दो दिनों तक शिकारियों की लाशें कराताश पहाड़ की बर्फीली चट्टानों पर उनके शिकार, पवित्र अर्गाली मेढ़े, के साथ पड़ी रहीं. स्टेट ड्यूमा में राष्ट्रपति के दूत अलेक्जेंडर कोसोपकिन, संसद के वरिष्ठ अधिकारी सर्गेई लिविशिन, बीयर कारोबारी बोरिस इवानोविच बेलिंस्की, लोक संगीतकार वासिली व्यालकोव, उप प्रधानमंत्री अनातोली बानिख और वन्यजीवों के आधिकारिक संरक्षक विक्टर कैमिन.
इन दोस्तों ने सरकारी ऊर्जा कंपनी गज़प्रोम की सहायक कंपनी गज़प्रोमाविया के एक हेलीकॉप्टर पर कब्जा कर लिया था, ताकि वे गंभीर रूप से संकटग्रस्त अर्गाली का पीछा कर सकें और ऑटोमैटिक हथियारों से उसका शिकार कर सकें. उन्होंने हवा से वन्यजीवों पर गोली चलाने पर लगे कानूनों को नजरअंदाज कर दिया.
साल 2009 की उस नई शुरुआत में इन लोगों के पास जश्न मनाने के कई कारण थे. हालांकि बहुत कम लोग जानते थे कि अल्ताई के बीच से एक विशाल गैस पाइपलाइन ले जाने की योजना बन चुकी थी, जिससे रूस के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक को भारी दौलत मिलने वाली थी. लेकिन यह शिकार दुखद हादसे में बदल गया. जब हेलीकॉप्टर मारे गए मेढ़े को पहाड़ से उठाने के लिए घूम रहा था, तब माइनस 26 डिग्री सेल्सियस तापमान और तेज हवाओं से लड़ते हुए पायलटों ने एमआई-171 हेलीकॉप्टर का नियंत्रण खो दिया.
चार साल बाद, गज़प्रोम ने पूर्व की ओर नया रास्ता चुन लिया और मूल पाइपलाइन परियोजना को रोक दिया गया. फिर दुनिया बदल गई. अल्ताई पाइपलाइन, जिसे पावर ऑफ साइबेरिया 2 पाइपलाइन भी कहा जाता है, अब वापस आ गई है.
एशिया की नई व्यवस्था
पिछले हफ्ते, जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उनके चीनी समकक्ष शी जिनपिंग बीजिंग में मिले, तो दोनों नेताओं ने एक ऐसी योजना पर सहमति जताई जो उनके देशों को लोहे जैसे मजबूत रिश्तों से बांध देगी.
यह योजना पहले कीमतों को लेकर मतभेद और मॉस्को की इस चिंता के कारण छोड़ दी गई थी कि वह एक ही खरीदार पर निर्भर हो जाएगा. इसके बजाय साइबेरिया पाइपलाइन को पूर्व की ओर व्लादिवोस्तोक तक बढ़ाया गया, ताकि जापान और दक्षिण कोरिया के बाजारों को सेवा दी जा सके, और वहीं से एक शाखा दक्षिण की ओर चीन तक जाती थी.
हालांकि बहुत कम जानकारी सार्वजनिक की गई है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि 2022 में समुद्र के नीचे बनी नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन को कथित तौर पर यूक्रेन द्वारा नुकसान पहुंचाए जाने के बाद यूरोप में गज़प्रोम के बाजार खत्म हो गए. इसी वजह से रूस कम कीमतों और सिर्फ एक ग्राहक वाली पाइपलाइन पर सहमत हुआ.
रूसी सरकार शायद यह मानती है कि अमेरिका और यूरोप के प्रतिबंधों से बाहर एक सुरक्षित रास्ता बनाना समझदारी है. साथ ही, रूस संभवतः अपने सबसे बड़े बाजार को जितना संभव हो उतना बेच लेना चाहता है, इससे पहले कि चीन कच्चे तेल और एलएनजी पर अपनी निर्भरता स्थायी रूप से कम कर दे.
दूसरी ओर, चीन आयातित हाइड्रोकार्बन पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वह ऐसी सुरक्षित गैस आपूर्ति को महत्वपूर्ण मानता है जो पश्चिम एशिया के संकट, पाकिस्तान की अस्थिरता, म्यांमार के गृहयुद्ध और अमेरिकी भू-राजनीतिक दबाव से प्रभावित न हो. ऊर्जा विशेषज्ञ एरिका डाउन्स ने कहा कि यह गैस और भी बेहतर लगती है, क्योंकि यह ऐसे इलाके से आती है जो अमेरिका की सैन्य पहुंच से काफी दूर है.
17वीं सदी से ही एशिया की ये दो बड़ी ज़मीनी ताकतें एक-दूसरे को शक की नज़र से देखती रही हैं. कई बार यह अविश्वास युद्धों तक पहुंच गया. रूस, जो आबादी में गिरावट और कमजोर अर्थव्यवस्था से जूझ रहा है, चीन की जरूरत महसूस करता है. लेकिन वह यह भी जानता है कि उसका पड़ोसी उसे एक जूनियर पार्टनर की तरह देखता है. विश्लेषक एलेक्सी मार्तीनोव ने पुतिन-शी मुलाकात से कुछ दिन पहले लिखा था कि बीजिंग “ऐसी सावधानी से नियंत्रित साझेदारी बनाए रखना चाहता है जिसमें चीन वरिष्ठ भागीदार बना रहे और अपनी जिम्मेदारियां कम से कम रखे.”
बहुत कम देश ऐसी अधीनता स्वीकार करेंगे. लेकिन रूस जानता है कि गलत राजनीतिक फैसलों, आर्थिक कुप्रबंधन और जनसंख्या की सच्चाई ने उसके पास ज्यादा विकल्प नहीं छोड़े हैं.
एशिया का दिल
हालांकि अमेरिकी रणनीतिकारों ने अफगानिस्तान को एशिया का दिल बताया था. उन्होंने जानबूझकर या अनजाने में यह विचार उन इस्लामी युद्ध सरदारों के राष्ट्रगान से लिया था, जिन्होंने 1992 से 1996 तक शासन किया था. अफगान राष्ट्रगान, जिसे कश्मीरी मूल के संगीतकार कासिम जो ने बनाया था, जिहाद के आह्वान और कुरान को देश का मार्गदर्शक सिद्धांत बनाने के वादे पर आधारित था.
चीन का दावा था कि एशिया का दिल शिनजियांग की राजधानी उरुमकी के पास है, क्योंकि उसके नक्शे के अनुसार यह महाद्वीप साइप्रस से जापान तक फैला हुआ है. रूसियों ने इसका केंद्र अल्ताई के किज़िल में बताया, जो 19वीं सदी में चीन से छीना गया इलाका था.
भौगोलिक सटीकता की बहस से अलग, सच यह है कि अल्ताई वही जगह थी जहां एशिया का जन्म हुआ. 1929 से यहां प्राचीन स्किथियन लोगों की बर्फ में सुरक्षित ममियां मिलीं, साथ ही धार्मिक स्मारक और पत्थरों पर उकेरी गई आकृतियां भी मिलीं. इनमें कई अर्गाली मेढ़ों की थीं, जिनका शिकार 2009 के उस हादसे में मारे गए शिकारी कर रहे थे. इसके अलावा भालू और भेड़िये जैसे दूसरे टोटम जानवरों की आकृतियां भी थीं.
यह इलाका सिर्फ प्राचीन इतिहास की वजह से महत्वपूर्ण नहीं है. यह दूरदराज का प्रांत कजाखस्तान और रूस, जो एशिया में हाइड्रोकार्बन के दो सबसे बड़े भंडार हैं, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन और मंगोलिया के बीच स्थित है.
नोवोसिबिर्स्क से मंगोलिया सीमा तक जाने वाला R256 राजमार्ग, जिसे जोसेफ स्टालिन के दौर में गुलाग के मजबूर मजदूरों से बनवाया गया था, एशियन हाईवे का हिस्सा है. यह रास्ता उरुमकी तक जाता है और वहां से शंघाई या कराची तक पहुंचता है.
19वीं सदी के मध्य से रूसी व्यापारी, जिनमें कई लोग ऑर्थोडॉक्स चर्च की बढ़ती ताकत से बचने वाले धार्मिक समूहों से थे, अल्ताई के रास्ते नाममात्र के स्वतंत्र तुवा राज्य में घुसने लगे. उनके पीछे चीनी व्यापारी भी पहुंचे.
विद्वान डेविड डालिन, जिन्होंने 1947 में सोवियत संघ की गुलाग व्यवस्था पर बड़ा खुलासा किया था, ने 1913 में अल्ताई गए एक रूसी शाही अधिकारी की डायरी में यह विवरण पाया. उसमें लिखा था, “रूसी व्यापारी, जो कठोर और क्रूर थे, उन्होंने कुछ साल पहले उधार में दी गई माचिस की एक डिब्बी के बदले आखिरी भेड़ तक छीनने या सबसे अच्छे चरागाह और घास के खेत कब्जाने में भी हिचक नहीं दिखाई.”
लेकिन तुवान लोगों का गुस्सा रूसी साम्राज्य की ताकत के सामने टिक नहीं सका. सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि स्थानीय शासकों को अपने जनजातीय प्रतीक और सत्ता के चिन्ह रूसी अधिकारियों को सौंपने के लिए मजबूर किया गया. 1914 में बेलोत्सार्स्क शहर बसाया गया और उसी साल तुवा औपचारिक रूप से रूस का संरक्षित क्षेत्र बन गया.
सोवियत क्रांति के बाद आधुनिक दुनिया ने तुवा की संस्कृति और सभ्यता को पूरी तरह बदल दिया. देश ने थोड़े समय के लिए फिर आजादी पाई, लेकिन भिक्षु से प्रधानमंत्री बने डोंडक कुलार ने स्टालिन को नाराज कर दिया, क्योंकि वह एक बौद्ध धार्मिक राज्य बनाना चाहते थे. इसके बाद 1929 में तख्तापलट हुआ और सोवियत समर्थक नेताओं को सत्ता में बैठा दिया गया.
सोवियत संघ ने तुवा को पूरी तरह बदल दिया. संगठित बौद्ध धर्म को खत्म किया गया, मठों को नष्ट किया गया और शमन परंपराओं को भूमिगत होने पर मजबूर किया गया.
रूस के कई लोगों की तरह तुवा के लोगों ने भी इन बदलावों को झेला और कई बार उनका समर्थन भी किया. नाजी जर्मनी के साथ युद्ध शुरू होने के बाद इस क्षेत्र ने अपने सोने के भंडार सोवियत संघ को दान कर दिए और यहां के कई लोग रेड आर्मी में शामिल हुए.
तुवा के सोना, प्लैटिनम और यूरेनियम भंडारों से इलाके को कुछ समृद्धि मिली. वहीं कई लोगों ने आधुनिक चिकित्सा, स्कूलों और स्थायी खेती के आने का स्वागत भी किया.
चौराहे पर खड़ा तुवा
सोवियत संघ के टूटने के बाद तुवा गहरे आर्थिक संकट में चला गया. गज़प्रोम ने सार्वजनिक सेवाओं और रोजगार का बड़ा स्रोत बनकर मदद की, लेकिन कार्यकर्ताओं ने पर्यावरण को होने वाले नुकसान और तुवा की आबादी पर पड़ने वाले असर को लेकर चेतावनी दी.
किसी को हैरानी नहीं हुई कि गज़प्रोम इन लड़ाइयों में जीत गया. लेकिन 2009 में दिखें भ्रष्टाचार और सांस्कृतिक घमंड ने कई स्थानीय समुदायों को नाराज कर दिए.
क्या चीन वह ताकत साबित होगी जो लोगों को निराश नहीं करेगी? इसमें बहुत कम शक है कि नई पाइपलाइन निवेश और रोजगार लेकर आएगी. लेकिन इसका कितना फायदा अल्ताई के लोगों तक पहुंचेगा, यह साफ नहीं है.
ऊर्जा अर्थशास्त्री जेम्स हेंडरसन ने दिखाया है कि पहली पाइपलाइन से मिलने वाला फायदा रूस की उम्मीदों से कम था. दूसरी परियोजना में लगभग तय है कि रूस को और ज्यादा रियायतें देनी पड़ी होंगी.
एक समय था जब रूस आधुनिक तकनीक और तैयार सामान का बड़ा निर्यातक था. अब वह सिर्फ ऊर्जा, निकेल और यहां तक कि खाद्य पदार्थों का सप्लायर बनकर रह गया है. कजाखस्तान या तुर्कमेनिस्तान की तरह रूस की भूमिका अब सिर्फ ड्रैगन को खाना खिलाने की रह गई है.
कम ऊर्जा कीमतों का फायदा बीजिंग को मिलता है, मॉस्को को नहीं. लेकिन रूस के पास यह चुनने का ज्यादा विकल्प नहीं है कि वह किसे और किस कीमत पर बेच सकता है.
यूरेशिया में फैला स्टील पाइपलाइनों का जाल दिखाता है कि रूस ने खुद को एशिया की नई व्यवस्था से बांध लिया है. बिना प्यार वाली हर शादी की तरह, व्लादिमीर पुतिन जिस रिश्ते में अपने देश को लेकर गए हैं, वह एक कैद की तरह है. लेकिन वहां से निकलने की कोई जगह भी नहीं है.
प्रवीण स्वामी दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका X हैंडल @praveenswami है. विचार निजी हैं.
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