Sunday, 3 July, 2022
होममत-विमतमोदी सरकार के लिए लोगों का स्वास्थ्य नहीं, बल्कि खबरों की हेडलाइन मैनेजमेंट ज्यादा महत्त्वपूर्ण

मोदी सरकार के लिए लोगों का स्वास्थ्य नहीं, बल्कि खबरों की हेडलाइन मैनेजमेंट ज्यादा महत्त्वपूर्ण

आलोचना, सवाल-जवाब किसी भी जीवंत लोकतंत्र की सबसे जरूरी शर्तें हैं, खास तौर से तब तो और भी जब वह ऐसे संकट से गुजर रहा हो जिसका उसने पहले कभी सामना न किया हो

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कोविड की महामारी नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए बड़ी चिंता का मसला नहीं है. उसके लिए तो प्रचार, प्रेस, और प्रशंसा ज्यादा महत्व रखती है. उसका ज़ोर लोगों की सेहत पर नहीं है, अपने लिए सुर्खियों पर है. भारत जबकि कोविड-19 की दूसरी मारक लहर से जूझ रहा है, प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम वायरस से लड़ने की जगह उन आलोचकों से उलझने में व्यस्त है, जो उसे जमीनी हकीकतों से आगाह कर रहे हैं.

स्वास्थ्य मंत्री विपक्ष के वरिष्ठ नेता तथा पूर्व प्रधानमंत्री को भद्दा पत्र लिख रहे है, विदेश मंत्री अपने राजनयिकों से कह रहे हैं कि वे भारत में महामारी की एकतरफा खबरें दे रही अंतरराष्ट्रीय मीडिया का प्रतिवाद करें, तो दिल्ली पुलिस सरकार की वैक्सीन नीति की आलोचना करने वाले पोस्टर जारी करने के लिए लोगों को गिरफ्तार कर रही है, यानी शासक खेमा अपनी आक्रामकता दिखा रहा है और उन तमाम जानकारियों को पूरी तरह खारिज कर रहा है जिनमें उसकी तारीफ न की गई हो. महामारी से लड़ाई की परवाह न करके सुर्खियों और अपनी छवि को ‘मैनेज’ करने की जरूरत हावी दिखती है.

आलोचना, सवाल-जवाब किसी भी जीवंत लोकतंत्र की सबसे जरूरी शर्तें हैं, खास तौर से तब तो और भी जब वह ऐसे संकट से गुजर रहा हो जिसका उसने पहले कभी सामना न किया हो. कोई भी जागरूक सरकार या नेता, जिसमें अपनी गलती को कबूल करके सुधार करने की काबिलियत होगी, विविध विचारों के लिए सम्मान भाव होगा वह आलोचकों के प्रति ऐसा क्रूर और हमलावर रुख नहीं अपनाएगा. कोविड की दूसरी लहर के जवाब में मोदी सरकार के कदमों को दो तरह से परिभाषित किया जा सकता है— एक तो यह कि वह अपनी छवि को निखारने की हताश कोशिश करती रही है; दूसरे, वह आपके विकल्पों को अपराध घोषित करती रही है.

किसी संकट का कुशलता से सामना न कर पाना एक बात है— ऐसी चुनौती का सामना किसी भी सरकार को करना पड़ सकता है, वास्तव में कई राज्य सरकारें आज सामना कर भी रही हैं. लेकिन अपनी अक्षमता का बेशर्म बचाव करने के लिए अपने आलोचकों के पीछे हाथ धो कर पड़ जाना बिलकुल अलग बात है. प्रधानमंत्री ने 2015 में कोल्हापुर में कहा था कि उन्हें ‘आलोचना की कमी’ महसूस होती है, मगर सच यह है कि उनमें आलोचना बर्दाश्त करने की सहनशीलता नहीं है.

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हमलावर तेवर

यह शायद ही कोई रहस्य रह गया है कि महामारी की दूसरी लहर से निपटने में मोदी सरकार अक्षम साबित हुई है. इस बात को भी खारिज नहीं किया जा सकता कि इसका टीकाकरण कार्यक्रम भी निराशाजनक रहा है. सरकार की ये नाकामियां उसके कर्ता-धर्ताओं की अक्षमताओं, अनुभवहीनता, और हालात पर काबू पाने में उनकी विफलता को उजागर करती हैं, जो कि कोई असामान्य बात नहीं है. उदाहरण के लिए, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी महामारी की दोनों लहरों के दौरान देश की देश की राजधानी को संभालने में जद्दोजहद करनी पड़ी.

लेकिन मोदी सरकार के मामले में सबसे अक्षम्य बात यह है कि प्राथमिकताओं को लेकर उसकी समझ असंगत है, जो जनमत को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिशों और सलाह-सुझाव देने वाले के प्रति उसकी प्रतिक्रिया से जाहिर है.

जरा इन बातों पर गौर करें.

अपनी मेधा और अकादमिक उपलब्धियों के लिए विख्यात एक पूर्व प्रधानमंत्री ने सार्थक सलाह देते हुए आपको पत्र लिखा. लेकिन अपनी सौम्यता और मिलनसारिता के लिए जाने गए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने उसके जवाब में राजनीतिक कटाक्ष करते हुए एक घटिया पत्र लिख डाला. यह प्रसंग बेशक मनमोहन सिंह बनाम हर्षवर्धन का है.

जब कांग्रेस कार्य समिति महामारी से निपटने में सरकार की बदइंतजामी के लिए उसकी आलोचना करती है तो भाजपा के अध्यक्ष तुरंत सोनिया गांधी को पत्र लिखकर आरोप लगा देते हैं कि उनकी पार्टी ‘झूठी दहशत’ फैला रही है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर एक विदेशी दूतावास को ऑक्सीजन सप्लाई के मामले पर कांग्रेस नेता जयराम रमेश से ट्वीटर युद्ध में उलझ जाते हैं.

और जब आप देखते हैं कि आपकी वैक्सीन नीति की आलोचना करने वाले पोस्टर राजधानी में लगाए गए हैं, तब आप दिल्ली पुलिस से कई लोगों को गिरफ्तार करवा देते हैं. ये सब केवल ज्यादतियां नहीं हैं बल्कि एक ऐसे समय में अक्षम्य विद्वेषपूर्ण कदम हैं जब सरकार को अपने प्रयासों में हर किसी को शरीक करना चाहिए था.


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जनधारणा का मैनेजमेंट

सूचना व प्रसारण मंत्रालय उच्चस्तरीय बैठकें करने में जुटा रहा है ताकि प्रतिकूल खबरों का खंडन किया जा सके और ऐसे संदेश प्रसारित किए जाएं कि सरकार की छवि पर कोई दाग न आए. होना तो यह चाहिए था कि बैठकें स्वास्थ्य मंत्रालय में होतीं और महामारी से निपटने और वैक्सीन के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के अगले कदमों के बारे में उनमें विचार किया जाता.

विदेश मंत्री जयशंकर अपने राजनयिकों को हिदायत देते रहे हैं कि विदेशी मीडिया में सरकार से जुड़ी नकारात्मक खबरों का कैसे खंडन किया जाना चाहिए. भाजपा के नेता और उसका आइटी सेल आलोचनाओं का जवाब देने के लिए सोशल मीडिया का पूरा इस्तेमाल करने, लीपापोती करने और ‘विकास पुरुष’ मोदी की छवि पर दाग न लगने देने की कोशिशों में दिन-रात लगा है.

मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा का काम छवि चमकाना और अतिवादी स्थितियों के चित्र पेश करना ही रहा है. सच्ची बात तो यह है कि राजनीति जनमत को मोड़ने और अपनी बात को जोरदार तरीके से पेश करने का ही खेल है. लेकिन खुद को हमेशा, खासकर तब जबकि देश भारी संकट से गुजर रहा हो, अच्छा दिखाने और विरोधी को खराब बताने पर ज़ोर देने के खेल में कुछ क्रूरता, चिंतनीय, और सच कहें तो बचकानापन भी जुड़ा है.

जब यह सब खत्म हो जाएगा और इतिहास पीछे मुड़कर इस दौर पर नज़र डालेगा तब कोविड महामारी से निपटने में मोदी सरकार की बदइंतजामी से ज्यादा उसकी स्वार्थपूर्ण और अंधी कोशिशें एक काले धब्बे की तरह उभरकर सामने आएंगी. साहसी लोग वे नहीं होते, जो गलतियां नहीं करते, बल्कि वे होते हैं जो अपनी गलतियों को कबूल करते हैं, उनकी लीपापोती नहीं करते, और दूसरों को उन गलतियों की ओर इशारा करने की छूट देने की शालीनता बरतते हैं.

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