छह दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस का दृश्य. (फोटो: गेटी इमेजेज)
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सुलगती अयोध्या, आगजनी, बेकाबू भीड़…

एक ऐसा माहौल जिसमें भय व्याप्त था और अफवाह गर्म, मुझे 7 दिसम्बर 1992 को लखनऊ में संदेश आया कि मैं तुरंत फैज़ाबाद पहुंचूं और ज़िला मजिस्ट्रेट का कार्यभार संभालूं.

जब मैं इलाहाबाद से लखनऊ पहुंचा (वहां मैं रेवेन्यू बोर्ड के सदस्य के रूप में पोस्टेड था) हर तरफ बम सुनाई दे रहे थे- सचिवालय के अंदर से भी बम फटने की आवाज़ें आ रहीं थी. मुझे वहां पर उस समय तत्कालीन मुख्य सचिव वीके सक्सेना तब स्थिति से अवगत करवा रहे थे. उन्होंने मुझे तुरंत अयोध्या जा कर वहां की बिगड़ी हालत पर नियंत्रण करने के लिए भेजा.

8 दिसम्बर 1992 को करीब 4 बजे, मैं फैज़ाबाद के लिए निकला. सारे क्षेत्र में कर्फ्यू लगा हुआ था और फैज़ाबाद जाने वाली सड़कों पर कार सेवक रास्ता रोक कर खड़े थे. मैं हैलीकॉप्टर से वहां पहुंचा. एक अजीब सी मुर्दनी शांति पसरी हुई थी. प्रशासन पिछले एक हफ्ते से बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने में लगा था जो कि खुलकर ‘बाबर की औलादों’ को भारत छोड़ने को कह रहे थे.


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अयोध्या के हज़ारों मुसलमान परिवार बाबरी विध्वंस के बहुत पहले ही डर के मारे शहर छोड़ गए थे. इस विध्वंस के बाद हिंसक भीड़ ने कई मुस्लिम घरों में आग लगा दी थी और बाबरी के पास की मस्जिदों को नुकसान पहुंचाया था. कानून का शासन चल नहीं रहा था और प्रशासन इस सारे उत्पात को मूक दर्शक की तरह देखती रहा. पुलिस पर आरोप लगा कि वह एक पक्ष का साथ दे रही थी और उसने भीड़ को रोका नहीं.

अब कौन प्रशासन पर विश्वास करेगा? इस भड़के हुए माहौल में, मैंने कानून का शासन स्थापित करने का सर्वोपरि काम शुरू किया, लोगों के मन में सुरक्षा का भाव बहाल करने का काम. जो मुसलमान परिवार भागे थे वे बहुत ही खराब हालत में शर्णार्थी शिविरों में रह रहे थे. और वे इस बात से भी डर रहे थे कि कहीं उनको वहां से भी न निकल जाना पड़े. वहां आमतौर पर ऐसा माना जाने लगा था कि ये लोग कभी भी अपने घरों में लौट कर नहीं आ पायेंगे. समाज का ताना बाना हमेशा के लिए छिन्न-भिन्न किया जा चुका था.

मैं इसको बदलने के लिए कटिबद्ध था और इस बंटे हुए माहौल को फिर एकरस करने के लिए भी कटिबद्ध था.


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इसके बाद एक भी हिंसा की घटना नहीं होने दी गई और इस ज्वलंत माहौल को शांत किया गया. रिलीफ कैंप की स्थिति सुधारी गई और सुरक्षा का माहौल बनाया गया. उपद्रवियों को कड़ा संदेश दिया गया. हमारी पहली प्राथमिकता अल्पसंख्यकों में विश्वास पैदा करना था.

गहन चर्चा करके हमने विस्थापित मुसलमान परिवारों को आश्वस्त किया कि राज्य की कानून व्यवस्था उनके साथ है. बहुत मान मनौवल के बाद वे परिवार अपने घरों को लौटने को तैयार हुए. ये एक बड़ा कदम था.

फिर हमने उनके नुकसान का आंकलन किया और जल्दी से घरों की मरम्मत और पुनर्वास और नए घर बनाने के लिए मुसलमान परिवारों को ग्रांट दिए. कई स्थानीय संगठनों और विभागों ने इस पुनर्वास प्रक्रिया में अड़चन पैदा करने की कोशिश की. लाल फीताशाही को दरकिनार किया गया और अड़चनों को हटाया गया.

लोग ही नहीं, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद फैज़ाबाद की पूरी फिज़ा ही बदरंग हो गई थी. फैज़ाबाद की मुख्य सड़क पर कई मस्जिदें टूटी हुई थीं. मेरा दृढ़ निश्चय था कि इन मस्जिदों की मरम्मत करवाऊंगा. कुछ प्रमुख नेताओं को इस काम में जोड़ा और उन्हें सारी सहायता का मैंने वादा किया. मुस्लिम समाज ने सहयोग नहीं किया क्योंकि उनको नहीं लग रहा था कि उनके ज़ख्मों पर मल्हम लगे पायेगा.


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मेरे लिये हमारे संविधान में जो सेक्युलर धारणा है वह मस्जिदों में बसती है. मस्जिद को तोड़ना अयोध्या की गंगा जमुनी तहज़ीब पर आघात था. इसे हमें वापस सही करना था. मस्जिदों की मरम्मत अल्पसंख्यकों के विश्वास को प्राप्त करने के लिए ज़रूरी थी.

करीब एक महीने के अंदर ही, सभी क्षतिग्रस्त मस्जिदों को अपने पहले वाले स्वरूप में लाया गया. कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, न ही कोई हिंसा हुई. साथ चलने का एक दूसरे को सुनने का जज्बा कायम रहा. एक बार फिर फैज़ाबाद-अयोध्या की मिश्रित विरासित की जीत हुई.

फिर साथ ही हमने असली दैत्यों पर हमला भी शुरू किया- गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, बेरोज़गारी जो सभी सरकारों, चाहे वह किसी भी पार्टी की हो, में व्याप्त था. और लोगों ने भी इसपर अच्छी प्रतिक्रिया दी. उनको बताया गया कि न राम मंदिर न बाबरी मस्जिद उनकी दुर्गति को दूर करेगी. खराब शासन ने उनके जीवन को नष्ट किया है. पहली बार 1986 के बाद राजनीति में मंदिर मस्जिद की बजाय विकास का एजेंडा चल निकला. समुदाय एक दूसरे और प्रशासन से सहयोग करने लगे.

(लेखक रिटायर्ड आईएएस अफसर हैं और भारत सरकार में सचिव रह चुके हैं.)


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