यह बात सभी जानते हैं कि रवि किशन एक बेहतरीन अभिनेता हैं. लेकिन उन्हें देखते ही सबसे पहले जो तस्वीर दिमाग में आती है, वह पान चबाने वाले, गमछा डाले हुए, उत्तर भारतीय आदमी की होती है, जिसकी बोली असल जिंदगी से प्रेरित लगती है, लेकिन किसी एक इलाके की नहीं होती. यह इतना आम हो चुका है कि अगर कोई रवि किशन को सूट पहनकर अंग्रेजी बोलते हुए, या यहां तक कि सामान्य हिंदी बोलते हुए भी सोच ले, तो हंसी आ जाती है. बहुत कम अभिनेता ऐसे होते हैं जो एक ही तरह के किरदार में इतने बंध जाते हैं कि लेखक और निर्माता उन्हें किसी दूसरे रोल में सोच ही नहीं पाते. रवि किशन आज इसी दौर से गुजर रहे हैं और उन्हें इससे बाहर निकालने की जरूरत है.
पिछले दस साल में उनकी लगभग कोई भी बॉलीवुड फिल्म उठा लीजिए. हर बार वही चीजें नजर आती हैं. गले में गमछा. मुंह में पान. यूपी-बिहार वाली गहरी बोली, जो हर शब्द में साफ सुनाई देती है. और ऐसा किरदार जो या तो कानून तोड़ता है, या कानून संभालता है. उनके मामले में दोनों लगभग एक जैसे ही लगते हैं. कभी वह भ्रष्ट पुलिस अधिकारी होते हैं. कभी रिश्वत लेने वाला और दबंगई दिखाने वाला स्थानीय नेता. कभी ऐसा खलनायक जिसे आखिर में हराना जरूरी होता है. कई बार तो वह ये तीनों किरदार एक साथ निभाते नजर आते हैं.
किरण राव की 2023 की फिल्म लापता लेडीज को ही देख लीजिए, जिसे ऑस्कर के लिए नामांकन मिला और खूब तारीफ भी मिली. इसमें रवि किशन एक पुलिस अधिकारी बने हैं. और हमेशा की तरह वह पान चबा रहे हैं और बनावटी लहजे में बात कर रहे हैं. लगभग हर संवाद में “हमरा, हमरा” जोड़ दिया गया है, जैसे वही एक किरदार बन गया हो. फिल्म को एक जमीन से जुड़ा पुलिस वाला चाहिए था, इसमें कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन फिल्म के बाकी किरदारों को हर संवाद में अपनी क्षेत्रीय पहचान दिखाने की जरूरत नहीं पड़ी. सिर्फ रवि किशन के साथ ऐसा किया गया.
2017 में रणजीत तिवारी की फिल्म लखनऊ सेंट्रल में, जिसमें फरहान अख्तर थे, रवि किशन फिर “हमरा, हमरा” कहते नजर आए. वह पुलिस वालों को धमका रहे थे कि अगर उनकी बात नहीं मानी तो उन्हें ट्रैफिक पुलिस में भेज देंगे. 2022 की चर्चित सीरीज खाकी में भी उन्होंने लगभग ऐसा ही भ्रष्ट और स्वार्थी नेता निभाया. फिर 2026 में साइको सैयां आई, जिसमें उन्होंने हंटर चौहान का किरदार निभाया. वह एक जुनूनी और जहरीला इंसान है, जो एक महिला को अपना निशाना बनाता है और उसे जबरन रिश्ते में रहने पर मजबूर करता है, जहां उसे मना करने का मतलब मौत है. और इस बार भी उनके सबसे पसंदीदा सह-कलाकार वही गमछा रहा.
और भी दिलचस्प बात यह है कि दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग, जिसका यूपी-बिहार वाली इस छवि से कोई लेना-देना नहीं है, उसने भी लगभग यही ढांचा अपनाया, बस थोड़ा बदलाव कर दिया. 2014 की तेलुगु फिल्म रेस गुर्रम में रवि किशन ने सत्ता के भूखे और निर्दयी नेता शिवा रेड्डी का किरदार निभाया. फिल्म दक्षिण भारत की थी, लेकिन उनका रवैया वही था, जो बॉलीवुड पहले से उन्हें देता आ रहा था.
निभाने के लिए और भी किरदार हैं
साफ दिखता है कि बॉलीवुड दोहरे मापदंड अपनाता है और अब इसे नजरअंदाज करना मुश्किल है. दबंग सीरीज में सलमान खान और सिंघम सीरीज में अजय देवगन भी पुलिस अधिकारी बने हैं, लेकिन किसी ने उन्हें किसी क्षेत्रीय छवि में नहीं बांधा. उन्हें स्टाइल मिला, दबदबा मिला और हीरो वाला अंदाज मिला. ऐसा लगता है कि बॉलीवुड के हिसाब से यथार्थवाद सिर्फ रवि किशन जैसे कलाकारों के लिए है. जैसे कोई अनकहा नियम हो कि बड़े सितारों को बड़े हीरो की तरह दिखाया जाएगा, लेकिन हिंदी पट्टी से आने वाले कलाकारों को हमेशा गमछा, बोली और उसी छवि में बांधकर रखा जाएगा.
विडंबना यह है कि रवि किशन अपने घर की फिल्म इंडस्ट्री में पहले ही साबित कर चुके हैं कि वह एक बहुमुखी अभिनेता हैं. उनकी पहली भोजपुरी फिल्म सइयां हमार 2003 में आई थी. यह एक सामान्य रोमांटिक एक्शन फिल्म थी, लेकिन यहां वह अपने घर की भाषा भोजपुरी बोल रहे थे, न कि बनावटी लहजे वाली हिंदी. साधारण परिवार के युवक की तरह कपड़े पहने थे. पान नहीं चबा रहे थे. जिस महिला से प्यार करते थे, उसके साथ सम्मान से पेश आते थे और वही करते थे जो किसी भी रोमांटिक हीरो से उम्मीद की जाती है. इस फिल्म ने आधुनिक भोजपुरी फिल्म उद्योग को नई जिंदगी दी और यह उसकी पहली सिल्वर जुबली हिट बनी. तीन साल बाद बांके बिहारी विधायक में उन्होंने एक मजबूत इरादों वाले इंसान का किरदार निभाया, जो भ्रष्ट राजनीति और स्थानीय माफिया से लड़ता है. यह बात बीस साल पुरानी है. लेकिन बॉलीवुड आज तक वहां नहीं पहुंच पाया.
बॉलीवुड ने कुछ अच्छे फैसले भी लिए हैं. अनुराग कश्यप ने 2017 की मुक्काबाज में उन्हें नेता का किरदार दिया, लेकिन यहां उन्हें किसी तय छवि में नहीं बांधा गया. उन्हें अपनी कुर्सी से प्यार था, लेकिन वैसे नहीं जैसा दूसरी फिल्मों में दिखाया गया. उनका लहजा भी ज्यादा स्वाभाविक था, किसी फिल्मी दिखावे जैसा नहीं. फिर नेटफ्लिक्स की चर्चित कॉमेडी सीरीज मामला लीगल है आई, जिसमें उन्होंने वीडी त्यागी नाम के समझदार वकील का किरदार निभाया. वह पढ़े-लिखे हैं, स्मार्ट हैं, अच्छे कपड़े पहनते हैं, अंग्रेजी बोलते हैं, अपने विरोधियों को संभालना जानते हैं और अदालत में अपनी समझदारी से दूसरों पर भारी पड़ते हैं. यह किरदार कई परतों वाला है. वह दूसरों की मदद भी करते हैं, लेकिन उनके अपने फायदे भी जुड़े रहते हैं. इसने फिर साबित कर दिया कि रवि किशन की अभिनय क्षमता बॉलीवुड जितनी समझता है, उससे कहीं ज्यादा है.
जब उन्होंने द कपिल शर्मा शो में अपनी अंग्रेजी दिखाई तो बहुत लोग हैरान रह गए. लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए था. उसी शो में रवि किशन ने बताया कि वह गैंग्स ऑफ वासेपुर (2012) का हिस्सा नहीं बन पाए, क्योंकि अनुराग कश्यप को कथित तौर पर कहा गया था कि वह सेट पर “अनप्रोफेशनल” हो सकते हैं. लेकिन बाटला हाउस (2019) में उनके साथ काम कर चुके जॉन अब्राहम, जो उसी शो में मौजूद थे, उन्होंने रवि किशन को अपने साथ काम करने वाले सबसे प्रोफेशनल कलाकारों में से एक बताया. बाद में अनुराग कश्यप ने उन्हें मुक्काबाज में लिया और दिखा दिया कि वह क्या कर सकते हैं.
अब तक बॉलीवुड के पास यह मानने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि जिस अभिनेता को उसने सिर्फ यूपी-बिहार वाली तय छवि में बांध दिया है, उसे बिल्कुल अलग तरह से भी देखा जा सकता है. शायद अब समय आ गया है कि ऐसा ज्यादा बार हो.
विचार निजी हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: क्या विजय की TVK के पास कोई वैचारिक दिशा नहीं है?