यह कहना मुश्किल है कि सोवियत रूस के पहले प्रमुख ब्लादिमीर लेनिन ने वास्तव में यह कहा था या नहीं: “विपक्ष को नियंत्रित करने का सबसे अच्छा तरीका है कि हम खुद उसका नेतृत्व करें.” लेकिन यह कथन, जिसे अक्सर उनके नाम से जोड़ा जाता है, आज पश्चिम बंगाल की राजनीति की स्थिति को संक्षेप में बताता है.
3 जून को, टीएमसी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष का नेता (LoP) नियुक्त किया गया. उन्हें 80 में से 58 तृणमूल कांग्रेस विधायकों का समर्थन मिला. वहीं पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी लगभग दिशाहीन दिखाई दीं. ऐसे में पश्चिम बंगाल एक ऐसे राज्य की ओर बढ़ता दिख रहा है जहां विपक्ष लगभग खत्म हो गया हो. यह ऐसी स्थिति है जिसमें राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी सरकार और विपक्ष दोनों पर नियंत्रण रखती है, जैसा कि शायद लेनिन ने कभी सुझाया होगा.
विडंबना यह है कि यही ऋतब्रत बनर्जी थे जिन्होंने कभी कहा था कि उन्होंने जन राजनीति को लेकर लेनिन के मशहूर सिद्धांत को ममता बनर्जी को जनता के बीच काम करते हुए देखकर समझा था.
सबसे बड़ा राजनीतिक झटका
ऋतब्रत ने ममता बनर्जी के साथ जो किया है, उसे बयान करने के लिए शायद उससे बेहतर शब्द नहीं हो सकता जो अंग्रेज़ी साहित्यकार विलियम शेक्सपियर ने अपने मित्र ब्रूटस द्वारा जूलियस सीजर के विश्वासघात का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल किया था—“सबसे क्रूर वार”. आखिरकार, ममता बनर्जी ही थीं जिन्होंने उनके राजनीतिक करियर को दोबारा खड़ा करने में मदद की थी.
सिर्फ 35 साल की उम्र में, पढ़े-लिखे और प्रभावशाली ऋतब्रत बनर्जी सीपीआई(एम) से राज्यसभा सांसद बने थे. उन्हें पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य और सीपीआई(एम) के पूर्व महासचिव सीताराम येचुरी दोनों का करीबी माना जाता था. वह वामपंथ का सबसे चमकदार युवा चेहरा थे.
लेकिन सितंबर 2017 में सीपीआई(एम) ने उन्हें कथित “पार्टी विरोधी गतिविधियों, नैतिक पतन और अपनी ज्ञात आय से अधिक आलीशान जीवनशैली” के आरोपों में पार्टी से निकाल दिया. यह उनके संकटों की सिर्फ शुरुआत थी.
नवंबर 2017 में पश्चिम बंगाल पुलिस की एक टीम उन्हें गिरफ्तार करने के लिए दिल्ली पहुंची, जब एक महिला ने उन पर यौन शोषण का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई. ऋतब्रत ने आरोपों से इनकार किया और कहा कि पुलिस की कार्रवाई राजनीतिक रूप से प्रेरित है. उन्होंने महिला पर जबरन पैसे मांगने का आरोप लगाते हुए पलट शिकायत भी दर्ज कराई.
इसके कुछ समय बाद ऋतब्रत टीएमसी के करीब आने लगे और 2020 में राज्यसभा कार्यकाल खत्म होने के बाद औपचारिक रूप से ममता बनर्जी के साथ जुड़ गए.
सीपीआई(एम) से निकाले जाने और यौन शोषण के मामले का सामना करने के बावजूद, टीएमसी ने न केवल उन्हें राजनीतिक शरण दी बल्कि 2024 में राज्यसभा की सीट और बाद में विधानसभा चुनाव का टिकट भी दिया.
दूसरी ओर, ऋतब्रत ने सार्वजनिक रूप से ममता बनर्जी की राजनीति की तुलना लेनिन की जन आंदोलन की समझ से की थी.
पूर्व कम्युनिस्ट नेता का तर्क था कि आम लोगों के साथ ममता बनर्जी का जुड़ाव असली राजनीति का उदाहरण है. उन्होंने यह भी कहा था कि उनकी जनकल्याणकारी नीतियां गरीब समर्थक राजनीति की वास्तविक भावना को दर्शाती हैं.
पीटीआई की रिपोर्ट में कहा गया है, “तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि यही नेता एक दिन उसी राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व करेगा जिसने उसे दोबारा स्थापित किया था.”
3 जून को, ममता बनर्जी की खुली चुनौती देते हुए, जो विपक्ष के नेता पद के लिए टीएमसी के वरिष्ठ नेता सोवनदेब चट्टोपाध्याय का समर्थन कर रही थीं—58 बागी विधायकों ने एक पत्र सौंपा. इसमें ममता बनर्जी को पार्टी प्रमुख, रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता और शेउली साहा, जावेद खान, संदीपन साहा तथा सबीना यास्मीन को सदन में उपनेता बनाने की मांग की गई.
ऋतब्रत ने पत्रकारों से कहा, “हम विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. हम 60 विधायकों का समूह हैं. हम ममता बनर्जी से अनुरोध करेंगे कि वह हमारी सलाहकार बनें और हमारा मार्गदर्शन करें. हम रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे.”
उन्होंने स्पष्ट किया कि 3 जून को सार्वजनिक रूप से उनके साथ 58 विधायक ही दिखाई दिए थे, लेकिन दो अन्य विधायकों ने भी उन्हें समर्थन देने का भरोसा दिया था.
हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया को अंजाम ऋतब्रत बनर्जी ने दिया, जिन्होंने ममता बनर्जी के खिलाफ जाकर पश्चिम बंगाल में विपक्ष का चेहरा बनने का फैसला किया, लेकिन कोलकाता की राजनीतिक गलियारों में उस “अदृश्य हाथ” की भी चर्चा हो रही है जिसने संभवतः इस पूरे घटनाक्रम को तैयार किया.
छिपा हुआ हाथ
लेखक और शिक्षाविद सरोजेश मुखर्जी के लिए इस “छिपे हुए हाथ” की पहचान को लेकर ज्यादा अटकलें लगाने की ज़रूरत नहीं है. इसके पीछे उनके दो कारण हैं.
सरोजेश ने दिप्रिंट से कहा, “यह इतनी बारीकी से किया गया कदम है कि इसके पीछे किसकी योजना है, इस पर ज्यादा संदेह नहीं हो सकता और किसी अपराध पर आधारित कहानी की तरह यहां भी बस यह सोचना है कि इसका फायदा किसे हो रहा है?”
उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्र के जनक एडम स्मिथ ने ‘छिपे हुए हाथ’ की बात की थी, जो बाज़ार में संसाधनों का कुशल बंटवारा करता है. कुछ ऐसा ही हाल में टीएमसी विधायक दल के भीतर संसाधनों के बंटवारे में भी होता दिखाई देता है.
आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने सीधे भाजपा पर आरोप लगाया है. टीएमसी में टूट के बाद पत्रकारों से बात करते हुए सिंह ने कहा, “भाजपा जिस तरह काम करती है, उसमें पार्टियों को तोड़ना, ईडी, सीबीआई और जांच एजेंसियों के जरिए दबाव बनाना शामिल है. यह देश में एक खेल बन चुका है. उन्होंने शिवसेना को तोड़ा, एनसीपी को तोड़ा, अरुणाचल और उत्तराखंड में कांग्रेस को तोड़ा, गोवा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में कांग्रेस को तोड़ा. उन्होंने हमारी आम आदमी पार्टी को भी तोड़ दिया.”
वरिष्ठ पत्रकार और सार्वजनिक नीति विश्लेषक प्रतिम रंजन बोस ने दिप्रिंट से कहा कि टीएमसी में हुई टूट से भाजपा को निश्चित रूप से फायदा मिला है, लेकिन यह महाराष्ट्र मॉडल जैसा नहीं है, जहां शिवसेना टूटी थी.
बोस ने कहा, “यहां जो अलग और अभूतपूर्व बात है, वह यह है कि विपक्ष विपक्ष में बने रहने के लिए ही टूट गया है. शिवसेना टूटी थी और उसका एक धड़ा सरकार में शामिल हो गया था.”
बोस का कहना है कि इस टूट ने “टीएमसी ब्रांड की मालिक” ममता बनर्जी को पूरी तरह किनारे कर दिया है.
उन्होंने कहा, “भाजपा को फायदा होगा क्योंकि नई तृणमूल कांग्रेस में ऐसे बड़े नेता नहीं हैं जो भाजपा सरकार के खिलाफ मजबूत लड़ाई लड़ सकें. इस टूट ने ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी दोनों को अप्रासंगिक बना दिया है और उन्हें ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है जहां वे धीरे-धीरे राजनीतिक रूप से कमजोर होते जाएंगे.”
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया है कि पार्टी को पश्चिम बंगाल में किसी समर्थन की ज़रूरत नहीं है और उसकी प्राथमिकता सांसद हासिल करना है. अगर टीएमसी बिखरी रहती है, तो उसके सांसद अलग समूह बना सकते हैं और परिसीमन विधेयक के संशोधित मसौदे तथा ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ विधेयक जैसे महत्वपूर्ण कानूनों को पारित कराने के लिए भाजपा को जरूरी संख्या जुटाने में उनका समर्थन मिल सकता है.
लेकिन मामला सिर्फ संसद तक सीमित नहीं है. पश्चिम बंगाल में नई भाजपा सरकार ने तेजी से काम शुरू किया है और कई ऐसे फैसले लिए हैं जिन पर काफी बहस हो रही है. ऐसे में उसे ऐसे विपक्ष का फायदा मिलेगा, जिस पर वह नियंत्रण रख सके.
कल्पना की जा सकती है कि ममता बनर्जी अवैध सड़क किनारे की दुकानों पर बुलडोजर चलाने, बड़े परिवहन केंद्रों के पास फुटपाथ खाली कराने, सड़कों पर सार्वजनिक नमाज पर रोक लगाने और सार्वजनिक स्थानों पर पशु वध पर प्रतिबंध जैसे कदमों का विरोध कर सकती थीं. लेकिन रितब्रत बनर्जी?
लेनिन को उद्धृत करने के शौकीन इस पूर्व कम्युनिस्ट नेता ने शायद ऐसा कदम उठा दिया है, जिससे भाजपा को सरकार और विपक्ष दोनों पर नियंत्रण मिल गया है.
दीप हल्दर एक लेखक हैं और दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. वे @deepscribble पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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