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Tuesday, 1 September, 2026
होमहेल्थHIV इलाज में नई उम्मीद: हफ्ते में एक बार ली जाने वाली गोली रोज की दवा जितनी असरदार

HIV इलाज में नई उम्मीद: हफ्ते में एक बार ली जाने वाली गोली रोज की दवा जितनी असरदार

हफ्ते में एक बार लेने वाली इस गोली में Merck की islatravir और Gilead की lenacapavir दवाएं हैं. मंजूरी मिलने पर यह पहली पूरी तरह वीकली मुंह से लेने वाली HIV की डोज़ बन सकती है.

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नई दिल्ली: ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस (HIV) के लिए बनाई जा रही हफ्ते में सिर्फ एक बार लेने वाली एक नई गोली को एक बड़े ग्लोबल फेज-3 ट्रायल में वायरस को दबाने में रोज दी जाने वाली आम दवाई जितना ही असरदार पाया गया है. इससे HIV के साथ रह रहे लोगों को रोज दवा लेने के बजाय कम बार दवा लेने का विकल्प मिल सकता है.

HIV का इलाज एंटीरेट्रोवायरल दवाओं के एक संयोजन से किया जाता है. ये दवाएं वायरस को बढ़ने से रोकती हैं. इससे खून में HIV की मात्रा कम हो जाती है, जिसे वायरल लोड कहा जाता है. जब वायरल लोड इतना कम हो जाता है कि जांच में उसका पता नहीं चलता, तो माना जाता है कि व्यक्ति में वायरस दब गया है.

जिस व्यक्ति का वायरल लोड जांच में नहीं आता, वह सेक्स के जरिए HIV दूसरे व्यक्ति में नहीं फैला सकता, लेकिन वायरस शरीर से पूरी तरह खत्म नहीं होता और इलाज जारी रखना ज़रूरी होता है.

Gilead Sciences की ओर से प्रायोजित फेज-3 ISLEND-2 ट्रायल में हफ्ते में एक बार लेने वाली ऐसी गोली का परीक्षण किया गया, जिसमें Merck की islatravir और Gilead की lenacapavir को मिलाया गया था. यह ट्रायल 14 देशों और क्षेत्रों के 100 केंद्रों पर 626 वयस्कों पर किया गया. दोनों कंपनियां मिलकर इस दवा के संयोजन को विकसित कर रही हैं.

इन नतीजों की जानकारी पहली बार जून में दी गई थी और जुलाई में रियो डी जेनेरियो में हुई इंटरनेशनल एड्स कॉन्फ्रेंस में इन्हें पेश किया गया था. इसके पूरे नतीजे 29 अगस्त को द लांसेट में प्रकाशित हुए.

Merck ने कहा कि मंजूरी मिलने पर यह संयोजन पहली पूरी तरह हफ्ते में एक बार मुंह से लेने वाली HIV की दवा बन सकता है.

अमेरिका की Community Resource Initiative की रिसर्च डायरेक्टर और मैसाचुसेट्स में Cambridge Health Alliance के Zinberg Clinic की मेडिकल डायरेक्टर एमी कोल्सन ने कहा, “एक ही गोली में इलाज की व्यवस्था ने HIV के साथ रह रहे लाखों लोगों के लिए इलाज की तस्वीर बदल दी है.” वह इस स्टडी में शामिल थीं.

उन्होंने कहा, “हफ्ते में एक बार दवा लेने का विकल्प मिलने से लोगों के पास अपनी ज़रूरत और पसंद के हिसाब से इलाज चुनने के ज्यादा विकल्प हो सकते हैं.”

AIDS Society of India के प्रेसिडेंट एमेरिटस डॉ. ईश्वर गिलाडा के मुताबिक, इन नतीजों को ट्रायल में शामिल मरीजों के संदर्भ में समझने की ज़रूरत है.

रियो डी जेनेरियो में जुलाई में हुई AIDS Conference में शामिल हुए गिलाडा ने कहा, “यह ट्रायल उन लोगों पर किया गया जो पहले से इलाज ले रहे थे. इसलिए यह असल में एक ‘स्विच स्टडी’ थी, जिसमें मरीजों को एक इलाज से दूसरे इलाज पर बदला गया.”

उन्होंने समझाया कि इस ट्रायल में यह देखा गया कि HIV का इलाज पहले से अच्छी तरह ले रहे लोग रोज की दवा से हफ्ते में एक बार लेने वाली दवा पर जा सकते हैं या नहीं. इसमें यह नहीं देखा गया कि यह दवा उन लोगों में काम करेगी या नहीं, जो पहली बार इलाज शुरू कर रहे हैं या जिनका मौजूदा इलाज काम नहीं कर रहा है.

Third World Network की सीनियर साइंटिफिक एंड लीगल रिसर्चर चेताली राव ने कहा कि ये नतीजे महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इससे HIV के इलाज के बढ़ते विकल्पों में एक और संभावित विकल्प जुड़ता है. लेकिन इन नतीजों को HIV के साथ रह रहे सभी लोगों पर लागू नहीं किया जाना चाहिए.

ट्रायल में क्या पता चला?

ट्रायल में शामिल 626 लोगों में से 314 लोगों ने हफ्ते में एक बार लेने वाली islatravir-lenacapavir गोली लेना शुरू किया, जबकि 312 लोग अपनी पहले से चल रही रोज की HIV दवा लेते रहे.

48 हफ्तों के बाद, हफ्ते में एक बार लेने वाली गोली लगभग सभी लोगों में HIV को उसी तरह काबू में रख रही थी, जैसे रोज की दवा रखती है. हफ्ते में एक बार गोली लेने वाले 314 लोगों में से सिर्फ एक व्यक्ति का वायरल लोड 50 copies/mL या उससे ज्यादा था. वहीं रोज की दवा लेते रहने वाले 312 लोगों में से चार लोगों का वायरल लोड इतना था.

हफ्ते में एक बार लेने वाली गोली रोज की गोली जितनी ही असरदार रही. वायरस को काबू में रखने के मामले में यह रोज की दवा से काफी कम असरदार नहीं थी.

दवा नियमित रूप से लेने की दर भी काफी ज्यादा रही. हफ्ते में एक बार वाला इलाज लेने वालों में दवा लेने की औसत दर 100 प्रतिशत रही, जबकि 98 प्रतिशत लोगों ने डॉक्टर की बताई गई कम से कम 90 प्रतिशत खुराक ली.

हालांकि, ये नतीजे मुख्य रूप से उन लोगों पर लागू होते हैं जिनका HIV का इलाज पहले से अच्छी तरह चल रहा था. सभी लोगों में HIV पहले से दबा हुआ था, वे कम से कम छह महीने से इलाज ले रहे थे और उनका पहले कभी इलाज फेल नहीं हुआ था. इसलिए इस स्टडी से पता चलता है कि जिन लोगों में HIV काबू में है, वे रोज की दवा से हफ्ते में एक बार लेने वाली गोली पर जा सकते हैं और वायरस को दबाकर रख सकते हैं.

जिन लोगों के शरीर में वायरस अभी भी जांच में दिखाई देता है, जो अक्सर अपनी दवा लेना भूल जाते हैं या जिनके शरीर में HIV की दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी है, उनके बारे में इन नतीजों से कम जानकारी मिलती है.

हफ्ते में एक बार लेने वाली यह दवा आम तौर पर लोगों को ठीक तरह से सहन हुई. हफ्ते में एक बार वाली गोली लेने वाले 18 प्रतिशत लोगों ने इलाज से जुड़े साइड इफेक्ट बताए, जबकि सामान्य इलाज लेने वालों में यह संख्या 1 प्रतिशत से भी कम थी. इनमें से ज्यादातर साइड इफेक्ट हल्के या सामान्य स्तर के थे. 5 प्रतिशत लोगों को सिरदर्द, 3 प्रतिशत को जी मिचलाना और 3 प्रतिशत लोगों को दस्त की शिकायत हुई.

हफ्ते में एक बार वाली गोली पर जाने वाले लोगों ने अपनी दवा से ज्यादा संतुष्टि भी बताई. रोज दवा लेने वाले लोगों की तुलना में उन्हें इलाज का बोझ भी कम लगा.

हफ्ते में एक बार वाली गोली का इस्तेमाल कहां हो सकता है?

आधुनिक एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी यानी ART, HIV को अपने नए कॉपी बनाने से रोकती है और वायरस की मात्रा को इतना कम कर सकती है कि वह जांच में दिखाई न दे.

भारत के सरकारी ART कार्यक्रम में ज्यादातर वयस्कों और किशोरों के लिए पहली पसंद का सामान्य इलाज TLD है. इसमें दिन में एक बार लेने वाली कई दवाओं का संयोजन होता है, जिसमें tenofovir disoproxil fumarate, lamivudine और dolutegravir शामिल हैं.

डॉ. गिलाडा ने बताया कि भारत में HIV के साथ रह रहे लोग सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों या निजी इलाज के जरिए आम तौर पर इलाज ले सकते हैं. कुछ NGO भी मुफ्त या कम कीमत पर इलाज की सुविधा देते हैं.

उन्होंने बताया कि भारत का सरकारी कार्यक्रम “टेस्ट-एंड-ट्रीट” तरीके पर चलता है. इसमें जिस व्यक्ति की HIV जांच पॉजिटिव आती है, उसका इलाज शुरू कर दिया जाता है. जिन मरीजों की स्थिति स्थिर है, उन्हें लंबे समय के लिए भी दवाएं दी जा सकती हैं. इससे उन्हें बार-बार ART केंद्र जाने की ज़रूरत कम हो जाती है.

बचाव के बारे में गिलाडा ने बताया कि प्री-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PrEP) फिलहाल भारत के सरकारी HIV कार्यक्रम का हिस्सा नहीं है और इसे ज्यादातर निजी स्वास्थ्य सेवाओं के जरिए लिया जाता है. पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PEP) HIV के संभावित संपर्क के बाद सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के जरिए उपलब्ध है.

दुनिया भर में dolutegravir पर आधारित दवाओं के संयोजन का काफी इस्तेमाल होता है. कुछ देशों में bictegravir, tenofovir alafenamide और emtricitabine जैसी दवाओं वाले इलाज भी इस्तेमाल किए जाते हैं. लंबे समय तक असर करने वाले इंजेक्शन वाले इलाज, जिनमें cabotegravir और rilpivirine शामिल हैं, उन लोगों के लिए उपलब्ध हैं जिन्हें इसके लिए सही माना जाता है और जिनमें HIV पहले से दबा हुआ है.

Lenacapavir को अमेरिका में पहले ही मंजूरी मिल चुकी है. इसका इस्तेमाल ऐसे वयस्कों में कई दवाओं के प्रति प्रतिरोधी HIV के लिए दूसरे इलाज के साथ किया जाता है, जो लंबे समय से कई तरह की HIV दवाएं ले रहे हैं और जिनका मौजूदा इलाज काम नहीं कर रहा है. शुरुआत में इसकी एक शुरुआती खुराक दी जाती है, जिसके बाद हर छह महीने में दो इंजेक्शन दिए जाते हैं.

Islatravir को फिलहाल अकेले HIV के इलाज के रूप में मंजूरी नहीं मिली है. हफ्ते में एक बार लेने वाला islatravir-lenacapavir संयोजन भी अभी जांच के दौर में है.

लेकिन गिलाडा ने कहा कि हफ्ते में एक बार वाली किसी भी दवा को भारत में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचने में कई साल लग सकते हैं.

उन्होंने कहा, “अगर हफ्ते में एक बार लेने वाला इलाज आता भी है, तो इसे सरकारी कार्यक्रम में आने में पांच साल से ज्यादा समय लग सकता है.” उन्होंने यह भी कहा कि इस इलाज की कीमत कम होनी चाहिए, इसे लागू करना आसान होना चाहिए और इसे सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में संभालना संभव होना चाहिए.

भारत में Central Drugs Standard Control Organisation (CDSCO) की एक विशेषज्ञ समिति ने HIV से बचाव के लिए बनाई जा रही जेनेरिक इंजेक्शन वाली lenacapavir दवा के लिए स्थानीय Phase III ट्रायल की जरूरत खत्म करने की सिफारिश की है. इसके लिए मंजूरी के बाद Phase IV अध्ययन किए जाने होंगे. यह मामला PrEP से जुड़ा है और प्रयोग के दौर में चल रहे हफ्ते में एक बार लेने वाले islatravir-lenacapavir इलाज से अलग है.

राव ने कहा कि हफ्ते में एक बार वाली गोली रोज लेने वाली दवा और लंबे समय तक असर करने वाले इंजेक्शन के बीच की कमी को पूरा कर सकती है. रोज की ART में लोगों को हर दिन अपनी दवा याद रखनी पड़ती है. वहीं इंजेक्शन वाले इलाज में दवा लेने की संख्या कम हो जाती है, लेकिन मरीजों को समय-समय पर इंजेक्शन लगवाने के लिए स्वास्थ्य केंद्र जाना पड़ता है.

उन्होंने कहा, “इस तरह की दवा इन दोनों के बीच आती है. लोगों को हर दिन गोली लेने का बोझ नहीं होगा, लेकिन उन्हें महीने में एक बार, महीने में दो बार या छह महीने में एक बार इंजेक्शन लगवाने के लिए क्लिनिक जाने की योजना भी नहीं बनानी पड़ेगी.”

यह संयोजन ऐसे इलाज की जगह नहीं लेगा जो पहले से काम नहीं कर रहा है. इसके बजाय, अगर इसे मंजूरी मिलती है, तो जिन कुछ लोगों में HIV पहले से दबा हुआ है, वे कम खुराक लेकर भी इसे काबू में रख सकेंगे. इससे इलाज की संख्या साल में करीब 365 खुराक से घटकर 52 खुराक रह जाएगी.

इस संयोजन की लंबे समय तक सुरक्षा और असर को भी साबित करना होगा. इसके लिए ट्रायल में शामिल लोगों की 96 हफ्तों तक निगरानी की जा रही है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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