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सुप्रीम कोर्ट. (फाइल फोटो/पीटीआई)
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इधर कई समुदाय, संगठन, धर्माचार्य इतिहासकार व राजनीतिक दल लगातार दबाव बना रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट शीघ्र फैसले अथवा बातचीत द्वारा और नहीं तो कानून बनाकर अयोध्या के रामजन्मूभूमि/बाबरी मस्जिद विवाद का शीघ्र निपटारा किया जाये. मुश्किल यह है कि ऐसा करते हुए वे न विवाद की पेचीदगियों को समझते हैं और न समझना चाहते हैं. उन्हें समझना चाहिए कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट तुरत फुरत सुनवाई की मांग खारिज कर जनवरी में सुनवाई का आदेश दे चुका है, इसलिए शीघ्र फैसले का विकल्प उपलब्ध ही नहीं है.

कानून बनाकर विवाद निपटारा करना हो तो सुप्रीम कोर्ट में लंबित सभी 14 अपीलों को रद्द करना पड़ेगा, जो विधिक नहीं होगा. इनके अतिरिक्त बौद्धों की ओर से दायर रिट पिटीशन नं. 294/2018 भी है, जिसे न्यायालय ने इसी वर्ष एक आदेश द्वारा मुख्य मुकदमे में संलग्न कर दिया है. इस रिट में दावा किया गया है विवदित स्थल पर जो ढांचा छह दिसम्बर, 1992 तक खड़ा था, 2500 वर्ष प्राचीन बौद्ध विहार है.


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ज्ञातव्य है कि 1993 के अयोध्या विशेष क्षेत्र भूमि अधिग्रहण कानून की धारा-4 के तहत इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में चल रहे इस विवाद से जुड़े मुकदमों पर रोक लग गई थी तो उच्चतम न्यायालय ने अपने 24 अक्टूबर 1994 के आदेश में उक्त धारा को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया था कि वह न्याय के स्वाभाविक सिद्धांत के खिलाफ है.

ज्ञातव्य है कि सुप्रीम कोर्ट 1995 में 12 सितम्बर को जारी अपने एक अन्य आदेश में स्पष्ट कर चुका है कि उसके द्वारा पारित किसी भी ऐसे आदेश को, जो पक्षकारों पर बाध्यकारी हो, कानून बनाकर निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता.

यहां जानना चाहिए कि अयोध्या विवाद में सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा व रामलला विराजमान पक्षकार हैं और केंद्र सरकार पर अधिग्रहीत क्षेत्र की यथास्थिति बनाये रखने का दायित्व है. इस व्यवस्था को किसी कानून द्वारा निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता.


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जानकारों के अनुसार राममंदिर के लिए धर्म के आधार पर हिंदुओं के पक्ष में कानून बनाने से संविधान की धारा-14 व 15 का साफ उल्लंघन होगा. देश के संविधान की धारा-14 के अनुसार कानून की निगाह में सारे नागरिक बराबर हैं, जबकि धारा-15 में कहा गया है कि नागरिकों के धर्म, जाति, लिंग और जन्म के स्थान को लेकर उनमें भेदभाव नहीं किया जा सकता.

कुछ हलकों में मुसलमानों पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे बड़ा दिल दिखाते हुए विवादित स्थल से अपना दावा वापस ले लें. परंतु इसमें भी कई बाधाएं हैं. बाबरी मस्जिद के लिए मुकदमा सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड लड़ रहा है जो सरकारी संस्था है और मुसलमानों की तरफ से मुख्य दावेदार है. शिया वक्फ बोर्ड का इसमें कोई दखल नहीं है और फैजाबाद के सिविल जज द्वारा 30 मार्च, 1946 को ही उसके दावे को खारिज किया जा चुका है.

केंद्रीय वक्फ कानून 1995 की धारा-51 व संशोधित वक्फ कानून 2013 की धारा-29 में स्पष्ट कहा गया है कि वक्फ सम्पत्ति मस्जिद न तो स्थानान्तरित की जा सकती है, न गिरवी रखी जा सकती है. साथ ही न उसे बेचा जा सकता है और न ही अन्य उपयोग में लाया जा सकता है. इस कानूनी व्यवस्था के विरुद्ध कोई कदम उठाया जाता है तो वह असंवैधानिक होगा. इस्लामी शरीयत के अनुसार भी मस्जिद जमीन से आसमान तक मस्जिद ही रहती है.


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ज्ञातव्य है 1950 में अयोध्या के उन्नीस मुसलमानों ने फैजाबाद की अदालत में शपथ पत्र देकर विवादित स्थल पर मन्दिर बनाने की अनुमति दी थी परन्तु अदालत ने हिंदू पक्ष को इसका लाभ नहीं दिया था.

इस विवाद को आमतौर पर हिंदू बनाम मुस्लिम कहकर प्रचारित किया जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि उच्चतम न्यायालय में हिंदू पक्षकार भी एक दूसरे के विरुद्ध खड़े हैं. जो 14 अपीलें लंबित हैं, उनमें आठ मुस्लिम पक्ष की ओर से और छह हिंदू पक्ष की ओर से दायर की गई हैं. हिंदू पक्ष की छह अपीलों में से दो रामलला के जबकि मात्र एक अपील मुसलमानों के विरुद्ध है. इसी तरह एक-एक अपील निर्मोही अखाड़ा, राजेंद्र सिंह व सुरेश दास के विरुद्ध है.

साफ है कि इस विवाद में हिंदू पक्षकारों में ही सर्वानुमति नहीं है और वे एक दूसरे के विरुद्ध खड़े हैं. वे स्वयं संगठित होकर किसी एक के पक्ष में अपने दावे नहीं छोड़ रहे और एक दूजे के मुकाबिल हैं. तभी तो मुसलमानों की ओर से कहा जा रहा है कि उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि वे इनमें से किससे और किस आधार पर बात करें.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)


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