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Sunday, 21 July, 2024
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दो पंजाब- चुनाव प्रचार की जुबान इतनी जुदा क्यों?

हमारे पंजाब में विधानसभा के लिए मतदान 20 फरवरी को है और प्रचार की मुख्य भाषा जाहिर तौर पर पंजाबी है. पंजाब के सब शिखर नेता प्रचार पंजाबी में कर रहे हैं पर सरहद के उस पार यानी पाकिस्तान में पंजाब के बड़े नेता सभाओं में उर्दू में बोलते हैं. वहां पंजाब की असेंबली में पंजाबी बोलने पर निषेध हैं. जुबान के स्तर पर सरहद के आरपार के पंजाब में इतना अंतर क्यों?

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पंजाब का धुरी शहर. चुनावी सभा हो रही है. राज्य के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी चुनावी सभा को पंजाबी में संबोधित कर रहे हैं. इसमें हैरान होने की तो कोई बात नहीं है. आम आदमी पार्टी (आप) के मुख्यमंत्री पद के दावेदार भगवंत मान भी शहरों और गांवों की सभाओं में अपनी बात पंजाबी में ही रख रहे हैं. अब सरहद पार पाकिस्तान के पंजाब में चलते हैं.

वहां पर जब इमरान खान अपने संसदीय क्षेत्र मियांवाली में चुनावी सभा में बोलते हैं तो उनकी जुबान धरती की भाषा पंजाबी ना होकर उर्दू होती है. मियांवाली पाकिस्तान के पंजाब का मशहूर शहर है. मुस्लिम लीग के नेता नवाज शरीफ या शाहबाज शरीफ लाहौर, रावलपिंडी,लायलपुर जैसे शहरों में चुनावी सभाओं में उस जुबान में नहीं बोलते जिसे वहां का अवाम अपनी मानता है. वे बोलते हैं उर्दू में.

ये क्यों होता है कि धरती की जुबान को सरहद के उस पार दोयम दर्जे की जुबान मान लिया गया है? लाहौर में पंजाबी प्रचार के अध्यक्ष तारिक जटाला इस सारी स्थिति के लिए उन लोगों को जिम्मेदार मानते हैं जो देश के बंटवारे के समय उत्तर प्रदेश या दिल्ली से यहां आए थे. वो कहते हैं कि पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की सलाह पर मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की राष्ट्र भाषा उर्दू घोषित करवा दी थी. उसके चलते पूर्वी पाकिस्तान आगे चलकर बांग्लादेश बना और पंजाब में पंजाबी अछूत हो गई.

अगली 20 फरवरी को पंजाब विधानसभा के नतीजे आने के बाद वहां पर राज्य सरकार के गठन की प्रक्रिया चालू होगी. उसके बाद विधानसभा के सदस्य और फिर नई कैबिनेट शपथ लेगी. ये सब पंजाबी में होगा.


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हमारी और उनकी पंजाब असेंबली में फर्क

उधर, पाकिस्तान के हिस्से वाली पंजाब असेंबली में पंजाबी के लिए स्पेस सिकुड़ता जा रहा है. वहां पर बहस उर्दू या इंग्लिश में ही हो सकती है. पंजाबी में बहस करना या सवाल करना निषेध है. मतलब जिस भाषा को वहां पर लोग बोलते-समझते हैं. उसमें असेंबली में बोलने की मनाही है. अपने घर में पाकिस्तान पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री उस्मान बुझदर भले ही पंजाबी में बोलते हों या पंजाबी लोकगीत सुनना भी पसंद करते हैं. लेकिन, वे पंजाब असेंबली में उर्दू से इतर किसी भाषा में नही बोलते.

आपको उनका यूट्यूब पर एक भी इंटरव्यू पंजाबी में नहीं मिलेगा जिसमें वे पंजाबी में सवालों के जवाब दे रहे हों. वो डेरा गाजी खान से आते हैं. क्या हमारे पंजाब में कोई मुख्यमंत्री पंजाबी से दूरी बनाकर सियासत कर सकता है? असंभव.

लाहौर में रहने वाले पंजाबी के कथाकार रेहान चौधरी कहते हैं, ‘इकबाल, फैज और साहिर लुधियानवी जैसे शायरों ने अपनी मातृभाषा यानी पंजाबी में क्यों नहीं लिखा? इससे साफ है कि पंजाब में पंजाबी की बेकदरी का इतिहास पुराना है. हालांकि भारत के पंजाब में तो पंजाबी को उसका वाजिब का हक मिल गया. भारत के स्कूलों में पंजाबी की पढ़ाई अनिवार्य है पर हमारे स्कूलों-कॉलेजों में इसकी पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं है. हमारे इधर अब पंजाबी को पढ़ाना तो दूर, इससे पंजाबी समाज का एक तबका पल्ला झाड़ रहा है. यह सब कुछ हो रहा है सरकार की उर्दू परस्त नीति के कारण.’


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पंजाबी से क्यों दूर जाता है पंजाब 

मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान बनने के बाद पहली बार 19 मार्च,1948 को ढाका पहुंचे. उनका वहां पर गर्मजोशी के साथ स्वागत हुआ. पूर्वी पाकिस्तान के अवाम को उम्मीद थी कि वो पूर्वी पाकिस्तान के विकास को लेकर कुछ अहम घोषणाएं करेंगे.

जिन्ना ने 21 मार्च, 1948 को ढाका के खचाखच भरे रेसकोर्स मैदान में एक सभा को संबोधित करते हुए घोषणा कर दी पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू ही रहेगी. उन्होंने अपने चिर-परिचित आदेशात्मक स्वर में कहा कि ‘ सिर्फ उर्दू ही पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा रहेगी. जो इससे अलग तरीके से सोचते हैं वे मुसलमानों के लिए बने मुल्क के शत्रु हैं.’ जिन्ना के फरमान को तब कम से कम ईस्ट पाकिस्तान( अब बांग्लादेश) ने सिरे से खारिज कर दिया था पर पंजाब ने जिन्ना के वन नेशन-वन लैग्वेज फार्मूला को आंखें बंद करके स्वीकार कर लिया.

नतीजा हुआ कि पंजाब से पंजाबी दूर होने लगी. लाहौर के दयाल सिंह कॉलेज के प्रिंसिपल भी रहे तारिक जटाला कहते हैं कि ‘हम पंजाबी के पक्ष में इसलिए लड़ रहे हैं क्योंकि हमारी पंजाबी के रूप में पहचान हमारे पाकिस्तानी और मुस्लिम पहचान से कहीं अधिक पुरानी है. हम हजारों सालों से पंजाबी हैं. पाकिस्तानी तो हम 70 सालों से हैं और मुसलमान 200 सालों से भी कम समय से. इसलिए हमें पंजाबी के हक में लड़ना है.’

वे यह भी बताते हैं कि पंजाब में मुगलों से लेकर महाराजा रंजीत सिंह के समय से ही पंजाबी को उसका हक नहीं मिला तब पंजाब की सरकारी भाषा फारसी थी. अंग्रेजों के दौर में फारसी का स्थान उर्दू ने लिया.

पंजाबी, हिन्दी और आर्य समाज

पाकिस्तान के पंजाब में पंजाबी अपना वजूद बचाने के लिए लड़ रही है. वहां पिछली 2017 में हुई जनगणना के समय पंजाब प्रांत के लोग अपनी मातृभाषा उर्दू लिखवा रहे थे. ये बोलते हैं पंजाबी और लिखवा रहे थे उर्दू जनगणना में. आप समझ सकते हैं कि ये अपनी मातृभाषा या पंजाबी में कहें तो मां बोली के साथ अन्याय कर रहे हैं. भारत के पंजाब के हिन्दुओं के एक हिस्से ने भी देश की आजादी के बाद हुए जनगणना में कुछ हिन्दूवादी संगठनों के आहवान पर अपनी मां बोली हिन्दी लिखवाई थी. मतलब पंजाबी के साथ हमने भी एक हद तक तो नाइंसाफी की है.

टाइम्स आफ इंडिया जालंधर के स्थानीय संपादक और पंजाब मामलों के जानकार आई.पी. सिंह कहते हैं कि पंजाब में आर्य समाज ने हिन्दुओं को पंजाबी से दूर करने की कोशिश की थी. इसके चलते पंजाब में विभिन्न समुदायों में दूरियां भी बढ़ीं थीं.

दरअसल भाषा के सवाल पर सरहद के आर-पार पंजाब ने इंसाफ तो नहीं किया. हां, गनीमत इतनी है कि हमारे यहां पंजाबी को लेकर स्थिति अब सही है. ये सियासत की जुबान तो निश्चित ही है. इसके अलावा, इसे  पंजाब में पढ़ना अनिवार्य है.

हिन्दी-पंजाबी के वरिष्ठ कथाकार डॉ. प्रताप सहगल कहते हैं कि पंजाब का दुर्भाग्य रहा कि वहां पर पंजाबी के साथ वहां के भूमि पुत्रों ने अन्याय किया. देश के विभाजन से पहले हिन्दू भी पंजाबी की तुलना में उर्दू और हिन्दी ही सीखते-पढ़ते थे.

इस लिहाज से सिख पंजाबी के साथ खड़े रहे। यह बात दीगर है कि देश की आजादी के पश्चात भारत में भाषाई विवाद सुलझ गए. देश ने अपनी सभी भाषाओं को उनका उचित स्थान दे दिया. पाकिस्तान में यह नहीं हुआ.

(विवेक शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार और Gandhi’s Delhi के लेखक हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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