अभी बस दो सप्ताह पहले इस कॉलम में हमने लिखा था कि लोकसभा में अल्पमत में होने के बावजूद नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी देश को किस तरह एकदलीय व्यवस्था की ओर ले जा रही है.
इस मान्यता की परीक्षा संसद के सोमवार से शुरू हो रहे मॉनसून सत्र में होगी. ज्यादा संभावना तो यही है कि यह सत्र भारत में एकदलीय व्यवस्था के विकास की पुष्टि कर देगा.
बेशक इसका दूसरा पहलू भी है. यह दूसरे दल के उभार की संभावना का रास्ता भी बना सकता है, बशर्ते यह दल उन क्षेत्रीय दलों का बचा-खुचा वोट बैंक अपने पाले में ले आए जिन्हें भाजपा फिलहाल नष्ट करने या हड़प लेने की कोशिश में जुटी है.
विडंबना यह है कि भाजपा की यह कामयाबी कांग्रेस को बीजेपी के लिए एकमात्र अखिल भारतीय चुनौती के रूप में उभरने का अपना जज्बा मजबूत करने का मौका दे सकती है.
मुझे मालूम है कि इस मान्यता पर काफी संदेह किया जाएगा, बल्कि कांग्रेस से घोर नफरत करने वाले और हताश हो चुके उसके प्रेमी इसका मखौल भी उड़ाएंगे. लेकिन मोदी, शाह और बीजेपी इससे सहमत हो सकते हैं. उन्हें मालूम है कि उनके खिलाफ एकमात्र बड़ी चुनौती कांग्रेस ही है. बीते वर्षों में मोदी के चुनावी भाषणों को ले लीजिए. सबसे ज्यादा हमला वे कांग्रेस और गांधी परिवार पर ही करते रहे हैं.
यह सिलसिला उन राज्यों में भी जारी रहा है जिनमें कांग्रेस शून्य है. आंध्र प्रदेश में मोदी ने बार-बार कहा कि कांग्रेस ने तुष्टीकरण की अपनी नीति के चलते राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के आयोजन का बहिष्कार किया.
झारखंड में एक कांग्रेस मंत्री के घरेलू नौकर के घर से बरामद नकदी का हवाला देते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि सभी दलों ने अपनी नकदी का भंडार कहां बना रखा है. आंध्र प्रदेश में भी उन्होंने ऐसा ही सुर अपनाया, जबकि 2024 में वहां कांग्रेस को मात्र 2.74 प्रतिशत वोट ही मिले. उसी चुनाव अभियान में ओड़ीशा (कांग्रेस के लिए एक और शून्य प्रदेश) में उन्होंने सवाल किया कि क्या कांग्रेस के ‘शहजादे’ ‘2014 वाली कहानी दोहराने जा रहे हैं?” बिहार में, जहां कांग्रेस यादव परिवार की जूनियर पार्टनर है, मोदी ने कांग्रेस की “तुष्टीकरण की राजनीति” पर बार-बार हमले किए. पश्चिम बंगाल में बीजेपी की एकमात्र प्रतिद्वंद्वी थी ममता बनर्जी की टीएमसी, लेकिन मोदी ने कांग्रेस को उसका सहयोगी घोषित करते हुए यह कहा कि ये दोनों पार्टियां महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के रास्ते में रोड़ा अटका रही हैं.
कहीं नगरपालिका का चुनाव भी हो रहा हो और कांग्रेस का वहां कोई नाम-ओ-निशान भी न हो फिर भी आप बीजेपी को कांग्रेस पर हमला करते पाएंगे. यह सब बताता है कि मोदी काँग्रेस को ही अपना एकमात्र संभावित प्रतिद्वंद्वी मानते हैं. उसे वे पूरी नफरत के साथ बेमानी बताते हुए खारिज करते नजर आते हैं.
संसद के मॉनसून सत्र में इस मान्यता की सबसे बड़ी परीक्षा यह होगी कि बीजेपी दलबदल, अधिग्रहण, सदन से गैरहाजिरी आदि के जरिए दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में सफल होती है या नहीं; और संसद का आकार बढ़ाने तथा इसके साथ चुनाव क्षेत्रों का नया परिसीमन करने के लिए संविधान संशोधन करवाने, महिला आरक्षण विधेयक को पास करवाने में सफल होती है या नहीं.
महज 240 सीटों के साथ शुरू करके दो-तिहाई बहुमत के लिए 362 या उससे ऊपर का आंकड़ा जुटा लेना एक सियासी चमत्कार ही होगा.
इसके बाद बीजेपी का अगला लक्ष्य क्या होगा? अगले साल के शुरू में उत्तर प्रदेश और पंजाब में, और अगले साल के आखीर में गुजरात में चुनाव होने हैं. उसके अगले साल कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव होंगे. मैं केवल उन राज्यों को गिना रहा हूं जिनमें लोकसभा के उसके 10 से ज्यादा सांसद हैं.
इनमें से अधिकतर राज्यों में कांग्रेस ही बीजेपी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी होगी. इसलिए उम्मीद यही है कि भाजपा का कांग्रेस विरोधी शोर और तेज होगा. लेकिन भाजपा 2029 और उससे आगे की भी सोच रही है. और, वह किसे अपने भावी प्रतिद्वंद्वी के रूप में देख रही है? जिन क्षेत्रीय और जाति आधारित दलों ने उसे 240 पर सिमटा दिया था उनमें से अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को छोड़ अधिकतर दलों का सफाया कर दिया गया है.
बीजेपी ने उनमें फूट डालकर या दलबदल करवाकर और ‘ऑपरेशन लोटस’ के तमाम अभियानों के तहत बरबाद कर दिया है. बीजेपी के हाथों हार झेलने से कोई क्षेत्रीय दल नहीं बचा है. डीएमके जिंदा है और वह अपनी विचारधारा को बचाए हुए है, लेकिन हकीकत यह है कि तमिलनाडु में बीजेपी की कोई ताकत नहीं है. आंध्र में चंद्रबाबू नायडु की तेलुगु देसम पार्टी (टीडीपी) ने ठोस गठबंधन बना लिया है. उनके प्रतिद्वंद्वी वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी की YSRCP भी बीजेपी से मुक़ाबला नहीं करने वाली.
INDIA खेमे के इतने सारे घटक जबकि घायल, टूटफूट और मृत हो चुके हैं तब कांग्रेस के लिए भविष्य एक नई चुनौती भी है और एक नया मौका भी. क्या वह बीजेपी की एकमात्र या लगभग एकमात्र प्रतिद्वंद्वी के रूप में साहसिक छलांग लगा सकती है? इसे इस तरह से देखें. कांग्रेस के 21 फीसदी वोट तो पक्के दिखते हैं. बीजेपी को 2024 में करीब 37 फीसदी वोट मिले. कांग्रेस को 37 फीसदी वोट लाने की जरूरत नहीं है. वह 5 फीसदी ज्यादा वोट भी ला सके तो बीजेपी के लिए खेल बिगाड़ सकती है.
आप यह मान कर चल सकते हैं कि इस अतिरिक्त वोट में से ज्यादातर बीजेपी से टूटकर आएंगे, क्योंकि कांग्रेस के खिलाफ बीजेपी की कामयाबी की दर सबसे ज्यादा है. कांग्रेस ने अगर 30-32 फीसदी वोट हासिल कर लिए तो बीजेपी करीब 200 के आंकड़े में सिमट जाएगी. तब उसके नेतृत्व वाले एनडीए का रूप बदल जाएगा. बेशक ये सब केवल सैद्धांतिक बातें हैं, लेकिन बीजेपी को भी इनका इल्म है. यही वजह है कि जब उसका मुक़ाबला टीएमसी या बीजेडी या YSRCP से होता है तब भी वह काँग्रेस को ही अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानती है.
चूंकि हम सैद्धांतिक बातें कर रहे हैं, तो अकादमिक सूत्रों का हवाला देना उपयुक्त होगा. जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित ‘जर्नल ऑफ डेमोक्रेसी’ के जुलाई 2026 में प्रकाशित, राजनीतिशास्त्रियों एडगार सार और पेलिन अयान मुसील के रिसर्च को देखें. इसका शीर्षक भारत में प्रचलित इस धारणा के काफी उलट है कि सत्ता में बैठे दल को पराजित करने का एकमात्र मान्य रास्ता गठबंधन ही है. कांग्रेस के दौर में बीजेपी ने एनडीए का गठन किया, उसके बाद कांग्रेस ने यूपीए के जरिए उसे जवाब दिया. जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी वाली रिसर्च ने, जिससे मुझे हमारे राजनीतिक संपादक डी.के. सिंह ने अवगत कराया, इस तर्क को हंगरी और तुर्की के उदाहरण देकर पलट दिया है.
रिसर्च पेपर के लेखकों का कहना है कि “यह निबंध विद्वानों और रणनीतिकारों के बीच बनी इस सहमति को उलटता है कि प्रतियोगी अधिनायकवादी व्यवस्था में प्रबल सत्ताधारी दलों को चुनाव-पूर्व बनाए गए व्यापक गठबंधन ही गद्दी से हटा सकते हैं.” उनका कहना है कि इसके प्रमाण हैं “दो आश्चर्यजनक सत्ता परिवर्तन—एक, हंगरी में 2006 में हुआ सत्ता परिवर्तन जिसमें एक ही दल ‘टिस्ज़ा पार्टी’ ने विक्टर ओर्बान की फिदेस्ज़ पार्टी को सत्ता से बेदखल कर दिया था; दूसरे, 2024 में तुर्की में निर्णायक स्थानीय चुनावों में रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (सीएचपी) ने अकेले ही भारी जीत हासिल की”.
हंगरी में फिदेस्ज़ पार्टी के असंतुष्ट नेता पीटर माग्यार ने नई पार्टी खड़ी की और ओर्बन को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरा. माग्यार भी ओर्बन जितने घोर दक्षिणपंथी हैं. तुर्की में सीएचपी ने खुद को नये रूप में ढाला और “व्यापक विपक्षी मतदाताओं को अपने पक्ष में समेट लिया”.
यह ‘व्यापक विपक्षी मतदाता’ असली पेंच है. यह हर लोकतंत्र में मौजूद होता है, भारत में भी है. विपक्ष इस वोट को एकजुट करने के लिए बहुदलीय गठबंधनों का गठन करता रहा है. क्या कांग्रेस इसकी कोशिश अकेले अपने बूते करने की हिम्मत कर सकती है?
हम श्रीलंका और नेपाल में देख चुके हैं कि ताकतवर दल को भी किस तरह सत्ता से बेदखल किया जा सकता है. मैं उनमें बांग्लादेश को शामिल नहीं करता क्योंकि वहां सत्ताधारी दल पर रोक लगाकर चुनाव करवाए गए. श्रीलंका और नेपाल में नए नेता नए विचारों के साथ एकदलीय चुनौती के रूप में उभरे.
क्या कांग्रेस खुद को नए अवतार के रूप में उभार सकती है? वाम-दक्षिण वाला द्वंद्व नहीं कारगर होगा क्योंकि जनकल्याण, वितरणवादी अर्थनीति, सार्वजनिक क्षेत्र, सबसीडी, आदि के मुद्दों पर मोदी कांग्रेस के मुक़ाबले ज्यादा वामपंथी झुकाव प्रदर्शित करते रहे हैं. हर चीज के लिए, उनकी नीतियों के लिए, विदेशी सम्मानों के प्रति उनके झुकाव के लिए, उनकी भाषा और हावभाव के लिए उन पर हमला करने या उनका मखौल उड़ाने पर जवाबी ट्वीट का सामना करना पड़ेगा, और इन सबका उन करीब 15 फीसदी वोटों पर कोई असर नहीं पड़ेगा, जो मोदी बीजेपी की झोली में खींच लाते हैं. कांग्रेस को नया विचार और नया एजेंडा लाना पड़ेगा. वह कहती है कि भाजपा सरकार ने चीन और ट्रंप के आगे घुटने टेक दिए हैं, वह पाकिस्तान का मुक़ाबला नहीं कर सकती, वह इजरायल के प्रति ज्यादा ही दोस्ताना निभा रही है. लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस इनमें से हरेक मसले से कैसे निबटेगी? बदली हुई दुनिया के मद्देनजर कांग्रेस की विदेश नीति, रणनीति और अर्थनीति क्या होगी? वह कहती है कि मोदी आर्थिक वृद्धि के जो आंकड़े दे रहे हैं वे फर्जी हैं. तो कांग्रेस भारत की आर्थिक वृद्धि दर के आंकड़े को 8 फीसदी पर कैसे पहुंचाएगी?
जिस तरह भीषण आपदाओं के बीच से अवसर भी झांकते नजर आते हैं, उसी तरह कठोरतम हकीकतों के बीच से बड़ी विडंबनाएं भी उभरती दिखती हैं. क्षेत्रीय दलों का सामूहिक विनाश एक आपदा ही है. लेकिन यह नई एकदलीय व्यवस्था दो दलों के मुकाबले को जन्म दे सकती है. जरूरत इस बात की है कि चुनौती देने वाले में सत्ताधारी से अकेले लड़ने की हिम्मत और जज्बा हो, और वह नये विचार के साथ मुक़ाबले में उतरा हो.
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