31 अगस्त 2020 की रात जब भारत और चीन कैलास पर्वत पर युद्ध के कगार पर पहुंच गए थे, तब जो घटनाएं घटी थीं उन्हें भारत के सैन्य इतिहास के सबसे निर्णायक क्षणों में शुमार किया जाएगा. कैलास पर्वत क्षेत्र पर अपना वर्चस्व कायम करने के भारतीय सेना के सामरिक कौशल की व्यापक तारीफ हुई है. लेकिन इस प्रकरण का व्यापक महत्व कुछ और है, वह यह कि इसने भारत के सिविल-मिलिट्री (नागरिक-सैन्य) संबंध, और संकट के समय रणनीतिक निर्णय की प्रक्रिया के स्वरूप को उजागर कर दिया.
पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने अपनी अप्रकाशित मगर व्यापक रूप से उद्धृत पुस्तक ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ के जरिए एक असुविधाजनक मगर जरूरी बहस की शुरुआत कर दी है.
31 अगस्त 2020 की रात 8.15 बजे जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की थलसेना और तोपें रेचिन ला की ओर बढ़ आईं तब सेना अध्यक्ष जनरल नरवणे ने राजनीतिक नेतृत्व से दिशानिर्देश मांगा. जनरल नरवणे के मुताबिक, उन्हें इसका व्यापक, अस्पष्ट और संक्षिप्त किस्म का जवाब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की ओर से दो घंटे बाद रात 10.30 बजे मिला. रक्षा मंत्री ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री से बात की है, यह बिलकुल सैन्य निर्णय का मामला है: “जो उचित समझो वह करो”. जाहिर है, फैसला सेना पर छोड़ दिया गया.
घटनाओं के इस ब्योरे का खंडन न तो सरकार ने किया है, और न जनरल नरवणे ने. मीडिया में बहस इस बात को लेकर हो रही है कि एक सामरिक मसले के मामले में सेना अध्यक्ष ने दिशानिर्देश की जो मांग की वह उचित थी या नहीं और प्रधानमंत्री ने पूरी ज़िम्मेदारी के साथ स्पष्ट रणनीतिक दिशानिर्देश न देकर पांच शब्दों में अस्पष्ट-सा जो निर्देश दिया वह क्या उचित था? जब संघर्ष चार महीने से चल रहा था, तब ऐसी स्थिति बनी तो यह अकल्पनीय और चिंताजनक ही है.
रेचिन ला वाली घटना एक बुनियादी सैद्धांतिक सवाल को जन्म देती है: जब सामरिक फैसलों के कारण रणनीतिक टकराव की स्थिति बनती हो, तब राजनीतिक सत्ता और सैन्य कमान के बीच किस तरह का संवाद होना चाहिए? सवाल व्यक्तियों या राजनीतिक विकल्पों का नहीं है. यह संस्थागत वास्तविकता का मामला है—भारत की नागरिक-सैन्य संरचना और रणनीतिक निर्णय प्रक्रिया का स्वरूप सैद्धांतिक दृष्टि से अधूरा बना हुआ है.
सामरिक सवाल ने रणनीतिक खामी उजागर की
लद्दाख में 2020 में जो संकट पैदा हुआ वह पारंपरिक युद्ध से बिलकुल अलग स्थितियों के तहत पैदा हुआ. पीएलए ने पहले कार्रवाई करते हुए 1959 की अपनी दावा सीमारेखा को मजबूत किया और पांच स्थानों में करीब 1,000 वर्गकिमी इलाके पर भारत को नियंत्रण से वंचित कर दिया. भारत ने शुरू में इसे सीमारेखा को लेकर सामान्य धौंसबाजी का मामला माना और यह सोचा कि पहले की तरह इस बार भी कूटनीतिक प्रयासों के जरिए यथास्थिति फिर बहाल कर ली जाएगी. लेकिन, सेनाओं की वापसी के समझौते को लागू करने में हुई गलती के कारण जून 2020 में गलवान कांड हुआ था जिसे भुलाया नहीं जा सकता. उस घटना में भारत को अपने एक कमांडिंग अफसर समेत 20 सैनिक गंवाने पड़े थे.
संकट के दौरान सुरक्षा मामलों को कैबिनेट कमिटी (सीसीएस) की कई बैठकें हुईं. ‘चाइना स्टडी ग्रुप (सीएसजी)’ ने सेना के साथ संवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभाई. यह असामान्य किस्म की बात थी, क्योंकि ‘सीएसजी’ का गठन सीमा क्षेत्र के प्रबंधन और विकास के लिए किया गया था. आश्चर्य की बात यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) की बैठक कभी नहीं हुई और वह पूरी तस्वीर से बाहर रही. रणनीतिक और सामरिक मोर्चे पर झटका झेलने के बाद सरकार ने एक व्यापक रणनीति अपनाई : अपनी सेना की भारी तैनाती करके चीन का सामना करो मगर युद्ध से बचो. सामना करने के सख्त नियम बनाए गए और गतिशील सैन्य साधनों के इस्तेमाल का निषेध किया गया. पहले की तरह, यह रणनीति मौखिक रूप से प्रसारित की गई, कोई लिखित निर्देश नहीं दिया गया. जमीनी स्थिति गतिशील, अस्थिर, और विस्फोटक थी.
शुरुआती विफलता से परेशान सेना ने पीएलए पर दबाव बनाने के लिए जवाबी कार्रवाई की आपात योजना बनाई. इनमें चूसुल सेक्टर में कैलास पर्वत क्षेत्र पर फिर से अपना वर्चस्व हासिल करना शामिल था. इस क्षेत्र से स्पांग्गुर त्सो घाटी के 25-30 किमी विस्तार पर कब्जा रखा जा सकता है. योजना में, फिंगर 4 के ऊपर ऊंची पहाड़ियों को भी अपने कब्जे में लेना शामिल था ताकि पैंगोंग त्सो के उत्तर से पीएलए की घुसपैठ को रोका जा सके. ये दोनों ऑपरेशन एलएसी का उल्लंघन किए बिना पूरे किए जा सकते थे. अगस्त के अंत तक, चार बड़ी ब्रिगेड और मेकेनाइज्ड फोर्स असेंबली एरिया में इंतजार कर रही थी.
तत्कालीन नदर्न आर्मी कमांडर ले.जनरल वाई.के. जोशी ने अपनी किताब ‘हू डेयर्स विन्स: अ सोल्जर्स मेमॉयर’ में पहले की गई जवाबी कार्रवाई का जिक्र किया गया है वह 29-30 अगस्त की रात को सफलतापूर्वक की गई और अगले 48 घंटे में मजबूती हासिल कर ली गई. पीएलए अचंभित रह गई और उसने सेना की तैनाती का सामना करने की कार्रवाई की. जनरल नरवणे के अनुसार, सेना ने इस आशंका के कारण ऑपरेशन किया कि पीएलए 29 अगस्त की रात कैलास की पहाड़ियों पर आकर जमने की पहल कर सकती है.
मेरे विचार से सेना ने इज्जत बचाने वाली ऐसी सैन्य कार्रवाई के लिए हिचक भरे राजनीतिक नेतृत्व से मंजूरी हासिल करने की कोशिश की, जो कार्रवाई पहले ही की जा चुकी थी, और इस कार्रवाई का मकसद सेना और देश का मनोबल उठाना था. यह अनौपचारिक राजनीतिक लक्ष्य के विपरीत था. आश्चर्य की बात यह है कि काम हो जाने के बाद काम की मंजूरी ‘सीसीएस’ ने नहीं बल्कि ‘सीएसजी’ ने 30 अगस्त को दी.
सेना अध्यक्ष के ज़ोर देने पर सशस्त्र मुक़ाबले के नियम भी बदले गए. उन्होंने लिखा: “तय किया गया कि अगर हमारी सुरक्षा खतरे में हो तो अंतिम उपाय के तौर पर केवल वही टुकड़ी आत्मरक्षा में गोली चला सकती है जो मुक़ाबले में सामने है”.
जब कोई बड़ा ऑपरेशन चल रहा था तब सेना अध्यक्ष को ‘काइनेटिक फोर्स’ (पारंपरिक युद्ध के साधनों) के इस्तेमाल की पूरी आज़ादी की मांग करनी चाहिए थी. राजनीतिक नेतृत्व इसकी मंजूरी देने में साफ तौर पर हिचक रहा था.
कैलास पर्वत क्षेत्र पर भारतीय सेना का कब्जा एक साहसिक ऑपरेशन था. इसने पहल उसके हाथ में सौंप दी, लागत दुश्मन के लिए बढ़ गई, और सामरिक संतुलन बदल गया. लेकिन उस प्रकरण ने सिविल-मिलिट्री के बीच गहरे तनाव को उजागर कर दिया. जब आगे बढ़ रही चीनी तोपों से सीधा मुक़ाबला करने की नौबत दिखने लगी तो सेना के कमांडरों ने सीधे मुक़ाबले और युद्ध को तेज करने के नियमों के बारे में राजनीतिक
स्पष्टता हासिल करने की कोशिश की. जैसा कि बताया गया है, राजनीतिक निर्देश सावधानी भरा और खुला हुआ था.
जनरल नरवणे ने दूरंदेशी और संयम के साथ संकल्पबद्धता दिखाई, और निश्चित युद्ध को टाला, जो कि राजनीतिक लक्ष्य भी था. फिर भी, रणनीतिक व्यवस्था केवल व्यक्तिगत निर्णय के बूते हासिल सफलता पर निर्भर नहीं रह सकती. संस्थाओं का मूल्यांकन अनुकूल नतीजों के आधार पर नहीं किया जाता बल्कि दबाव में किए जाने वाले अनुमानित आचरण के आधार पर किया जाता है. इसलिए, रेचिन ला प्रकरण युद्धक्षेत्र के प्रकरण से ज्यादा का मामला बन जाता है, यह सिविल मिलिट्री संबंध की अस्पष्टता का उदाहरण बन जाता है.
सिद्धांत से इतर रणनीतिक निर्णय
संवैधानिक रूप से, भारतीय सेना निर्वाचित राजनीतिक सरकार के जरिए नागरिक सत्ता के अधीन काम करती है. राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए सेना का इस्तेमाल करना सरकार का विशेषाधिकार है. बीते वर्षों में, भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा के साधनों को ये औपचारिक रूप दिए— सुरक्षा पर कैबिनेट कमिटी, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (जिसमें स्ट्रेटेजिक पॉलिसी ग्रुप, नेशनल सिक्यूरिटी एड्वाइजरी बोर्ड, और संयुक्त खुफिया कमिटी शामिल हैं), डिफेंस प्लानिंग कमिटी और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ.
फिर भी आश्चर्य और समझ में न आने वाली बात यह है कि भारत का राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर कोई औपचारिक ‘विजन’, रणनीति और प्रतिरक्षा नीति नहीं है. सेनाएं लफ्फाजी भरे राजनीतिक भाषणों या विषय केंद्रित संबोधनों (जिन्हें प्रायः सेना तैयार करती है, रक्षा मंत्रालय/पीएमओ जांचता है और जिन्हें कमांडरों के संयुक्त सम्मेलनों, ‘सीसीएस’ और दूसरे मंचों पर पढ़ा जाता है) से उभरने वाले ‘रणनीतिक विचारों’ के आधार पर सैन्य रणनीति तैयार करने की जद्दोजहद करती रहती हैं.
इन खामियों का असर लड़ाई के दौरान किए जाने वाले रणनीतिक फैसलों पर पड़ता है. प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ‘सीसीएस’ के दौरान या व्यक्तिगत तौर पर राजनीतिक दिशानिर्देश ‘सीडीएस’, तीनों सेनाओं के अध्यक्षों को मौखिक रूप से दिया करते हैं. संघर्ष या युद्ध का राजनीतिक मकसद, युद्ध शुरू करने के समय या अवधि, सैन्य ऑपरेशन के पैमाने, युद्ध में तेजी, सीधी मुठभेड़ से संबंधित नियम ‘सीसीएस’ या ‘एनएससी’ सचिवालय की ओर से लिखित रूप में औपचारिक तौर पर नहीं जारी किया जाता. सरकारों द्वारा
राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति और नीति को औपचारिक स्वरूप न देने और संकट के दौरान लिखित दिशानिर्देश ने देने की मुख्य वजह जवाबदेही से बचना है.
समस्या जीहुजूरी करने वाली ऐसी सेना की वजह से और बढ़ जाती है, जो प्रतिबंधों या सीमाओं के कारण सैन्य ऑपरेशंस पर पड़ने वाले प्रभावों की पर्याप्त व्याख्या नहीं करती. इससे भी ज्यादा खतरनाक स्थिति वह होती है जब सेना ऐसे मिशनों के लिए तैनात किए जाने के नतीजों की ओर सख्ती से संकेत नहीं करती जो उसकी क्षमता के बाहर हैं, जैसा कि 1962 में हुआ था.
रेचिन ला में जो कुछ हुआ था उसने इन्हीं सैद्धांतिक खामियों को उजागर किया. चीन जैसे ताकतवर प्रतिद्वंद्वी का बिलकुल करीब में बड़े पैमाने पर सेना की तैनाती के बूते कैसे सामना किया जा सकता है जबकि आपको यह साफ पता नहीं है कि अपनी गतिशील सैन्य साधनों का किस तरह प्रयोग करना है? वह भी तब, जबकि गलवान में आपके 20 सैनिक मारे गए हों? विडंबना यह है कि यह 1961-62 की ‘आगे बढ़ते चलो’ वाली नीति की विरासत है. उस समय कमजोर हवाई ताकत के साथ अलगथलग पड़ी भारतीय सेना को अपने से बड़ी संख्या में पीएलए के सैनिकों का सामना करना पड़ा था. इसने देश को गलती से अंततः युद्ध में धकेल दिया था और सेना को ऐसे मिशन में उतार दिया था जो उसकी क्षमता से बाहर था. यह नौबत एक संयुक्त सचिव के दस्तखत के तहत जारी संक्षिप्त दिशानिर्देश के कारण आई थी.
’ऑपरेशन सिंदूर’ को भारी सफलता मिली, लेकिन उसके घोषित राजनीतिक और सैन्य लक्ष्य आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों (यानी पाकिस्तानी सेना) को सजा देने पर केंद्रित थे. और अगर वास्तव में राजनीतिक और सैन्य लक्ष्य थे, तो यह गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि इससे यह जाहिर होता है कि पाकिस्तान को दहशत में डालने का रणनीतिक लक्ष्य सोच-समझकर तय नहीं किया गया था बल्कि गलती से तय हो गया था.
लक्ष्यों के मामले में सीमाएं तय करके सेना के ऑपरेशन में राजनीतिक दखल के कारण शुरू में सामरिक झटके
मिले.
यह सुधार का समय है
चीन और पाकिस्तान से दो मोर्चों पर चुनौती के कारण भारत के लिए सुरक्षा का जो माहौल उभर रहा है वह सिविल मिलिट्री संबंधों और रणनीतिक निर्णय की प्रक्रिया में स्पष्टता की जरूरत को अनिवार्य बना रहा है. लेकिन इससे पहले, निश्चित रक्षा बजट के साथ सेना में तेज परिवर्तन लाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा ‘विजन’, रणनीति, और इस पर आधारित राष्ट्रीय रक्षा नीति को औपचारिक स्वरूप देना जरूरी है.
संकट, संघर्ष या युद्ध के समय ‘सीसीएस’ के फैसले राजनीतिक दिशानिर्देश के रूप में औपचारिक तौर पर जारी किए जाने चाहिए. ये दिशानिर्देश ‘एनएससी’ तैयार करे और रक्षा मंत्रालय इसे ‘सीडीएस’ तथा तीनों सेनाओं के अध्यक्षों को जारी करे. इसमें राजनीतिक इरादे और लक्ष्य स्पष्ट रूप से दर्ज होने चाहिए. सीमाओं, युद्ध के स्टार में तेजी, सीधी मुठभेड़ के नियमों को साफ-साफ बताया जाना चाहिए, खासकर अस्पष्ट किस्म के संघर्षों के मामलों में, और इनमें सैन्य ऑपरेशनों की बुनियादी शर्तों का उल्लंघन न हो. कमांडरों को पता होना चाहिए कि किस तरह की कार्रवाई राजनीतिक रूप से स्वीकार्य नहीं होगी.
दिशानिर्देश जारी होने के बाद सेना को घोषित रणनीतिक मंशा के अनुरूप ऑपरेशन की आज़ादी दी जानी चाहिए. लंबे संघर्ष या मुठभेड़, जो कि भारत की सीमाओं पर आम है, के मामले में कमांड की कड़ी जबकि ‘सीसीएस’ से शुरू होकर रक्षा मंत्री और फिर ‘सीडीएस’ और तीनों सेना अध्यक्षों तक पहुंचती है, ‘एनएससी’ सलाह, फैसले, और संकट प्रबंधन के मामलों में केंद्रीय एजेंसी की भूमिका निभा सकती है.
रेचिन ला में सामरिक सफलता मिली और रणनीतिक चेतावनी मिली. इसने सामरिक और ऑपरेशन संबंधी मामलों में साहस, पहल, और पेशेवराना रुख का प्रदर्शन किया. लेकिन इसने यह भी उजागर कर दिया कि अभी भी एक ऐसी व्यवस्था उभर रही है जिसमें राजनीतिक नेतृत्व सीमाओं को औपचारिक रूप से परिभाषित किए
बिना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है और सेना के कमांडर औपचारिक राजनीतिक निर्देशों के अभाव में रणनीतिक ज़िम्मेदारी संभाल लेते हैं.
भारत के लिए भविष्य के संघर्ष उलझन भरे माहौलों में उभर सकते हैं, जो युद्ध से नीचे के स्तर के होंगे लेकिन जो तेजी से बड़ा आकार ले सकते हैं. ऐसी परिस्थितियों में केवल सैन्य ताकत से काम नहीं चलेगा. निर्णायक बात यह होगी कि राज्यसत्ता राजनीतिक मंशा को संस्थागत सिद्धांत के बूते सैन्य कार्रवाई से जोड़ने में कितना सक्षम है.
अंतिम सबक सीधा-सा है और वह यह है कि कोई भी देश हमेशा जुगाड़ के बूते संकटों से नहीं उबर सकता. व्यक्तिगत निर्णय अगर एक बार कारगर होता है तो उसे अपेक्षित शासन कौशल में तब्दील किया जाना चाहिए. तभी भारत में सिविल-मिलिट्री संबंध प्रकरण-दर-प्रकरण स्वरूप ग्रहण करने की जगह रणनीतिक परिपक्वता में तब्दील हो पाएगा.
लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग PVSM, AVSM (R) ने इंडियन आर्मी में 40 साल तक सेवा की. वे C नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड के GOC थे. रिटायरमेंट के बाद, वे आर्म्ड फोर्सेज़ ट्रिब्यूनल के मेंबर थे. विचार निजी हैं.
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