नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ आंदोलन के मुख्य रणनीतिकार शरजील इमाम ने द क्विंट को एक इंटरव्यू दिया है, जिसमें उन्होंने अपने इस्लामवादी घोषणापत्र के बारे में विस्तार से बात की है.
हैरानी की बात है कि उनके ऐसे बयानों पर कोई बड़ा विवाद नहीं हुआ है, जो खुले तौर पर उदारवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ हैं. एक शब्द में कहें तो ये बयान राष्ट्र-विरोधी हैं.
वह खुले तौर पर संविधान को फासीवादी कहते हैं, धर्मनिरपेक्षता को जाल बताते हैं और लोकतंत्र को मुसलमानों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने का एक तरीका बताते हैं. वह उदारवाद को बहुसंख्यकों का दबदबा कायम करने की चाल बताते हैं. वह उदारवादियों के सबसे बड़े आदर्श जवाहरलाल नेहरू पर भी झूठ बोलने और नैरेटिव गढ़ने का आरोप लगाते हैं. उनका आरोप है कि नेहरू ने अपनी किताब द डिस्कवरी ऑफ इंडिया में भारत को एक प्राचीन, लगातार बनी रही और एकजुट भारतीय सभ्यता के रूप में पेश किया.
शरजील इमाम लंबे समय से महात्मा गांधी को 20वीं सदी का सबसे बड़ा फासीवादी बताते रहे हैं, क्योंकि गांधी ने ‘राम राज्य’ शब्द का इस्तेमाल किया था. वह भारत के राष्ट्र को भी एक फासीवादी परियोजना मानते हैं.
यह लेख उनके खुले तौर पर दिए गए ऐसे बयानों में पहला नहीं है. इसमें उदारवादी वर्ग के दर्शन, सोच और राजनीति के खिलाफ आरोपों की लंबी सूची है. वह उदारवादियों और हिंदुत्ववादियों के बीच किसी भी तरह का अंतर मानने से साफ इनकार करते हैं. उनके मुताबिक, दोनों सिर्फ हिंदू हैं. उनकी सोच में सभी हिंदू एक जैसे हैं, क्योंकि वे इस बात पर एकमत हैं कि मुसलमानों को वह राजनीतिक ताकत नहीं मिलनी चाहिए, जिसे वे इस ज़मीन पर अल्लाह की इच्छा लागू करने का अपना ईश्वरीय अधिकार मानते हैं.
उनकी सोच में उदारवादियों का ‘धर्मनिरपेक्ष ढांचा’ असल में ‘उस बड़े राष्ट्रवादी ढांचे की ही एक शाखा है, जिसका हिस्सा हिंदुत्व का ढांचा भी है.’ लेकिन जिस बात से उन्हें सबसे ज्यादा गुस्सा आता है, वह है उदारवादियों की यह सोच कि मुसलमान सबसे पहले और सबसे बढ़कर भारतीय हैं. वह इस पर आपत्ति जताते हुए कहते हैं, “धर्मनिरपेक्ष ढांचा हमें पहले से ही ‘भारतीय’ मानता है. शिक्षा और राजनीतिक विकास का अंतिम नतीजा यह होता है कि हम महसूस करने लगते हैं कि हम सिर्फ ‘भारतीय’ हैं और बाकी सब कुछ हमारे लिए दूसरे दर्जे का है.”
अनजाने में ही सही, शरजील ने एक ऐसी बात को पहचान लिया है, जिसे मानने से उदारवादी बचते रहे हैं. वह यह कि हिंदुत्व की भारत की कल्पना भी उसी ‘बड़े राष्ट्रवादी ढांचे’ पर टिकी है और इस सोच में मुसलमानों की पहचान सबसे पहले भारतीयों की है.
उदारवादियों की जिस तरह आलोचना की गई है और लेखक जिस तरह उनके और दक्षिणपंथियों के बीच कोई अंतर मानने से इनकार करता है, उसे देखते हुए ऐसी बात पर तीखी नाराजगी की उम्मीद की जा सकती थी. आखिर, अपने सम्मान को लेकर सतर्क रहने वाले किसी उदारवादी के लिए इससे बड़ी बेइज्जती क्या होगी कि उसे हिंदुत्व के साथ खड़ा कर दिया जाए.
इसीलिए, उदारवाद के बड़े नेताओं की ओर से इस आरोप का कड़ा जवाब तलाशने के लिए इंटरनेट खंगाला जाता है, लेकिन वहां सिर्फ गहरी चुप्पी मिलती है. यह चुप्पी इस्लामवादी एजेंडे का सामना करने में उनकी पूरी तरह असमर्थता को उजागर करती है.
वामपंथी-उदारवादियों का एकतरफा प्यार
पश्चिमी अकादमिक जगत में वामपंथी-उदारवादी, ग्लोबल इस्लाम का सामना करने के बजाय ‘ग्लोबल हिंदुत्व को खत्म करने’ में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं. इसकी वजह साफ है. वैश्विक हिंदुत्व एक काल्पनिक खतरा है, जो पश्चिमी सभ्यता के लिए कोई चुनौती नहीं है. इसके उलट, ग्लोबल इस्लाम पश्चिम में अपनी आबादी बढ़ाकर अपनी जगह बना चुका है और पश्चिमी सभ्यता को खत्म करने के अपने इरादे भी खुले तौर पर जाहिर करता है. वामपंथी-उदारवादियों को उम्मीद है कि वे पूंजीवादी व्यवस्था और नव-उदारवादी विचारधारा को खत्म करने के लिए इस्लाम की कच्ची ताकत का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसमें उत्तर-आधुनिकतावाद के गूढ़ विचारों को भी जोड़ दीजिए. यह एक ऐसा विचार है, जो किसी ठोस दर्शन के बजाय इंसान को फिर से गुफाओं में रहने जैसे आदिम जीवन की ओर लौटने की बात करता है. इसके साथ 1970 के दशक से सऊदी अरब की वहाबी सरकार की आर्थिक मदद से चल रहे ‘ज्ञान के इस्लामीकरण’ के कैंपेन को मिला दीजिए, तो वामपंथियों और इस्लामवादियों के गठबंधन के लिए वैचारिक औजार तैयार हो जाते हैं.
ऐसे छद्म दर्शन से पहले ही कमजोर हो चुके भारतीय वामपंथी-उदारवादी, जो अपनी राजनीति में टिके रहने के लिए मुस्लिम वोट बैंक पर निर्भर हैं, राष्ट्रवादी राजनीति को बर्दाश्त करने के बजाय इस्लामवादियों के दबदबे का खतरा उठाना ज्यादा पसंद करेंगे.
इस्लामवादियों के लिए वामपंथी-उदारवादियों का प्यार हमेशा एकतरफा रहा है. इस्लामवादी अपनी विचारधारा की बुनियाद से ही उनसे नफरत करते हैं, जहां भी इस्लामवादियों की सत्ता आती है, वे वामपंथी-उदारवादियों को पूरी तरह कुचल देते हैं. मुस्लिम सोशल मीडिया पर एक सरसरी नज़र डालना ही यह समझने के लिए काफी है कि वामपंथी-उदारवादियों के प्रति कितनी नफरत है. 2020 में अपने उस भाषण में, जो अब काफी मशहूर हो चुका है, शरजील इमाम ने कहा था, “यह गैर-मुसलमानों से कहने का समय है कि अगर आप हमारे समर्थक हैं, तो हमारी शर्तों पर हमारे साथ खड़े हों. अगर आप हमारी शर्तों पर हमारे साथ नहीं खड़े हो सकते, तो आप हमारे समर्थक नहीं हैं.”
शरजील इमाम ने कोई नई बात नहीं कही है. उन्होंने बस इस्लामवादियों की उस आम सोच को शब्द दिए हैं, जो पढ़े-लिखे मुसलमानों के एक बड़े वर्ग में फैली हुई है. असल में, वह मुस्लिम विचार रखने वाले उन कई लोगों की लंबी सूची में सबसे नया नाम हैं, जिनमें इकबाल और जिन्ना से भी पहले के विचारकों से लेकर सैयद शहाबुद्दीन और असदुद्दीन ओवैसी तक शामिल हैं.
उनके विचारों पर विस्तार से बात करने से पहले, उनके हालिया बयानों को इस्लामवादियों और वामपंथी-उदारवादियों के बीच की अंदरूनी खींचतान के संदर्भ में समझना ज़रूरी है. दोनों ही विचारधाराएं भारत के एक राष्ट्र होने, उसकी सभ्यता के प्राचीन होने और राजनीति से ऊपर उसकी व्यापक एकता को नकारने के लिए एक-दूसरे से होड़ करती हैं. उनकी बातचीत और लेखन में भारत का नाम इतना बदल गया है कि उसकी जगह ‘दक्षिण एशिया’ का इस्तेमाल होने लगा है. यह औपनिवेशिक दौर के उस भूगोल से भी एक कदम आगे है, जिसमें भारत को उसके सही नाम से पुकारने के बजाय बिना किसी नाम और पहचान वाले सिर्फ एक भूभाग यानी उपमहाद्वीप के रूप में बताया जाता था. भारत के राष्ट्र होने की पहचान को नकारने के लिए अंग्रेजों का कहना था, “भारत महज एक भौगोलिक नाम है.”
अपने बेबाक बयानों की वजह से शरजील इमाम धीरे-धीरे वामपंथी-उदारवादियों के लिए शर्मिंदगी का कारण बन गए हैं. वे न तो खुले तौर पर उनकी आलोचना कर सकते हैं और न ही पूरी तरह उनका समर्थन कर सकते हैं. शरजील इमाम शिकायत करते हुए कहते हैं, “ऐसा क्यों? क्योंकि मैं एक अच्छे मुसलमान की उनकी छवि में फिट नहीं बैठता. मैं उनके लिए जरूरत से ज्यादा मुसलमान हूं.”
खुद को इकबाल और जिन्ना का उत्तराधिकारी मानने वाले शरजील इस बात से दुखी हैं कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ मीडिया ने उन्हें ‘इतिहास से मिटा दिया’ है. अमेरिका में रहने वाले पाकिस्तानी विद्वान शेराली तरीन उन्हें सिर्फ एक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि राजनीतिक विचारक मानते हैं. उन्होंने अपनी किताब पेरिलस इंटिमेसीज: डिबेटिंग हिंदू मुस्लिम फ्रेंडशिप आफ्टर एम्पायर उन्हें समर्पित की है और किताब का आखिरी अध्याय भी उन्हीं पर लिखा है. इसलिए, शरजील इमाम के हालिया विचारों को वामपंथी-उदारवादियों की ओर से उन्हें नज़रअंदाज़ कर इतिहास से मिटाने की कोशिश के जवाब में उठाए गए कदम के रूप में देखा जाना चाहिए.
इस्लाम या फिर रास्ते से हट जाओ?
इमाम अपने घोषणापत्र की शुरुआत अपने इस्लामवादी एजेंडे के सैद्धांतिक आधार से करते हैं. दूसरे मुस्लिम बुद्धिजीवियों के उलट, वह अपने विचारों को अकादमिक दुनिया में सम्मान पाने लायक बनाने के लिए उन पर धर्मनिरपेक्षता का दिखावा करने की जरूरत भी नहीं समझते.
हालांकि, वह इसे स्वीकार नहीं करते, लेकिन उनके विचारों का ढांचा इस्लाम और मार्क्सवाद को मिलाकर बना है. इसे उन्होंने अली शरीअती से लिया है. शरीअती ईरान के बुद्धिजीवी थे और उन्हें इस्लामी क्रांति का वोल्तेयर माना जाता है. क्रांति ने ही उनकी याद को मिटा दिया. यही वह डर है, जो उन सभी मुसलमानों को सताता है, जिनके विचारों में जरा-सा भी उदारवाद दिखाई देता है.
अपनी किताब ऑन द सोशियोलॉजी ऑफ इस्लाम में शरीअती ने मार्क्सवाद के विचारों को इस्लाम के पवित्र इतिहास पर लागू किया. इनमें इतिहास की एक तय दिशा, द्वंद्वात्मकता, ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग संघर्ष, क्रांति, सर्वहारा वर्ग की तानाशाही और वर्ग-विहीन समाज की आदर्श कल्पना शामिल हैं. उन्होंने आदम के बेटों के बीच शुरुआती वैचारिक संघर्ष से लेकर एक आदर्श समाज तक की पूरी कहानी को एक तय दिशा में आगे बढ़ते हुए बताया. आदम के दो बेटे थे- खेती करने वाले कैन और पशुपालन करने वाले एबल. शरीअती के मुताबिक, इस संघर्ष का अंत ईश्वर की इच्छा से तय ‘आदर्श समाज: उम्मा’ में होता है. यह इस्लाम में वर्ग-विहीन समाज के बराबर है.
इमाम की सोच में मार्क्सवाद के वर्ग संघर्ष को इस्लामी रूप देकर ‘शिर्क’ यानी बहुदेववाद से मुक्ति और आज़ादी की लड़ाई बना दिया गया है. वह शिर्क को ‘मानव इतिहास में शोषण का सबसे बड़ा स्रोत’ बताते हैं. वहीं, राष्ट्रवाद को भी बहुदेववाद की ही एक शाखा मानते हैं.
जिस तरह मार्क्सवाद खुद को इंसानों की मुक्ति का सिद्धांत बताता है, उसी तरह इमाम तौहीद यानी इस्लाम में एक ईश्वर को मानने की धारणा को ही ‘आज़ादी, न्याय, समानता और न्यायपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था का एकमात्र स्रोत’ मानते हैं. इसी उद्देश्य से वह ‘दुनिया के मजदूरों, एक हो जाओ!’ के नारे की तर्ज पर कुरान के आदेश का हवाला देते हुए ‘किताब वालों’ और एक ईश्वर को मानने वाले समुदायों के साथ गठबंधन करने की वकालत करते हैं.
हालांकि, इस तर्क में एक बड़ी खामी है. इस्लाम की पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इस्लाम के अलावा हर धर्म शिर्क है. इसमें ईसाई और यहूदी धर्म भी शामिल हैं, जबकि इन्हें अहल अल-किताब कहा जाता है. इस्लाम में ईसाई धर्म की त्रिमूर्ति की धारणा को बहुदेववाद माना जाता है. इसी तरह यहूदियों की भी निंदा की जाती है और उन पर आरोप लगाया जाता है कि वे एज्रा को ईश्वर का बेटा मानते हैं (सूरह 9, आयत 30).
किसी भी स्थिति में, हिंदुओं को सबसे कट्टर बहुदेववादी माना जाता है. इमाम के सिद्धांत के मुताबिक, हिंदू धर्म को शिर्क मानने के कारण उसे ‘मानव इतिहास में शोषण का सबसे बड़ा स्रोत’ माना जाएगा.
भारत में पाकिस्तान बनाने का सपना
शिर्क और तौहीद के बीच के जिस सिद्धांत को द्वंद्वात्मक इस्लामवाद कहा जा सकता है, उसे पेश करने के बाद शरजील इमाम मुस्लिम राष्ट्रवाद की अवधारणा की ओर बढ़ते हैं. भारत के एक राष्ट्र होने से इनकार करने और नेहरू समेत उदारवादियों की इस बात के लिए आलोचना करने के बाद कि उन्होंने ‘प्राचीन भारतीय राष्ट्र के अस्तित्व का मिथक’ बनाया, वह दक्षिण एशिया में एक मुस्लिम राष्ट्र की बात करते हैं. ऐसा करते हुए वह जानबूझकर भारत नाम का इस्तेमाल करने से बचते हैं.
उनका दावा है कि “दक्षिण एशिया के मुसलमान यहां अल्पसंख्यक होने के बावजूद दुनिया के कुल मुसलमानों का लगभग एक-तिहाई थे. इस तरह वे सबसे बड़ा मुस्लिम राष्ट्र थे और इसलिए उनकी स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए संविधान में विशेष व्यवस्था की जरूरत थी…” वह इकबाल का हवाला देते हैं, जिनकी राय में भारतीय मुसलमान ही एकमात्र ऐसा समूह थे, जिसे ‘आधुनिक अर्थों में राष्ट्र’ कहा जा सकता था.
इकबाल ने अपनी कविता ‘वतनियत’ में क्षेत्र के आधार पर बने राष्ट्रवाद का विरोध किया था. उन्होंने इसकी तुलना बहुदेववाद की दुनिया में एक नई मूर्ति से की थी, लेकिन उनके गद्य लेखों और नेहरू के साथ उनके संवाद से पता चलता है कि वह राष्ट्रवाद के ही खिलाफ नहीं थे. उनका विरोध सिर्फ भारतीय राष्ट्रवाद से था, क्योंकि इससे हिंदुओं के अपने देश पर शासन करने का रास्ता खुलता था. अगर मुसलमान शासक बन सकते, तो उन्हें राष्ट्रवाद से कोई परेशानी नहीं थी और वह ‘सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा’ भी गा सकते थे.
712 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम के सिंध पर हमले के बाद से कई सदियों तक भारत के अलग-अलग हिस्सों में मुसलमान शासक रहे. इससे उनके मन में भारत पर शासन करने का अधिकार होने की भावना पैदा हुई. इसी वजह से उनके विचार रखने वाले नेता इस बात को लेकर उलझन में रहे कि वे एक राष्ट्र हैं या अल्पसंख्यक.
एक राष्ट्र को अपना राज्य चाहिए, जबकि अल्पसंख्यक समुदाय को संविधान से सुरक्षा की गारंटी चाहिए. सिद्धांत और व्यवहार, दोनों में कोई एक समूह एक ही समय में दोनों नहीं हो सकता, लेकिन मुस्लिम नेताओं ने ऐसी राजनीतिक चतुराई दिखाई कि वे एक साथ दोनों बने रहने में कामयाब रहे. उन्होंने अपने लिए एक देश बनवाया और साथ ही अल्पसंख्यक के तौर पर विशेष सुविधाएं भी हासिल कीं. यह एक ही समय में दोनों फायदे उठाने का क्लासिक उदाहरण है.
भारत के विभाजन के इतिहास का ज़िक्र करते हुए इमाम पूरे आत्मविश्वास से तर्क देते हैं, “दो राष्ट्रों का मतलब कभी दो भौगोलिक राष्ट्र नहीं था…बल्कि दक्षिण एशिया में फैले दो धार्मिक राष्ट्र थे, जिनके लिए संविधान में एक खास और सावधानी से बनाई गई व्यवस्था की जरूरत थी.”
इस तरह की बात का मतलब है कि भारत में आज भी दो राष्ट्र मौजूद हैं. हालांकि, यही तर्क पाकिस्तान और बांग्लादेश पर कभी लागू नहीं किया जाता. और अगर बंटे हुए भारत में दो राष्ट्र हैं, तो दो राज्य भी होने चाहिए.
भले ही वह इसे स्वीकार न करते हों, लेकिन भारत के भीतर ही एक अलग राज्य होने का विचार, दुनिया के प्रमुख इस्लामवादी विचारकों में शामिल और जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी ने अपनी किताब मुसलमान और मौजूदा सियासी कशमकश (1938) में पेश किया था. यह मॉडल ‘एक राज्य के भीतर दो राष्ट्र’ की कल्पना से भी आगे जाता है, क्योंकि इसमें एक ही देश के भीतर दो राज्यों की मांग की जाती है. पाकिस्तान बनने से यह इच्छा कम नहीं हुई, बल्कि और बढ़ गई.
यह साफ है कि इमाम की ‘ऐसी विशेष संवैधानिक व्यवस्था की मांग, जिससे उनकी स्वायत्तता सुनिश्चित हो और वे बिना किसी दखल के अपनी सांस्कृतिक, शैक्षिक, धार्मिक और राजनीतिक संस्थाओं का स्वतंत्र रूप से विकास कर सकें’ पूरी तरह बेतुकी है. यह साफ तौर पर न तो अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात है और न ही मुस्लिम नागरिकों की समानता की. इसके बजाय, यह मुस्लिम समुदाय को बराबरी का दर्जा देने की मांग है, जिसमें वह खुद को एक राष्ट्र का दर्जा दिलाना चाहता है. यानी भारत की सीमाओं के भीतर ही एक पाकिस्तान.
ज्ञान प्रकाश अपनी किताब इमरजेंसी क्रॉनिकल्स में बताते हैं कि मुस्लिम समुदाय अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर अपना तर्क और विचार विकसित करने में सफल नहीं रहा. इतिहासकार मोहम्मद सज्जाद एक अहम सवाल उठाते हैं कि क्या मुस्लिम नेतृत्व की मांगें कभी वास्तव में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के बारे में थीं भी? उनका तर्क है कि मुस्लिम नेतृत्व हमेशा खुद को एक अलग राष्ट्र के रूप में मान्यता दिलाने की मांग करता रहा. वह व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि अगर बात अल्पसंख्यकों के अधिकारों की थी, तो क्या पाकिस्तान ने अपने अल्पसंख्यकों को वही अधिकार नहीं देने चाहिए थे, जो भारत में मुसलमानों को मिले?
विभाजन का अधूरा काम
भारत का विभाजन उन सभी लोगों को आज भी परेशान करता है, जो देश के अतीत और वर्तमान में दिलचस्पी रखते हैं. इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं कि इमाम बार-बार विभाजन के मुद्दे पर लौटते हैं, लेकिन ऐसा वह उससे सबक लेने के लिए नहीं, बल्कि उसके अधूरे एजेंडे को पूरा करने के लिए करते हैं.
विभाजन को लेकर आम तौर पर यह माना जाता रहा है कि मुसलमानों की प्रतिनिधि पार्टी मुस्लिम लीग ने विभाजन की मांग की थी और कांग्रेस ने इसे स्वीकार कर लिया था.
1980 के दशक में मुसलमानों के बीच फिर से अपनी राजनीतिक ताकत जताने की भावना का असर विभाजन के इतिहास को नए नज़रिए से लिखने में भी दिखा. इसका सबसे अच्छा उदाहरण आयशा जलाल की किताब द सोल स्पोक्समैन और एचएम सीरवाई की किताब पार्टिशन ऑफ इंडिया: लीजेंड एंड रियलिटी हैं. आयशा जलाल ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने मुस्लिम लीग पर विभाजन थोप दिया था. उनके मुताबिक, मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग का इस्तेमाल केवल एक सौदेबाजी के तरीके के रूप में कर रही थी, ताकि एकजुट भारत में मुसलमानों के लिए बेहतर शर्तें हासिल की जा सकें.
इतिहास को इस नजरिए से लिखने की शुरुआत मौलाना आजाद की किताब इंडिया विंस फ्रीडम और राम मनोहर लोहिया की किताब गिल्टी मेन ऑफ इंडियाज पार्टिशन से मानी जा सकती है. इन किताबों ने विभाजन की राजनीति में मुसलमानों को किसी भी वास्तविक गलती के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया था.
एक जीवित सभ्यता के टुकड़े किए जाने और इसके साथ हुई हिंसा को लेकर मुस्लिम समुदाय के मन में अपराधबोध बना हुआ था. आयशा जलाल और सीरवाई जैसे लेखकों ने इतिहास को नए नजरिए से लिखकर इस अपराधबोध से मुक्ति दिलाई. इससे मुस्लिम समुदाय को अपनी पुरानी राजनीति को नए विश्वास के साथ आगे बढ़ाने का मौका मिला.
शरजील इमाम विभाजन के मामले में मुस्लिम लीग को निर्दोष बताते हैं और इसके बजाय कांग्रेस की ‘ब्राह्मणवादी ताकतों’ को दोष देते हैं. उनके मुताबिक, अगर मुस्लिम लीग का सत्ता के विकेंद्रीकरण का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया होता, तो भारत का विभाजन नहीं होता.
हालांकि, वह ऐसे किसी प्रस्ताव का उदाहरण नहीं देते, जिसका मकसद सत्ता का विकेंद्रीकरण करना था. मुस्लिम लीग हमेशा से उन प्रांतों में मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात से ज्यादा राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की मांग करती रही थी, जहां वे अल्पसंख्यक थे. खासकर उत्तर प्रदेश में. इसके अलावा, वह उन प्रांतों की विधानसभाओं में मुस्लिम बहुमत की गारंटी चाहती थी, जहां मुसलमानों की आबादी हिंदुओं से थोड़ी ही ज्यादा थी. बहस हमेशा सत्ता के केंद्रों में मुसलमानों को उनकी आबादी से ज्यादा हिस्सा देने को लेकर थी, न कि सत्ता के विकेंद्रीकरण को लेकर. अगर बात विकेंद्रीकरण की होती, तो पाकिस्तान संघीय व्यवस्था और सत्ता के विकेंद्रीकरण का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया होता.
इमाम कैबिनेट मिशन योजना को एकजुट भारत के प्रति वफादारी की परीक्षा के रूप में पेश करते हैं. उनके मुताबिक, मुस्लिम लीग इस परीक्षा में पास हो गई, जबकि कांग्रेस असफल रही. इतिहास को इस नजरिए से देखने का यह विचार मौलाना आजाद ने दिया था. उन्होंने अपनी किताब इंडिया विंस फ्रीडम में भारत के विभाजन के लिए कांग्रेस की ओर से कैबिनेट मिशन योजना को खारिज किए जाने को जिम्मेदार ठहराया था, लेकिन सवाल उठता है कि अगर यह योजना इतनी अच्छी थी, तो पाकिस्तान ने इसे लागू क्यों नहीं किया? आखिर, योजना में जिन ग्रुप बी और सी का प्रस्ताव था, वे ही बाद में पाकिस्तान के पश्चिमी और पूर्वी हिस्से बने.
मुस्लिम लीग को या ज्यादा सही कहें तो उसके प्रतिनिधित्व वाले लोगों को विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराने से इनकार करते हुए लेखक एक ऐसी दलील देते हैं, जो सही भी है और विडंबनापूर्ण भी. वह लिखते हैं कि 1946 में जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग को मुसलमानों के 80 फीसदी वोट मिले थे, यानी लगभग सभी मध्यवर्गीय मुसलमानों के वोट.
मुस्लिम लीग ने ये चुनाव पाकिस्तान बनाने के मुद्दे पर लड़े थे. वोट देने का अधिकार रखने वाले 80 फीसदी मुसलमानों ने उसके पक्ष में वोट दिया था. इनमें पढ़े-लिखे लोग, मध्यवर्ग और अमीर वर्ग शामिल थे. लेखक इसे आम सहमति बताते हैं और इसके लिए इस्लामी कानून में इस्तेमाल होने वाले शब्द ‘इज्मा’ का इस्तेमाल करते हैं. उनका तर्क है कि लगभग सभी मुसलमान मुस्लिम लीग के साथ थे.
इसलिए इतिहास को नए नजरिए से लिखने की हालिया कोशिशों में पेश की गई इस बात को खारिज करना जरूरी है कि पाकिस्तान केवल अमीर और प्रभावशाली लोग चाहते थे और अगर आम मुस्लिम जनता को वोट देने का मौका मिलता, तो वह अलग फैसला करती. मुस्लिम अभिजात वर्ग और आम जनता की राजनीतिक विचारधारा हमेशा एक जैसी रही है, क्योंकि उनकी राजनीति धर्म पर आधारित है और वे सभी एक ही धर्म को मानते हैं.
सही सैनिकों की तलाश
लेखक तथाकथित ब्राह्मणवादी ताकतों, जिनमें “कांग्रेस, आरएसएस और हिंदू महासभा” शामिल हैं, पर आरोप लगाते हैं कि वे “सिर्फ मुस्लिम विरोधी ही नहीं, बल्कि आदिवासी और दलित विरोधी भी हैं”. इस्लाम को मानने वाले कट्टरपंथियों की लंबे समय से यह कोशिश रही है कि दलितों और आदिवासियों के साथ गठबंधन किया जाए – या यूं कहें कि उन्हें सैनिकों के रूप में भर्ती किया जाए – ताकि हिंदू धर्म पर सीधा हमला किया जा सके. उनके समाजशास्त्र के मुताबिक, दलित और आदिवासी हिंदू नहीं हैं. वहीं, उनके इतिहास के मुताबिक, उन्होंने हिंदू समाज में जातिगत भेदभाव से बचने के लिए इस्लाम अपनाया था. ऐसा लगता है, जैसे इस्लाम अपनाते ही वे सैयद या पठान बन गए हों.
यह सवाल पूछा जा सकता है कि भारत में इस्लाम के 14 सदियों के इतिहास में क्या कभी दलितों और आदिवासियों के लिए सचमुच चिंता दिखाई गई? असल में, उन्हें विदेशी विजेताओं के शासन में जाति मानने वाले हिंदुओं के मुकाबले और भी ज्यादा तकलीफें झेलनी पड़ीं.
भारत में लिखे गए इस्लामी लेखों और किताबों में मूर्ति पूजा करने के लिए हिंदुओं की निंदा की गई, लेकिन जातिगत उत्पीड़न पर कभी सवाल नहीं उठाए गए. जातिगत भेदभाव को कम करने के बजाय, मुस्लिम विजेताओं ने उसमें नस्ल और धर्म के आधार पर भेदभाव भी जोड़ दिया और इसे और बढ़ा दिया. जब ऊंची जाति का कोई मुस्लिम, निचली जाति के किसी मुस्लिम को नीची नजर से देखता है, तो इसके पीछे मूल रूप से नस्ल का भेदभाव होता है. यह वैसा ही है, जैसे कोई विजेता हार चुके लोगों को नीची नजर से देखता है.
ऐसी चुप्पी जिसे याद रखा जाएगा
अगर ब्राह्मणवाद विश्लेषण की एक सही श्रेणी है, तो इस्लामी ब्राह्मणवाद हिंदू ब्राह्मणवाद से भी बदतर है, क्योंकि अभी तक उसे स्वीकार नहीं किया गया है, न ही उस पर सवाल उठाए गए हैं और न ही उसकी आलोचना की गई है.
मुस्लिम साहित्य में, दोनों धर्मों के धार्मिक नेताओं के लिए अक्सर ब्राह्मण शब्द के साथ शेख शब्द का इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि, इस्लाम को मानने वाले कट्टरपंथी ब्राह्मणवाद शब्द का इस्तेमाल अपमान करने के लिए करते हैं. उन्होंने यह शब्द दलित विमर्श से लिया है और दलित विमर्श ने इसे प्राच्यविद्या के विद्वानों के लेखन से लिया था. चूंकि अब वे खुले तौर पर हिंदू धर्म को बदनाम नहीं कर सकते, इसलिए वे उसकी जगह ब्राह्मणवाद शब्द का इस्तेमाल करते हैं.
इस्लाम को मानने वाले कट्टरपंथियों पर सवाल उठाने वालों के लिए वे बिना सोचे-समझे एक और शब्द का इस्तेमाल करते हैं – “फासीवादी”. ऐसा इसलिए, क्योंकि अब वे उन्हें “काफिर” नहीं कह सकते.
इमाम का यह सिद्धांत – जो मुस्लिम लीग की राजनीति और जमात-ए-इस्लामी की विचारधारा को उकसाने वाले अंदाज में फिर से पेश करता है – जल्द ही भुला दिया जाएगा. हालांकि, वामपंथी-उदारवादियों की मिलीभगत वाली चुप्पी को लंबे समय तक याद रखा जाएगा.
(इब्न ख़ल्दून भारती इस्लाम के छात्र हैं और इस्लामी इतिहास को भारतीय नज़रिए से देखते हैं. उनका एक्स हैंडल @IbnKhaldunIndic है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)
संपादक का नोट: हम लेखक को अच्छी तरह से जानते हैं और छद्म नामों की अनुमति तभी देते हैं जब हम ऐसा करते हैं.
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