Thursday, 7 July, 2022
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मंदिर या मस्जिद? नए सर्वे की जरूरत नहीं, बस सच्चाई को स्वीकार कर सुलह की ओर बढ़ें

यह तो निर्विवाद तथ्य है कि मंदिर तोड़े गए और मस्जिदें बनाई गईं, अब उस इतिहास को बदला नहीं जा सकता लेकिन सौहार्द पर विचार करने से पहले हम अतीत की गलतियों से इनकार नहीं कर सकते.

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वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद के वुजू तालाब में जो पाया गया वह शिवलिंग है या बड़े आकार के झरने की टोंटी?

अदालत के आदेश पर किए जा रहे सर्वे में क्या उस मस्जिद की दीवारों पर सिंदूरी रंग की मूर्तियां, कमल के फूल, स्वस्तिक, पौराणिक शेषनाग की आकृतियां खुदी हुई मिली हैं?

क्या क़ुतुब मीनार के अहाते में उलटे हुए एक पत्थर पर गणेश की आकृति खुदी हुई है? क्या मथुरा में औरंगजेब ने भगवान कृष्ण की जन्मभूमि पर बने केशवदेव मंदिर को तोड़ कर शाही ईदगाह मस्जिद बनवाई थी? मान लीजिए कि इन सारे सवालों के जवाब ‘हां’ में हैं क्योंकि प्रायः जवाब यही है, चाहे यह शिवलिंग बनाम झरना विवाद ही क्यों न हो.

तीन और सवाल उभरते हैं-

  • अगर ये सब सच हैं, तो क्या फर्क पड़ता है?
  • अगर इससे आप हिंदुओं को भारी गुस्सा आता है, तो आज 2022 में उन सच्चाइयों का आप क्या कर सकते हैं?
  • अगर आप नाराज और खौफजदा मुसलमान हैं, तो आप क्या करेंगे?

भारतीय राष्ट्रवाद के लिए जीने-मरने के इन सवालों के जवाब ढूंढते हुए हमें एक और सवाल उठाना पड़ेगा. वह यह कि 1947 से जवाहरलाल नेहरू से लेकर 2014 से नरेंद्र मोदी तक तमाम प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली के लाल किले से ही देश को संबोधित क्यों करते रहे हैं?

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दिल्ली के लाल किले को हर किसी ने, चाहे वह किसी राजनीतिक पक्ष का हो या किसी भी विचारधारा का हो, भारत की संप्रभुता का प्रतीक मान लिया है. क्या इसे मुस्लिम स्मारक के रूप में देखा जाता है?

300 से ज्यादा वर्षों से भारतीय राष्ट्रवाद या अधिक साहस के साथ कहें तो भारतीय धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद का जिस दिलचस्प और आकर्षक ढंग से विकास हुआ है. उसकी जटिलताओं का यह 17वीं सदी का किला उपयुक्त प्रतीक है. पूरी तरह भारतीय माने जा सकते मुगल बादशाह शाहजहां ने जब अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली लाने का फैसला किया तब 1638 ई. में उसने इसे बनाने का हुक्म जारी किया था. कट्टरपंथी हिंदू भी शाहजहां को कम खराब मुगल शासक मानते हैं. वह अपने ‘कुटिल’ बेटे औरंगजेब के जुल्म का शिकार बना था, जिसने अपने भाई और पसंदीदा वारिस दारा शिकोह की हत्या की और अपने ‘कमजोर’ बाप को कैद में डाल दिया था.

वैसे, हमारा इतिहास बहुत सीधा-सादा नहीं है. इसी ‘कम खराब’ शाहजहां ने ओरछा के भव्य मंदिरों को तोड़ने का हुक्म दिया था क्योंकि ओरछा के राजा झुझर सिंह ने बगावत की थी और उसने झुझर सिंह को ‘सज़ा’ देने के लिए अपने जिस शाहज़ादे को भेजा था वह औरंगजेब ही था. जैसा लड़ाई का मैदान, वैसा सेनापति!

अगर कुछ विद्वान लोग मुगलों को विदेशी मानते हैं, तो गौर करने वाली बात यह है कि लाल किले पर पहला हमला 1739 में एक असली विदेशी मुस्लिम हमलावर नादिर शाह ने किया था. उस समय मुगल सल्तनत का उसी तरह पतन हो रहा था जिस तरह अभी मार्च में चीन में बोइंग-737 विमान गिरा था और वजह भी एक ही थी. औरंगजेब के मुगल वारिस भी उस विमान के चीनी पाइलटों की तरह ही खुदकशी पर आमादा थे.

नादिर शाह ने जर्जर हो चुके मुगल शासक, रंगीला के नाम से मशहूर मोहम्मद शाह को तबाह कर दिया, लाल किले के बड़े हिस्से को तोड़ डाला और बादशाह के मयूर सिंहासन समेत शाही खजाने को लगभग पूरा लूट कर ले गया.

उसने ऐसा क्यों किया? लाल किला तो कोई हिंदू महल नहीं था, न ही उसके अंदर कोई मंदिर था. वह एक समय महान भारतीय साम्राज्य की ताकत का प्रतीक था. नादिर शाह और उसके साथी मुस्लिम हमलावरों को तो मध्ययुगीन लुटेरों की तरह उसे कायदे से लूटना भर था. इसलिए वह मुगल सिंहासन को ले गया. लाल किले पर दूसरा हमला इसके 44 साल बाद किया गया और इस बार हमलावर न तो मुस्लिम आक्रमणकारी था और न बदला लेने पर आमादा हिंदू थे. उस समय लाल किले पर हमला सिखों के एक लड़ाका मिसल ने किया था.

उस हमले का नेतृत्व विख्यात कमांडर जस्सा सिंह अहलूवालिया, जस्सा सिंह रामगढ़िया और बघेल सिंह ने किया था, जिन्हें केवल सिख ही हीरो नहीं मानते. सिखों ने लाल किले में अपना सैन्य अड्डा बनाकर लाल किले को वापस एक कमजोर मुगल शासक के हवाले कर दिया, उसी हाल में जिस हाल में नादिर शाह ने किया था.

सिखों ने लाल किले को छोड़ने की शर्त यह रखी थी कि दिल्ली में सात गुरुद्वारे बनवाए जाएं. तभी चांदनी चौक में वहां पर शीशगंज गुरुद्वारा बनवाया गया, जिस जगह पर औरंगजेब के हुक्म से सिखों के नौवें गुरु तेग़ बहादुर का सिर काटा गया था. मध्ययुग के हमलों के पीछे धर्म बड़ा कारण होता था. प्रधानमंत्री मोदी ने गुरु की 400वीं जयंती पर लाल किले में सिखों की एक सभा को संबोधित किया.

लेकिन, लाल किले को अभी आराम नहीं मिला. उन्हें आप स्वतंत्रता सेनानी कहें या विद्रोही, 1857 में उन सबने बहादुरशाह जफर और उसके झंडे की खातिर लड़ाई लड़ी, जबकि वह नाम का ही बादशाह था. फिर भी वह और लाल किला उन सेनानियों के लिए भारतीय संप्रभुता का प्रतिनिधित्व करता था.

इसीलिए, लाल किले पर अंतिम चढ़ाई अंग्रेजों ने की, जब उन्होंने उस विद्रोह को कुचल डाला. लूटपाट के लिहाज से देखें तो नादिर शाह सबसे विनाशकारी था, लेकिन अंग्रेजों ने शाही इमारतों का सबसे ज्यादा नुकसान किया. ईस्ट इंडिया कंपनी के हमले के बाद वहां शायद ही कुछ बचा. शाही निवास, हरम आदि सबको हथौड़ों से ढहा दिया गया और उनकी जगह फौजी बैरक खड़े कर दिए गए.

प्रतीकों की बात करें? तो 1945-46 में भी, नेताजी की आज़ाद हिंद फौज के जिन सैनिकों को गिरफ्तार किया गया था उन पर मुकदमा लाल किले में ही चलाया गया.

यानी 1739 में मुगलों द्वारा बनवाए गए लाल किले को 1857 तक 118 वर्षों में मुसलमानों, सिखों, और अंग्रेजों को ईसाई मान लें तो ईसाइयों के भी हाथों जुल्म और लूटपाट झेलनी पड़ी. इसकी वजह एक ही थी, कि उन सबने इसे भारत की राष्ट्रीय सत्ता का एक प्रतीक माना.


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हम पहले ही यह कबूल कर चुके हैं कि शुरू में हमने जो सवाल उठाए उनके जवाब हां में हैं. यह कि जिन इतिहासकारों को दक्षिणपंथी हिंदू जमात कपटी उदारवादी वामपंथी मानती है उन्होंने भी लिखा है कि काशी और मथुरा के मंदिर औरंगजेब के हुक्म से तोड़े गए और उनके मलबे पर मस्जिद और ईदगाह बनवाई गई. औरंगजेब को ‘सामान्य’ बताने का कथित अपराध करने के लिए धिक्कारे जाने वाले ऑड्रे ट्रुश्क ने भी इसे कबूल किया है. मध्ययुगीन भारत पर प्रामाणिक काम करने के लिए सम्मानित, एरिज़ोना यूनिवर्सिटी के रिचर्ड ईटन ने भी इसे विस्तार से रिकॉर्ड किया है.

आप 2001 में ‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका में दो भागों में छापे उनके निबंध को यहां पढ़ सकते हैं. ईटन ने बताया है कि भारत में मुसलमानों के आगमन के बाद से केवल काशी-मथुरा ही नहीं बल्कि कई दूसरे मंदिरों और हिंदू स्थलों को गजनी जैसे लुटेरों से लेकर उपनिवेशवादियों और भारत में जन्मे खासकर मुस्लिम देसी शासकों ने नष्ट किया.

इसलिए, अदालत के आदेश से कहीं भी सर्वे किया जाए, कोई नयी ‘खोल’ नहीं की जा सकेगी. यह सब निर्विवाद इतिहास है. हमने ऊपर जो तीन सवाल उठाए हैं. उनका अब जवाब देने की जरूरत है. इस इतिहास का हम क्या करें?

अगर इस पर कोई विवाद नहीं है कि ये तोड़फोड़ और लूटपाट हुई, तो लड़ने को यही मुद्दा रह जाता है कि उन हमलावरों की मंशा क्या थी. एक पक्ष का मानना है कि वह शुद्ध रूप से और अधिकांशतः राजनीतिक और आर्थिक मामला था. दूसरा पक्ष मानता है कि यह शुद्ध रूप से धर्मांधता और हिंसक मूर्तिभंजन का मामला था. अब यह दोनों तरफ के बुद्धिमानों की बौद्धिक बहस का मामला रह जाता है.

हमारा जो संवैधानिक ढांचा है उसके तहत इस अतीत को बदलना असंभव है. ‘उपासना स्थल (विशेष अनुबंध) अधिनियम-1991’ ऐसे किसी संशोधन पर रोक लगाता है. अधिक ज़ोर देने के लिए अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों के 2019 के फैसले का हवाला दिया जा सकता है जिसके तहत इस अधिनियम को स्पष्ट रूप से संविधान के मौलिक ढांचे में शामिल कर दिया गया है.

मुझे नहीं लगता कि अपने बहुमत के ज़ोर पर मोदी भी इस कानून को रद्द करेंगे और हमारे राष्ट्रहित के खिलाफ इतना बड़ा कदम उठाएंगे.

तीन दशक पहले नेल्सन मंडेला ने हमें दिखाया था कि महात्मा गांधी की अहिंसा और आज के संदर्भ में सच्चाई और सुलह-सौहार्द में कितनी शक्ति है. इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि सच्चाई के बिना सुलह भी नहीं हो सकती.

इक्कीसवीं सदी के इस मोड़ पर हिंदू समुदाय अपने ऊपर हुए जुल्म के सबूत जुटाने के लिए खुदाई करने से हाथ खींच सकता है.

उनके सबूत उन स्रोतों से पहले से ही उपलब्ध हैं जिन स्रोतों को दूसरा पक्ष भी विश्वसनीय मानता है. इसी तरह, मुस्लिम समुदाय और वाम-धर्मनिरपेक्ष पक्ष भी अतीत में हुई गलतियों के इनकार से परहेज कर सकता है, चाहे गलतियां करने वालों की जो भी मंशा रही हो.

धर्मनिरपेक्षता की वकालत करने के लिए इस तरह के तर्कों का सहारा लेना आत्मघाती ही होगा कि ‘क्या औरंगजेब अच्छा बादशाह था?’ 21वीं सदी के संदर्भ में देखें तो मध्ययुग का कोई भी शासक अच्छा नहीं माना जाएगा. कुछ खराब थे, तो कुछ बेहद खराब थे.

इस सच को जब दोनों पक्ष कबूल कर लेंगे तभी धीरे-धीरे सुलह-सौहार्द भी बहाल हो सकेगा.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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