Monday, 17 January, 2022
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पेगासस जासूसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- दायर याचिकाएं ‘ऑरवेलियन चिंता’ पैदा करती हैं

‘ऑरवेलियन’ अन्यायपूर्ण और अधिनायकवादी स्थिति, विचार या सामाजिक स्थिति को कहते हैं जो एक स्वतंत्र और खुले समाज के कल्याण के लिए विनाशकारी हो.

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नई दिल्ली: पेगासस जासूसी विवाद की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति नियुक्त करने का आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि उसकी कोशिश ‘राजनीतिक बयानबाजी’ में शामिल हुए बिना संवैधानिक आकांक्षाओं और कानून के शासन को बनाए रखना है. इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि इस मामले में दायर याचिकाएं ‘ऑरवेलियन चिंता’ पैदा करती हैं.

‘ऑरवेलियन’ उस अन्यायपूर्ण और अधिनायकवादी स्थिति, विचार या सामाजिक स्थिति को कहते हैं जो एक स्वतंत्र और खुले समाज के कल्याण के लिए विनाशकारी हो.

चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया एन वी रमन्ना, जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस हिमा कोहली की अगुवाई वाली बेंच ने अंग्रेजी उपन्यासकार ऑरवेल का हवाला देते हुए कहा, ‘आप कोई बात गुप्त रखना चाहते हैं तो आपको उसे ख़ुद से भी छिपाना चाहिए.’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कथित जासूसी विवाद की स्वतंत्र जांच कराए जाने की मांग करने वाली याचिकाएं यह ‘ऑरवेलियन चिंता’ पैदा करती हैं कि आप जो सुनते हैं, वह सुनने, आप जो देखते हैं, वह देखने और आप जो करते हैं, वह जानने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किए जाने की कथित रूप से संभावना है.

बेंच ने कहा, ‘यह अदालत राजनीतिक घेरे में नहीं आने के लिए हमेशा सचेत रही है लेकिन साथ ही वह मौलिक अधिकारों के हनन से सभी को बचाने से कभी नहीं हिचकिचाई.’

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बेंच ने आगे कहा, ‘हम सूचना क्रांति के युग में रहते हैं जहां लोगों की पूरी जिंदगी क्लाउड या एक डिजिटल फाइल में रखी है. हमें यह समझना होगा कि तकनीक लोगों के जीवनस्तर में सुधार करने के लिए उपयोगी उपकरण है लेकिन इसका इस्तेमाल किसी व्यक्ति के पवित्र निजी क्षेत्र के हनन के लिए भी किया जा सकता है.’

बेंच ने कहा, ‘सभ्य लोकतांत्रिक समाज के सदस्य निजता की सुरक्षा की जायज अपेक्षा रखते हैं. निजता (की सुरक्षा) सिर्फ़ पत्रकारों या सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए चिंता की बात नहीं है. भारत के हर नागरिक की निजता के हनन से रक्षा की जानी चाहिए. यही अपेक्षा हमें अपनी पसंद और स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने के काबिल बनाती है.’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से, निजता के अधिकार लोगों पर केंद्रित होने के बजाय ‘संपत्ति केंद्रित’ रहे हैं और यह दृष्टिकोण अमेरिका और इंग्लैंड दोनों में देखा गया था.

अदालत ने कहा, ‘1604 के सेमायने के ऐतिहासिक मामले में यह कहा गया था कि ‘हर आदमी का घर उसका महल होता है.’ इसने गैरकानूनी वारंट और तलाशी से लोगों को बचाने वाले कानून को विकसित किए जाने की शुरुआत की.’

बेंच ने चैथम के अर्ल (राजा) और ब्रितानी नेता विलियम पिट का हवाला देते हुए कहा, ‘सबसे गरीब आदमी अपनी कुटिया में क्राउन (राजा) की सभी ताकतों की अवमानना कर सकता है. उसकी कुटिया कमजोर हो सकती है. उसकी छत हिल सकती है. हवा इसे उड़ा कर ले जा सकती है. उसमें तूफान आ सकता है, बारिश का पानी आ सकता है लेकिन इंग्लैंड का राजा उसमें प्रवेश नहीं कर सकता. उसकी पूरी ताकत भी बर्बाद हो चुके मकान की दहलीज को पार करने की हिम्मत नहीं कर सकती.’

कोर्ट ने 1890 में अमेरिका के दिवंगत अटॉर्नी सैमुअल वारेन और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के दिवंगत सदस्य लुई ब्रैंडिस के  ‘निजता का अधिकार’ लेख का जिक्र करते हुए कहा, ‘हाल के आविष्कार और व्यावसायिक तरीके उस अगले कदम पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता पर बल देते हैं जो व्यक्ति की सुरक्षा के लिए और जैसा कि (अमेरिका के) जस्टिस कूली ने कहा था कि व्यक्ति के ‘अकेले रहने’ के अधिकार की रक्षा के लिए उठाया जाना चाहिए.’

अदालत ने कहा कि अमेरिका के संविधान में चौथे संशोधन और इंग्लैंड में गोपनीयता संबंधी अधिकारों के ‘संपत्ति केंद्रित’ मूल के विपरीत भारत में निजता के अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन के अधिकार’ के दायरे में आते हैं.

बेंच ने कहा, ‘जब इस अदालत ने अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन’ के अर्थ की व्याख्या की तो उसने इसे रूढ़ीवादी तरीके से प्रतिबंधित नहीं किया. भारत में जीवन के अधिकार को एक विस्तारित अर्थ दिया गया है. वह स्वीकार करता है कि ‘जीवन’ का अर्थ पशुओं की की तरह जीने से नहीं है बल्कि एक निश्चित गुणवत्तापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने से है.’


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