31 अगस्त को पणजी में मराठी आंदोलन चल रहा था. गोवा में कोंकणी के साथ मराठी को भी समान आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की मांग करने वाली मराठी राजभाषा निर्धार समिति के झंडे लिए समर्थकों ने पोरवोरिम में गोवा विधानसभा की ओर मार्च करने की कोशिश की. उन्होंने पुराने मंडोवी ब्रिज को बंद कर दिया. यह राजधानी को नॉर्थ गोवा से जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण मुख्य सड़क है. भीड़ में कुछ छोटे बच्चे भी मौजूद थे, जिनसे गोवा के न्यूज़ चैनल प्रूडेंट मीडिया ने बात की. रिपोर्टर ने नौजवानों से पूछा कि वे “बुजुर्ग लोगों” के साथ प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं और वे इससे क्या हासिल करना चाहते हैं.
बच्चे इसके लिए पहले से तैयार थे कि उन्हें क्या कहना है. उनमें से एक लड़के ने कहा कि वे मराठी के प्रति अपना प्यार दिखाने के लिए प्रदर्शन में आए हैं. उन्होंने “भारत” और “एकता” की बात की, पुर्तगालियों का ज़िक्र किया और यह बताने की कोशिश की कि कोंकणी एक कॉलोनियल थोपी हुई चीज़ है. जब उनसे पूछा गया कि वे हिंदी क्यों नहीं सीखना चाहते, जबकि हिंदी भारतीय संघ की आधिकारिक भाषा है, तो बच्चों ने फिर बातचीत को मराठी की ओर मोड़ दिया.
यह पूरी बातचीत कोंकणी भाषा में हुई.
इसके बाद से यह रील सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर हो रही है और इस पर करीब एक हजार कमेंट आ चुके हैं. कुछ लोग पूछ रहे हैं कि क्या उन्हें वह चाय और समोसे मिले, जिनके लिए वे वहां आए थे. कुछ दूसरे लोग पूछ रहे हैं कि क्या प्रदर्शन में शामिल लोगों को 500 रुपये मिले, जो उन्हें इसमें शामिल होने के लिए जरूर देने का वादा किया गया होगा. ज्यादातर लोग इस बात पर हंसी नहीं रोक पा रहे हैं कि वे मराठी को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं, लेकिन खुद धाराप्रवाह कोंकणी में बात कर रहे हैं.
मराठी-कोंकणी का सवाल
मराठी को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की मांग ने तटीय राज्य गोवा की भाषा की राजनीति में एक नया मोर्चा खोल दिया है. इससे पुरानी चिंताएं फिर सामने आ गई हैं, जो 1967 के गोवा ओपिनियन पोल तक पहुंची थीं. इसके बाद 1987 में गोवा, दमन और दीव आधिकारिक भाषा अधिनियम बनाया गया. इस कानून के अनुसार, देवनागरी लिपि में कोंकणी गोवा की एकमात्र आधिकारिक भाषा है, लेकिन इसी कानून में साफ तौर पर मराठी को राज्य में “सभी या किसी भी आधिकारिक काम” के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई है.
यह कानून मराठी को पूरी तरह आधिकारिक भाषा का दर्जा देने से एक कदम पीछे रह जाता है, लेकिन व्यवहार में इसका मतलब है कि राज्य सरकार की नीति है कि उसे मराठी में मिलने वाले किसी भी आधिकारिक पत्र का जवाब मराठी में ही दिया जाए.
संभव है कि यह प्रावधान एक नाजुक समझौते को बनाए रखने के लिए रखा गया था, लेकिन इस अस्पष्टता की वजह से हर कुछ साल में इस मुद्दे को फिर से उठाने का मौका मिलता रहा है.
इस आंदोलन की अगुवाई गोवा में पुराने आरएसएस गुट के प्रमुख नेता सुभाष वेलिंगकर कर रहे हैं. वह खुद भी धाराप्रवाह कोंकणी बोलते हैं. चार दशकों तक इस कुशल संगठनकर्ता ने गोवा में आरएसएस की शाखाएं खड़ी कीं और नेताओं की एक पूरी पीढ़ी को तैयार किया. इनमें पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर भी शामिल थे. हालांकि, बाद में दोनों के बीच काफी विवाद हो गया और उनके रास्ते अलग हो गए.
पिछले एक साल से वेलिंगकर मराठी के मुद्दे के लिए समर्थन जुटा रहे हैं. इसकी शुरुआत पोंडा और डिचोलीम जैसी जगहों पर तालुका स्तर की छोटी बैठकों से हुई. ये इलाके पारंपरिक रूप से मराठी के मजबूत क्षेत्र माने जाते हैं.
वेलिंगकर ने रैलियों में कहा, “कई सालों से गोवा सरकार मराठी और मराठी बोलने वाले लोगों के साथ अन्याय कर रही है.” उन्होंने सरकार से मराठी को सह-आधिकारिक भाषा घोषित करने की मांग करते हुए कहा, “इससे गोवा के लोगों की स्थानीय संस्कृति का सम्मान होगा.”
चुनावी साल में वेलिंगकर ने साफ कर दिया है कि मराठी वोट बैंक इस मुद्दे पर एकजुट होगा और “बीजेपी को इसके नतीजे भुगतने होंगे.”
इससे पहले भाषा की राजनीति में वेलिंगकर की एकमात्र भागीदारी भारतीय भाषा सुरक्षा मंच के जरिए थी. इस संगठन का उद्देश्य 2011 में अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ कोंकणी और मराठी दोनों की रक्षा करना था. संगठन ने प्राथमिक स्तर के अंग्रेज़ी स्कूलों को सरकार की ओर से अनुदान देने की कांग्रेस सरकार की नीति का विरोध किया था. यह ऐसा मुद्दा था, जिसके खिलाफ मनोहर पर्रिकर और बीजेपी ने भी अभियान चलाया था. हालांकि, अगले साल जब पर्रिकर सत्ता में आए और बीजेपी ने महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी (MGP) के साथ गठबंधन सरकार बनाई, तब भी उन्होंने इन स्कूलों को अनुदान देना जारी रखा.
तभी, वेलिंगकर को जाने के लिए कहा गया और 400 वॉलंटियर्स ने विरोध में इस्तीफा दे दिया.
इसके बाद वेलिंगकर ने गोवा सुरक्षा मंच नाम से एक राजनीतिक पार्टी बनाई, लेकिन उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली. अब वह सांप्रदायिक विवाद खड़े करने के लिए ज्यादा जाने जाते हैं. उन्होंने सुझाव दिया था कि गोवा के सम्मानित संत फ्रांसिस जेवियर से “गोएंचो साइब” की सम्मान वाली उपाधि वापस ले लेनी चाहिए क्योंकि उन्होंने पुर्तगालियों के गोवा में उपनिवेश बनाने में मदद की थी. उन्होंने यह भी कहा था कि बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस में रखे उनके अवशेषों का DNA टेस्ट कराया जाना चाहिए.
वेलिंगकर पर मौजूदा ज्यादातर टिप्पणियों में उन्हें ऐसे संगठनकर्ता के तौर पर देखा जाता है, जिसके पास अब कोई संगठन नहीं है और जो कुछ बेहतर करने के लिए न होने की वजह से अपनी शिकायतों को ज़िंदा रखे हुए है, लेकिन इन शिकायतों की गोवा के इतिहास में गहरी जड़ें हैं.
भारतीय भाषा सुरक्षा मंच की कोर कमेटी के सदस्यों में से एक उदय भेंब्रे हैं. वह 80 साल से ज्यादा उम्र के वकील, राजनेता, लेखक और कोंकणी भाषा के कार्यकर्ता हैं. भेंब्रे आधिकारिक भाषा अधिनियम को लेकर हुए आंदोलन के नेताओं में से एक थे. अब वेलिंगकर इसी कानून में बदलाव की मांग कर रहे हैं.
भेंब्रे इन मांगों को दो हिस्सों वाले आंदोलन महाराष्ट्रवाद और मराठीवाद से जोड़ते हैं. पहला विचार यह है कि गोवा ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भाषाई रूप से महाराष्ट्र का हिस्सा है. इसकी शुरुआत 1940 में ही साहित्यिक सम्मेलनों में पास हुए प्रस्तावों से हुई थी. सदी के काफी बड़े हिस्से तक यह विचार लेखकों के बीच ही बना रहा.
दिसंबर 1961 में गोवा की आज़ादी के बाद स्थिति बदल गई. उस समय महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी ने गोवा का पहला चुनाव इस मुख्य मुद्दे पर जीता कि गोवा को बड़े महाराष्ट्र राज्य में मिला दिया जाना चाहिए.
आखिरकार 16 जनवरी 1967 को ओपिनियन पोल हुआ, जिसे आम तौर पर अस्मिताई दिस (पहचान दिवस) के नाम से जाना जाता है. वोटिंग में लोगों के सामने सिर्फ दो विकल्प थे—महाराष्ट्र में विलय या केंद्र शासित प्रदेश के रूप में गोवा का बने रहना. 54 प्रतिशत मतदाताओं ने महाराष्ट्र में विलय के खिलाफ वोट दिया. भेंब्रे ने एक इंटरव्यू में मुझे बताया, “महाराष्ट्रवाद वहीं खत्म हो गया.” लेकिन मराठीवाद, यानी भाषा के आधार पर संगठन, बचा रहा.
उन्होंने कहा, “हिंदू समुदाय के एक हिस्से ने मराठी को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने का आंदोलन जारी रखा. खासकर 1980 के दशक में, जब भाषा, राज्य का दर्जा और आठवीं अनुसूची को लेकर चर्चा अपने चरम पर थी.”
उनके मुताबिक, पिछले 40 साल में यह आंदोलन रुक-रुककर चलता रहा है, लेकिन इसके समर्थन में पर्याप्त संख्या नहीं है. भेंब्रे ने कहा कि 2011 की जनगणना में गोवा में 9.6 लाख से ज्यादा लोगों यानी करीब 70 प्रतिशत लोगों ने कोंकणी को अपनी मातृभाषा बताया था. इसके मुकाबले 1.6 लाख लोगों ने मराठी को अपनी भाषा बताया था.
भेंब्रे ने कहा, “हम भजन, कीर्तन, साहित्य और पत्रकारिता के लिए मराठी का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन किसी भाषा को राजभाषा घोषित करने का आधार यह नहीं हो सकता. अंग्रेज़ी इस्तेमाल करने वाले लोग तो हमसे भी ज्यादा हैं—असल में उद्योग और प्रशासन की भाषा अंग्रेज़ी है.”
उन्होंने कहा कि कोंकणी लोगों की भाषा है और बच्चे इसे अपनी मां से सीखते हैं, जबकि मराठी प्राथमिक स्कूलों में सीखी जाती है.
इसके बाद सरकारी कामकाज का सवाल भी है. भेंब्रे पूछते हैं कि क्या मराठी को सह-आधिकारिक भाषा का दर्जा मांगने वाले लोग यह समझते हैं कि हर फाइल, नोट और सर्कुलर दोनों भाषाओं में तैयार रखना होगा. इसका मतलब यह भी है कि हर कर्मचारी को दोनों भाषाओं में अच्छी तरह काम करना आना चाहिए.
भेंब्रे ने पूरे भरोसे के साथ कहा, “लोगों के मुताबिक, इस मुद्दे का कोई महत्व ही नहीं है.”
लेकिन अगर इसका कोई महत्व ही नहीं होता, तो यह मुद्दा बनता ही नहीं. अगर मराठी प्राथमिक कक्षाओं में सीखी जाती है, तो इन स्कूलों में आखिर किन लोगों के बच्चे पढ़ रहे हैं?
सारस्वत सत्ता की बची हुई छाप
पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रहे और दक्षिण एशिया में पुर्तगाली साम्राज्य के इतिहास पर रिसर्च कर रहे कौस्तुभ नाइक ने कहा कि कई पीढ़ियों से मराठी गोवा के बहुजन लोगों के लिए आगे बढ़ने और बेहतर सामाजिक स्थिति पाने की भाषा भी रही है. इनमें भंडारी, गोमंतक मराठा, गौड़ा और कुनबी समाज के लोग शामिल हैं.
नाइक का कहना है कि पुर्तगालियों के शासन के दौरान सरस्वत ब्राह्मणों के ऊंची जाति वाले लोगों के पास महत्वपूर्ण पद थे, जबकि बहुजन किसान उन ज़मीनों पर खेती करते थे, जिनके मालिक ऊंची जाति के भाटकर थे. कोंकणी को एक अलग पहचान के रूप में पेश करने की एक वजह गोवा के सारस्वत ब्राह्मणों की जातिगत स्थिति को बनाए रखना भी थी. गोवा की आज़ादी के बाद MGP ने ज़मीन उस व्यक्ति को देने के सुधार को मराठी के साथ जोड़ा और इसका मॉडल महाराष्ट्र के जाति-विरोधी सुधार आंदोलनों, जैसे सत्यशोधक समाज, से लिया गया था.
नाइक ने बताया कि आज बहुजन युवाओं में मराठी से दूरी बढ़ती दिख रही है. इसकी एक वजह यह है कि कोंकणी संगठनों ने कोंकणी भाषा को गोवा की पहचान के साथ जोड़ दिया है. इसके बावजूद मराठी एक ऐसी मांग है, जिसे कई अलग-अलग मुद्दों से जोड़ा जा सकता है. इसे खतरे में पड़ी हिंदू संस्कृति के बड़े विचार के साथ-साथ उपनिवेशवाद के खिलाफ काम से भी जोड़ा जा सकता है.
उन्होंने मुझे बताया, “कोंकणी सारस्वत सत्ता की बची हुई छापों में से एक है.” नाइक का मानना है कि भाषा के पीछे एकजुट होना शायद आज़ाद भारत में खुद को नए तरीके से स्थापित करने की उनकी एकमात्र उम्मीद थी. इसके जरिए वे भाषा पर अपना दावा कर सकते थे और अपनी एक अलग पहचान बना सकते थे, ताकि एक अलग राज्य का दावा किया जा सके, राज्य की सीमाओं के दोबारा बदलाव को रोका जा सके और औपनिवेशिक दौर की अपनी सत्ता और विशेष अधिकारों को बचाया जा सके.
“फिर भी, कोंकणी समुदाय के अंदर मौजूद ऊंच-नीच के सवालों पर सवाल उठाने को लेकर अब भी विरोध है. उदाहरण के लिए, अभी तक बी.आर. आंबेडकर की रचनाओं का कोंकणी में कोई अनुवाद नहीं है. मराठी का ‘खतरे’ के रूप में मौजूद रहना कोंकणी के लिए मददगार है.”
भाषा की इस बहस में सबसे बड़ा नुकसान रोमी कोंकणी को हुआ है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से गोवा का कैथोलिक समुदाय करता है. यह भाषा रोमन लिपि में लिखी जाती है और इसकी छपी हुई किताबों और दूसरी सामग्री की परंपरा 16वीं सदी से लगातार चली आ रही है. आज भी यह गोवा के तियात्र थिएटरों और चर्च की धार्मिक किताबों में इस्तेमाल होती है. लेकिन आधिकारिक भाषा अधिनियम में इसका कोई स्थान नहीं है.
कैथोलिक समुदाय 1985-86 के कोंकणी पोरजेचो आवाज़ आंदोलन में सबसे आगे था. इस आंदोलन में सात लोगों की मौत हुई थी, लेकिन फरवरी 1987 में जब आधिकारिक भाषा अधिनियम पास हुआ, तो उसमें सिर्फ देवनागरी कोंकणी को मान्यता दी गई. नाइक ने कहा कि देवनागरी पक्ष की तरफ से आम तौर पर यह जवाब दिया जाता है कि लिपि भाषा नहीं होती और दोनों एक ही भाषा हैं.
इस मुद्दे पर Substack पर लिखे एक लेख में नाइक ने कहा कि सिर्फ “पहचान दिखाने की राजनीति” से आगे बढ़कर, गोवा, दमन और दीव आधिकारिक भाषा अधिनियम, 1987 में किसी भी बदलाव में लोगों के अधिकारों को ध्यान में रखा जाना चाहिए. देवनागरी कोंकणी, रोमी कोंकणी और मराठी—तीनों को सह-आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए.
नाइक ने लिखा, “यह तीन भाषाओं वाला फॉर्मूला गोवा की भाषा की पहेली में अब भी गायब हिस्सा है.” हालांकि, यह कोई अनजानी सच्चाई नहीं है.
उन्होंने लिखा, “रोमी कोंकणी के समर्थक दशकों से इसे औपचारिक मान्यता देने की मांग करते रहे हैं. हालांकि, मराठी और रोमी कोंकणी के पक्ष में खड़े लोगों के बीच गठबंधन अब तक नहीं बन पाया है. भारत में बढ़ता हिंदू राष्ट्रवादी माहौल, मुख्य कोंकणी आंदोलन का ब्राह्मणवादी नेतृत्व और मराठी नेतृत्व का हिंदुत्व की राजनीति के साथ बढ़ता जुड़ाव—इन सबने अलग-अलग समुदायों के बीच ऐसा गठबंधन बनाना लगभग असंभव कर दिया है.”
गोवा में अपना आधार बनाने की कोशिश कर रही एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया है. मुंबई में यही पार्टी कई सालों से मजदूर वर्ग के प्रवासियों से कहती रही है कि अगर वे राज्य में काम करना चाहते हैं तो उन्हें मराठी सीखनी चाहिए. लेकिन गोवा में यही पार्टी लोगों से यह सोचने को कह रही है कि आधिकारिक भाषा की परिभाषा कितनी व्यापक होनी चाहिए.
फिलहाल इस आंदोलन को थोड़ी राहत मिली है. हो सकता है कि यह आंदोलन कुछ समय शांत रहने के बाद फिर लौटे, लेकिन कम से कम मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने कहा है कि वह आंदोलन की मांगों पर विचार करेंगे. चुनावी साल में उनके लिए यह सबसे सुरक्षित कदम है.
यह लेख Goa Life सीरीज़ का हिस्सा है, जिसमें गोवा की संस्कृति के नए और पुराने दोनों पहलुओं को समझाया जाता है.
करनजीत कौर पत्रकार हैं, Arré की पूर्व संपादक हैं और TWO Design में पार्टनर हैं. उनका एक्स हैंडल @Kaju_Katri है. व्यक्त किए गए विचार निजी है.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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