Sunday, 3 July, 2022
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काबुल ने बाइडन को भेड़ की खाल में छुपा भेड़ साबित किया, यूरोप, भारत और क्वाड उनके रुख से हैरत में है

अफगानिस्तान पर जो बाइडन को देखने के बाद क्वाड क्या अमेरिकी सहयोगियों की फैंसी नौसेना परेड के अलावा कुछ है?

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काबुल हवाई अड्डे पर करीब 100 लोगों की हत्या करने वाले बम धमाके के कुछ ही घंटे बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने बयान जारी किया कि ‘हम न माफ करेंगे और न भूलेंगे. हम तुम्हें खोज निकालेंगे और कीमत वसूल करेंगे.’ अंतिम सूचना तक धमाके में अमेरिका के 13 सैनिक भी मारे गए थे.

बाइडन ने अपना गुस्सा, संकल्प और आक्रामकता दिखाने की पूरी कोशिश की. लेकिन अफसोस कि खुद उनके लिए और उनके देश के लिए, उनकी छवि वैसी ही उभरी जैसे वे खुद हैं— भेड़ की खाल में भेड़. इस ध्रुविकृत समय में उनके निष्ठावान मतदाताओं की आंखों में अभी भी प्रेरणा से निकले आंसू मौजूद होंगे, लेकिन बाकी लोग या तो उन पर तरस खा रहे होंगे या हंस रहे होंगे. बाइडन जिन अफगानी-पाकिस्तानी जिहादी गुटों के खिलाफ गुस्सा कर रहे थे उन्हें इससे शायद ही कोई फर्क पड़ने वाला है.

बाइडन इस प्रकरण की तुलना 1975 के सैगोन प्रकरण से न ही करें तो बेहतर. वहां तो अमेरिका का मुक़ाबला बाकायदा एक सेना और वायुसेना से था, जिसे चीन सहित पूरे कम्युनिस्ट खेमे का समर्थन हासिल था और वह एक स्पष्ट नेतृत्व के अधीन थी. और उसे जनता का व्यापक समर्थन हासिल था.

लेकिन अफगानिस्तान में तो आपने एक अव्यवस्थित, हथियारबंद गिरोह के आगे बिना शर्त हथियार डाल दिए, जिसके पास न तो शासन तंत्र का कोई दिखावा था, न कोई अपनी जमीन थी और न कोई अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल था. आप शर्म से बचने के लिए बेशक यह कह सकते हैं कि आपने पाकिस्तानियों के आगे समर्पण किया. हां, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने बेशक यह घोषणा की है कि यह एक आज़ादी है, कि अफगानों ने गुलामी की जंजीर तोड़ दी है.


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लेकिन क्या यह किसी भी सिरे से आज़ादी जैसी चीज है? अगर अफगानों ने ऐसा माना होता तो वे घरों से बाहर निकलकर विजेता तालिबानियों को खुशी से गले लगा रहे होते. लेकिन वे तो हजारों की तादाद में काबुल हवाई अड्डे पर जमा हैं कि किसी तरह अपने मुल्क से बाहर निकल जाएं. माएं अपने बच्चों को कंटीले तार के पार उछाल रही हैं, कई परिवार नालों में छुपे बैठे हैं और अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं. कई लोग तो बम धमाके के अगले दिन भी हवाई अड्डे तक बेखौफ पहुंच गए. बाइडन प्रशासन इसे चाहे जिस तरह से देखे, यह उसकी सबसे शर्मनाक हार है.

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वे कह सकते हैं कि उन्हें ट्रंप प्रशासन की करतूतों को भुगतना पड़ रहा है, लेकिन यह बहाना भी उतना ही झूठा है जितना बाइडन के गुस्से और संकल्प का दिखावा खोखला है. पहली बात तो यह है कि डोनाल्ड ट्रंप ने बेशर्त समर्पण और वापसी पर कोई सहमति नहीं दी थी. दूसरे, फरवरी 2020 में दोहा में हुए समझौते के बावजूद उनके प्रशासन ने तालिबान के इस दावे को मानने से इनकार कर दिया था कि वह अफगानिस्तान का इस्लामिक अमीरात है. समझौते के पहले पन्ने पर ही अमेरिका ने इसे साफ कर दिया है.

टूट चुकी यह महाशक्ति आज अफगानिस्तान में अपनी सबसे कीमती और कमजोर संपत्तियों की पहचान तथा ठिकानों के बारे में जानकारी इस उम्मीद में साझा कर रही है कि उसकी रक्षा की जाएगी. इसे एक महान सुपरपावर का ढहना ही माना जाएगा. यह 1989 में सोवियत संघ के विघटन जैसा नहीं है, क्योंकि अमेरिका में इसे बहुत महत्व नहीं दिया जाएगा, सिवा इसके कि इसे बाइडन प्रशासन का अपने कार्यकाल के शुरू में ही, राजनीतिक परिभाषा के मुताबिक, ‘अवशिष्ट’ बन जाना माना जाएगा.

बाइडन को हमने ‘भेड़ की खाल में भेड़’ इसलिए कहा है कि ट्रंप या नामांकन के मामले में अपनी पार्टी के अपने पुराने प्रतिद्वंद्वियों के विपरीत बाइडन खांटी ‘कोल्ड’ योद्धा हैं. अब यह उनकी पुरानी शैली की मिसाल भले हो और ‘कोल्ड वार’ भले जीत गए हों लेकिन इसके आगे ऐसा नहीं लगता है कि उनमें शक्ति प्रदर्शन का बहुत माद्दा है. वे एक ऐसे ‘कोल्ड’ योद्धा हैं जो जोखिम से कतराता है.

पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के संस्मरण बताते हैं कि बाइडन ने उन्हें ओसामा बिन लादेन के एबोटाबाद अड्डे पर छापा मारने की सलाह नहीं दी थी. उन्हें डर था कि यह ऑपरेशन नाकाम रहा तब क्या होगा. डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति जिमी कार्टर के साथ ऐसा हो चुका था. तेहरान में अमेरिकी दूतावास में फंसे बंधकों को वापस लाने का उनका ‘ऑपरेशन ईगल क्लाव’ विफल हो गया था. लड़ाई से कतराने वाले पुराने योद्धा को डर था कि लादेन को खोज निकालने के ‘ऑपरेशन नेप्चून स्पियर’ का हश्र भी कार्टर वाले ऑपरेशन जैसा हो सकता है. उसमें कई हेलिकॉप्टरॉन का इस्तेमाल किया गया था, और हमें क्या मालूम नहीं है कि वे कितने अविश्वसनीय हो सकते हैं. ईरान भेजे गए आठ में से तीन हेलिकॉप्टर खराब हो गए और ऑपरेशन रद्द किए जाने के बावजूद एक तो ट्रांसपोर्ट विमान से टकरा गया जिसमें आठ सैनिक मारे गए. बाइडन फिर ऐसा जोखिम नहीं लेना चाहते थे. आखिर वे एक पक्के ‘कोल्ड’ योद्धा हैं, जिसके लिए अमेरिका सर्वोपरि है और जो जोखिम से निरंतर कतराता रहा है. तभी उन्हें ‘भेड़ की खाल में भेड़’ कहा.


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बाइडन ने दया, सहानुभूति, निष्पक्षता को राजनीतिक उत्पाद बनाकर ट्रंप को हराया. काबुल में पराजय से पहले और उसके बाद के दिनों के उनके बयानों पर गौर कीजिए. उनके किसी बयान में अफगानों के लिए इन मूल्यों की झलक नहीं मिलती.

‘हम देश का निर्माण करने के लिए अफगानिस्तान नहीं गए.’ वाकई? तो आठ साल के ओबामा कार्यकाल में आप वहां से वापस क्यों नहीं लौटे? या लादेन के मारे जाने के बाद ही क्यों नहीं लौट गए? 2004 के बाद 16 साल तक अमेरिका और उसके साथी देशों— अगर मैं भारत का नाम भी जोड़ सकूं—की संयुक्त ताकत राष्ट्र निर्माण में ही तो लगी थी. नाकाम रही, तो आपने वापस हो जाने का फैसला कर लिया. लेकिन कोई समझौता किए बिना? कोई शर्त रखे बिना?

बाइडन ने कहा कि मुझे ऐसे सवालों से परेशान मत करो, मेरे लिए सोचने की बहुत खुशनुमा बातें हैं, मसलन ‘वीकेंड’. इसके अलावा अफगानिस्तान की अशरफ ग़नी सरकार को शर्मसार करना! ग़नी ने शर्मनाक काम किया. अपने पराजित सहयोगी के लिए ऐसा कोई कहता है भला? वह भी उसे खारिज कर देने के बाद?

अफगान फौज के बारे में भी उन्होंने इसी तरह अपमानजनक बातें कही जबकि इस फौज ने पिछले दो दशकों में अमेरिका एवं साथी देशों की फौज के मुक़ाबले 30 गुना ज्यादा सैनिकों को खो दिया. अंततः वह आसानी से हार गई, लेकिन तभी जब अमेरिका वायुसेना से सहारा देने, आधुनिकीकरण करने, इलेक्टोनिक खुफियागीरी, और इसके वायुसैनिक अड्डों को सुरक्षा देने की वादे करके पीछे हट गया. अफगान फौज वायुसेना और इलेक्ट्रोनिक कवच के बिना सामरिक रूप से अंधे कुएं में पहुंच गई, हालांकि अमेरिकियों ने उसे बहुआयामी आधुनिक युद्ध लड़ने का प्रशिक्षण दिया था.

वहां छोड़ी गई वायुसेना की संपत्तियों की देखभाल के लिए रखे गए ठेकेदार भी भाग गए. नतीजा यह हुआ कि लड़ाई के अंतिम दिनों में अफगान वायुसेना का कहीं पता नहीं था. अब तालिबान को पूरा खजाना मिल गया है जिसमें ब्लैकहॉक हेलिकॉप्टरों का बेड़ा, क्लोज़-सपोर्ट विमान, हजारों हम्वी, लाखों राइफल और मशीनगन शामिल हैं. इस तरह की वापसी किस तरह का कमांडर-इन-चीफ करता है? और फिर पूरे मामले को बड़ी बेरुखी से खारिज भी कर देता हो?

जब तक कि मानव बमों ने अमेरिकी सैनिकों समेत 100 से ज्यादा लोगों को उड़ा नहीं दिया. जोखिम से भागने वाले किसी शख्स के लिए यह क्रूरता ही मानी जाएगी कि उसका विमान युद्धक्षेत्र के ऊपर मंडरा रहा हो लेकिन उम्मीद से भरकर आसमान ताक रही अफगान फौज की मदद करने का जोखिम नहीं उठाता. यह सब कितना अजीब लगता है यह जानने के लिए ‘न्यू यॉर्क टाइम्स’ में जनरल सामी सादात का लेख पढिए. सादात अफगान फौजी अभियानों के युवा प्रमुख हैं.

हताश बाइडन, अमेरिकी फौजी सत्ता से जिनके मोहभंग पर काफी बहस हो चुकी है, शायद बुश जूनियर के इन शब्दों को ही प्रतिध्वनित कर रहे थे कि ‘हम उन्हें उनकी मांद से बाहर निकलने को मजबूर कर देंगे…’

बाइडन अगर अपनी चेतावनी पर अमल करते हैं तो एक दृश्य यह उभर सकता है. सबसे पहले तो यह ‘निष्कर्ष’ पेश कर दो कि मामला केवल ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ खोरासण प्रोविन्स’ (आइएसकेपी) का है. इसके बाद किसी नेता/नेतृत्व की और उसके अड्डे की पहचान करो और फिर उस पर ड्रोन से या वायुसेना से हमला कर दो. हर सूरत में उन्हें पाकिस्तान की मदद लेनी पड़ेगी. दूसरा कोई उपाय नहीं है.

अमेरिका ने एक राष्ट्रपति (बुश जूनियर) के दावों की खातिर पाकिस्तान पर निर्भरता के लिए दो दशक तक खून और खूनी पैसे से कीमत चुकाई. अब उसके लिए काम करने वालों से हारने के बाद दूसरा राष्ट्रपति अपने लोगों को संतुष्ट करने के लिए रावलपिंडी की बाहों का सहारा लेगा. हम जानते हैं कि मूर्खता कितनी आसानी से बांटी जा सकती है. लेकिन आइएसकेपी के वर्तमान मुखिया को मारने के बाद बाइडन का अमेरिका क्या करेगा?

जल्दी ही दूसरा मुखिया खड़ा हो जाएगा. अफगानिस्तान फिर इस्लामी उग्रवाद की ग्लोबल नर्सरी बन जाएगा. जो भी यह सोचता है कि पाकिस्तानियों के संरक्षण में तालिबान बेहद मतान्ध समूहों के होते हुए एक अमूर्त राष्ट्र-राज्य का स्वरूप हासिल कर लेगा तो वह मुगालते में होगा. क्या यह फिर पुराना दुष्चक्र शुरू कर देगा– आतंकवाद के खिलाफ जंग में पाकिस्तान अगुआ बनेगा, जिसका अर्थ है कि अंततः आपकी हार ही होनी है?

बाइडन के घरेलू मतदाताओं को इससे कोई नुकसान नहीं होगा. यह हम ट्रंप को मिले वोटों के आंकड़े में देख सकते हैं, हार हो तो भी ‘आधार’ जो है वह अपने नेता को बहुत हद तक माफ कर देता है. लेकिन इससे अमेरिका की दबदबे वाली छवि को बहुत चोट पहुंचेगी. भारत समेत उसके सभी साथियों को झटका लगा है. अगर इतने में ही वह सब कुछ छोड़ कर भाग खड़ा हो जाता है और हमले की जद में फंसे साथी को दोषी ठहराने लगता है, तो चीन से खतरा महसूस कर रहे ताइवान, जापान, या दक्षिण कोरिया उस पर कैसे भरोसा कर सकते हैं? भारत ही कैसे भरोसा कर सकता है? तब क्वाड का सिवा एक छलावे, कभी -कभार नौसैनिक परेड या तमाशे के सिवा क्या महत्व रह जाता है? बाइडन काबुल में धमाका करने वाले आतंकवादियों को जो भी करें या न करें, उन्होंने ग्लोबल रणनीतिक चिंतन में उथलपुथल मचा दिया है.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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