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Sunday, 4 October, 2026
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रूस-यूक्रेन युद्ध से भारत की खाद्य सुरक्षा पर खतरा बढ़ रहा है, अब दिल्ली को पहल करनी होगी

ब्लैक सी क्षेत्र दुनिया के गेहूं के व्यापार का लगभग एक-तिहाई और सूरजमुखी तेल के निर्यात का 63% हिस्सा है. उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए भोजन का संकट अगला संकट हो सकता है.

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दुनिया के विकासशील देशों के बड़े हिस्से के लिए, अगले दो सालों में सबसे बड़ी कमी शायद ऊर्जा या कर्ज की नहीं होगी. यह खाने की हो सकती है. गेहूं की कीमतें दो साल के सबसे ऊंचे स्तर पर हैं, खाद की लागत बढ़ रही है, और जरूरी अनाज को आयात करने वाले देशों तक पहुंचाने वाले समुद्री रास्तों का बीमा कराना और उनका इस्तेमाल करना मुश्किल होता जा रहा है. इसका काफी कुछ एक ही समुद्री इलाके से जुड़ा है.

ब्लैक सी क्षेत्र दुनिया के गेहूं के व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा और दुनिया के सूरजमुखी तेल के निर्यात का 63 प्रतिशत हिस्सा संभालता है. यूक्रेन के इस इलाके के बंदरगाह 55 से ज्यादा देशों को खाद्य उत्पाद भेजते हैं. भारत भी उनमें शामिल है और सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में से एक है. भारत दुनिया में सूरजमुखी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और इसकी ज्यादातर आपूर्ति ब्लैक सी से होती है. भारत जरूरी खाद की सप्लाई के लिए भी इन्हीं समुद्री रास्तों पर निर्भर है.

भारत पिछले कुछ सालों से लगातार यह कहता आया है कि विकासशील देशों की खाद्य और खाद की सुरक्षा को दूर देशों के संघर्षों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. भारत ने अपनी G20 अध्यक्षता और ग्लोबल साउथ की वॉयस ऑफ द ग्लोबल साउथ बैठकों के जरिए यह बात रखी है. भारत उन कुछ बड़े देशों में रहा है जो उन देशों की तरफ से बोलने को तैयार रहे हैं जो अपना खाना आयात करते हैं, लेकिन जिन रास्तों से उनका खाना आता है, उन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है. जो देश अपना खाना डॉलर में खरीदते हैं और अपने यहां जरूरी चीजों पर सब्सिडी देते हैं, उनके लिए हजारों मील दूर होने वाला कोई संकट बहुत जल्दी सरकारी बजट और आम लोगों की रसोई की समस्या बन सकता है.

अब यह खतरा भारतीयों के लिए भी सिर्फ एक दूर की बात नहीं रह गया है. जुलाई में यूक्रेन से जा रहे गोल्डन लियो नाम के एक मालवाहक जहाज पर ग्रेटर ओडेसा बंदरगाह के पास रूसी क्रूज मिसाइलों से हमला हुआ. जहाज के 17 सदस्यों में से 9 मारे गए, जिनमें 4 भारतीय थे. भारत पहले ही दुनिया के समुद्री कामगारों में 12 प्रतिशत से ज्यादा की आपूर्ति करता है. सरकार का लक्ष्य है कि दुनिया के हर पांच में से एक नाविक भारतीय हो. ऐसे में व्यापारिक जहाजों पर होने वाले हमले भारतीय समुद्री कामगारों के लिए खास तौर पर बड़ा खतरा हैं.

भारत के लिए यह सब बहुत खराब समय पर हो रहा है. भारतीय निर्यातकों पर पहले से ही अमेरिकी टैरिफ का दबाव है. रूसी तेल की खरीद पर प्रतिबंधों का खतरा और ऊर्जा के बड़े समुद्री रास्तों में रुकावटें भी अर्थव्यवस्था की लागत बढ़ा रही हैं. अब खाना और खाद तीसरे झटके का खतरा बन गए हैं, ठीक उस समय जब भारत पहले दो झटकों को संभालने की कोशिश कर रहा है.

खाने और खाद के झटके: भारत पर असर 

भारत में इसका असर खाना पकाने के तेल में पहले से दिखाई दे रहा है. ब्लैक सी से सूरजमुखी तेल की खेप पहुंचने में 60 दिनों तक की देरी हुई है और इस सीजन में भारत का आयात 24 प्रतिशत घटकर 2.48 मिलियन टन रह गया है. वहीं, रिफाइनर दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं, इसलिए सोयाबीन तेल की खरीद 54 प्रतिशत बढ़ गई है.

अगस्त में भारत पहुंचने वाले कच्चे सूरजमुखी तेल की कीमत लगभग 1,496 डॉलर प्रति टन थी, जो पिछले साल की तुलना में 18.4 प्रतिशत ज्यादा है. इसके मुकाबले पाम तेल की कीमत 9.4 प्रतिशत और सोयाबीन तेल की कीमत 7.9 प्रतिशत बढ़ी.

दिल्ली पहले ही खाने के तेल पर आयात शुल्क घटा चुकी है. सूरजमुखी तेल पर सबसे ज्यादा कटौती की गई है. इसका मतलब है कि सरकार उपभोक्ताओं पर असर कम करने के लिए कुछ राजस्व छोड़ रही है. रिफाइनर अब तेजी से अर्जेंटीना की तरफ देख रहे हैं, जिसने पहली बार भारत को सूरजमुखी तेल देने के मामले में यूक्रेन को पीछे छोड़ दिया है. लेकिन दूसरे देशों से तेल लाना ज्यादा महंगा पड़ रहा है. लंबे समुद्री रास्तों से लागत बढ़ती है, ठीक उस समय जब ज्यादा देश उन्हीं सप्लायरों से सामान खरीदने की कोशिश कर रहे हैं.

दूसरा रास्ता खाद का है और यहां सरकार पर आर्थिक बोझ और भी ज्यादा है. भारत ब्लैक सी क्षेत्र और खाड़ी देशों से होने वाले आयात पर काफी निर्भर है. इसलिए दोनों संघर्ष वाले इलाकों में होने वाली उथल-पुथल का भारत पर असर पड़ता है. खाड़ी क्षेत्र में रुकावट से बचने के लिए भारत ने अपनी खरीद का रास्ता बदलकर मिस्र, अल्जीरिया, नाइजीरिया और जॉर्जिया कर दिया है. 2026-27 के केंद्रीय बजट में खाद सब्सिडी के लिए 1.71 लाख करोड़ रुपये रखे गए थे. लेकिन अब सरकार को 70,000-80,000 करोड़ रुपये और देने पड़ सकते हैं, क्योंकि आयात की बढ़ी हुई लागत से कुल खर्च बजट से काफी ऊपर जा सकता है. सिर्फ आयात किए गए यूरिया पर सब्सिडी का खर्च पिछले साल 128 प्रतिशत बढ़कर लगभग 48,000 करोड़ रुपये हो गया. ऐसा बजट जो दुनिया की कीमतें कम होने की उम्मीद पर बनाया गया था, अब इसके उलट बढ़ती कीमतों के कारण पीछे छूट रहा है.

दिल्ली का एक फायदा

इससे जुड़ी बड़ी समस्या के बारे में भारत पिछले एक दशक से चेतावनी देता आया है: ग्लोबल साउथ के देशों को उन झटकों का नुकसान उठाना पड़ता है जिन्हें पैदा करने में उनका बहुत कम या कोई योगदान नहीं होता. बांग्लादेश के खरीदार अब ऑस्ट्रेलियाई गेहूं के लिए 450 डॉलर प्रति टन से ज्यादा दे रहे हैं, जबकि इस रुकावट से पहले इसकी कीमत 380 डॉलर से कम थी. ब्लैक सी की सप्लाई की जगह दूसरी सप्लाई लेने पर प्रति टन 25-60 डॉलर और खर्च हो सकते हैं. सोमालिया अपने 90 प्रतिशत अनाज का आयात करता है और वहां पहले से ही 60 लाख लोग गंभीर भूख का सामना कर रहे हैं. ये वही देश हैं जिनकी तरफ से भारत ने हाल के वर्षों में बोलने की कोशिश की है, और इस बार भारत खुद भी इसी दबाव का सामना कर रहा है.

भारत के इस मामले में शामिल होने की एक और वजह है. भारत लगातार खुद को ऐसे देश के रूप में पेश करता रहा है जो शांति की कोशिश में दोनों पक्षों से बातचीत करने को तैयार है, भले ही इस रुख की आलोचना भी हुई हो.

व्यापारिक खाद्य जहाजों की सुरक्षा पर ध्यान देने वाला एक समझौता यूरोप से बहुत दूर के देशों की साझा और तुरंत सामने आई समस्या को हल कर सकता है. साथ ही, इससे शांति के लिए भारत की प्रतिबद्धता को व्यावहारिक रूप दिया जा सकता है. इसकी शुरुआत भारतीय और ब्लैक सी के बंदरगाहों के बीच एक छोटे स्तर के फूड कॉरिडोर से हो सकती है. इसमें पहले से भारतीय खरीदारों द्वारा खरीदा गया अनाज, खाने का तेल और खाद ले जाने वाले भारतीय झंडे वाले जहाज शामिल हो सकते हैं. इन जहाजों पर सैन्य सुरक्षा के बजाय भारतीय समुद्री पर्यवेक्षक मौजूद हो सकते हैं. भारत या ग्लोबल साउथ के लिए खाना ले जा रहे किसी साफ तौर पर पहचाने जा सकने वाले भारतीय जहाज पर हमला करने की कीमत बहुत अलग होगी.

भारत के पास ऐसा प्रभाव भी है जो बहुत कम देशों के पास है. रूस के साथ उसके बड़े आर्थिक संबंध भारत को ऐसी पहुंच और आर्थिक ताकत देते हैं जो कई दूसरे देशों के पास नहीं है. भारत इस स्थिति का इस्तेमाल रूस पर यह दबाव डालने के लिए कर सकता है कि वह नागरिक जहाजों या उन बंदरगाहों को निशाना न बनाए जो इन जहाजों की सेवा करते हैं. भारत दोनों देशों के बीच होने वाली व्यापक आर्थिक बातचीत में व्यापारिक समुद्री जहाजों की सुरक्षा को भी एक मुद्दा बना सकता है.

भारत के लिए अब यह दूर चलने वाला युद्ध नहीं है जिसके असर बहुत दूर महसूस हों. उसके समुद्री कामगार खतरे में हैं, उसके खाने और खाद की लागत बढ़ रही है और जिन देशों के लिए भारत ने बोलने का वादा किया है, उन पर इसका असर और भी ज्यादा पड़ रहा है. ब्लैक सी भारत को एक दुर्लभ मौका देता है कि वह अपने हितों की रक्षा करे, ग्लोबल साउथ के लिए खड़ा हो और दिखाए कि शांति के लिए उसकी प्रतिबद्धता व्यवहार में क्या हासिल कर सकती है.

पार्थिव भौमिक कीव स्थित टोनी ब्लेयर इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल चेंज में एनालिस्ट हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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