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Thursday, 19 February, 2026
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चीन के साथ भारत के बेहतर रिश्तों से बीजिंग-इस्लामाबाद संबंधों में बढ़ती दरार

155 अरब डॉलर पर, भारत-चीन व्यापार बीजिंग-इस्लामाबाद व्यापार से कम से कम सात गुना ज्यादा है, जो 23 अरब डॉलर है.

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पहाड़ों से ऊंचा, समुद्र से गहरा, शहद से मीठा…सच में? यह कहावत चीन और पाकिस्तान के बीच बेहद करीबी, “आयरनक्लैड” रणनीतिक साझेदारी को बताने के लिए इस्तेमाल होती है. दोनों देशों के नेता अक्सर अपनी दोस्ती को दिखाने के लिए इस वाक्य का इस्तेमाल करते रहे हैं.

हालांकि, अब इस दोस्ती पर गहरा दबाव है. यह स्थिति उनके आपसी किसी समस्या की वजह से नहीं, बल्कि बीजिंग और नई दिल्ली के बीच बढ़ते आर्थिक और राजनीतिक रिश्तों की वजह से पैदा हुई है. ड्रैगन और हाथी अब पहले से ज्यादा मजबूत आर्थिक रिश्ते में बंधे हुए हैं और BRICS और जी20 जैसे मंचों पर, जिनका पाकिस्तान सदस्य नहीं है—उनके रणनीतिक लक्ष्य भी उन्हें करीब ला रहे हैं.

20 ट्रिलियन डॉलर की सालाना जीडीपी के साथ, चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और इस दशक के अंत तक भारत तीसरे स्थान पर होगा. यह सही है कि 4.5 ट्रिलियन डॉलर के साथ भारत को अभी काफी आगे बढ़ना है—यह अभी भी चीन की अर्थव्यवस्था का एक-चौथाई है, लेकिन भारत 7.4 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रहा है, जबकि चीन की विकास दर 3-4 प्रतिशत है.

भारत के पास सही ‘जनसंख्या लाभ’ भी है. भारत की आबादी रिप्लेसमेंट लेवल से थोड़ा ज्यादा बढ़ रही है, जबकि चीन में यह घट रही है. साथ मिलकर, वे 2035 तक अमेरिका की जीडीपी को पीछे छोड़ देंगे, जिससे वैश्विक ताकत का केंद्र पश्चिम—यूरोप और अमेरिका, से पूर्व—एशिया, की ओर स्थायी रूप से शिफ्ट हो जाएगा.

यह शक है कि तब तक पाकिस्तान 42वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी स्थिति बनाए रख पाएगा या नहीं, क्योंकि उसकी 3 प्रतिशत सालाना विकास दर को 2.77 प्रतिशत की जनसंख्या वृद्धि दर काफी हद तक खत्म कर देती है. इससे देश में पहले से चल रहे खाद्य, पानी, रोजगार और स्वास्थ्य संकट और बढ़ेंगे. अगर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कमजोर होती रही, तो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) में लगाए गए लगभग 62 अरब डॉलर के निवेश का भविष्य भी खतरे में पड़ जाएगा, जिसमें ग्वादर पोर्ट और एयरपोर्ट शामिल हैं.

हालांकि, एयरपोर्ट और पोर्ट दोनों तकनीकी रूप से पूरी तरह काम कर रहे हैं, लेकिन पिछले साल पोर्ट पर 30 से भी कम कार्गो जहाज आए. इस स्थिति में चीन के लिए पोर्ट की ऑपरेटिंग लागत निकालना भी मुश्किल होगा. 2024-25 में इस आधुनिक सुविधा ने पाकिस्तान के कुल कार्गो ट्रैफिक का 1 प्रतिशत से भी कम हिस्सा संभाला और भीड़भाड़ वाला कराची पोर्ट अब भी निर्यातकों और आयातकों के लिए परेशानी बना हुआ है. ग्वादर एयरपोर्ट की स्थिति और भी खराब है क्योंकि वहां से अभी तक कमर्शियल उड़ानें शुरू नहीं हुई हैं.

भारत का असर

1960 के दशक में, पाकिस्तान और चीन दोनों के हित पूरी तरह एक जैसे थे. बीजिंग ने इस्लामाबाद को अपने करीब किया क्योंकि वह अपने शिनजियांग प्रांत को तिब्बत से जोड़ना चाहता था (जिस पर उसने 1950 के शुरुआती सालों में कब्ज़ा कर लिया था) और पाकिस्तान ने पाकिस्तान के कब्ज़े वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) के गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में शक्सगाम घाटी (जिसे ट्रांस काराकोरम ट्रैक्ट भी कहा जाता है) के 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीन को दे दिया. भारत ने इस समझौते को नहीं माना है और इसे ‘भारतीय क्षेत्र का अवैध हस्तांतरण’ मानता है.

पिछले छह दशकों में, चीन ने अपनी रक्षा व्यवस्था मजबूत की, नागरिक बुनियादी ढांचा बनाया और इस क्षेत्र की जनसंख्या संरचना बदल दी, लेकिन अब जब यह सब हो चुका है, तो चीन को पाकिस्तान की पहले जैसी ज़रूरत नहीं है. हालांकि, भारत अभी भी संविधान के अनुच्छेद 1 की अनुसूची 1 के अनुसार इस क्षेत्र पर अपना कानूनी अधिकार (de jure sovereignty) होने का दावा करता है, लेकिन ज़मीन पर सच्चाई यह है कि इस क्षेत्र पर चीन का पूरा वास्तविक नियंत्रण (de facto control) है और पाकिस्तान और भारत दोनों का वहां कोई नियंत्रण नहीं है.

हालांकि, भारत चीन को मान्यता देने वाले पहले देशों में था, लेकिन माओ जेदोंग और चोउ एनलाई अफ्रीकी-एशियाई दुनिया के नेता के रूप में जवाहरलाल नेहरू से आगे निकलना चाहते थे. बांडुंग सम्मेलन के बाद तनाव बढ़ने लगा था और भले ही दोनों देश “हिंदी-चीनी भाई-भाई” कहते थे, लेकिन मैकमोहन लाइन (जिसे भारत मानता है, लेकिन चीन नहीं मानता) पर कई सीमा झड़पें हुईं. यह लगभग 890 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो हिमालय के साथ है.

अक्टूबर 1962 में, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के सैनिक नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (NEFA, जिसे अब अरुणाचल कहा जाता है) में घुस आए और असम के तेजपुर तक पहुंच गए और एक महीने बाद मैकमोहन लाइन तक वापस चले गए. यह भारत के लिए एक बड़ी हार थी और नेहरू इस झटके से कभी पूरी तरह उबर नहीं पाए, लेकिन इससे भारत को बहुत महत्वपूर्ण सबक मिले. राजनीतिक नेतृत्व ने रक्षा की अहमियत को समझा.

भारतीय सेना के पुनर्गठन की कहानी—हार से दोबारा मजबूत बनने तक—को उस समय के भारत के गृह सचिव आरडी प्रधान ने बताया है, जिन्होंने इसका श्रेय उस समय के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और रक्षा मंत्री वाईबी चव्हाण को दिया. 1965 में, इस सेना ने न केवल पाकिस्तान की जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ की कोशिशों को रोका, बल्कि लाहौर और सियालकोट की ओर भी बढ़ गई.

1976 में, इसी सेना ने सिक्किम में अगस्त-सितंबर में नाथू ला और अक्टूबर में चो ला में चीनी सेना का सामना किया. सैन्य इतिहासकार प्रोबल दासगुप्ता ने इसे अपनी किताब ‘1967: इंडिया’स फॉरगॉटन विक्ट्री ओवर चाइना’ में लिखा है. 1975 में, अरुणाचल में तुलुंग ला में सैनिकों की झड़प हुई और इसके बाद 1987 में समदुरोंग चू घाटी में टकराव हुआ.

2017 में भूटान सीमा पर डोकलाम में झड़प 73 दिनों से ज्यादा चली और फिर 2020 में लद्दाख के गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच झड़प हुई, जहां दोनों देश अपनी-अपनी जगह पर डटे रहे. इसके बाद, दोनों देशों ने पीछे हटने और तनाव कम करने की प्रक्रिया अपनाई और राजनीतिक स्तर पर यह वादा किया कि इस मुद्दे को बिना बल प्रयोग के हल किया जाएगा.

व्यापार में नई दिल्ली काफी आगे

इस बीच, पिछले दशक में भारत ने हर मौसम में काम आने वाली सड़कों के जरिए अपनी सीमा का बुनियादी ढांचा मजबूत किया है, जिनमें से कई सड़कें हेलिपैड के रूप में भी इस्तेमाल की जा सकती हैं. वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम भी शुरू किया गया है—इसके तहत 662 सीमा गांवों को 24×7 बिजली और इंटरनेट कनेक्टिविटी, पीने का पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं दी जा रही हैं. यह प्रोग्राम यह सुनिश्चित करता है कि लोग इन गांवों में रहें और यह क्षेत्र स्किल डेवलपमेंट और छोटे तथा सूक्ष्म उद्योगों के केंद्र बन जाएं.

भारत और चीन ने हाल ही में व्यापार के लिए तीन बॉर्डर पोस्ट—सिक्किम में नाथू ला, हिमाचल में शिपकी ला और उत्तराखंड में लिपुलेख—भी खोले हैं. इसके अलावा, दोनों देशों ने रुपये-युआन में व्यापार को भी बढ़ावा दिया है. इनसे होने वाला व्यापार अभी छोटा है, लेकिन अब जब इन बॉर्डर पोस्ट पर रुपये-युआन व्यापार शुरू हो गया है, तो इन जगहों पर बैंकिंग और लॉजिस्टिक्स ढांचे को मजबूत करने के प्रयास किए जा रहे हैं. पहले प्रति लेन-देन 25,000 रुपये की सीमा थी, उसे भी हटा दिया गया है.

हालांकि, सीमा व्यापार, भारत-चीन के 155 अरब डॉलर के कुल व्यापार का बहुत छोटा हिस्सा है, लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह बीजिंग-इस्लामाबाद व्यापार से कम से कम सात गुना ज्यादा है, जो 23 अरब डॉलर है. इसके अलावा, जहां भारत-चीन व्यापार 12 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, वहीं पाकिस्तान-चीन व्यापार 10 प्रतिशत पर अटका हुआ है. इसलिए दोनों के बीच का अंतर आगे और बढ़ेगा, क्योंकि भारत का आधार पहले से ही बड़ा है. बेहतर लॉजिस्टिक्स और फसल के बाद के बेहतर प्रबंधन के कारण भारत के कृषि निर्यात भी वैश्विक स्तर पर ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो गए हैं.

इस तरह, जहां भारत धीरे-धीरे चीन के साथ अपने खराब रिश्तों को सुधार रहा है, वहीं पाकिस्तान-चीन रिश्तों में दरार अब साफ दिखने लगी है. CPEC कॉरिडोर में आर्थिक नुकसान के अलावा, चीन अपने इंजीनियरों और कर्मचारियों पर बढ़ते हमलों को लेकर भी चिंतित है, जो CPEC और उससे जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं. जनरल शौकिन चौहान ने Fair Observer में लिखा कि ‘यह कॉरिडोर वास्तव में चीन की आर्थिक सीमा से ज्यादा विस्तार और पाकिस्तान के खराब प्रबंधन का उदाहरण है. इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट अधूरे हैं, चीनी ठेकेदार काम पर हावी हैं और बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टिस्तान में स्थानीय लोगों का गुस्सा बना हुआ है.’ उन्होंने कहा, ‘चीन की नीति ने विकास के नाम पर पाकिस्तान को आर्थिक रूप से निर्भर बना दिया है और उसकी संप्रभुता को कमजोर किया है.’

संरक्षक-ग्राहक जैसा रिश्ता

जिस सैन्य साझेदारी की बहुत बात की जाती है, वह वास्तव में संरक्षक-ग्राहक जैसा रिश्ता है. पाकिस्तान चीन से बड़ी मात्रा में सैन्य उपकरण खरीदता है, लेकिन उनकी गुणवत्ता और प्रकृति अलग कहानी बताती है. उदाहरण के लिए, जेएफ-17 थंडर, जो चीन-पाकिस्तान रक्षा सहयोग का प्रतीक है, 1980 के दशक के पुराने चीनी डिजाइन पर आधारित है और आधुनिक लड़ाकू विमानों जैसी उन्नत तकनीक इसमें नहीं है. पाकिस्तान को दिए गए नौसैनिक जहाज अक्सर दूसरे स्तर के या रिटायर होने वाले जहाज होते हैं, जो तकनीक के मामले में उन जहाजों से कमजोर होते हैं, जिन्हें चीन मध्य पूर्व के अमीर देशों को बेचता है. चीन की नीति है कि वह मुख्य तकनीक अपने पास रखता है और ऐसे सिस्टम लगाता है, जिससे पाकिस्तान हमेशा उस पर निर्भर रहे.

हालांकि, पाकिस्तान का शीर्ष नेतृत्व और अमीर वर्ग चीन को अपना पसंदीदा साझेदार मान सकता है, लेकिन आम लोगों के स्तर पर दोनों के बीच बड़ा अंतर है. भाषा, धर्म, धार्मिक ग्रंथ, कपड़े और खान-पान में इतना फर्क है कि इसे पाटना मुश्किल है.

घोषणा: लेखक FEED के मानद चेयरमैन हैं और 2010 से 2013 तक NAFED के मैनेजिंग डायरेक्टर रह चुके हैं.

संजीव चोपड़ा एक पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और वैली ऑफ वर्ड्स साहित्य महोत्सव के निदेशक हैं. हाल तक वे LBSNAA के निदेशक रहे हैं और लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल (एलबीएस म्यूज़ियम) के ट्रस्टी भी हैं. वे सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज़, पीएमएमएल के सीनियर फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @ChopraSanjeev है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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