Thursday, 26 May, 2022
होममत-विमतइटली में हिमालय से भी दुर्गम इलाकों में भारतीय सैनिकों ने युद्ध में कैसे शानदार जौहर दिखाए थे

इटली में हिमालय से भी दुर्गम इलाकों में भारतीय सैनिकों ने युद्ध में कैसे शानदार जौहर दिखाए थे

भारतीय सैनिकों को इटली में बड़े सम्मान से देखा जाता है, इसका अंदाजा मुझे 1975 में ही तब हो गया था जब वहां मोंटे कासीनो में मैं पुराने फ़ौजियों से बातचीत कर रहा था.

Text Size:

भारतीय थलसेना अध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे ने 8 जुलाई को इटली के कसीनो में भारतीय सेना के एक स्मारक का उदघाटन किया. यह स्मारक जनवरी-मार्च 1944 में कसीनो युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों की याद में बनाया गया है.

1975 में इटली में घूमते हुए मैंने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान मोंटे कसीनो में हुई सबसे रक्तरंजित लड़ाई के बारे में जानने के लिए दो दिन बिताए थे. राष्ट्रमंडल युद्ध कब्रिस्तान और कसीनो के स्मारक भारतीय सैनिकों के बलिदान और योगदान को सम्मानित तो करते ही हैं, अब भारत ने जो युद्ध स्मारक बनवाया है वह गर्व की बात है.

‘बैटल ऑफ मोंटे कसीनो’ (1944) में चार अलग-अलग लड़ाइयां लड़ी गई थीं— 12 जनवरी से 9 फरवरी के बीच, 15 से 18 फरवरी, 19 से 23 मार्च, और 11मई से 5 जून के बीच. भारत का चौथा इनफैन्ट्री डिवीजन दूसरी और तीसरी लड़ाइयों में शामिल था.


यह भी पढ़ें: भाजपा MP राजीव चंद्रशेखर चाहते हैं द्वितीय विश्वयुद्ध का हिस्सा रहीं भारतीय मूल की जासूस नूर इनायत खान को मान्यता मिले


पृष्ठभूमि

इटली की रक्षा के लिए जर्मनी ने जो ‘गुस्ताव लाइन’ बनाई थी, मोंटे कसीनो उसकी धुरी थी. हालांकि यह पर्वत केवल 1700 फुट ऊंचा है लेकिन इसका इलाका मध्य हिमालय की तरह बेहद ऊबड़खाबड़ चट्टानों वाला है. ऐसा इलाका और पूरब तथा पश्चिम में तेज प्रवाह वाली नदियां ‘गुस्ताव लाइन’ की मोर्चाबंदी को बेहद मजबूत बना देती हैं.

मित्र राष्ट्रों की सेना ने जनरल हैरोल्ड अलेक्ज़ेंडर के नेतृत्व में 15 आर्मी ग्रुप—5 यूएस आर्मी और 8 ब्रिटिश आर्मी— के साथ सितंबर 1943 में इटली पर हमला कर दिया. वो इटली का मेरुदंड मानी गई मुख्य पर्वतमाला के दोनों ओर दबाव की दो रेखाओं पर आगे बढ़ने लगे. पश्चिमी मोर्चे पर ले.जनरल मार्क डब्लू. क्लार्क के नेतृत्व में 5 यूएस आर्मी नेपल्स के मुख्य अड्डे से आगे बढ़ी, पूरब के मोर्चे पर मशहूर जनरल सर बर्नार्ड मोंटगोमरी के नेतृत्व में 8 ब्रिटिश आर्मी आड्रीयाटिक समुद्र तट के किनारे-किनार आगे बढ़ी.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

दुर्गम इलाका, उफनती नदियों और कड़ाके की ठंड के कारण दोनों सेनाएं दिसंबर 1943 के अंत में गुस्ताव लाइन पर आकर रुक गईं. दुर्गम इलाके की वजह से इस ग्रुप ने रोम तक पहुंचने के लिए पूर्वी मोर्चे का रास्ता छोड़ दिया और पूरा ज़ोर पश्चिमी मोर्चे पर लगा दिया.

गुस्ताव रेखा

दक्षिण-पूर्वी इटली के विस्तार के बीच से जाने वाली 125-150 किमी लंबी ‘विंटर लाइन’ एक्सिस देशों की रक्षा मोर्चाबंदी थी. मुख्य मोर्चाबंदी गुस्ताव रेखा पर की गई थी, जो गारिगलियानो नदी के उत्तर टाइरेनियन सी से शुरू होकर इटली के बीच एपेन्नाइन पहाड़ों से निकलती हुई पूरब में आड्रीयाटिक समुद्रतट पर सांगरो नदी के उदगम पर खत्म होती थी. इसकी दो सहायक रेखाएं थीं—बर्नहार्ट रेखा और हिटलर रेखा.

गुस्ताव रेखा रोम तक जाने वाले मुख्य मार्ग, जो लीरी नदी घाटी से गुजरता है, की रक्षा करता है. मोंटे कसीनों इसकी धुरी था, जिस पर 529 में स्थापित बेनेडिक्टाइन एबे स्थित था. समुद्र तट के पास औरुंची पर्वत लीरी घाटी को संकरा बना देता था. मोंटे कसीनो इस क्षेत्र और रोम तक जाने वाले रास्तों पर छाया हुआ था, और इसके आसपास पांच महीने तक लंबा खूनी युद्ध चला, जो पहले विश्वयुद्ध में पश्चिमी मोर्चे पर लड़ी गई लड़ाई जितना तेज और खूनी था.

विंटर लाइन/विकीमीडिया

सितंबर 1943 में इटली ने हथियार डाल दिए और जर्मनी ने उस पर कब्जा कर लिया. गुस्ताव रेख की रक्षा कर रही सेना वह थी जो उत्तरी अफ्रीका और टूनीसिया में लड़ाई का अनुभव पाकर सख्त हो चुकी थी. 1941 से भूमध्यसागर क्षेत्र में जर्मन सेना के कमांडर, और अब इटली की रक्षा की ज़िम्मेदारी संभाल रहे थे विख्यात फील्ड मार्शल अल्बर्ट केडबल्यू एसेरिंग, जो लुफ्टवाफ जनरल थे. गुस्ताव रेखा की रक्षा कर रहा था 14 पंजेर कोर.


यह भी पढ़ें: अमेरिका ने चीन से अलग होना शुरू कर दिया है, भारत को कम नुकसान हो इसपर मोदी सरकार को काम करना चाहिए


कसीनो की पहली जंग : 12 जनवरी से 9 फरवरी 1944

5वीं यूएस आर्मी को 10 ब्रिटिश कोर के साथ गुस्ताव रेखा की मुख्य रक्षा मोर्चाबंदी पर हमला करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई, 2 यूएस कोर ने लीरी घाटी की तरफ से मोंटे कसीनो पर हमला किया. इससे और आगे पूरब में 6 यूएस कोर दूर उत्तर में अंजियो पर जलमार्ग से 22 जनवरी को पहुंचने वाला था ताकि मुख्य रक्षापंक्ति को बेदखल कर सके.

मुख्य रक्षा मोर्चे के करीब पहुंचने के बाद पहला हमला 17 जनवरी को 10 ब्रिटिश कोर ने किया और गारिगलियानो नदी के पार जाने को मजबूर कर दिया. जर्मनी के 94 इनफैन्ट्री डिवीजन पर रेखा पर डटे रहने का भारी दबाव था, और रिजर्व फोर्स का उपयोग जीत दिला सकता था. केसेलरिंग ने रॉम क्षेत्र के 29वें और 90वें पंजेरग्रेनेडियर डिवीजन को और सेना भेजने का आदेश दिया. इस तरह 21 जनवरी को मोर्चा मजबूत हो गया. पहली लड़ाई में 10वें कोर के तीन डिवीजन के 4,000 सैनिक मारे गए और घायल हुए. 3/8 पंजाब रेजीमेंट के सिपाही कमल राम को विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया.

लीरी घाटी में और मोंटे कसीनो की तरफ सेकेंड कोर ने मुख्य हमला 20 जनवरी को शुरू किया. 36 यूएस इनफैन्ट्री डिवीजन ने गारी नदी के पार जो हमला किया उसे मशहूर 15 पंजेर डिवीजन के जवाबी हमले ने नाकाम कर दिया. 48 घंटे में यूएस डिवीजन के 2,100 सैनिक मारे गए और घायल हुए. 34 यूएस डिवीजन ने कसीनो के उत्तर में रापीडो नदी के पार हमला किया. आठ घंटे की जबरदस्त लड़ाई के बाद वह उत्तर के पर्वत और मोंटे कसीनो के पूरब में पैर जमा पाया और 44 जर्मन इनफैन्ट्री डिवीजन को उसने पीछे धकेल दिया. दाहिनी तरफ के मोर्चे पर फ्रांस के एक्सपेडिशनरी कोर को 2100 सैनिकों से हाथ धोना पड़ा.

करीब एक महीने की भयंकर लड़ाई के बाद क्षत-विक्षत 2 यूएस कोर को मोंटे कसीनो क्षेत्र से हटा लिया गया और उसकी जगह न्यूजीलैंड कोर— 2 न्यूजीलैंड डिवीजन और 2 इंडियन इनफैन्ट्री डिवीजन— को तैनात किया गया. 22 जनवरी को अंजियो में जो सफल जलथलीय तैनाती की गई वह न तो रोम की तरफ ज्यादा बढ़ पाई और न गुस्ताव रेखा पर ज्यादा दबाव डाल पाई क्योंकि जर्मनी का जावाबी हमला तेज था और मोरचाबंदी को सीमित करने के लिए रिजर्व फोर्स का उपयोग किया गया.

कसीनो की दूसरी जंग : 15-18 फरवरी 1944

न्यूजीलैंड कोर को 34 यूएस इनफैन्ट्री डिवीजन द्वारा बनाए गए मजबूत अड्डे का इस्तेमाल करके मोंटे कसीनो पर कब्जा करना था. दोतरफा हमले की योजना बनाई गई. मोंटे कसीनो पर कब्जा करने के लिए 4 इंडियन इनफैन्ट्री डिवीजन को उत्तर की ओर से हमला करना था और न्यूजीलैंड डिवीजन को हमला करके कसीनो रेलवे स्टेशन और शहर पर कब्जा करना था.

लड़ाई से पहले मित्र राष्ट्रों के एक विवादास्पद फैसले के कारण छठी सदी का बेनेडिकटाइन अबे युद्ध के दौरान 15 फरवरी को सबसे भीषण बमबारी के कारण नष्ट हो गया. अबे पर जर्मनी का कभी कब्जा नहीं था. लेकिन इसकी 50 फुट ऊंची दीवारें ‘रक्षात्मक किले’ का प्रतीक थीं. इसका नतीजा उलटा हुआ, जर्मनी के 1 पाराशूट डिवीजन ने खंडहर पर कब्जा कर लिया और इसे एक किले में बदल दिया. खराब तालमेल के कारण हमला करने में देर हुई.

                   न्यूजीलैंड कोर के हमले की योजना, 17-18 फरवरी 1944

स्रोत: द्वितीय विश्व युद्ध का आधिकारिक इतिहास – यूनाइटेड किंगडम सैन्य श्रृंखला, भूमध्यसागरीय और मध्य पूर्व, वॉल्यूम- 5: ब्रिगेडियर सी.जे.सी. द्वारा सिसिली और इटली में अभियान. मोलोनी

मोंटे कसीनो पर उत्तर से हमला 7 इंडियन इनफैन्ट्री डिवीजन ने 17-18 फरवरी की रात शुरू किया. इलाका बेहद दुरूह था और बारूदी सुरंगों से पटा पड़ा था, जिसमें जर्मन एस बारूदी सुरंगे फटने पर तीन फुट तक ऊपर उछलती थीं और भारी संख्या में सैनिकों को हताहत करती थीं. पूरे तालमेल से चलने वाली मशीनगनें भी इलाके में तैनात थीं. हमला सुबह तक मामूली लाभ के बाद कमजोर पड़ गया.

उसी रात कसीनो में 2 न्यूजीलैंड डिवीजन की 28 माओरी बटालियन ने कसीनो रेलवे स्टेशन पर हमला करके उसे कब्जे में ले लिया. लेकिन टैंक काम नहीं कर पाए. जवाबी हमले में माओरी बटालियन के पांव उखाड़ गए, हमले में शामिल उसके 200 में से 124 सैनिक मारे गए या घायल हुए.

24 घंटे की भीषण लड़ाई के बाद हमला रुक गया और 4 इंडियन इनफैन्ट्री डिवीजन को अपने 590 सैनिक और न्यूजीलैंड डिवीजन को 226 सैनिक गंवाने पड़े. मित्र राष्ट्रों को पता नहीं चला मगर जर्मनों को फरवरी 1944 के पहले तीन सप्ताह में 4,470 सैनिक गंवाने पड़े और वे दूसरे हमले का जवाब देने की स्थिति में नहीं रह गए.

कसीनो की तीसरी जंग : 19 फरवरी-23 मार्च 1944

बरसात के मौसम और कड़ाके की ठंड ने तीसरी लड़ाई को 15 मार्च तक टाल दिया. इस बार न्यूजीलैंड कोर ने उत्तर की ओर से कसीनो पर हमला किया और भारतीय सैनिकों ने फिर मोंटे कसीनो पर तथा न्यूजीलैंड के सैनिकों ने शहर पर हमला किया. जोरदार हवाई बमबारियों से शहर तबाह हो गया और इसके बाद 1000 से ज्यादा तोपों से हमले किए गए.

गौरतलब है कि चोटी पर स्थित मठ पर हमला नहीं किया गया. बमबारी ने एक्सिस देशों के सैनिकों को नेस्तनाबूद कर दिया लेकिन इसने मित्रराष्ट्रों की सेना के लिए भी उतनी समस्या पैदा कर दी क्योंकि उन्हें टैंकों को आगे ले जाने में मुश्किल होने लगी. कसीनो के खंडहरों में घर-घर पर लड़ाई होने लगी, जिसमें अक्सर एक ही इमारत पर दोनों पक्ष की सेनाएं काबिज होती थीं.

                   15 मार्च 1944 को न्यूजीलैंड कोर द्वारा की गई प्रगति

स्रोत: द्वितीय विश्व युद्ध का आधिकारिक इतिहास – यूनाइटेड किंगडम सैन्य श्रृंखला, भूमध्यसागरीय और मध्य पूर्व, वॉल्यूम- 5: ब्रिगेडियर सी.जे.सी. द्वारा सिसिली और इटली में अभियान. मोलोनी

मठ के पास 1/9 गोरखा, 1/4  एसेक्स, और 4/5 राजपूताना राफल्स के साईंकोन ने असाधारण शौर्य का प्रदर्शन किया और आगे बढ़कर हैंगमैन्स हिल और मोंटे कसीनो के पूरब में कुछ स्थानों पर कब्जा किया. बचाव कर रही मजबूत जर्मन सेना अपनी आखिरी दम पर पहुंच गई लेकिन डटी रही जिसके कारण आगे नहीं बढ़ा जा सका. कसीनो का किला भेदने की तीसरी कोशिश को भी नाकाम कर दिया गया.


य़ह भी पढ़ें: कम कीमत वाले ड्रोन्स से उभरते खतरे लेकिन भारत अभी इस चुनौती से निपटने के लिए तैयार नहीं दिखता


कसीनो की चौथी जंग : 11 मई – 5 जून 1944

कसीनो की चौथी और अंतिम जंग ‘ऑपरेशन डियाडेम’ का समन्वय आर्मी ग्रुप लेवल पर भरपूर साजोसामान के साथ किया गया. 8 ब्रिटिश आर्मी को लीरी घाटी के रास्ते से हमला करना था, पांचवीं यूएस आर्मी को समुद्रतट की ओर से और पोलिश कोर को मोंटे कसीनो पर हमला करना था. बढ़ी हुई संख्या के साथ 6 यूएस कोर को अंजियो में हमला करते हुए गुस्ताव रेखा के पीछे पहुंचना था.

हमला 11 मई को पूरे मोर्चे पर तोपों की भारी गोलाबारी के साथ 11 बजे शुरू हुआ. आठ डिवीजनों ने एक साथ हमला किया और जर्मनों की जबरदस्त प्रतिरोध के बावजूद हमला करने वाले आगे बढ़ते गए. अगले छह दिन दूसरे विश्वयुद्ध के सबसे भयंकर युद्ध के थे. संयुक्त हमले के कारण गुस्ताव रेखा में पूरे मोर्चे पर अतिक्रमण किया गया.

                      ऑपरेशन डियाडेम: पोलिश कोर की योजना

द्वितीय विश्व युद्ध का आधिकारिक इतिहास – यूनाइटेड किंगडम सैन्य श्रृंखला, भूमध्यसागरीय और मध्य पूर्व, वॉल्यूम- 6: भूमध्य सागर में विजय ब्रिगेडियर सी.जे.सी. मोलोनी

मोंटे कसीनो और उत्तर के पहाड़ों पर मेजर जनरल रिचर्ड हाइडरिख के जर्मन पाराट्रूपर पोलिश कोर के हमलों के आगे डटे रहे. मगर निर्णायक हमला 16 मई को किया गया. ‘अपने मोंटे कसीनो’ पर कब्जा बनाए रखने के लिए डटे जाँबाज जर्मन पाराट्रूपरों के साथ बर्बर युद्ध हुआ. लीरी घाटी में गुस्ताव रेखा का अतिक्रमण हो जाने और अंजियो में कामयाबी के बाद सेना वापसी का रास्ता खतरे में पड़ता देख बचाव कर रहे सैनिक 17 मई को भाग खड़े हुए.

कसीनो में चार जंग में मित्र राष्ट्रों की सेना को 55,000 सैनिक गंवाने पड़े, जबकि जर्मन सेना के करीब 20,000 सैनिक मारे गए और घायल हुए. इटली में भारतीय सैनिकों को बहुत सम्मान से देखा जाता है. कसीनो में भारतीय सेना स्मारक वास्तव में भारतीय सैनिकों की बहादुरी और जांबाजी के लिए उपयुक्त श्रद्धांजलि है.

(ले.जन. एचएस पनाग, पीवीएसएम, एवीएसएम (रिटायर्ड) ने 40 वर्ष भारतीय सेना की सेवा की है. वो जीओसी-इन-सी नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड रहे हैं. रिटायर होने के बाद वो आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य रहे. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: वायुसेना महज ‘सहायक’ नहीं है, CDS और सेना प्रमुखों को बिना पूर्वाग्रह के फिर से विचार करना चाहिए


 

share & View comments