टूटी हुई शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर आपके मन में कैसी बनती है? दरकती दीवार, बरसों से बंद पड़ा शौचालय या वह शौचालय जो कभी बना ही नहीं, टपकती छत, बिना डेस्क का फर्श, वह कमरा जिस पर आधे साल बरसात का कब्ज़ा रहता है. ये तस्वीरें आंखों के सामने खड़ी हो जाती हैं, और झूठी भी नहीं हैं.
पर स्कूल ठीक करना दीवार और शौचालय ठीक करने से आगे की चीज़ है. दीवार ठीक करना अच्छी शुरुआत ज़रूर है. अच्छी शिक्षा व्यवस्था के लिए अच्छे स्कूल चाहिए पर स्कूल को अच्छा केवल उसकी इमारत नहीं बनाती.
“स्कूल ठीक करो” अभियान के तहत सरकारी स्कूलों का जो सामाजिक ऑडिट चल रहा है, वह एक कड़वी बात याद दिलाता है: व्यवस्था बुनियादी स्तर पर ही बच्चों के साथ नाकाम हो रही है. इस अभियान और इसके इर्द-गिर्द हुई रिपोर्टिंग ने एक के बाद एक ऐसे स्कूल सामने रख दिए हैं जहां शौचालय नहीं, बिजली नहीं, बेंच नहीं, और कहीं-कहीं टिक रहने वाली दीवार और छत भी नहीं.
इस साल पंद्रह अगस्त को उत्तर प्रदेश के संभल में स्कूल के मुख्य द्वार की छतरी गिरी और आठ बरस का एक बच्चा मारा गया. ऐसी नाकामियां किसी फाइल के हाशिये पर लिखी टिप्पणी नहीं हैं. वे बच्चे को साफ शब्दों में बता देती हैं कि व्यवस्था उसकी पढ़ाई को, और उसकी जान को, कितना कम आंकती है. किसी बच्चे को सुरक्षा और पढ़ाई में से एक चुनना न पड़े यह हमें सुनिश्चित करना ही होगा .
तो हां, स्कूल और उनकी इमारतें ठीक कराने की मांग पूरी तरह जायज़ है, कॉकरोच जनता पार्टी के तौर-तरीकों पर आपकी राय जो भी हो. आंदोलन के बाद राज्य सरकारों ने जो ऑडिट कराए, वे इस मांग को सही ठहराते हैं.
राजस्थान में 611 सरकारी स्कूल बिना किसी इमारत के चल रहे हैं. हिमाचल प्रदेश के शिमला ज़िले में 81 फीसदी स्कूलों में साफ पीने का पानी नहीं है और 43 फीसदी में सुरक्षा की चारदीवारी नहीं. ओडिशा ने अपने सभी स्कूलों का सुरक्षा ऑडिट कराने का आदेश दिया है.
सरकार के अपने संयुक्त समीक्षा मिशन और संस्थाओं का बरसों का काम जो बात कहता आया था, सीजेपी उसे आम चर्चा में ले आई. पर मांग स्कूल की इमारत पर खत्म नहीं होनी चाहिए क्योंकि वह ठीक वहीं खत्म होती रही है, गांव से लेकर नीति के सबसे ऊंचे कमरों तक: अहाता दुरुस्त करा दिया, मामला बंद.
बहस से एक बड़ी चीज़ गायब है, वही जो उसके बीच में होनी चाहिए: पढ़ाई की गुणवत्ता. सवाल यह भी है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले करोड़ों बच्चों का सीखना कैसे सुधरे और किस तरह ये स्कूल देश-दुनिया के बेहतरीन स्कूलों जैसे बन सकें.
भीतर की मरम्मत
2026 आ गया है और अब हमें इस समस्या को उसके असली रूप में पहचान लेना चाहिए. सवाल स्थानीय और राज्य सरकारों की उस कूवत का है कि वे हर बच्चे तक अच्छी शिक्षा पहुंचा सकें. सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था वाले देश यही करते हैं, और वे व्यवस्थाएं भी, जो पीसा (प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल असेसमेंट) जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर खरी उतरती हैं. ज़रूरी सुविधाओं से संपन्न एक सुरक्षित स्कूल पहला लक्ष्य पूरा कर देता है, यानी बच्चे को फाटक के भीतर ले आता है. उसे वहां टिकाए रखना और उसमें गुज़ारे बरसों को सार्थक बनाना उस पढ़ाई पर निर्भर है जो सबके लिए बराबर हो और अच्छी हो. जब तक यह नहीं हुआ, हमारी व्यवस्था सुधरी नहीं है.
भारत दुनिया की एक ताकत बन रहा है और सरकारी सेवाएं लोगों तक ढंग से पहुंचाने का दबाव बढ़ता जा रहा है, खासकर शिक्षा और स्वास्थ्य में. विकसित भारत 2047 का दारोमदार एक सीधी सी बात पर टिका है: देश उन नागरिकों से बनता है जो सही अर्थ में शिक्षित हों, महज़ साक्षर नहीं .
जिस देश में जाति और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के 70 फीसदी बच्चे सरकारी स्कूल के भरोसे हैं, वहां गुणवत्ता का फ़र्क रोज़ की ठोस चीज़ों में दिखता है. जून में शुरू हो रहे सत्र के लिए किताब अक्टूबर में जाकर कक्षा तक पहुंचती है. नया पाठ्यक्रम सर्कुलर में घोषित होता है पर उस शिक्षक तक कभी ठीक से पहुंचता ही नहीं जिसे उससे पढ़ाना है. प्रधानाध्यापिका अपने हफ़्ते का बड़ा हिस्सा निरीक्षण और रजिस्टर में खपाती है, बच्चों में नहीं. एक ही शिक्षक एक कमरे में तीन कक्षाएं संभालता है, या अपने समय का चौथाई से ज़्यादा हिस्सा गैर-शैक्षिक कामों में गंवाता है. प्रशासकों और शिक्षकों के पद बरसों खाली पड़े रहते हैं. दाखिले, हाज़िरी और आबादी के आंकड़े दो-दो, तीन-तीन प्रतियों में ऊपर जाते हैं, किसी फाइल में जाकर बैठ जाते हैं और रास्ते में कुछ नहीं बदलते.
इन सबके तले एक बड़ी कमी यह है: नीति चाहे जितनी अच्छी लिखी हो, जब तक वह कक्षा में शिक्षक और बच्चे के बीच होने वाला परस्पर संवाद नहीं बदलती, बच्चे नहीं सीखते और इमारत चाहे जितनी अच्छी दिखे, उन्हें वहां रुकने की कोई वजह नहीं मिलती.
हम खुद सरकारी स्कूलों में पढ़ा चुके हैं और पंद्रह बरस से सरकारी शिक्षा में सुधार का काम कर रहे हैं. इसलिए किसी भी गंभीर बदलाव में शिक्षक के योगदान पर हमें कोई शक नहीं. विकसित भारत बनाने वाले बच्चे उन्हीं कक्षाओं से निकलेंगे जिन्हें ऐसे शिक्षक चलाएंगे जिन्हें व्यक्तिगत मदद मिले, जिनका मन लगे और जो सीखते रहें. उन पर ठीक से पैसा लगाना होगा, समाज में उनकी हैसियत को कीमत देनी होगी, और पढ़ाने के लिए उनका समय और ध्यान बचाना होगा.
तीन काम
तीन कामों पर हम सबका ध्यान जाना चाहिए.
शिक्षकों की भर्ती सुधारिए
देश में एक करोड़ दो लाख से कुछ ज़्यादा शिक्षक हैं (यूडाइस+ 2025-26). इनके साथ ही करीब 9.83 लाख स्वीकृत पद खाली पड़े हैं (संसदीय समिति, रिपोर्ट संख्या 368), और एक लाख से ज़्यादा स्कूल एक ही शिक्षक के भरोसे चलते हैं. पहला काम है इन हालात को आंखों में उंगली गड़ाकर दिखाते रहना: ज़िला स्तर पर बरते जा रहे डैशबोर्ड यह काम करें , जिनमें स्तर और विषय के हिसाब से स्वीकृत, भरे और खाली पदों के अलावा हर साल आवश्यक शिक्षकों की संख्या भी दर्शाई जाती रहे. इसमें उन इलाकों को पहले दर्शाया जाए जहां कमी है और जहां से लोग पलायन करते हैं.
दूसरा काम कठिन है. हम शिक्षकों का चयन लगभग पूरी तरह एक प्रवेश परीक्षा द्वारा करते हैं, जैसा कि प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए किया जाता है. पर शिक्षक का काम विषय की पकड़ से कहीं आगे का है. वह इसपर टिका है कि शिक्षक प्रभावी रूप से पढ़ाकर समझा दे, बच्चों और आसपास के समाज से रिश्ता बनाए और उनकी फिक्र करे, मार-डांट के बिना अनुशासन रखे और ऐसी कक्षा बना सके जिससे हर बच्चा जुड़ाव महसूस करे .लिखित परीक्षा इनमें से कुछ नहीं नापती. यह बदलना होगा.
पढ़ाने का समय बचाइए
शिक्षा का अधिकार कानून की धारा 27 पहले से ही शिक्षकों को गैर-शैक्षिक कामों में लगाने से रोकती है, जनगणना, आपदा राहत और चुनाव ड्यूटी को छोड़कर. इस कानून पर अमल किया जाए और उसका हिसाब रखा जाए: कौन से काम शिक्षक को नहीं दिए जा सकते, यह साफ तौर पर लिखा हो, कक्षा से बाहर की हर तैनाती दर्ज हो, और उससे पढ़ाई के जितने दिन बरबाद हों वे कानून द्वारा तय 200 दिनों में से गिने जाएं.
यह कोई बड़ी मांग नहीं है. राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान के एक अध्ययन में पाया गया कि शिक्षक अपने काम के घंटों का मुश्किल से पांचवां हिस्सा सचमुच पढ़ाने में लगाते हैं. कानूनन जो समय शिक्षकों को मिलता है , सिर्फ़ उसे ही बचा लें तो बड़ी कमाई होगी.
शिक्षक की मदद और कोचिंग पर जोर दीजिए
कहा जाता है कि शिक्षा महकमे में दो ही तरह के लोग होने चाहिए: शिक्षक, और शिक्षकों की मदद करने वाले. हम इस ज़रूरत की पूर्ति से कोसों दूर हैं. शैक्षिक निरीक्षण रिपोर्ट बटोरने के दौरे बनने की बजाय कक्षा देखने और राय देने के दौरे बनें, ताकि अफसर के जाने के बाद शिक्षक के हाथ में करने लायक कुछ हो. शोध लगातार यही कहता है कि कक्षा पर सबसे बड़ा असर कोचिंग और मार्गदर्शन का पड़ता है, और हमारा कोई भी मौजूदा ढांचा यह काम न ढंग से करता है, न तरतीब से.
शिक्षकों के शैक्षणिक क्रियाकलाप नियमित रूप से देखे जाएं, उन पर राय दी जाए, उन्हें सिखाया जाए और मदद दी जाए-विषय के साथ-साथ पढ़ाने के तरीके पर भी, ताकि शिक्षक और बच्चे के बीच जो होता है वह उस अपेक्षा से मेल खा सके जो हमारी नई नीतियां सामने रखती हैं. लगातार सीखने का इनाम भी सीधा मिले: भरोसेमंद पेशेवर पाठ्यक्रमों से मिले क्रेडिट तरक्की में गिने जाएं.
दीवारें मायने रखती हैं. शौचालय बनाइए, छतें ठीक कराइए, चारदीवारी खड़ी कीजिए, और जल्दी कीजिए, क्योंकि बच्चे की सुरक्षा सबसे अहम है. पर मजबूत इमारत वह ज़मीन भर है जिस पर अच्छा स्कूल खड़ा होता है.
कठिन और ज़्यादा ज़रूरी काम इमारत बनने के साथ भी चलेगा और उसके बहुत बाद तक चलेगा, यानी उसके भीतर होने वाली पढ़ाई की गुणवत्ता. भारत के हर दूसरे बच्चे के पास सरकारी स्कूल के सिवा कुछ नहीं है. विकसित भारत का उसके लिए कोई अर्थ है, तो हमारा ध्यान और हमारा पैसा आखिरकार उधर ही मुड़ना चाहिए.
मधुकर बनुरी और सिद्धेश सरमा लीडरशिप फॉर इक्विटी के सह-संस्थापक हैं. प्रतिभा पाढ्ये केंद्रीय विद्यालय में हिंदी विषय की वरिष्ठ अध्यापिका (हिंदी प्रवक्ता) के पद से सेवानिवृत्त हुई हैं. साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने अनेक लघु कथाओं की रचना की है, तथा वे हिंदी रंगमंच से भी सक्रिय रूप से संबद्ध रही हैं. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
लीडरशिप फॉर इक्विटी यह गैर-लाभकारी संस्था सरकारी शिक्षा व्यवस्थाओं के साथ काम करती है, ताकि स्कूल का नेतृत्व और बच्चों का सीखना सुधरे. इसका जोर बुनियादी पढ़ाई पर है.
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