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फिल्म रांझना में अभय देयोल जिस यूनिवर्सिटी के छात्र नेता हैं और सोनम कपूर बनारस से पढ़ने के लिए जिस यूनिवर्सिटी में आती हैं, वह जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी ही है, जिसे लोग जेएनयू कहते हैं. फिल्मों और कथा साहित्य में जेएनयू की एक छवि बनाई गई है. आंदोलनकारियों की जेएनयू, खूब पढ़ने-लिखने वालों की जेएनयू, आईएएस-आईपीएस बनने के लिए बेचैन जेएनयू, वामपंथी विचारों की जेएनयू, आगे पढ़ने के लिए फॉरेन जाने को छटपटाती जेएनयू. एक और छवि मीडिया ने जेएनयू की बनाई है. टुकड़े-टुकड़े गैंग की जेएनयू, व्यभिचारियों और नशेड़ियों की जेएनयू, देश का पैसा बर्बाद करती जेएनयू.

लेकिन असली जेएनयू है क्या? आखिर लाल इंटों वाली, बिना पलस्तर की उन बिल्डिगों के पीछे है क्या? जिसे लेकर इतनी चर्चा होती है, इतना विवाद होता है? क्या है जेएनयू कल्चर?आइए जेएनयू कल्चर के बारे में कुछ जानते हैं.

जेएनयू की राजनीतिक संस्कृति में क्रांतिकारी जनगीतों की बेहद सुनहरी परंपरा रही है. यहां तक कि दुनिया भर में सराहनीय इस कैंपस में एक स्वस्थ लोकतांत्रिक, राजनीतिक संस्कृति को गढ़ने और संवारने में तमाम राजनीतिक क्रियाकलापों और नवीन आचार-व्यवहारों के साथ-साथ इस बहुरंगी लोक परंपरा की जनभावनाओं वाले जनगीतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

शुरूआत में जब मैं जेएनयू आया था तो ढपली के ताल पर गाए जाने वाले ये जनगीत मुझे बहुत लुभाते थे. हम लोग अलग अलग लेफ्ट पार्टियों के जनसंगठनों में काम करते थे, एक दूसरे की राजनीतिक निर्णयों एवं मतों को पुरजोर तरीके से काटते और खंडन-मंडन करते थे. दुनिया भर के मुद्दों पर एक दूसरे से वाक् युद्ध करते और धक्का लगाते रहते थे. अक्सर हम अपने नारों में विपक्षी जन संगठनों की आलोचना करते हुए कहते कि – ‘गुजरात के दंगाइयों को एक धक्का और दो, उधर से नारा आता कि सिंगूर-नंदीग्राम के हत्यारों को एक धक्का और दो’, मगर यह धक्का कभी हाथापाई या शारीरिक हिंसा का रूप नहीं लेते थे.

राजनीतिक आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों में हमारे आपस में हमेशा राजनीतिक मतभेद रहते लेकिन ये जनगीत ही थे जो हमारे आपसी राजनीतिक मतभेद और रोष को खत्म करके एक साथ बैठा देते थे. इस संदर्भ में जेएनयू कैंपस देश और दुनिया के शैक्षणिक संस्थानों से अनूठा है.

ये गंवई जनगीत राजनीतिक कार्यकर्ताओं में कभी भी व्यक्तिगत द्वेष और घृणा पनपने नहीं देते थे. धरना प्रदर्शन के दौरान जब ये जनगीत गाए जाते तो लिबरल से लेकर अल्ट्रा रेडिकल तक के सभी संगठनों के कार्यकर्ता सहज ही एक साथ मिल कर सुर में सुर मिलाने लगते थे.जनगीत खत्म होते ही फिर वैचारिक अंतरों और दृष्टिकोणों को लेकर मुट्ठी बांधे हाथ लहराने लगते.

हालांकि यह बात भी उतनी ही सच है कि प्रतिरोध स्थल पर गाए जाने वाले इन रोचक और जोश भरने वाले जनगीतों की परंपरा एवं संस्कृति को वास्तव में लेफ्ट ने जिंदा रखा और आगे बढ़ाया. इस बात के लिए वामपंथ को हमेशा सराहा जायेगा और जाना भी चाहिए. मगर यहां भी एक बात गौर करने वाली है कि वामपंथी जनसंगठनों में एसएफआई के कुलीन, अभिजात्य वर्ग के पुश्तैनी कामरेडों के कान में ये ठेठ, गंवई जनगीत पानी की तरह जरूर कसकते थे. उनके नाक-भौं के ऐंठन और शारीरिक भंगिमाओं से हम लोग सहज ही अंदाजा लगा ले जाते थे कि उनके कानों में कुलबुलाहट हो रही है.

लेकिन वह दौर 2010-11 का था और देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में मंडल-2 लागू हो चुका था. गाँव-देहात के पिछड़ों की पहली पीड़ी विश्वविद्यालयों के मुख्य द्वार को लाँघते हुए कैंपस के चहरदीवारों को देख रही थी और नौ मंजिला पुस्तकालय की किताबों को छान रही थी.

काफी हद तक यह भी सच है कि उच्च शिक्षा में पिछड़ों या मंडल के पहली पीढ़ी की इस पलटन का प्रथम शरणस्थली आइसा, ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टुडेंट्स फोरम, या फिर एआईएसएफ, एसएफआई रहा है. ओबीसी आरक्षण पर आइसा के ढुलमुल रवैये के चलते ओबीसी का एक वर्ग उससे टूट कर एआईबीएसएफ संगठन की स्थापना की और पहली बार दलित-पिछड़े लोगों पर केंद्रित होकर काम करना शुरू किया. पढ़ने-लिखने, पोस्टर-पर्चा चिपकाने, ऊंची आवाज में नारा लगाने, नए-नए नारों को गढ़ने, हर तरह से लड़ने-भिड़ने में माहिर इस मेहनतकश जमात से कैंपस के अभिजात्य वर्गों और कुलीनों को बहुत चुनौती मिली. उनके पास खिसियाने और बिलबिलाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. ये ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवक-युवतियाँ भी उन्हें चिढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे. फिर भी कैंपस में राजनीतिक कार्यकर्ताओं की वैचारिक परवरिश का माहौल ऐसा था कि जातीय घृणा, कट्टरता और शत्रुता की जगह बहुत कम थी.

इन जनगीतों में सत्ता को चुनौती देने वाले स्वर और समाजवाद के सपनों को पिरोया जाता था. कबीर, रैदास, फैज़ अहमद फैज़, साहिर लुधियानवी, बल्ली सिंह चीमा, नागार्जुन, पाश, मुक्तिबोध, गोरख पांडे आदि की कविताओं और गीतों को पूरी तन्मयता के साथ ढपली के थापों के सहारे गाया जाता था. कुछ पुराने जनगीतों में नई बदली राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप बदलाव कर दिये जाते थे.

अइसा के फेसबुक पेज से

लेकिन दुखद है कि जेएनयू में अब ये परंपरा खत्म सी हो गई है. अब जेएनयू के जंगलों और विरोध प्रदर्शनों में हमेशा गाए जाने वाले ये जनगीत नहीं सुनाई देते हैं. 9 फरवरी 2016 की घटना, जिसे लेकर जेएनयू को तमाम तरीके से बदनाम किया गया, ने लेफ्ट की जनवादी सांस्कृतिक परंपरा की भी कमर तोड़ दी है. सोशल मीडिया या मीडिया में रातों रात नेता बनने की चासनी ने सबका स्वाद ऐसा बिगाड़ दिया है कि बौद्धिक और वैचारिक बहसों की जगह संकुचित होती जा रही है.

खैर आज जब देश के विश्वविद्यालयों और कैंपसों में देश के मुद्दों को लेकर बहुजन छात्र-नौजवानों की राजनीतिक सक्रियता और वैचारिक चेतना जाग रही है, ऐसे में मुझे कई क्रांतिकारी जनगीत याद आ रहे हैं. इन जनगीतों में कुछ रोचक और आकर्षक गीत जो मेरे जैसे हजारों लोगों ने कैंपस में दाखिल होने के बाद सीखे और आंदोलनों में गाए, जैसे- कहब ते लग जाई धक से….. समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई…. लाज़िम है कि हम भी देखेंगे, हम देखेंगे…. गुलमिया अब हम नाही बजइबो, अजादिया हमरा के भावे ले…. हमे हल्के में मत लेना… . कमरा में बांधे तलवार हे सखि सांवर गोरिया….. ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के….. बड़ी बड़ी कोठिया सजाए पूंजीपतिया…. सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है, दिल पे रख कर हाँथ कहिए देश क्या आज़ाद है… इत्यादि.

हालांकि वामपंथी आंदोलनों तथा राजनैतिक रैलियों में इस तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा जनगीत प्रायः हमें देखने-सुनने को मिलते हैं. लेकिन ये जनवादी परंपरा सिर्फ लेफ्ट पार्टियों मे ही रही है, ऐसा कहना भी उचित नहीं होगा. भारत की समाजवादी परंपरा वाली पार्टियाँ भी ग्रामीण जनता से जमीनी तौर पर जुड़ने के लिए लोक कला एवं जनवादी संस्कृति को अपने आंदोलनों और राजनैतिक कार्यकर्मों में हाल के वर्षों तक तरजीह देती रही हैं. मुझे बचपन से याद है कि उत्तर प्रदेश में माननीय मुलायम सिंह यादव जब भी सूबें में राजनैतिक रैली करते थे तो उनके मंच पर बिरहा, रागिणी या लोकगीत गाने वाली रंगमंडलियाँ हमेंशा से बुलाई और सराही जाती रही हैं. ठीक इसी प्रकार माननीय लालू यादव भी बिहार में जब भी अपना राजनीतिक कार्यक्रम करते तो रंगकर्मियों के बिना कोई भी कार्यक्रम पूरा नहीं होता था.

हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या के बाद देश भर में खड़े हुए बहुजन नौजवानों के राजनीतिक आंदोलन में भी लोक परंपरा की भूमिका को देखा गया. एनडीए की केंद्र में सरकार बनने के बाद हाल के दिनों मे छात्र आंदोलनों को कुचल कर, छात्र नेताओं पर पुलिस केस, निष्कासन की नोटिस और हजारों रूपये का जुर्माना थोप कर, जिस तरह से कैंपस के राजनैतिक माहौल को खत्म करने की कोशिश किया गया है वह चिंताजनक है. यह चिंता कैंपस को बचाने के साथ साथ उसमें लोकतांत्रिक जगह बनाने एवं राजनीतिक संस्कृति को गढ़ने एवं सवांरने का भी है.

सवाल जेएनयू को, जेएनयू कल्चर को जिंदा रखने का है, क्योंकि उसमें पूरे देश की झलक दिखती है और वंचितों को स्वर मिलता है. यहां लेफ्ट, राइट और आंबेडकरावादी, लोहियावादी सभी विचार टकराते हैं. लेकिन यहां हिंसा की जगह नहीं है.

(लेखक- जेएनयू में पीएचडी कर रहे हैं और देश में सामाजिक न्याय के मुद्दों को लेकर छात्र आंदोलनों में सक्रिय हैं)


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