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Saturday, 18 July, 2026
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सोनम वांगचुक का अनशन आज के भारत में नैतिक विरोध की सीमाएं उजागर करता है

सोनम वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति के बावजूद, किसी भी सरकारी अधिकारी ने उनसे संपर्क नहीं किया. यह चुप्पी एक सवाल उठाती है: क्या नैतिक विरोध में अभी भी सत्ता में बैठे लोगों को शामिल होने के लिए मजबूर करने की शक्ति है?

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20 दिन. नौ किलो से ज्यादा वजन कम.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर बने एक अस्थायी मंच पर पतले गद्दे पर लेटे एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक, 40 डिग्री की गर्मी और उमस के बीच चल रहे दो पेडेस्टल पंखों के सहारे हर आने वाले का हाथ जोड़कर स्वागत कर रहे थे. वह साफ तौर पर काफी कमजोर दिख रहे हैं और बोलने में भी उन्हें दिक्कत हो रही थी. फिर भी उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी.

वह कहते हैं, “मैं बहुत अच्छी हालत में नहीं हूं, लेकिन इतनी भी बुरी हालत में नहीं हूं. मैं मर नहीं रहा हूं.”

एक वीडियो संदेश में वह कहते हैं, “मेरे शरीर की मांसपेशियां खत्म हो रही हैं, लेकिन मेरा दिल अभी भी काम कर रहा है. मुझसे अनशन खत्म करने की अपील मत कीजिए. इसके बजाय 20 जुलाई को संसद मार्च में मेरे साथ शामिल होइए.”

अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के 21वें दिन भी वांगचुक अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं. वह NEET पेपर लीक विवाद को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और भारत की परीक्षा व्यवस्था में बड़े सुधार की मांग कर रहे हैं. उनकी रोज मेडिकल जांच होती है और वह नमक मिले पानी की कुछ घूंट पीकर ही जिंदा हैं.

लेकिन उनकी लगातार बिगड़ती हालत के बावजूद सरकार की तरफ से अब तक कोई भी उनसे बातचीत करने नहीं पहुंचा है.

यही चुप्पी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है. क्या नैतिक आधार पर किया गया विरोध प्रदर्शन आज भी सत्ता में बैठे लोगों को बातचीत के लिए मजबूर कर सकता है? इसका जवाब फिलहाल ‘नहीं’ दिखाई देता है.

एक समय था जब गांधीवादी तरीके से किए गए अनशन सरकारों को बातचीत के लिए मजबूर कर देते थे, क्योंकि जनता का भारी दबाव बन जाता था. 2011 में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन इसका सबसे हालिया उदाहरण है. लेकिन आज हालात बदल चुके हैं. लोगों का ध्यान बहुत जल्दी दूसरी तरफ चला जाता है और सोशल मीडिया पर होने वाला शोर अक्सर जमीन पर बड़े आंदोलन में नहीं बदल पाता.

वांगचुक का आंदोलन भी इसी बदलाव को दिखाता है.

यह आंदोलन काफी हद तक वर्चुअल दुनिया में ही चला है. उन्हें समर्थन मिला, लोगों ने अनशन खत्म करने की अपील की और नेताओं ने भी समर्थन दिया, लेकिन यह सब ज्यादातर X और इंस्टाग्राम तक ही सीमित रहा. डिजिटल एक्टिविज्म और जमीन पर लोगों की भागीदारी के बीच बड़ा फर्क दिखाई देता है.

साथ ही सरकारें भी अब ऐसे प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शनों से पहले की तुलना में कम प्रभावित होती हैं.

हालांकि भूख हड़ताल आज भी एक मजबूत नैतिक संदेश देती है और किसी मुद्दे की तरफ पूरे देश का ध्यान खींच सकती है, जैसा कि वांगचुक के मामले में हुआ है. लेकिन आज के माहौल में सिर्फ प्रतीकात्मक विरोध किसी सरकार को कार्रवाई के लिए मजबूर करने के लिए शायद काफी नहीं है. आज से दस साल पहले के मुकाबले अब भूख हड़ताल सरकारों को बातचीत के लिए मजबूर करने की संभावना बहुत कम रखती है.

यही वजह है कि सोनम वांगचुक दिप्रिंट के न्यूज़मेकर ऑफ दि वीक हैं.

‘अनशन उनके लिए नया नहीं’

वांगचुक के लिए अनशन और आंदोलन कोई नई बात नहीं है. यह उनके खून में है.

उनके पिता सोनम नामग्याल, जो कांग्रेस नेता और जम्मू-कश्मीर की तत्कालीन सरकार में मंत्री थे, ने 1980 के दशक में लद्दाख के लोगों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल की थी. ऐसी ही एक हड़ताल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद उनके पास पहुंची थीं और उन्हें जूस का गिलास देकर उनका अनशन तुड़वाया था.

अपने पिता के रास्ते पर चलते हुए वांगचुक भी पर्यावरण संरक्षण और लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर कई बार भूख हड़ताल कर चुके हैं. उनका सबसे हालिया अनशन सितंबर 2025 में हुआ था, जो राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत उनकी गिरफ्तारी के साथ खत्म हुआ. इसके बाद वह छह महीने से ज्यादा समय तक हिरासत में रहे.

सिर्फ 2023 से अब तक वांगचुक कम से कम पांच बड़े भूख हड़ताल कर चुके हैं. इनमें जनवरी 2023 का पांच दिन का क्लाइमेट फास्ट, मार्च 2024 का 21 दिन का अनशन, अक्टूबर 2024 में ‘दिल्ली चलो’ मार्च के बाद 16 दिन का अनशन और सितंबर 2025 का एक और भूख हड़ताल शामिल है. इन सभी का केंद्र लद्दाख से जुड़े मुद्दे रहे.

हाल के वर्षों में वांगचुक लद्दाख से जुड़े मामलों पर सरकार के सबसे मुखर आलोचकों में से एक बनकर उभरे हैं.

उन्होंने चांगथांग में प्रस्तावित 13 गीगावाट जलविद्युत परियोजना और बड़े पैमाने पर सोलर प्रोजेक्ट्स जैसी बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का विरोध किया है. उनका कहना है कि इससे हिमालय के इस नाजुक पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा.

वह लगातार लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा देने, बिना नियंत्रण वाले औद्योगीकरण और खनन पर सख्त रोक लगाने और ज्यादा टिकाऊ पर्यटन मॉडल अपनाने की मांग करते रहे हैं.

छठी अनुसूची आदिवासी समुदायों को शासन में एक स्तर तक स्वायत्तता देती है, जिससे वे अपने मामलों और संसाधनों का खुद प्रबंधन कर सकते हैं. अनुमान है कि लद्दाख की 90 प्रतिशत से ज्यादा आबादी आदिवासी है.

2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जब लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, तब लोगों को बेहतर प्रशासन, संसद में प्रतिनिधित्व और सरकारी फंड व संसाधनों तक बेहतर पहुंच की उम्मीद थी. लेकिन जब केंद्र सरकार ने बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया, तो स्वायत्तता, रोजगार और जमीन व संस्कृति की सुरक्षा की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. बाद में यह बड़ा आंदोलन बन गया, जिसमें वांगचुक की भूख हड़ताल के समर्थन में 20,000 से ज्यादा लोग शामिल हुए.

लद्दाख के उलेयटोकपो गांव में जन्मे वांगचुक ने दिल्ली के विशेष केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने 1987 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NIT), श्रीनगर से पढ़ाई पूरी की. फिर वह लद्दाख लौटे और अपने भाई सोनम दोरजे तथा समान सोच वाले साथियों के साथ 1988 में स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) की सह-स्थापना की. यह संस्था 10वीं की परीक्षा में फेल हुए छात्रों को ब्रिज कोर्स, जीवन कौशल और काउंसलिंग देती है.

अपने काम के लिए उन्हें कई सम्मान मिले हैं. इनमें जम्मू-कश्मीर में शिक्षा सुधार के लिए गवर्नर मेडल और समाज के लिए उनके नवाचारों और योगदान के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार शामिल हैं.

‘सरकार के आलोचक’

सरकार के साथ वांगचुक का रिश्ता बातचीत और टकराव के बीच लगातार बदलता रहा है.

कई बार केंद्र सरकार ने उनसे बातचीत शुरू की, जिसके बाद उन्होंने अपने आंदोलन रोक दिए. लेकिन जब बातचीत आगे नहीं बढ़ी, तो वह फिर सड़क पर उतर आए या अनशन पर बैठ गए.

पिछले साल भी यही हुआ. सितंबर में लेह में प्रदर्शन के दौरान भीड़ को भड़काने के आरोप में उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत गिरफ्तार किया गया.

कुछ महीनों बाद सरकार ने NSA हटा लिया और उनकी रिहाई का आदेश दिया. सरकार ने कहा कि यह फैसला लेह में कानून-व्यवस्था की स्थिति और लद्दाख में “शांति, स्थिरता और आपसी भरोसा” बनाए रखने के लिए लिया गया है. गृह मंत्रालय ने यह भी कहा कि इसका मकसद क्षेत्र के सभी पक्षों के साथ सकारात्मक बातचीत का रास्ता खोलना है.

रिहा होने के बाद वांगचुक ने इस फैसले का स्वागत किया और उम्मीद जताई कि सार्थक बातचीत फिर शुरू होगी. इसके बाद कुछ सकारात्मक प्रगति भी हुई.

लेकिन आज वांगचुक एक बार फिर सरकार के साथ टकराव की स्थिति में हैं. हालांकि इस बार मुद्दा पूरी तरह अलग है. लेकिन पहले की तरह इस बार अब तक बातचीत की कोई पहल दिखाई नहीं दी है.

यह साफ है कि वांगचुक की ताकत चुनावी राजनीति से नहीं, बल्कि नैतिक अधिकार से आती है. यह अधिकार उन्होंने लद्दाख में शिक्षा, नवाचार और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में दशकों के काम से हासिल किया है.

उनके तरीकों पर किसी की भी अलग राय हो सकती है, लेकिन उन्होंने जो मुद्दा उठाया है, वह वास्तविक है और करोड़ों लोगों को प्रभावित करता है. यह इतना महत्वपूर्ण है कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह बातचीत करे और जनता की जायज चिंताओं पर अपना पक्ष साफ करे. रचनात्मक बातचीत करना न तो हार मानना है और न ही कमजोरी की निशानी. ऐसे सार्वजनिक मुद्दों पर चुप्पी नहीं, संवाद होना चाहिए.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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