एक दशक से एक-दूसरे के ‘दोस्त’ डॉनल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू पश्चिम के उदारवादियों और वामपंथियों की निंदनीय लोगों की लिस्ट में अव्वल नंबर पर आने की होड़ लगाते रहे हैं. इन दोनों के पतन की ख़्वाहिश और भविष्यवाणी की जाती रही है लेकिन ये दोनों अपने निंदकों को निराश करते रहे हैं.
ट्रंप राष्ट्रपति चुनाव दो बार जीते, बावजूद इसके कि उदारवादी लोग उनका उपहास उड़ाते रहे और उनके प्रति नफरत की बौछार करते रहे. नेतन्याहू पिछले 17 में से 16 वर्षों तक नफरत के चाकू की धार को कुंद करते रहे, सिवा 2021-22 के जब इजरायल के दो पूर्व प्रधानमंत्रियों, नाफ़्ताली बेनेट और यायर लैपिड ने उनके खिलाफ गठजोड़ कर लिया था. इस हफ्ते, नेतन्याहू ने उस चाकू को और गहराई में दफन कर दिया है.
इस बार चुनाव में उन्हें एक बार फिर से जनादेश तो नहीं हासिल हुआ है लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा सीटें मिली हैं और धुर दक्षिणपंथियों का समर्थन हासिल है. वे गठबंधन करने की बेहतर स्थिति में हैं. या वे जोड़तोड़ करके दोबारा चुनाव करवा सकते हैं, जो कि इजरायल में कोई असामान्य बात नहीं है.
नेतन्याहू की जीत इसलिए मानी जाएगी क्योंकि उन्हें हराया नहीं जा सका है. हमास की ‘कृपा’ से उन्होंने इजरायल को पूरी तरह बदल दिया है. दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि उनके प्रतिद्वंद्वी गादी एज़ेनकोट ने अगर दो अरब पार्टियों से हाथ मिलाया होता तो वे अपने गठबंधन की सीटों की संख्या 48 से, बहुमत के 61 वाले आंकड़े से बहुत आगे बढ़ा लेते. आखिर, इन दो अरब पार्टियों में से एक, रा-आम पार्टी 2021-22 में बेनेट-लैपिड के अल्पजीवी गठबंधन शामिल हुई थी. लेकिन अब कोई यहूदी समूह हमास को आतंकवादी घोषित किए बिना अरबों से हाथ नहीं मिला सकता. अरब पार्टियां भी ऐसा नहीं कर सकतीं, और न करेंगी. और ऐसा कोई गठबंधन इजरायल के अरब नागरिकों का समर्थन खोए बिना नहीं बन सकता. नेतन्याहू और हमास ने इजरायल में इसी तरह का बदलाव ला दिया है. इजरायल में अब कोई ‘मध्यमार्ग’ नहीं रह गया है.
अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी अगले हफ्ते शायद कुछ संतुलन बहाल कर सकती है, लेकिन इससे वह हकीकत नहीं बदल जाएगी जिसने ट्रंप को शाही सत्ता दिलाई. प्रवासियों, व्यापार, और मानवाधिकार के मसलों पर ट्रंप ने जिस तरह अपनी छाप छोड़ी है वह उनके बाद भी लंबे समय तक बनी रह सकती है.
ट्रंप-नेतन्याहू के जलवे को समझने के लिए हमें यह कबूल करना पड़ेगा कि वोटर अब दिमाग की जगह दिल से फैसले लेते हैं, विचारधारा की जगह लेन-देन वाले समीकरण को ज्यादा तरजीह देते हैं.
तो वे किस तरह की ‘डील’ चाहते हैं? उनके लिए अर्थव्यवस्था महत्व रखती है. लेकिन इससे भी ज्यादा महत्व वे इन तीन मुद्दों को देते हैं: राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यक्तिगत सुरक्षा, और अपनी पहचान. अमेरिका में ट्रंप ने कानून-व्यवस्था, प्रवासियों, और ‘अतिवादी’ राजनीतिक शुद्धता यानी शिक्षा जगत में ‘विविधता-समता-समावेश’ के प्रति झुकाव, स्त्री-पुरुष समानता, और सीमाओं के खुलेपन जैसे मुद्दों पर अपना दूसरा चुनाव जीता.
अश्वेतों के पक्ष में ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन और गाज़ा के सवाल पर उदारवादी समूहों के आक्रोश ने ट्रंप की मदद ही की. तब सवाल यह उठा कि इन मुद्दों पर श्वेत अमेरिकी और तमाम हिस्पैनिक लोग किस पर भरोसा करेंगे? ट्रंप पर या कमला हैरिस पर? राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यक्तिगत सुरक्षा, और पहचान जैसे मुद्दों के मुकाबले बाकी दूसरे मुद्दे मामूली और गौण माने जाते हैं.
इजरायल की कथा अनंत है. वहां एक ही मुद्दे पर चुनाव लड़ा गया, और वह मुद्दा था राष्ट्रीय सुरक्षा. उनके लिए ‘होलोकास्ट’ (यहूदियों के नरसंहार) के बाद 7 अक्टूबर 2023 को हुआ हमला ही सबसे यातनादायी है. इसके अलावा, पिछले करीब तीन दशकों से ईरान ने ‘रिंग ऑफ फायर’ (आग के घेरे) या ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ (प्रतिरोध की धुरी) से उनकी घेराबंदी कर रखी है.
अंतहीन लड़ाई ने इजरायलियों को सख्त बना दिया है. लेकिन 7 अक्टूबर उनके लिए महा पराजय थी. वह पहला मौका था जब विशाल यहूदी आबादी ने अपने ही इजरायली गढ़ में खुद को अपनी रक्षा करने में असमर्थ पाया था. इसने इजरायल को बदल दिया, इसने उसे आगे की लड़ाई के लिए तैयार किया, और नेतन्याहू को सरकार विरोधी आक्रोश से बचा लिया.
भारत समेत तमाम लोकतंत्रों में जो ठेठ उदारवादी बहस चलती है उसके विपरीत इजरायलियों की तर्कवादी, लोकतांत्रिक परंपरा गहरी रही है. वहां एक मजबूत, उदार और मुखर समूह रहा है जो फिलस्तीनियों से सहानुभूति रखता है, वेस्ट बैंक में आकर बसे लोगों की हिंसा से नफरत करते हैं, और एक ही क्षेत्र में ‘दो देश’ के विचार तक का समर्थन करते हैं.
वर्षों से मैं जिस इजरायली अखबार ‘हारेत्ज’ का ग्राहक हूं वह भारतीय मुख्यधारा के अखबारों के मुक़ाबले ज्यादा वामपंथी झुकाव वाला है. यह अखबार नेतन्याहू का घोर आलोचक रहा है और ऐसी खोजी खबरें देता रहा है जो उन्हें भारी राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकती थीं. इसने ऐसी खबरें भी दी कि नेतन्याहू ने 7 अक्टूबर के हमले के बारे में मिस्र और यूएई की पूर्व चेतावनी की किस तरह अनदेखी की. यह भी आरोप लगाया गया कि नेतन्याहू ने इस चेतावनी की जानबूझकर उपेक्षा की. इजरायल में चल रही बहसों में साज़िशों की बातें उछालना कोई नई बात नहीं है.
दूसरी ओर ऐसी धुर कट्टरपंथी पार्टियां भी हैं जो वेस्ट बैंक और गज़ा से सभी फिलस्तीनियों को निकाल बाहर करना चाहती हैं. संक्षेप में कहें तो इजरायली समाज में गहरे मतभेद मौजूद हैं और व्यक्तिपूजा का स्वभाव उनमें नहीं है, नेतन्याहू के लिए भी नहीं. गौर करने वाली बात यह है कि इन मतभेदों ने चुनाव को प्रभावित नहीं किया. इज़रायलियों ने दो कट्टरवादियों में से एक को चुना. समानुपातिक मतदान में 21 फीसदी अरबों को सीटें तो मिलती हैं लेकिन उनके वोट बेअसर हो जाते हैं क्योंकि बहुमत सुरक्षा और वजूद के पक्ष में एकजुट हो जाता है.
सवाल सीधा-सा था: इस भयावह रूप से असुरक्षित दौर में हम अपनी सुरक्षा के लिए किस पर ज्यादा भरोसा करें— जाने-पहचाने शैतान पर या उसके प्रतिद्वंद्वी पर, जिसे भी शांतिवादी नहीं माना जा सकता? नेतन्याहू ने जनरल गादी एज़ेनकोट को IDF का चीफ नियुक्त किया था; उनका फौजी बेटा गाज़ा में लड़ते हुए मारा गया; और खुद वे हमास का खात्मा करने का संकल्प ले चुके हैं. काफी लोगों ने बदलाव का खतरा मोल लेने की जगह मौजूदा सरकार को ही बनाए रखने के पक्ष में वोट दिया.
दो बातों की जांच जरूरी है. एक यह कि इजरायल में कभी काफी ताकतवर रहे वाम पक्ष का ज़ोर हवा क्यों हो गया? और दूसरे, उसके अरब मतदाताओं का मजबूत वोट बेअसर क्यों रह जाता है?
इजरायल में वाम पक्ष (लेबर पार्टी ) के वर्चस्व वाले दौर को भारत में ज्यादा याद नहीं किया जाता है. आधुनिक इजरायल के निर्माता और महान यहूदी राष्ट्रवादी (ज़ायनिस्ट) माने गए डेविड बेन गुरियन, गोल्डा मेयर, लेवी एश्कोल, और यीत्जाक राबिन सरीखे तमाम नेता लेबर के थे. किंवदंती बने लेफ्टिनेंट मोशे डयान लेबर के समाजवादी थे और स्वयंभू नास्तिक ज़ायनिस्ट थे. 1977 में लेबर पार्टी से अलग होकर उन्होंने मेनाशेम बेगिन के लीकुड गठबंधन में शामिल हुए और विदेश मंत्री के तौर पर मिस्र के साथ कैंप डेविड समझौते के लिए वार्ता की थी. 1948 से 1977 तक लेबर पार्टी का पूर्ण वर्चस्व रहा, जिसे बेगिन के लीकुड ने तोड़ा. शिमोन पेरेस, राबिन और एहुड बराक के नेतृत्व में लेबर थोड़े-थोड़े समय के लिए 1984, 1992, 1995 और 1999 में सत्ता में लौटी और फिर गुम हो गई.
1992 से 2000 के बीच लेबर पार्टी ने ओस्लो समझौते की वार्ताओं के जरिए मिस्र जैसी शांति संधि की कोशिश की, मगर वह बढ़ते फिलस्तीनी हमलों और फिदायीन बमबारियों के बीच विफल रही. पहली बार यह कोशिश राबिन की हत्या के कारण रुकी, और 2000 में दूसरा ‘इंतिफादा’ (फिलस्तीनी बगावत) आसन्न हो गया.
अंततः, इजरायलियों को अमन की खातिर अपनी जमीन का सौदा करने का लेबर पार्टी का विचार भ्रामक लगा. उन्होंने इस विचार के साथ लेबर पार्टी को भी दफना दिया. इसके बाद इजरायल में अमन के लिए वोट मांगना असंभव हो गया है.
विडंबना यह है कि भारत समेत कई देश जबकि ‘दो देश’ वाले समाधान का समर्थन करते हैं, लेकिन दोनों प्रमुख पक्षों में से कोई भी यह नहीं चाहता. इजरायली और फिलस्तीनी, दोनों केवल एक देश चाहते हैं और दूसरे को बाहर निकालना चाहते हैं. हर एक के पास ‘नदी से लेकर समुद्र तक’ का अपने मन मुताबिक समाधान मौजूद है. फिलस्तीनी आंदोलन अपना समाजवादी-सेकुलर-ईसाई आकर्षण गंवा चुका है. अब वह इस्लामी हो गया है. यह ईरान के लिए फायदे वाली बात है और छद्म युद्ध करने वालों को वैचारिक खुराक उपलब्ध कराती है.
दूसरा सवाल यह है कि अरब वोट इतना बेअसर क्यों हो गया है? हमें इस पर गंभीरता से सोचना पड़ेगा क्योंकि हाल के समय में भारत में ‘जिसकी सीटें ज्यादा वही विजेता’ वाली व्यवस्था की जगह आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग उठने लगी है. माना जाता है कि यही अल्पसंख्यकों को सही प्रतिनिधित्व देगा.
इजरायल कठोर सच्चाई से सामना कराता है. इजरायल में मुख्यतः मुस्लिम अरबों की आबादी 20 फीसदी से ज्यादा है. वे सरकारी सेवाओं में, व्यवसायों, और सेना तक में काम कर रहे हैं, हालांकि उन्हें सेना में अनिवार्य भरती से छूट मिली हुई है. रेकॉर्ड मतदान करके उन्होंने 120 सीटों वाली संसद ‘नेसेट’ में 19 सीटें जीती हैं और वे ‘किगमेकर’ बन सकते हैं, लेकिन उन्हें कोई भी साथ नहीं लेना चाहेगा. इजरायल के व्यापक परिदृश्य में वे राष्ट्रवाद के इम्तहान में फेल हो जाते हैं.
बताया जाता है कि 11 सीटें जीतने वाले गुट ने नज़ारेथ के अपने मुख्यालय में फिलस्तीनी प्रतीकों के साथ जीत का जश्न मनाया. वे 7 अक्टूबर की ‘निंदा’ करते हैं लेकिन इसे या हमास को आतंकवाद नहीं कहते. कोई यहूदी पार्टी उन्हें गले नहीं लगाएगी. इसलिए उनकी सीटों का कोई महत्व नहीं रह गया है. इसे इस तरह से भी देख सकते हैं. अगर आपने भारत में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था लागू कर दी, और मुस्लिम दलों ने अपनी आबादी के अनुपात से (543 में से 80) सीटें जीत लीं तब क्या कोई ‘सेकुलर’ गठबंधन भी उन्हें कबूल करेगा, भले ही खुदा न करे वे पाकिस्तानी या हुर्रियत के झंडों अथवा प्रतीकों के साथ जश्न मनाएं? या लश्कर और जैश को आतंकवादी मानने से इनकार कर दें? मुझे मालूम है कि मेरी इन बातों का कई लोग बहुत बुरा मानेंगे, लेकिन जरा देखिए कि असदुद्दीन ओवैसी कितने सतर्क और सही हैं. मैंने यह उदाहरण सिर्फ यह बताने के लिए दिया है कि इजरायली लोग अरब दलों के प्रति कैसी भावना रखते हैं.
यह किसी भी चुनावी लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों के लिए एक सबक है. अलग-थलग रहना उनके लिए शायद ही फायदेमंद है. उन्हें मुख्यधारा में जो स्वीकार्य लगते हैं उनके साथ जुड़ना चाहिए और गठबंधन करना चाहिए. इसके लिए वैचारिक समझौता करने की जरूरत पड़ेगी और राष्ट्रीयता से कोई समझौता नहीं करना पड़ेगा. 1989 से 2014 तक के गठबंधन वाले दौर में मुस्लिम वोट ने इसी तरह अपनी ताकत बनाई थी. या आप आनुपातिक प्रतिनिधित्व के लिए मुहिम चला सकते हैं और सीटें हासिल कर सकते हैं लेकिन हाशिये पर पड़े रह सकते हैं, इजरायली अरबों की तरह.
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