हम उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को याद करेंगे. हां, यह न तो पूरी तरह उदार थी, न ही वास्तव में अंतरराष्ट्रीय और न ही बहुत व्यवस्थित. लेकिन इन सबके बावजूद, यह ऐसी व्यवस्था थी जिसमें दुनिया का सबसे ताकतवर देश कम से कम कुछ बुनियादी नियमों का पालन करने और उन्हें लागू करने की कोशिश करता था, भले ही यह इसलिए हो कि ये नियम अमेरिका के लिए असमान रूप से फायदेमंद थे. राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा वेनेजुएला पर किया गया मूर्खतापूर्ण हमला बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी भी तरह की व्यवस्था अब शायद पीछे छूट चुकी है. भारत सहित अपेक्षाकृत कमजोर देश ही इससे सबसे ज्यादा नुकसान उठाने वाले हैं.
उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की तमाम विफलताओं के बावजूद, इसका एक हिस्सा भारत के लिए उपयोगी था क्योंकि इसमें चीन को एशिया और इंडो-पैसिफिक पर प्रभुत्व जमाने से रोकने की कोशिश भी शामिल थी, जिसे आप ‘कंटेनमेंट’ कह सकते हैं. लेकिन अगर अमेरिका को प्रभाव क्षेत्रों की मूर्खतापूर्ण रणनीतिक सोच से चलाया जाए और वह यह मान ले कि उसके हित सिर्फ वेस्टर्न हेमिस्फीयर (पश्चिमी गोलार्ध) तक सीमित हैं और वह एक वैश्विक शक्ति नहीं है, तो एशिया में संतुलन की किसी भी कल्पना का अंत हो जाएगा. बहुत संभव है कि एशिया और इंडो-पैसिफिक को चीन के वर्चस्व के साथ जीने की आदत डालनी पड़े. भारत की ओर से “बहुध्रुवीय एशिया” की “जरूरत” पर और अधिक खोखले बयान सुनने को मिलेंगे, जिनकी सफलता बहुध्रुवीय दुनिया की मांगों जितनी ही होगी.
भारत के लिए एक और सबक यह है कि विचारधारा को विदेश नीति की ठंडी और व्यावहारिक गणनाओं के आड़े नहीं आने देना चाहिए. डॉनल्ड ट्रंप के चुनाव को लेकर भारतीय राजनीतिक राय के कुछ हिस्सों में काफी संतोष और यहां तक कि कुछ हद तक ‘शाडेनफ्रॉयडे’ भी था, क्योंकि उनकी कथित साझा वैचारिक सहानुभूतियां मानी गईं. लेकिन देशजवाद अपने भीतर नफरत और कड़वाहट लेकर आता है, चाहे वह भारत में हो, अमेरिका में हो या कहीं और.
यही उस संकीर्ण सोच और मूर्खता का घरेलू परिणाम है, जो ट्रंप विदेश नीति में दिखाते हैं. दोनों ही अमेरिका के स्वार्थों को नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन बाकी दुनिया इसके बारे में बहुत कुछ नहीं कर सकती, क्योंकि यह अमेरिकियों की अपनी पसंद है. यह देखना बाकी है कि वे इसे समझेंगे और नुकसान को पलटने की कोशिश करेंगे या नहीं. अगले तीन वर्षों में, जब सबसे जल्दी ट्रंप-वेंस प्रशासन व्हाइट हाउस छोड़ेगा, तब तक किया गया नुकसान शायद सुधार से परे हो चुका होगा.
एक फेक नैरेटिव
वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई को सही ठहराने का एक तर्क प्रभाव क्षेत्रों की धारणा से जुड़ा दिखता है. इसका मतलब यह विचार है कि बड़ी शक्तियां अपने आसपास के इलाकों को नियंत्रित करती हैं. यह बात हाल ही में जारी अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति दस्तावेज में भी दिखाई दी, जिसमें वेस्टर्न हेमिस्फीयर में अमेरिकी हितों पर जोर दिया गया है. वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई इस रुचि को और साफ दिखाती है. लेकिन इस क्षेत्र में अमेरिका का दबदबा पहले से ही बहुत मजबूत और निर्विवाद है. इसलिए इस इलाके पर इतना जोर देना न सिर्फ अनावश्यक था, बल्कि इससे अमेरिकी हित भी सीमित हो गए. यह कहना कि अमेरिका ने वेस्टर्न हेमिस्फीयर पर दोबारा नियंत्रण स्थापित कर लिया है, वैसा ही है जैसे यह दावा करना कि अमेरिकी फिर से क्रिसमस मना सकते हैं. यह ऐसा नैरेटिव है जो ट्रंप के हाथों पर लगे मेकअप जितना ही नकली है.
अमेरिका द्वारा ऐसे प्रभाव क्षेत्रों पर जोर देने का एक दूसरा पहलू यह है कि वह असल में यह मान रहा है कि दूसरे क्षेत्रों में बड़ी शक्तियों से मुकाबला करने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है. प्रभाव क्षेत्र कोई कानूनी व्यवस्था नहीं होते, बल्कि सिर्फ शक्ति की वास्तविकताओं का प्रतिबिंब होते हैं. अगर 19वीं सदी में यूरोपीय ताकतें वेस्टर्न हेमिस्फीयर से दूर रहीं, तो यह उभरते अमेरिका के मुकाबले उनकी बढ़ती कमजोरी का संकेत था. यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा दूसरी शक्तियों को दी गई यह रियायत इतनी मूर्खतापूर्ण है, क्योंकि दूसरी शक्तियों के पास अपने-अपने क्षेत्रों में वैसा प्रभुत्व नहीं है जैसा अमेरिका का वेस्टर्न हेमिस्फीयर में है. रूस तुलनात्मक रूप से कमजोर है. परमाणु हथियारों को छोड़ दें तो उसके पास खुद को एक महान शक्ति कहने का कोई बहुत मजबूत आधार नहीं है.
चीन, बेशक, अपने क्षेत्र में प्रमुख शक्ति होने का कहीं ज्यादा दावा रखता है. लेकिन अमेरिका की समृद्धि पूर्वी एशिया के साथ गहराई से जुड़ी हुई है. इसका मतलब यह है कि कोई भी तर्कसंगत अमेरिकी नीति बिना लड़े उस क्षेत्र को नहीं छोड़ेगी. लेकिन तर्कसंगत होना ऐसा विशेषण नहीं है, जिसे कोई ट्रंप प्रशासन के साथ जोड़े.
अमेरिका के सहयोगियों के सामने विकल्प
वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई और ट्रंप की समग्र ‘रणनीति’ के और भी नतीजे हैं. सबसे अहम बात यह है कि इससे आज अमेरिका के सहयोगियों और साझेदारों के सामने मौजूद विकल्पों पर सवाल खड़े होंगे, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर और ज्यादा दबाव पड़ेगा. अगर वे अब अमेरिका पर भरोसा नहीं कर सकते, तो विकल्प तलाशने की जरूरत और मजबूत होगी, हालांकि अच्छे विकल्प ज्यादा मौजूद नहीं हैं.
एक विकल्प अमेरिका के बिना क्षेत्रीय साझेदारियां बनाना है. लेकिन ये ज्यादातर अव्यावहारिक हैं. पहला सवाल क्षमता का है, और जहां क्षमता है भी, वहां राजनीतिक समस्याएं ऐसी सुरक्षा साझेदारियों के रास्ते में आ जाती हैं. यूरोप के पास क्षमता की कमी नहीं है, क्योंकि कई यूरोपीय देश क्षेत्रीय खतरे रूस से ज्यादा अमीर हैं. सामूहिक रूप से वे लगभग दस गुना ज्यादा समृद्ध हैं. लेकिन वे बंटे हुए हैं और जो सबसे अमीर हैं, वे रूस से सबसे दूर भी हैं. उनके लिए सैन्य ताकत बढ़ाने से ज्यादा आसान अपनी जुबान चलाना है. एशिया में क्षेत्रीय साझेदारियां इसलिए कामयाब होने की संभावना कम है, क्योंकि चीन पहले से ही अन्य प्रमुख शक्तियों से ज्यादा अमीर और ताकतवर है.
दूसरा जवाब परमाणु हथियार है. अमेरिका के कई साझेदार तकनीकी रूप से सक्षम हैं और उनके पास इन्हें बनाने के लिए जरूरी संसाधन भी हैं. लेकिन दो वजहें उन्हें रोक सकती हैं.
एक वजह गैर-अधिग्रहण का मानदंड है, हालांकि अगर कोई एक सहयोगी परमाणु सीमा पार करने का फैसला कर ले तो यह टूट भी सकता है. यह क्षेत्रीय प्रभुत्व जमाने वाली ताकतों के खुले सैन्य दबाव का मुकाबला करने का सबसे आसान तरीका है, हालांकि अस्तित्व से जुड़े खतरों से कम गंभीर मामलों में ये आमतौर पर बेकार होते हैं. फिर भी, कुछ न होने से तो बेहतर ही हैं.
दूसरी वजह उम्मीद है. यह उम्मीद कि ट्रंप प्रशासन के जाने के बाद अमेरिका फिर से समझदारी दिखाएगा. यह खुद दो और मान्यताओं पर टिकी है. पहली, कि अमेरिकी या तो किसी डेमोक्रेट को चुनेंगे या किसी गैर-मैगा और गैर-अलगाववादी रिपब्लिकन को. यह बिल्कुल भी तय नहीं है. भले ही हाल के कुछ उपचुनावों में डेमोक्रेट्स ने अच्छा प्रदर्शन किया हो, लेकिन पार्टी खुद गहराई से बंटी हुई है और मुख्य रूप से ट्रंप के प्रति साझा और गहरी नफरत के कारण एकजुट है. यह अनिश्चित है कि वे एकजुट होकर पारंपरिक अमेरिकी रणनीतिक मूल्यों को दोहरा पाएंगे या नहीं.
बेशक, यह भी मान लिया गया है कि अमेरिकी रणनीतिक संस्कृति में मूल रूप से ऐसे बदलाव नहीं हुए हैं, जो नुकसानदेह दिशा में ले जाएं. यह भी किसी तरह से तय नहीं है.
राजेश राजगोपालन जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU), नई दिल्ली में इंटरनेशनल पॉलिटिक्स के प्रोफेसर हैं. उनका एक्स हैंडल @RRajagopalanJNU है. ये उनके निजी विचार हैं.
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