकी राधन पंडित वेत्रिवेल को विशेष कार्य अधिकारी (OSD) नियुक्त किया. जनता और उनके सहयोगियों की आलोचना के बाद उन्हें यह नियुक्ति रद्द करनी पड़ी. लेकिन जैसे-जैसे उनका आत्मविश्वास बढ़ा, उन्होंने ऐसे फैसले और बढ़ा दिए. उन्होंने अपनी फिल्म ‘जना नायकन’ के निर्माता के. वेंकट नारायण को दिल्ली में सरकार का विशेष प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया. उनकी फिल्मों की एक और निर्माता अर्चना कल्पथी को हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) विभाग का सदस्य बनाया गया.
दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल के तरीके को अपनाते हुए उनकी सरकार ने रिश्वत विरोधी हेल्पलाइन शुरू की है. इसमें लोगों से सरकारी अधिकारियों के रिश्वत लेते हुए ऑडियो और वीडियो सबूत देने को कहा गया है. यह कदम लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहा है, लेकिन विजय ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम को एक अलग स्तर तक पहुंचा दिया है और कई विभागों के टेंडर रद्द कर दिए हैं.
आंध्र प्रदेश के पूर्व सीएम जगन मोहन रेड्डी के तरीके को अपनाते हुए विजय ने पिछली सरकार की ओर से शुरू की गई कई बुनियादी ढांचा और विकास परियोजनाओं को भी रद्द कर दिया या रोक दिया है. इनमें परंदूर एयरपोर्ट, कांचीपुरम की पुनर्विकास योजना, चेन्नई की स्पोर्ट्स सिटी और कोयंबटूर का स्टेडियम समेत कई अन्य परियोजनाएं शामिल हैं.
अस्पष्ट विचारधारा
जयललिता की तरह विजय भी अपने विधायकों और यहां तक कि मंत्रियों से आसानी से नहीं मिलते. उनके तुरंत पहले मुख्यमंत्री रहे एम.के. स्टालिन ने भी प्रधानमंत्री मोदी की तरह मुख्यमंत्री रहते कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की. हालांकि, उन्होंने मीडिया को इंटरव्यू दिए थे. लेकिन विजय पूरी तरह मीडिया से दूर रहे हैं और ज्यादातर मंत्री भी ऐसा ही कर रहे हैं. इससे सरकार में फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर और ज्यादा सवाल खड़े हो रहे हैं. चेन्नई के एक तेज नजर रखने वाले राजनीतिक पर्यवेक्षक ने मुझसे कहा: “इस सरकार में फैसले कौन ले रहा है, यह किसी को नहीं पता. क्या मुख्यमंत्री फैसले ले रहे हैं? या मंत्री अपने-अपने फैसले खुद ले रहे हैं? या फिर अधिकारी? फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर बहुत ज्यादा कुछ साफ नहीं है.”
उदाहरण के लिए, सरकार के उस विवादित सर्कुलर के पीछे कौन था, जिसमें छात्रों को वाम दलों और कॉकरेच जनता पार्टी (CJP) की ओर से आयोजित प्रदर्शनों में शामिल होने से रोक दिया गया था? वाम दल सरकार में शामिल हैं. सरकार के अंदर और बाहर से विरोध होने के बाद यह सर्कुलर वापस ले लिया गया. अब CPI(M) ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव एम. साई कुमार के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की है, जबकि राजनीतिक नेता इस मुद्दे पर जवाब देने से बच रहे हैं. यह पक्का है कि यह फैसला मुख्य सचिव का नहीं हो सकता था.
तो आखिर विजय की राजनीति या प्रशासन में ऐसा क्या है, जिसकी वजह से MOTN सर्वे में हर 11वां व्यक्ति उन्हें पीएम बनते देखना चाहता है? उनकी विचारधारा साफ नहीं है. बीजेपी को अपना ‘वैचारिक दुश्मन’ बताने से विजय की विचारधारा के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं चलता. चेन्नई के दूसरे एयरपोर्ट की परियोजना को कथित तौर पर किसानों की जमीन और उनकी रोजी-रोटी बचाने के लिए रद्द करने से लेकर कृषि बजट का मसौदा लेकर एक मंत्री को तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर भेजने तक, उनकी राजनीति भी उतनी ही उलझी हुई है. वह परिसीमन पर भी साफ रुख नहीं अपनाते और हर कदम पर अपना रुख बदलते रहते हैं. उनका प्रशासन भी कोई नई सोच नहीं दिखाता.
कुल मिलाकर, उनकी राजनीति, विचारधारा और प्रशासन में न तो तालमेल है और न ही साफ दिशा. असल में, 114 दिन तक मुख्यमंत्री पद पर रहने के बाद भी सीएम विजय पर्दे की दुनिया के किसी रहस्यमय मसीहा की तरह ही नजर आते हैं. उनकी चुप्पी और लोगों से दूरी शायद इसी सोच-समझकर बनाई गई छवि का हिस्सा है. शायद यही एक वजह हो सकती है कि भारत में हर 11वां व्यक्ति उन्हें पीएम के रूप में देखना चाहता है.
डीके सिंह दिप्रिंट में पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: प्रधानमंत्री मोदी-नितिन नवीन की तस्वीर BJP नेताओं और कार्यकर्ताओं को क्यों चिंता में डाल सकती है