अब यकीन करना मुश्किल है, लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप कभी बीजेपी के फेवरेट थे. इससे बहुत पहले कि उन्होंने अपना पहला कार्यकाल जीता, बीजेपी के नेता उनके जन्मदिन पर पार्टियां मनाते थे. बीजेपी की ऑनलाइन टीम सोशल मीडिया पर उनकी तारीफ करती और हिलरी क्लिंटन को गालियाँ देती थी. हिलरी, जो विदेश मंत्री के रूप में पाकिस्तान को आतंकवादियों को बढ़ावा देने से रोकने की चेतावनी दे चुकी थीं, को वे भारत विरोधी और मुस्लिम चरमपंथियों के अधीन मानते थे.
जब आप देखते हैं कि अब हालात कैसे हो गए हैं, ग्लोबल इकोनॉमी बुरी तरह बिखरी हुई है, हजारों निर्दोष लोग मर चुके हैं, और भारत अपने विकास दर को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है क्योंकि ट्रंप की अनावश्यक युद्ध नीति के कारण, तो यकीन करना मुश्किल है कि ये लोग कभी इतने भोले थे कि ट्रंप के फैनबॉय बन गए. लेकिन हाँ, वे बन गए थे.
और जब ट्रंप फिर से चुनाव में खड़े हुए, तो ये लोग फिर सक्रिय हो गए. उन्होंने MAGA राइट के पागल fringe की भाषा अपनाई और ‘लिबटार्ड्स’ के खिलाफ बोलने लगे, जबकि उन लोगों के साथ हाथ मिला लिया जो वास्तव में उनका, उनकी संस्कृति और उनके रंग के प्रति तिरस्कार रखते थे.
कोई समझदार भारतीय—राजनीतिक नेता तो और भी—क्यों MAGA चरमपंथियों जैसे लोगों के साथ अंधाधुंध पहचान बनाएंगे. वे ट्रंप जैसे आदमी की क्यों पूजा करेंगे. इसका कारण था. जैसे ट्रंप ने अमेरिका को फिर से महान बनाने की बात कही, ये लोग उन्हें इसलिए पसंद करते थे क्योंकि उन्होंने फिर से भेदभाव को सम्मानजनक बना दिया.
भेदभाव की भाईचारा
2015 में जब ट्रंप ने अमेरिका में मुसलमानों के प्रवेश पर बैन लगाने की बात कही, तभी से फैनबॉय उन्हें पसंद करने लगे. यह आदमी मुसलमानों पर हमला करने से नहीं डरता था. वह उनके पूर्वाग्रहों को साझा करता है. वे उसे पसंद करने लगे.
फिर, ऐसा भी लगा कि ट्रंप की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भी अच्छी जम रही है. जहां तक संघ के निष्ठावान समर्थकों की बात थी, तो यह उनके लिए ‘सोने पर सुहागा’ जैसा था. न सिर्फ़ एक कट्टरपंथी, बल्कि हमारे नेता का दोस्त भी! इससे बेहतर और क्या हो सकता था?
आने वाले वर्षों में, सरकारी समर्थक टीवी चैनल ऐसे दिखाते रहे कि ट्रंप और मोदी ने दुनिया को मिलकर चलाने का निर्णय लिया है. टीवी एंकर यह कहते हुए शर्मिंदगी महसूस कर रहे होंगे कि पूरी दुनिया कांपती थी क्योंकि ट्रंप ने मोदी के लिए दरवाजा खोला, या कि अन्य देश इस जोड़ी की शक्ति के सामने डरते थे.
मुझे यकीन नहीं कि मोदी ने खुद इस संबंध की इस तरह की व्याख्या पर भरोसा किया. वह इसके लिए बहुत चालाक हैं. निश्चित रूप से, विदेश मंत्रालय भी इस बकवास से खुद को दूर रखता रहा. लेकिन सरकार के लिए यह ठीक था कि यह बकवास टीवी और सोशल मीडिया पर दिखती रहे. इसलिए किसी ने भी उन कल्पनाओं को रोकने की कोशिश नहीं की जो यह दिखाते कि अब दुनिया भारत के इर्द-गिर्द घूमती है.
दरअसल, उन दिनों हिंदू दक्षिणपंथी तबका जिस-जिस बात पर यकीन करता था, वह हर एक चीज़ अब गलत साबित हो चुकी है. MAGA लोग हिंदुओं से प्यार नहीं करते. वे नियमित रूप से हिंदू धर्म और देवताओं का मजाक उड़ाते हैं. वे भारतीयों को अपने जैसे नहीं मानते. अमेरिकी सोशल मीडिया पर हिंदू विरोध की लहर भयावह और डरावनी है.
और ट्रंप खुद भारत के प्रति कोई स्नेह नहीं रखते. वह हमारी अर्थव्यवस्था को मृत कहते हैं. हमारे खिलाफ अधिक टैरिफ लगाते हैं, यहां तक कि हमारे दुश्मनों की तुलना में. जब हम पाकिस्तान के आतंकवाद प्रायोजन के खिलाफ कार्रवाई करते हैं, तो ट्रंप पाकिस्तान का पक्ष लेते हैं.
जहां तक पहले कार्यकाल की मुस्लिम विरोधी बयानबाजी की बात है, ट्रंप ने उसे कम कर दिया है. उन्होंने देखा कि दुनिया के कई मुसलमान बहुत अमीर हैं, इसलिए उनका परिवार उनके साथ डील कर रहा है.
भेदभाव करने वालों की यही विशेषता है. वे केवल तब तक अन्य भेदभाव करने वालों को पसंद आते हैं जब उनका भेदभाव किसी और पर हो. लेकिन कोई भी हमेशा भेदभाव से सुरक्षित नहीं रहता. देर-सबेर, यह आपके पास आता है. और तभी आप जानते हैं कि कैसा लगता है.
दोस्त नहीं
वर्तमान में, हमारी गहराई से विभाजित दुनिया में केवल एक बात पर सब सहमत हैं कि ट्रंप एक खतरा हैं. भारत में, सोशल मीडिया पर वही लोग जो कभी उनकी तारीफ़ों के पुल बांधा करते थे, अब उनके कट्टर विरोधी हैं. वही टीवी एंकर जिन्होंने कभी उनकी लीडरशिप पर हैरानी जताई और भारत के प्रति उनके प्यार के बारे में भावुक होकर बात की, अब नियमित रूप से उन पर हमला करते हैं.
मुझे बहुत हैरानी होगी अगर अमेरिका ने ईरान पर फिर से हमले शुरू कर दिए. ट्रंप को एक तरीका चाहिए था जिससे वह एक अपॉपुलर युद्ध से बाहर निकल सके जिसे वह जीत नहीं सकता था, और युद्धविराम उसी के लिए रास्ता देगा. लेकिन ग्लोबल इकोनॉमी (और दुनिया भर की समझदारी) को पहले ही नुकसान पहुंंच चुका है. दुनिया को इससे उबरने में समय लगेगा, और हम में से अधिकांश अगले कुछ महीनों में ट्रंप की कार्रवाइयों के कारण थोड़े गरीब होंगे.
मैं लंबी अवधि में भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर कई अन्य टिप्पणीकारों की तरह चिंतित नहीं हूं. द्विपक्षीय संबंध अधिक लाभ पर निर्भर करते हैं, न कि इस पर कि कौन सा नेता दूसरे के लिए दरवाजा खोलता है. और भारत-अमेरिका संबंधों में स्वाभाविक लॉजिक है.
बहुत से लोग जो कह रहे हैं—“भारत को ग्लोबल साउथ को एकजुट करना चाहिए था”, “हमें ईरान के लिए आवाज उठानी चाहिए थी”, आदि—हमने परिस्थितियों में सबसे समझदारी का काम किया: हमने चुप रहना ही चुना. ट्रंप के अभी तीन साल बाकी हैं, और हमें इस अवधि में सावधानी से अपने रास्ते को नेविगेट करना होगा.
लेकिन ईरान युद्ध की त्रासदी और वास्तव में पूरे ट्रंप अध्यक्षीय काल से हम सभी के लिए सबक है. कूटनीति को व्यक्तिगत मत बनाओ. लंबी अवधि में गले मिलना बहुत मायने नहीं रखता. किसी अस्थिर नेता पर भारत का दोस्त होने के लिए कभी भरोसा मत करो.
और अपना भेदभाव घर पर ही छोड़ो. जितना अधिक तुम लोगों से प्यार उनके पूर्वाग्रहों के कारण करते हो, उतना ही मूर्ख दिखाई दोगे जब भेदभाव करने वाले तुम्हारे खिलाफ हो जाएंगे.
वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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